Home Hindi कर्ण को चुकानी पड़ी एक असत्य की कीमत अपने प्राण दे के

कर्ण को चुकानी पड़ी एक असत्य की कीमत अपने प्राण दे के

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कर्ण को चुकानी पड़ी एक असत्य की कीमत अपने प्राण दे के

युद्ध का सत्रहवाँ दिन। कर्णार्जुन में बहुत भयानक युद्ध हुआ था। दिन अपने अंतिम चरण में था, वैसे ही इन दो महारथियों का युद्ध भी। आज कोई एक ही वापस अपने शिविर लौटने वाला था और दूसरा वीरगति को प्राप्त होने वाला था। कृष्ण नंदीघोष को एक चतुर सारथी की तरह हलचल करवा रहे थे। कुछ देर पहले ही अर्जुन को एक जीवन दान मिला था। कृष्ण ने अगर रथ को नीचे झुकाया नहीं होता, तो आज अर्जुन का शीश पृथ्वी पर होता।

तभी कृष्ण ने देखा कि कर्ण ने युद्ध रोक दिया है व अपने सारथी शल्य को कुछ कह रहा है। थोड़ा देखने पर समझ आ गया कि कर्ण का रथ का पहिया धरती में फँस गया है। उसी को निकालने के लिये ही उसने युद्ध रोका है और फिर नीचे उतर कर वो पहिया निकाल रहा है। कृष्ण ने देखा कि अर्जुन ने भी गांडीव नीचे रख दिया है। पर यह ऐसा मौका था जो कृष्ण हाथ से जाने नहीं देना चाहते थे। उन्होंने अर्जुन को यह बात बताई, उसको समझाया व कर्ण का वध करवा दिया। कर्ण ने उस समय ब्रह्मास्त्र का स्मरण किया, पर वो उसे याद नहीं आया। आना ही नहीं था।

कर्ण के साथ एक शाप था, जो उसे तब मिला था जब वो महेंद्र पर्वत पर महर्षि परशुराम से ब्रह्मास्त्र लेने गया था। जब कर्ण ने अपने कवच-कुंडल दान कर दिए तो दुर्योधन ने उसको ब्रह्मास्त्र प्राप्त करने के लिए कहा। कर्ण ने ब्रह्मास्त्र लिया तो परशुराम से था, परंतु यह उसने झूठ बोल के लिया था। परशुराम का नियम था कि वो किसी क्षत्रिय को शिक्षा नहीं देंगे। कर्ण क्षत्रिय था, पर यह बात उसे पता नहीं थी, वो खुद को सारथी का पुत्र ही मानता था।

लेकिन परशुराम को उसने बताया कि वो एक ब्राह्मण है। परशुराम ने इस बात पर विश्वास कर के उसे ब्रह्मास्त्र दे दिया। परंतु जब उन्हें सच का पता चला तो वे बड़े क्रोधित हुए। इसी क्रोध में उन्होंने कर्ण को शाप दिया कि जिस ब्रह्मास्त्र के लिए उसने झूठ बोला, उसी को वह तब भूलेगा जब उसको उसकी सबसे ज्यादा जरूरत होगी।

यही हुआ। जब युद्ध के सत्रहवें दिन कर्ण का सबसे महत्वपूर्ण युद्ध था, जब अर्जुन को मारने का सबसे अच्छा मौका था, तभी उसे ब्रह्मास्त्र याद नहीं आया व उसकी मृत्यु हुई। तो कहने का मतलब यह है, कि आपका बोला या किया हुआ असत्य आपको ऐसे वक्त चोट पहुँचाता है, जब आपको उसकी उम्मीद नहीं होती। यह शाश्वत सत्य है।

लोग झूठ बोलकर, गलत तरीक़ों से ऊँचाई पर जरूर पहुँच जाते है, पर यह स्थायी नहीं होता। अंतिम में जीत सच की ही होती है और झूठ बहुत भारी कीमत वसूलता है। जिसमें आपका मान-सम्मान भी चला जाता है और आप जितनी ऊँचाई पर होते हैं उतने ही नीचे गिरते हैं।

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