मैं हिंदू हूँ, मैं थक गई हूँ, और मैं क्रोधित हूँ

मैं एक भारतीय हिंदू हूँ, और मैं थक गई हूँ और मैं क्रोधित हूँ

मैं थक गई हूँ, मेरे धर्म पर, मेरे त्योहारों पर, मेरी परंपराओं और विश्वासों पर, मेरी जीवनचर्या पर निरंकुश हमलों से।

मैं थक गई हूँ एक हिंदू के रूप में मुझे अपमानित करने के लगातार अनथक प्रयासों से। मैं थक गई हूँ अपने देवताओं, पवित्र प्रतीकों, मेरे पूजा अर्चना के तरीकों का बार बार उपहास उड़ाये जाने और अपमानित किये जाने से। मैं थक गई हूँ बॉलीवुड, तथाकथित पत्रकारों, छद्म बुद्धिजीवियों के हिन्दुविरोधी व्यवहार से जिसे वो बड़े आनंद और उत्साह से दर्शाते हैं।

मैं थक गई हूँ अपने ही देश में अपने मौलिक अधिकारों के व्यवस्थित कानूनी और संवैधानिक उत्पीड़न से। मैं थक गई हूँ सरकारों द्वारा मेरी शैक्षिक संस्थानों को बंद करने के लिए मजबूर होने के कारण (शिक्षा का अधिकार कानून मात्र हिन्दु संचालित शिक्षा संस्थानों पर ही लागू है)।

मैं थक गई हूँ हर तरह की सरकारों द्वारा (नीली, हरी, भगवा सभी दलों की) अपने मंदिरों के दुधारु गाय कि तरह शोषित किये जाने से। सरकारें मात्र हिन्दु मन्दिरों पर ही नियन्त्रण रखती है जैसे वैष्णो देवी श्राईन बोर्ड, तिरुपति देवस्थानम बोर्ड, जो भी चढ़ावा आता है वो सरकारी खजाने में तो जाता है पर उपयोग होता है अन्य कार्यो में।

मैं थक गई हूँ अपने अस्तित्व पर हो रहे निरंतर व कठोर हमलों से। मैं थक गई हूँ मीडिया-शिक्षा-एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में काबिज कम्युनिस्टों और क्रिस्लामियों के हमलों से।

मैं थक गई हूँ उन लोगों की निष्क्रियता से जो हमने अपने नेताओं के रूप में चुने थे, लेकिन इस सबसे बढ्कर, मैं थक गई हूँ आम शहरी, पश्चिमी पद्धति शिक्षित दब्बू हिंदूओं के अपने धर्म से विमुख होने से।

मैं थक गई हूँ हिन्दुओं को विभाजित करने के निरंतर, अच्छी तरह से वित्त पोषित, अच्छी तरह से योजनाबद्ध, व्यवस्थित रूप से चलने वाले अभियानों से।

और मैं थक गई हूँ इस बात से कि हम कितनी आसानी से एक क्षण में विभाजित हो जाते हैं। जाति, भाषा, भोजन, लिंग, कोई भी बहाना हमें छोटे छोट समूहों में विभाजित करने के लिए काफी है!

मैं थक गई हूँ ऐसे लोगों से जो आसानी से हर इस्लामी आतंकवादी हमले के बाद बडी शिद्दत से कह देते है कि “लेकिन, परन्तु आतंकवाद का कोई धर्म नहीं है” लेकिन हर छोटी से छोटी घट्ना के लिये सम्पूर्ण हिंदू समाज को दोषी ठहराये जाने का सम्पूर्ण प्रयास करते है।

और मैं थक गई हूँ उन हिन्दुओं से जो ऐसे हर प्रयास को बढावा देते हैं और गर्व से अपनी आस्तीन पर इसे सम्मान के एक प्रतीक की तरह स्वेच्छा से पहनते हैं। मैं थक गई हूँ मूर्ख धिम्मी हिंदुओं के बेकार बिना कारण के अपराध बोध से, जो यह नहीं समझते कि इस्लामियों की नजर में हम सभी काफिर हैं, यहां तक ​​कि मूर्ख धिम्मी हिंदू भी।

मैं शर्मिंदा हूँ हिंदू संभ्रांत वर्ग की तथाकथित शर्मिंदगी (जैसा कि पिछ्ले दिनों बॉलीवुड ने दिखाया) और क्रिस्लामियों के सामने उनके आत्म समर्पण से जो अपने स्वार्थ के लिए हिंदू विरोधी प्रचार मेंउत्साहपूर्ण तरीके से भाग लेते है। जो ये नहीं समझते की जिन लोगों के ये तलुवे ये चाट रहे है वो हर बार उन्हें रौन्द कर आगे बढ़ जायेंगे।

मैं थक गई हूँ तथाकथित हिंदू नेतृत्व से जो हर बार हिंदू हितों को उन्ही क्रिस्लामियों के सामने बेच देते है जो खुले तौर पर हिन्दुओं और उनके त्योहारों , परंपराओं और विश्वासों का तिरस्कार करते हैं।

मैं थक गई हूँ उन अर्थहीन सरोकारों से जैसा कि हमारे कुछ लोग यह बताते हैं कि कैसे प्रतिशोध “हिंदू मार्ग या तरीका” नहीं है और हम सभी को हर अपमान को नरम रूप से स्वीकार कर लेना चाहिएक्योंकि हम ही एक “सभ्यता है जो किसी तरह बच गए” हैं। क्या यह मजाक है? कॉकरोच भी तो जीवित रहे, लाखों कि सँख्या मे हर साल विनाश होने के बावजूद, क्या इसका मतलब यह है कि कॉकरोच का कोई सम्माननीय अस्तित्व है?

हम सभ्यताओं के युद्ध के बीच में हैं, और यदि आप हिंदू हैं और इसे देख नहीं सकते हैं, या आप इसे नहीं देखना चाहते, तो आप सर्वथा हारने योग्य हैं।

इतने सारे क्षण हैं जब मैं खुद से पूछती हूँ कि क्या यह लड़ाई लड्ने के लायक है? ऐसे दिन होते हैं जब मैं नाराजगी को पीछे छोड़ और उन चीजों पर ध्यान केंद्रित करती हूँ जिसमे मुझे खुशी मिलती है – मंदिर, बुनकर वस्त्र और यात्रा के त्रि-सूत्र!

और फिर, मैं एक भारतीय गांव की यात्रा पर जाती हूँ और मिलती हूँ ऐसे लोगों से जिन्हे अपने हिंदू होने पे गर्व है। मैं देखती हूँ एक ऐसा अद्भुत प्राचीन मंदिर जो एक ही ठोस चट्टान को ऊपर से नीचे की तरफ खुदाई करके बनाया गया है, मैं देखती हूँ ऐसे बुनकरों को जो रोज काम शुरू करने से पहले अपने करघे को सबसे पहले नमन करते हुए, जो अपने काम के साथ उनके एक गहरे आध्यात्मिकसंबंध को दिखाता है। और मुझे मिलता है हिन्दू होने का अर्थ जो लोगों को उनकी जड़ों से जोड़ता है, उन्हे आधार देता है और इन सबमे मिलता है मुझे एक नया जोश, एक नयी स्फूर्ति।

सदियों से, उन्होंने हमारे मंदिरों को नष्ट किया, हमारी देवमूर्तियों को तोड़ा, हमारी महिलाओं के साथ बलात्कार किया, हमारे बच्चों को गुलामी में बेच दिया, फिर भी हमारे पूर्वज अपने धर्म पर टिके रहे। ये साधारण लोग थे, जिनके पास साधनों की कमी थी, कम पढ़े लिखे लोग, लेकिन उनके पास था तो एक महान व दॄढ विश्वास। हां, मैंने देखा है उसी दॄढ्ता, उसी विश्वास के साथ धर्म का पालन होते हुए।

अपने धर्म पर हो रहे लगातार हमलों की पराकाष्ठा को देखते हुए जागॄत हिंदुओं के रूप में लड़ाई करना हमारा कर्तव्य हमारा धर्म है। हाँ, जो कुछ हमारे पास है उसको बचाने के लिये लड़ना हमारा कर्तव्य है। जैसा कि सीताराम गोयल ने एक बार कहा था “हर जागॄत हिंदू मस्तिष्क, धर्म के लिए एक सैनिक है”।

याद रखें,

धर्मेविहतोधधर्मोरक्षतिरक्षितः

धर्म उन लोगों की रक्षा करता है जो इसे सुरक्षित करते हैं!

(इस्लाम में धिम्मी (dhimmi उर्दू में जिम्मी) उस व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह को कहते हैं जो मुसलमान नहीं है और शरियत कानून के अनुसार चलने वाले किसी राज्य की प्रजा है। इस्लाम के अनुसार इन्हें जीवित रहने केलिये कर (टैक्स) देना अनिवार्य है जिसे जजिया कहा जाता है। धिम्मी को मुसलमानों की तुलना में बहुत कम सामाजिक और कानूनी अधिकार प्राप्त होते हैं। लेकिन यदि धिम्मी इस्लाम स्वीकार कर ले तो उसको लगभग पूराअधिकार मिल जाता है)

(शेफाली वैद्य का लिखा लेख, द्वारा हिन्दी में अनुवादित)

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