Sunday, August 9, 2020
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गणेश कुमार को कोस कर कुछ नहीं मिलेगा, समस्या का ‘श्री गणेश’ कैसे हुआ ये सोचिए

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K. S. Dwivedi
नया कुछ भी नहीं है, सब सुना हुआ ही है यहाँ.
 

बिहार बोर्ड के परिणाम घोषित हुए और अगले ही दिन ये सुर्ख़ियों में था. सुर्ख़ियों में होने की वजह थोड़ा दुखद थी. बारहवीं कक्षा के कला वर्ग के टॉपर गणेश कुमार, टीवी पत्रकारों को बेसिक सवालों के उत्तर भी नहीं दे पा रहे थे. संगीत के प्रैक्टिकल में सबसे ज्यादा अंक लाए लेकिन सरगम भी ठीक से नहीं सुना पाए.

और तो और, बाद में पता चला कि इन्होंने उम्र कम दिखाने के लिए कागजों में भी हेराफेरी की थी. अंततः पुलिस ने उनको पूछताछ के लिए हिरासत में लिया और अब उनपर कानूनी कार्रवाई की जा रही है. कुछ ऐसा ही पिछले साल भी हुआ था. बारहवीं की टॉपर रूबी राय को न तो पॉलिटिकल साइंस बोलना आता था और ना ही ये पता था कि उसमें क्या पढ़ाया जाता है.

लेकिन इनसे ज्यादा दुखद भी थीं कुछ बातें. कुछ बहुत महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार करने का मौका हो सकता था ये लेकिन हर बार की तरह इस बार भी हम चाँद को छोड़ उसकी तरफ इंगित करने वाली उंगली पर ध्यान लगाए रहे.

मीडिया का अत्यधिक गैर-जिम्मेदाराना रवैया तो अपेक्षित है, आखिरकार बिहार को एक बार फिर से अनपढ़, गंवार, भ्रष्ट दिखाने का मौका था. बिहार है भी कुछ हद तक लेकिन इन मुद्दों पर मीडिया की अति-सक्रियता संदेहास्पद रही है. लेकिन सबसे ज्यादा दुखद बात रही सोशल मीडिया पर लोगों के विचार.

नितीश कुमार के प्रति गुस्सा जायज हो सकता है लेकिन किसी राजनेता की तरह हर बात को नितीश से जोड़ देना उतना ही दुखद है जितना भ्रष्टाचार को हर अपराध की वजह बता देना.

भ्रष्टाचार अपने आप में कोई कारण नहीं बल्कि एक साधन है. मैं नितीश का प्रशंसक नहीं हूँ लेकिन इस मुद्दे का दोषारोपण नितीश पर किये जाने से आहत इसलिए हूँ क्योंकि ऐसा करने की वजह से ये मात्र एक राजनीतिक दोषारोपण बन कर रह गया. हमार ध्यान चाँद को छोड़ ऊँगली पर चला गया. कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाये जा सकते थे, वो सब दब गए.

 

इस पूरे प्रकरण में मुझे दो बातें कहनी हैं:

सबसे पहली बात कि ये नितीश कुमार की देन नहीं है. ना ही सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार इसका मूल कारण है. भ्रष्टाचार इसका माध्यम या साधन अवश्य है लेकिन मूलभूत कारण नहीं.

इसका कारण है शिक्षा के प्रति हमारा नजरिया और गिरता हुआ उद्देश्य. ये प्रक्रिया शुरू मैकाले ने की थी, और अभी तक आने वाली हर सरकार ने जारी रखी है. सरकार ही नहीं, हमारा समाज भी उतना ही दोषी है. शिक्षा एक यात्रा है, गंतव्य नहीं.

 

हम शिक्षा को एक प्रक्रिया न मानकर डिग्री तक पहुँचने का साधन मानते हैं. और ‘डिग्री’ और ‘सर्टिफिकेट’ को ही शिक्षा का पैमाना बना दिया गया है. हमारा उद्देश्य शिक्षा नहीं, डिग्री बन गया है. हम शिक्षा नहीं चाहते, उसका सबूत चाहते हैं.

और यही वो वजह है कि अभिभावक अपने पाल्य को शिक्षा नहीं बल्कि येन-केन प्रकारेण डिग्री दिलाना चाहते हैं. विद्यार्थी भी शिक्षा में नहीं शिक्षा के ‘सर्टिफिकेट’ में रूचि ले रहे हैं. एक व्यक्ति जो एक गरीब घर से निकलने के बावजूद न सिर्फ एक कुशल राजनेता बना बल्कि भारत का प्रधानमंत्री बन गया, जो हमारे विश्वविद्यालयों में राजनीति शाश्त्र में अध्ययन और शोध का विषय होना चाहिए, हम उसकी ‘राजनीति शाश्त्र’ की डिग्री खोजते हैं.

हमसे बहुत बेहतर थी वो पीढ़ी जिसकी साक्षरता दर हमसे बहुत कम थी. अनपढ़ कबीर दास की डिग्रीयां खोजने के बदले कबीर दास को पढ़कर पीएचडी कर ली. अगर पैसे देकर डिग्री खरीद लेना अपराध है तो पिछले पांच साल के सवाल पढ़ कर डिग्री पा लेना भी अपराध ही है. आई आई टी से इंजीनियरिंग सिर्फ MBA में आसानी से दाखिला लेने के लिए करना भी गलत है. नैतिक अपराध तो है ही. रूबी राय या गणेश कुमार प्रकरण के लिए नितीश उतने ही दोषी हैं जितने मैं, आप या कोई भी और. हमारा पूरा समाज दोषी है इसका, जिसने शिक्षा से ज्यादा महत्वपूर्ण डिग्री और ‘मार्क्स’ को बना दिया है.

दूसरी और सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात ये कि, ये बिहार की समस्या नहीं है, पूरे देश की समस्या है.

बिहार को शर्मसार करने की हमारी अति-सक्रियता का एक कारण ये भी है कि हम भी उसी शिक्षा व्यवस्था से निकले हैं. अपना अपराधबोध छिपाने की अचेतन कोशिश हो सकती है ये. बच्चे के मरने पर डायन ज्यादा जोर से रोती है. हाजीपुर के किसी सरकारी प्राइमरी स्कूल से लेकर आई आई टी और आई आई एम तक की यही हालत है. किसी परीक्षा को उतीर्ण करके डिग्री ले लेना और उस डिग्री के भरोसे खींच-खांच कर एक नौकरी पा लेना जीवन की आवश्यकता तो हो सकती है लेकिन योग्यता का पैमाना और शिक्षा का उद्देश्य नहीं.

राजधानी दिल्ली का कौन सा ऐसा शिक्षण संस्थान है जिसके बाहर “रेडीमेड प्रोजेक्ट रिपोर्ट और थीसिस” नहीं बिकती? कौन सा ऐसा आई आई टी है जहाँ बाज़ार से खरीदे हुए प्रोजेक्ट नहीं जमा होते? कितने ऐसे संस्थान हैं जहाँ विज्ञान में रिसर्च के नाम पर प्रोफ़ेसर और गाइड के घर सब्जी, दूध और गैस का सिलिंडर नहीं पहुँचाया जाता?

आप खुद एक बार याद कीजिये जब आप पढ़ते थे तब क्या आपका उद्देश्य विषय को जानने से ज्यादा उसमें अधिकतम अंक लाना नहीं था? भारत की ‘बूमिंग’ आई टी इंडस्ट्री में 90% लोग ऐसे हैं जो एक दिन अगर गूगल बंद हो जाए तो राहुल गांधी के बौद्धिक स्तर पर पहुँच जायेंगे.

80% चिकित्सक “कुछ दिन ये दवाई खाओ, फिर दवाई बदल के ट्राई करेंगे…” पद्धति से इलाज कर रहे हैं और ‘भगवान’ बने हुए हैं. मेरा व्यक्तिगत अनुभव तो ऐसा ही रहा है. इंजीनियरिंग जैसी पढ़ाई में भी शिक्षक यही बोलते पाए गए कि “आज हम ये टेक्नोलॉजी पढेंगे, परीक्षा में में ये ऐसे-ऐसे पूछा जाता है और उत्तर में कैसे लिखा जाएगा वो मैं आपको लिखवा दूंगा.” उनका उद्देश्य विद्यार्थियों को इंजिनियर बनाना नहीं बल्कि इंजीनियरिंग की परीक्षा पास करवा कर डिग्री दिलवाना था. और कमोबेश सारे विद्यार्थियों की भी यही इच्छा थी. वो हमको यही सिखाते रहे कि लाप्लास ट्रांसफॉर्म कैसे निकाला जाता है, क्यों निकाला जाता है, वो बताने की जरूरत उन्होंने नहीं समझी. कला, विज्ञान, वाणिज्य अथवा चिकित्सा, हर जगह कमोबेश यही हाल है.

नितीश को दोषी बताने में राजनीतिक दलों के निहित स्वार्थ हैं, लेकिन हमको ये मौका मिला है आत्मावलोकन का. राजनीतिक रोमांस से ऊपर उठकर समाज के बारे में सोचने का. गरीबी और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर विचार करने के हजारों मौके मिलते हैं, लेकिन इन मुद्दों पर बात करने के मौके कम ही आते हैं.

खराबी हमारी शिक्षा व्यवस्था में ही नहीं, हममें भी है. राजकुमार हिरानी ने यही सब शिक्षा देने के लिए “3 इडियट्स’ फिल्म बनायी थी, उससे भी हमने ये शिक्षा तो नहीं ली, लेकिन शादी के मंडप से दुल्हन को भगाना जरूर सीख लिया.

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