शहरी नक्सलियों से देश को बचाइए

सुकमा में नक्सली हमले में शहीद हुए जवानों के परिजनों के मदद के लिए गौतम गंभीर अब सामने आ गये हैं. दरसल वे अपने मदद की बात सबसे छुपाना चाहते थे लेकीन आखिर ये बात सामने आ ही गयी. लेकिन मेरा ये आर्टिकल आज सिर्फ गौतम गंभीर पे नहीं बल्की उन लोगों पर ज्यादा है जो सिर्फ देश को तोड़ने वालों की बात करते हैं.

कई टीवी चैनेल पर नक्सली विचारधाराओं के लोगों को टीवी डिबेट के नाम पर अपनी विचारधारा देश में फैलाने के लए बुलाते हैं. जंगल के नक्सली से ज्यादा खतरनाक तो शहर के ठंडे कमरे में बैठा नक्सली सबसे ज्यादा खतरनाक है. जंगल के नक्सली सिर्फ शरीर पे वार कर सकते हैं और उनके लिए हमारी सेना काफी हैं, लेकिन जो ए.सी. लगाकर ठंडे कमरों में बैठकर देश की विचारधारा को मार रहे हैं उनसे हमें खतरा ज्यादा है और ऐसे लोगों की तादाद आजकल बढने लगी हैं. इसे हमें रोकना ही होगा.

जंगल वाले नक्सलियों से निपटने के लिए हमारे जवान हैं. पर जो शहर में रहने वाले हैं और टीवी पे आकर प्राईम टाईम में बैठ कर उनके लिए रोना रोते हैं, उनसे कौन निपटेगा? क्यूंकी जंगल के नक्सली सिर्फ शरीर पर हमला करते हैं लेकिन शहरो में रहने वाले ये सुट बूट के नक्सली बच्चों के दिमाग पे वार करते हैं. हाँ इससे जानमाल का नुकसान दिखता नहीं लेकिन वो बच्चे और जवान युनिव्हर्सिटी में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ नारा जरूर लगाते हैं.

सरकार हमेशा की तरह खामोश

इस बार भी सरकार ने इस नक्सली हमले की निंदा की है, और जवाब देने की बात कही है. लेकिन जवाब कब मिलेगा? पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राईक कर दी, लेकिन अब उस बात को ६ महीने हो गये हैं, और बीजेपी आज भी वही ढोल पीट रही है जैसे काँग्रेस १९४७, १९६५ और १९७१ का ढोल पीटती है. मरनेवाले र्सिर्फ जवान नही होते हैं, उनके साथ मरते है उनके परिवारवाले, नई नवेली दुल्हन, बच्चों के सपने. टीवी वालों के पास दिखाने के लिए कन्हैया और रोहित वेमुला का परिवार है और पत्थरबाज को जीप पे बांधने के बाद उसके घर तक पहुंचने वाला मीडिया (१, २ को छोड़कर) कभी आर्मी के परिवार वालों के घर जवान के अंतिम संस्कार के १२ दिन बाद कभी नही पहुंचती है.

झूठी पत्रकारिता कब तक?

आजकल दिल्ली मे कई पत्रकार घूम रहे हैं. जो बड़ेबड़े कमरों में बैठते हैं और कहते हैं कि आर्मी तो सबपर जुल्म कर रही है. इनके लिए कन्हैया और खालिद जैसे लोग हीरो होते है लेकिन कभी जवानों के कुर्बानी पर एक आंसू नहीं बहाते. सबको पता है कौन सा न्यूज चैनेल नक्सली विचारधारा को समर्थन करता है और कौन सा नहीं. कुछ लोग टीवी डीबेट मे उन नक्सली विचारधाराओं के लोगों को फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन ने नाम पर बुलाते है और उनकी विचारधारा पूरे देश मे फैलाना चाहते है.

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