देश को मोदी-योगी जैसे नेता चाहिये, केजरीवाल जैसे नहीं

केजरीवाल के चाल, चरित्र और चेहरे को बेनकाब करने वाले सबसे ज्यादा लेख शायद मैंने ही लिखे हैं. १८ मार्च २०१४ को भी केजरीवाल को बेनकाब करता हुआ मेरा लेख प्रकाशित हुआ था, जिसका शीर्षक था: “केजरीवाल: महानायक से खलनायक बनने तक का सफर”. मीडिया ने तो दिल्ली MCD चुनावों के बाद उन्हें खलनायक घोषित किया है लेकिन मेरे हिसाब से तो वह इस “सम्मान” के अधिकारी आज से लगभग तीन साल पहले ही हो चुके थे, उसी के चलते २०१४ के लोकसभा चुनावों में भी उनका सूपड़ा साफ़ हो गया था लेकिन, मोदी की २०१४ की जीत से बौखलाए अल्पसंख्यक वोटों के ध्रुवीकरण के चलते केजरीवाल ६७ सीटों के साथ दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए.

केजरीवाल किसी भी कारण से मुख्यमंत्री बने हों, लेकिन उनके पास अपने आप को साबित करने का एक बेहतरीन मौका था- जिन मुद्दों को वह अन्ना आंदोलन के वक्त और उससे पहले जोर शोर से उठाने की नौटंकी कर रहे थे, उन्हें अमली जामा पहनाने का भरपूर मौका उनके पास था. जनता ने दिल खोलकर बहुमत दिया था. मेरे जैसे लोग तो खैर हैरान थे, क्योंकि मुझे यह मालूम था कि ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला है- काम करना केजरीवाल की फितरत में नहीं है. अपनी पढाई पूरी करने के बाद केजरीवाल को पहली नौकरी टाटा ग्रुप में मिली थी, काम करने की नीयत नहीं थी, लिहाज़ा वह नौकरी छोड़कर भारतीय राजस्व सेवा में आये, लेकिन यहां भी काम करने की वजाये पहले तो लम्बी छुट्टे लेकर “स्टडी लीव” पर चले गए और जब वापस आये तो यह नौकरी भी छोड़ दी और लगे NGO चलाने. NGO चलाने का अपना ही मज़ा है. कुछ किये बिना NGO में विदेशों से भेजे हुए पैसों पर मौज करो. अब सरकार ने ऐसे NGO पर नकेल कसनी शुरू भी की है तो केजरीवाल के बिरादरी के और लोग जो NGO चला रहे हैं, उन्हें भारी तकलीफ हो रही है.

केजरीवाल की ६७ विधायकों वाली प्रचंड बहुमत की सरकार बने लगभग दो साल से ऊपर का समय हो चुका है और इन दो सालों में उनका फोकस काम करने पर कम था और इस बात पर ज्यादा था कि किस तरह से काम न कर पाने के लिए “मोदी और भाजपा” को जिम्मेदार ठहराया जाए. अपनी इस बहानेबाज़ी को उन्होंने जनता के खर्चे पर प्रचारित भी किया. जगह जगह बड़े बड़े पोस्टर और होर्डिंग लगवाए, जिन पर लिखा था- “हम काम करते रहे, वह हमें परेशान करते रहे.” काम क्या हो रहा था, वह सिर्फ इस पार्टी के कार्यकर्ताओं को मालूम था, जिसका खुलासा शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट में भी हुआ है और जिनके कारनामों की मैं अपने अलग अलग ब्लॉग में चर्चा भी कर चुका हूँ.

मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ यह लिखना चाहता हूँ कि केजरीवाल ने पिछले २ सालों में “काम” कम और “कारनामे” ज्यादा अंजाम दिए हैं, इसी वजह से लोग केजरीवाल और उनकी पार्टी से बुरी तरह खिसियाये हुए थे और वह सिर्फ उस मौके का इंतज़ार कर रहे थे कि कब इन्हे दिल्ली से बाहर का रास्ता दिखाया जाए. चुनावों के जरिये दिल्ली की जनता ने अपना निर्णय सुना दिया है. भाजपा पिछले १० सालों से MCD में थी और अगर केजरीवाल ने पिछले दो सालों में ठीक से काम किया होता तो उन्हें यह MCD चुनाव जीतने में कोई मशक्कत नहीं करनी पड़ती लेकिन जनता यह अच्छी तरह समझ चुकी है कि काम करना केजरीवाल जी की फितरत में नहीं है, यह सिर्फ काम से बचना चाहते है, उसके लिए इन्हे किसी भी व्यक्ति पर कैसे भी आरोप क्यों न लगाने पड़ें. दिल्ली और देश की जनता इस तरह की नौटंकियों से अब ऊब चुकी है और हालिया चुनाव नतीजों में जनता की इस सन्देश को बहुत साफ़ साफ़ देखा जा सकता है कि देश को अब मोदी-योगी जैसे काम करने वाले नेताओं की जरूरत है, केजरीवाल जैसे बहानेबाज़ों की नहीं.

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