Thursday, June 20, 2024
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बुद्धिजीवियों, अपनी ना-समझी का दोष वेदों को मत दो

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डॉ साम्बे जी का एक लेख “विकृत धार्मिक विचारोंसे भी बनते हैं शहर-शहर बुलंदशहर!” पढ़ा| समाज मे फैली घृणित मानसिकता को उन्होने जिन श्लोकों से जोड़ने की कोशिश की, वह अच्छा नहीं लगा| उनके द्वारा श्लोकों की ग़लत व्याख्या करने पर विश्व गौरव ने भी लेख लिखा , “भारतीय साहित्य व परंपराओं को गलत पेश न करें”| मैं इन दोनो ही लेखकों की तरह बहुत अधिक पढ़ा लिखा तो नहीं हूँ, लेकिन कुछ ऐसे ही उदाहरणो के द्वारा कोशिश करूँगा कि साम्बे साहब जैसे बुद्धिजीवियों की ग़लतफहमी दूर हो सके| काफ़ी दिनों से कुछ ऐसे ही तथा कथित कवि एक बुद्धिजीवी लोग श्री रामचरित मानस की एक चौपाई को बड़ी ही हेय दृष्टि से देखते हैं और उसका ग़लत अर्थ समझाते हैं , वो चौपाई है :

शूद्र गवाँर ढोल पशु नारी ! सकल ताड़ना के अधिकारी !!

इस चौपाई की व्याख्या करना , मेरे बस की बात नहीं. लेकिन एक बात कहना चाहूँगा कि बिना समास, रस और अलंकार के काव्य कुछ भी नहीं होता| और इन्हीं रस , समास और अलंकारों की ही वजह से काव्य की शोभा बढ़ती है| काव्य को उनके शाब्दिक अर्थ से ही यदि समझने की कोशिश करेंगे तो आप गुड़ का गोबर कर देंगे| मैं यहाँ पर श्लेष अलंकार से युक्त एक पंक्ति को उद्धृत करना चाहूँगा, आप उसके शाब्दिक अर्थ को समझिए और फिर उन पंक्तियों को अलंकार के तहत समझिए ! आपको डॉ साम्बे साहब और कवि के विचारों मे फ़र्क नज़र आएगा :

चरण धरत, चिंता करत, चितवत चारहूँ ओर !
सुबरन को खोजत फिरै , कवि व्यभिचारी चोर !!

इस पंक्ति मे कवि, व्यभिचारी और चोर तीनो सिर्फ़ एक ही वस्तु की हमेशा तलाश करते हैं , वो है सुबरन| तो क्या साम्बे साहब यह कहना चाहेंगे कि व्यभिचारी जिस “सुबरन” अर्थात सुंदर स्त्री की तलाश करता है उसी की तलाश मे कवि भी है | उत्तर होगा नहीं ! क्योंकि कवि जिस सुवरन की तलाश मे है उसका अर्थ है “सुंदर वर्ण” उसकी रचना के लिए| और चोर के लिए वही सुवरन “सोना” (GOLD) है ! यदि इससे समझ मे ना आए तो रहीम जी का लिखा हुआ पढ़ लीजिए :

रहिमन पानी रखिए, बिनु पानी सब सून !
पानी बिना ना उबरै मोती मानस चून !!

यहाँ पर तो पानी का एक ही अर्थ तीनो के लिए समान तो नहीं होंगे ना? सूरदास की एक रचना है , जिसमे उन्होंने उद्धव और गोपियों के बीच के संवाद को लिखा है| गोपियाँ , उद्धव जी से कहती हैं :

कहत कत परदेसी की बात ।

मंदिरअरध अवधि बदि हमसौ, हरि अहार चलि जात ।।

ससिरिपु बरष, सूररिपु जुग बर, हररिपु कीन्हौ घात ।

मघपंचक लै गयौ साँवरौ, तातै अति अकुलात ।।

नखत, वेद, ग्रह, जोरि अर्ध करि, सोइ बनत अब खात ।

‘सूरदास’ बस भईं बिरह के, कर मीजैं पछितात ।।

यदि आप इस रचना के शाब्दिक अर्थ को समझेंगे तो इसका अर्थ आप पूरे जीवन मे नहीं लगा सकते| इस काव्य की यही विशेषता है| इस काव्य की रचना अपने आप मे उत्तम है| इसका अर्थ समझिए :सूरदास जी लिखते हैं कि गोपियाँ उद्धव जी से कहती हैं कि आप किस परदेसी (श्री कृष्ण जी) की बात कर रहे हैं|

प्रथम लाइन — मंदिर (घर) अरध (आधा) अर्थात घर का आधा , ड्योढ़ी जिसको पाख बोलते हैं, पाख मतलब पक्ष , और पक्ष का अर्थ लिया 15 दिन| हरि (सिंह- शेर) ,आहार- भोजन ! सिंह का भोजन अर्थात माँस, माँस को लिया मास के रूप मे , मास का मतलब महीना |

द्वितीय लाइन — ससि (चंद्रमा) रिपु -शत्रु ! चंद्रमा का शत्रु- यानी रात का शत्रु दिन , वर्ष के समान और सूर (सूर्य) रिपु यानी दिन का शत्रु रात्रि , युग के समान गुज़रता है ! हर (महादेव) रिपु – कामदेव (विरह की वेदना ) हमेशा सालती रहती है ! (तृतीय लाइन )मघ (मघा नक्षत्र) से पंचक (पाँचवा) – चित्रा नक्षत्र , चित्रा का अर्थ लिया चित अर्थात मन से ! और सांवरो का अर्थ लिया श्री कृष्ण जी से ! (चतुर्थ लाइन)नखत (नक्षत्र-27) वेद (4) ग्रह (Planet-9) जोरि (जोड़) अर्ध (आधा) 27+4+9=40, 40/2=20 (बीस), बीस को लिया विष के अर्थ मे (पंचम लाइन)

अंत मे मैं सिर्फ़ इतना ही कहना चाहूँगा कि ये तीनों उदाहरण बहुत प्राचीन नहीं हैं , लेकिन फिर भी इनके अर्थ बड़े ग़ूढ हैं| जब इनको समझना कठिन है तो वेदों को कैसे समझेंगे |इसलिए अपनी नासमझी की वजह से किसी भी काव्य के अर्थ को अनर्थ ना किया जाय|

सुभाषितानी मे लिखा है :

अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् | परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ||

धर्म के प्रति मेरी यही आस्था है

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