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आपदा सदैव एक अवसर के साथ आती है

जी हाँ, मित्रों जब पूरे विश्व में कोरोना काल का भयानक दौर चल रहा था, सर्वत्र त्राहि माम त्राहि माम की असहनीय दशा अपने चरम पर थी, तब हमारे प्रधानमंत्री (श्री नरेंद्र दामोदरदास मोदीजी) ने देशवासियो का हौसला बढ़ाते हुए कहा था कि इस आपदा से घबराने की आवश्यकता नहीं है, अपितु इसका डटकर सामना करने की आवश्यकता है, इस आपदा को अवसर में बदलने की आवश्यकता है!

मित्रों ये कोई नई बात नहीं कहीं थी हमारे प्रधानमंत्री ने, उन्होंने केवल हमें याद दिलाया था और अपने प्रतिभा, योग्यता और ज्ञान का उपयोग करते हुए, इसका सामना करने की बात कहीं थी।

अब आप सोच रहे होंगे की “आपदा में अवसर तलाशने वाली बात” पुरानी कैसे हो सकती है, तो आइये मैं आपको कुछ उदाहरण देकर इसका प्रमाण देता हूँ! हम अत्यंत प्राचीन काल में ना जाकर दूसरे विश्व युद्ध से हि इसकी शुरुआत करते हैं:-

१:- जब अंग्रेज विश्वयुद्द में उलझें थे तो इसका प्रभाव हमारे देश पर भी पड़ रहा था, ये विश्व युद्ध पूरी मानवता पर एक मानव निर्मित आपदा थी और इसी आपदा में हमारे प्रिय नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को भारत को स्वतन्त्रता दिलाने का अवसर दिखाई दिया, उन्होंने गाँधी जी से कहा की इस वक़्त हमें इन अंग्रेजो के विरुद्ध विद्रोह छेड़ देना चाहिए, अंग्रेज युद्ध में फसे होने के कारण इसका दमन नहीं कर पाएंगे, पर अंग्रेजो के प्रिय गाँधी जी ने इसे नहीं माना अपितु उन्होंने अंग्रेजो की सहायता करने का निर्णय लिया।

२:- मित्रों याद करिये जब स्व श्री लाल बहादुर शास्त्री जी प्रधानमंत्री थे, उस दौरान सूखा और अकाल पड़ जाने के कारण देश खाद्यान्न संकट से जुझ रहा था। अमेरिका से गेंहू आयात होता था और अमेरिका सुअरो को खिलाने वाला गेंहू भारत को देता था। इसी बीच पाकिस्तान ने आक्रमण कर दिया। शास्त्री जी ने एक कुशल सेनापति की भांति सेना को युद्ध के लिए तैयार किया और आदेश दिया कि दुश्मन को उसकी औकात बता दो। भारतीय सेना ने अद्भुत पराक्रम और वीरता का परिचय दिया और कराची और लाहौर तक घुसकर पाकिस्तानियो का जूस निकालने लगी, तब घबराकर पाकिस्तान अमेरिका के पास गया और भारत को युद्ध से रोकने के लिए प्रार्थना किया। उधर अमेरिका अपने घमंड में चूर होकर तुरंत भारत को युद्ध रोकने के लिए आदेश दिया और ऐसा ना करने पर गेंहू का निर्यात बंद करने की धमकी दी।
मित्रों ये उस वक़्त के कई आपदाओं में से एक आपदा थी, पर शास्त्री जी अमेरिका के सामने झुके नहीं, उन्होंने अपने देशवासियों से प्रार्थना की यदि हम सब मिलकर एक वक़्त के भोजन का त्याग कर दे तो इस भुखमरी वाले हालात से निपट सकते हैं और इसके बाद इन्होने जब “जय जवान जय किसान” का मंत्र दिया तो पूरा देश इनके साथ हो गया और इस प्रकार अमेरिका के घमंड को धूल में मिला दिया। शास्त्री जी ने आपदा को एक अवसर के रूप में देखा और पूरे भारत के जनमानस को एकजुट कर दिया।

३:- याद करिये जब पश्चिमी पाकिस्तान के लोग पूर्वी पाकिस्तान के लोगों पर अत्याचार कर रहे थे और बड़ी मात्रा में पूर्वी पाकिस्तान के लोग भारत की सीमा में प्रवेश कर रहे थे शरणार्थी के रूप में। इससे भारत की स्थिति अस्थिर हो रही थी, क्योंकि लाखों की संख्या में शरणार्थीयो के लिए व्यवस्था करना अत्यंत हि मुश्किल हो रहा था।
उस वक़्त भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी जी थी। उन्होंने अमेरिका से पाकिस्तान में चल रहे गृहयुद्ध को रोकने के लिए दखल देने की बात कही, पर अमेरिका ने अनसुना कर दिया, फिर क्या था, इंदिरा जी ने इस आपदा को अवसर के रूप में देखा और भारतीय सेना के पराक्रम ने पाकिस्तान के दो हिस्से कर दिए , एक पाकिस्तान और दूसरा आज का बंग्लादेश।

४:-याद करिये जब सोवियत संघ का विघटन हो चुका था और अब अमेरिका केवल एक महाशक्ति के रूप में था। उस दौरान श्री नरसिम्हा राव जी कि सरकार थी। भारत को क्रायोजेनिक इंजन कि अवश्यक्ता थी अपने एक प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए। रूस, भारत को वो इंजन देने के लिए तैयार था, परन्तु अमेरिका के दवाब में आकर उसने क्रायोजेनिक इंजन देने से मना कर दिया। फिर क्या था भारत के वैज्ञानिकों ने इस आपदा में अवसर को तलाशा और ६ वर्षो के कड़े परिश्रम के पश्चात क्रायोजेनिक इंजन बनाने में सफलता प्राप्त कर ली।

५:- याद करिये जब अमेरिका ने भारत को स्पष्ट चेतावनी देते हुए खा था की, यदि भारत ने परमाणु बम का परीक्षण किया तो उसे गंभीर प्रतिबन्धो का सामना करना पड़ सकता है। अमेरिका के डर से कोई भी देश में हमें यूरेनियम देने के लिए तैयार नहीं था। तब स्व श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी और स्व डॉ अब्दुल कलाम जी ने इस आपदा को अवसर के रूप में लिया और जब अमेरिका के अधुनिकतम सेटेलाइट्स को चकमा देकर राजस्थान के पोखरन में एक नहीं अपितु तीन परमाणु विस्फोट सफलतापुर्वक किये तो पूरी दुनिया सहित अमेरिका भौचक्का रह गया।

तो मित्रों देखा आपने किस प्रकार पहले भी आपदा को अवसर में बदलकर उसका वीरतापूर्वक सामना करने के उदाहरण मिलते हैं। मित्रों आपने ये भी देखा होगा की नकारात्मक ऊर्जा वाली शक्तियों ने प्रधानमंत्री जी के इस “आपदा को अवसर में बदलने” वाले मंत्र का जानबूझकर केवल उनका अपमान करने के लिए ना केवल गलत अर्थ निकाला अपितु उसे जोर शोर से प्रचारित भी किया।

पर जैसा कि आप जानते हैं, ये सबका अपना अपना स्वभाव और सोच होता है, कुछ लोग अच्छाई में भी बुराई ढूंढते हैं और वहीं कुछ बुराई में भी अच्छाई निकाल लेते हैं।

श्रीमद्भागवत गीता अध्याय ६ – आत्मसंयमयोग के श्लोक ८ में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं:-
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकांचनः॥ ८ ॥
जिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञान से तृप्त है, जिसकी स्थिति विकाररहित है, जिसकी इन्द्रियाँ भलीभाँति जीती हुई हैं और जिसके लिए मिट्टी, पत्थर और सुवर्ण समान हैं, वह योगी युक्त अर्थात भगवत्प्राप्त है, ऐसे कहा जाता है ॥

अब यदि आप अपने प्रधानमंत्री के दैनिक जीवन पर ध्यान केंद्रित करें तो आपको अवश्य ज्ञात हो जाएगा की उपर्युक्त श्लोक की एक एक बात उन पर चरितार्थ हो जाती है। अब आइये कोरोना काल में हमारे प्रधानमंत्री ने किस प्रकार इस आपदा को अवसर में बदला:-

१:- इस आपदा को अवसर् बनाते हुए हमारे देश के वैज्ञानिकों ने रूस, अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस का मुकाबला करते हुए, दुनिया में सबसे ज्यादा असरदार वेक्सिन बनाई।
२:- भारत ने दुनिया के लगभग ८० छोटे बड़े देशों में बिना मूल्य के वेक्सिन भेजी। इस वेक्सिन डिप्लोमेसी ने भारत कि विदेश निति को जबरदस्त मजबूती प्रदान की।
३:- भारत ने ना केवल अपने ८२ करोड़ देशवासियों को बिना मूल्य के राशन प्रदान किया अपितु दुनिया के कई गरीब देशों को भी राशन भेजा। इस राशन डिप्लोमेसी ने भी भारत का कद पूरी दुनिया में ऊँचा कर दिया।
४:- भारत ने अमेरिका जैसी महाशक्ति से लेकर भूटान जैसे छोटे देश तक सभी को दवाइयां भेजी।
५:- कई चिकित्सा के उपकरण पहले भारत में नहीं निर्मित होते थे, परन्तु इस आपदा काल में उन सभी अधारभूत चिकित्सीय परिधानो और और उपकरण का निर्माण शुरू हो गया और यही नहीं भारत ने उसका निर्यात भी शुरू कर दिया।

और इस प्रकार आपदा को अवसर में बदलने वाले मंत्र ने पूरे देश को एक गज़ब के उत्साह और जोश में भार दिया, जिसने ना केवल विश्व पटल पर भारत के कद को ऊँचा किया अपितु देशवासियों में आत्मविश्वास की बहुप्रतीक्षित ज्योति प्रज्वलित कर दी।
श्रीमद्भागवत गीता अध्याय ६ – आत्मसंयमयोग के श्लोक ४६ में भगवान् कहते हैं:-
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥ ४६ ॥
योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है और सकाम कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है। इससे हे अर्जुन! तू योगी हो !
हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी जी वहीं योगी हैं।

भारत कि सशक्त और धाकड़ विदेश नीति।

मित्रों आज से कुछ वर्ष पूर्व गीतकार और कवी प्रसून जोशी के एक प्रश्न का उत्तर देते हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदरदास मोदीजी ने कहा था कि “भारत ना आँखे उठा के बात करता है और ना आँखे झुकाकर बात करता है, ये नया भारत है जो आँखो में आँखे डालकर बात करता है।”

मित्रों उस वाक्य के एक एक शब्द को चरितार्थ करते हुए भारत ने अपनी विदेश नीति को श्री एस जयशंकर जी के नेतृत्व में अत्यधिक शसक्त और सुदृढ़ बना दिया है।

जैसा कि आप सबको विदित है कि वर्ष २०१४ से पूर्व भारत की समस्त नीतियाँ चाहे हो विदेश नीति हो या आर्थिक या फिर धार्मिक, सभी एक परिवार द्वारा तय की जाती थी। और इस परिवार को देशहित से ज्यादा व्यक्तिगत हित में रूचि थी।

परन्तु वर्ष २०१४ के पश्चात् जब राष्ट्रवादी नेतृत्व के अंतर्गत भारत में भारतीयों की सरकार बनी तो देश की आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और विदेश नीति एक परिवार के हाथो से निकलकर लोकतंत्र के हाथों में चली गई। और फिर भारत वो सब करने और कहने लगा जो भारत के हित में था।

उदाहरण के लिए जब कांग्रेस के शासन काल में २६/११ का हमला पाकिस्तानी इस्लामिक आतंकवादियों ने किया तो इसका बदला केवल इसलिए नहीं लिया गया, क्योंकि इससे देश का मुसलमान नाराज हो जाता और संयुक्त राष्ट्र संघ इसे सही नहीं मानता।

परन्तु जब जम्मू कश्मीर के पुलवामा में इस्लामिक आतंकियों ने हमारे ४० से ज्यादा वीर जवानो का बलिदान ले लिया तो हमने तुरंत पाकिस्तान के सीमा के अंदर घुसकर बालाकोट नामक स्थान पर सर्जिकल स्ट्राइक किया। मित्रों आज भारत दुनिया के हर बड़े देश चाहे वो सस्ता ब्रिटेन हो, अमेरिका हो, जर्मनी या चिन हो, सबको उन्हीं की भाषा में उत्तर देता है।

गलवान घाटी की घटना तो आप भूले नहीं होंगे। जिस चिन के ताकतवर होने का हौव्वा नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक (स्व. लाल बहादुर शास्त्री जी को छोड़कर) सभी कांग्रेसियों ने कई वर्षो से खड़ा कर रखा था, गलवान घाटी में उसकी हवा निकल गई, उसके दाँत खट्टे कर दिए हमारी वीर सेना ने। एशिया के कई देश तो विश्वास ही नहीं कर पाये की चिन को उसकी औकात कोई इस प्रकार से भी बता सकता है।

कोरोना काल में केवल भारत हि ऐसा एकमात्र देश था, जिसने दुनिया के लगभग ८० से ज्यादा गरीब देशों को वेक्सिन दी वो भी सहायता के तौर पर और इससे उन सभी देशों के रिश्ते मजबूती से भारत के साथ जुड़े।

यही नहीं अफगानिस्तान को बर्बाद करके अमेरिका एक चालाक और धूर्त अक्रान्ता की तरह तालिबान के हवाले छोड़कर भाग खड़ा हुआ और पलट कर देखा भी नहीं, उस अफगानिस्तान का साथ भारत ने नहीं छोड़ा और दवाई, खाद्यान्न, पेट्रोल इत्यादि जीवन से जुड़ी हर वस्तु देकर उसकी सहायता की और इसीलिए तालिबान सत्ता में आने के पश्चात् भारत के सामने नतमस्तक हो गए।

ये भारत की विदेश नीति का ही कमाल है की भारत ने अस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका के साथ मिलकर चिन के विरुद्ध Quad की स्थापना की। आज दक्षिणी चिन महासागर Indo- pacific zone के नाम से जाना जाता है।

ये भारत की विदेश नीति की सफलता ही है की वो फ्रांस से राफेल ले रहा है, इजराइल से नई तकनीकी ले रहा है, अमेरिका से अत्याधुनिक आयुध सामग्री खरीद रहा है और रसिया से दुनिया की सबसे मारक एंटी मिसाइल तकनीकी S-४०० ले रहा है। और यही नहीं वाह कई देशों को अपने देश में बने तेजस जैसे लडाकू विमान और ब्रह्मोस मिसाइल भी बेच रहा है।

मित्रों एक परिवार की इच्छा को अपना राजधर्म मानकर चलने वाले कांग्रेसी कभी भारत की विदेश निति के बढ़ते प्रभाव और व्यापक सफलता को पचा ही नहीं पाए | उदहारण के लिए एक महान वफादार कांग्रेसी है श्री आनंद शर्मा जी, इन्होने भारत की विदेश निति पर एक लेख लिखा, जो ” Modi pursuing personalised foreign policy bereft of direction” नामक शीर्षक से ” The Economic Times” ने दिनांक १८ मार्च २०१८ को छापा था| इस लेख के जरिये कांग्रेसी भाई ने ये बताने की कोशिश की “It was confused एंड conducted in a cavalier manner which has damaged India’s profile”. मित्रों ये वही आनंद शर्मा जी हैं जो उस वक्त वफादार जिव की भांति हाथ बांधकर खड़े थे जब सोनिया गाँधी जी की उपस्थिति में परमज्ञानी श्री राहुल गाँधी जी चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ एक MOU पर हस्ताक्षर कर रहे थे। अब ये पता नहीं की ये परिवार किस प्रकार का समझौता चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ कर रहा था और उसका भारत की विदेश निति से क्या लेना देना था।

मित्रों दूसरा उदहारण उस समय का है जब पंजाब में चुनाव हो रहे थे और कांग्रेस पार्टी को सस्ती लोकप्रियता दिलाने के लिए परिवार के इशारे पर, मनमोहन सिंह जी ने एक वीडियो सन्देश जारी कर भारत के राष्ट्रवाद और विदेश नीति की मन से आधारहीन आलोचना की, उनके इस वीडियो सन्देश को “The Wire” के Website  पर १७ फरवरी २०२२ को “Fake Nationalism, Failed Foreign Policy” नामक शीर्षक के साथ प्रस्तुत किया गया। मित्रों ये मनमोहन सिंह वही Accidental PM” थे जो पुरे १० वर्ष प्रधानमंत्री होने के बाद भी एक नियम या कानून पर अपना ज्ञान इस परिवार को न दे सके और केवल अपना सारा हावर्ड से पढ़ा अर्थशास्त्र उस परिवार की जी हुजूरी में खर्च कर दिया।

खैर पुन: अपने मुद्दे पर आते हैं, ये भारत की विदेश नीति की सफलता ही है की जंहा एक ओर वो ताइवान के मामले में चिन के विरुद्ध यूरोपिय यूनियन और अमेरिका के साथ है, वंही दूसरी ओर युक्रेन और रसिया के मामले में किसी के साथ ना होकर भी अपने परम्परागत मित्र रसिया के विरोध में नहीं है।

मित्रों जब से रसिया और यूक्रेन के मध्य अमेरिका के धूर्तता और चालाकी से युद्ध आरम्भ हुआ है, तब से ही अमेरिका और ब्रिटेन ने अपने षड्यंत्र के अनुसार रसिया को कमजोर करने के लिए युरोपीय यूनियन को साथ लेकर तरह तरह के प्रतिबंध लगा रहे हैं। और वो चाहते थे की भारत भी रसिया के साथ खड़ा ना हो और खुलकर उसका विरोध करे, पर भारत ने बड़े ही सजगता और चातुर्य से धूर्त अमेरिका और ब्रिटेन की चाल को पकड़ लिया और स्पष्ट रूप से घोषणा कर दी की “हम केवल उसके साथ हैं जो हमारे साथ है।”

मित्रों भारत के इस रुख से सबसे ज्यादा झटका यदि किसी को लगा तो वो भारत से अरबों की सम्पत्ति लूट कर ले जाने वाले ब्रिटेन को लगा, क्योंकि वो आज भी ये समझता था कि “भारत हर हाल में उनके साथ ही होगा” पर ये गोरे भूल गए अब भारत में एक राष्ट्रवादी सरकार एक राष्ट्रवादी नेतृत्व के हाथो द्वारा वर्ष २०१४ से कार्य कर रहे है और भारत की विदेश निति अब एक परिवार के हाथ से निकलकर लोकतंत्र के हाथो में आ गयी है, अत: अब भारत वही करता है जो भारत के हित में होता है।

अब जब अमेरिका और धूर्त ब्रिटेन, भारत को रसिया के विरुद्ध नहीं कर पाए तो उन्होंने भारत के विरुद्ध प्रोपेगेंडा चलाना शुरू किया और उसकी आड़ में भारत को यूक्रेन का साथ देने के लिए नसीहत देने लगे| पर मित्रों हमारे श्री जयशंकर जी ने जब पूरी दुनिया की मिडिया के सामने ये कहा कि “हमें याद रखना होगा की आपने अफगानिस्तान के मामले में क्या किया”, तो ब्रिटेन का मुंह सुख कर मुरझा गया।

मित्रों इनका प्रोपेगेंडा यहीं नहीं रुका, जब रसिया के प्रस्ताव पर भारत सस्ते दर पर रसिया से तेल खरीदने के लिए राजी हो गया, तो इसी ब्रिटेन के डिप्लोमैट्स ने दुनिया के सामने कहना शुरू किया की “India-Russia Cheap Oil Deal would be deeply disappointing UK”. फिर क्या था, एक बार फिर पूरी दुनिया के सामने श्री जयशंकर जी ने इनके प्रोपेगण्डे को ध्वस्त करते हुए कहा की “यूरोपियन यूनियन के देश रसिया से ख़रीदा तेल जितना दोपहर तक खर्च कर देते हैं, भारत उतना एक महीने में भी नहीं खर्च करता।” बस फिर क्या था सबकी बोलती एक बार फिर बंद।

मित्रों जब अमेरिका और ब्रिटेन,  भारत और रसिया के मध्य खाई नहीं खोद पाए तो उन्होंने भारत में मानव अधिकारों के हनन की झूठी कहानी लेकर प्रोपेगेंडा फैलाना और भारत को कटघरे में खड़ा करना शुरू कर दिया। पर यंहा भी उनको मुंहतोड़ जवाब देते हुए हमारे विदेश मंत्री श्री एस  जयशंकर जी ने सीधा संदेश देते हुए कहा कि “India also Monitors Human Rights Situation in other Countries including US”, समझदारो के लिए इशारा काफी था। अल्पसंख्यकों की स्थिति पर उठाये गए प्रोपेगेंडा का जवाब देते हुए उन्होंने आइना दिखाते हुए कहा कि “others should answer, how did they respond? We are not the only country dealing with disturbances in our neighbourhood. Europe has ssen conflict; the US had 9/11(terror attacks). How did they respond? It is important to reflect on your own way of handling the issues. On naturalisation (immigration laws), what is the pathway they took? critics must not “get fixated on the dots and ignore the line” or big picture.”

अब मित्रों मजे की बात ये है की ना केवल “श्री एस जयशंकर जी ने इनके नाक में दम कर रखा है अपितु भारत का हर डिप्लोमेट इसी भाषा और तेवर में बात करता है और इसी को कोट करते हुए विदेशी डिप्लोमैट्स ने सीधे सीधे शिकायत भरे लहजे में कहा कि “भारत की विदेश नीति पूरी तरह बदल चुकी है, अब वो किसी की भी नहीं सुनते”।

मित्रों विदेशी डिप्लोमेट्स के इसी शिकायत को आधार बनाकर परमज्ञानी श्री राहुल गाँधी ने सूट – बूट में सजधजकर विदेश में एक साक्षात्कार दिया और   भारत की विदेश नीति की आलोचना करते हुए इसे गलत बताया और साथ हि भारतीय डिप्लोमेट्स को arrogant बताया।

अब आपको पता चल ही गया होगा कि मैं इनको परमज्ञानी क्यों कह रहा हूँ? पर हमारे श्री एस जयशंकर साहेब कँहा चुकने वाले थे, उन्होंने एक ट्वीट के जरिये  पुरे विपक्ष  को समझा दिया जो इस प्रकार है” Yes, The Indian Foreign Service has changed. Yes, They follow the orders of the Government. Yes, They counter the Arguments of the others. It is called confidence and it is called defending National Interest”. पर देखने  और समझने वाली बात ये है कि जिसके पास अपना कोई अस्तित्व ना हो वो क्या “confidence” और “Defending National Interest” जैसे भारी भरकम शब्दों के मायने समझ सकता है, आप क्या कहते हैं?

मैं तो बस यही कहूंगा “जय जय एस जयशंकर”

Increasing employment or atrocities of students of Bihar?

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There is no doubt that Bihar has been an important center of education, we have been associated with the history of education with universities like Nalanda and many others. Big personalities of Bihar have also contributed very efficiently by making education their base, like Dr. Rajendra Prasad who became the first President of India who was from Bihar, and freedom activist like Jai Prakash Narayan who also raised the name of our Bihar. Yes, great scholar Vidyapati ji as well as great people like Ramdhari Singh Dinkar made Bihar a master in the field of art. This trend continues even today, our own state has been giving officers in the most prestigious civil services examination.

What happens when the whole system becomes your enemy?

As we have seen our history and we have seen ours today, in both we have been ahead and will continue to do so. Be it in the field of education or in the field of employment, the youth of Bihar do not shy away from working hard. But today the game is being played with the future of the youth and buying and selling is taking place in the education system. The youth of Bihar is the honor and respect of Bihar, this should not be forgotten by our government.

If better facilities are given to them, they will do better so that Bihar will move forward. The government should improve its education system and at the same time action should be taken against those who play with the future of the students. Youth choose the government so that the government understands their words and works for their better future. Our literacy rate is around 60 per cent, if not very bad then not very good either. This index shows us why our education and employment are not so developed. 

The government should know that when a boy from a poor family prepares for a government exam, he studies not only for the welfare of his family but also for the welfare of the society, that boy lands in lakhs to get employment, And he doesn’t even know whether he will get success or not. After years of hard work, he goes to take the exam and then comes to know that the exam has been rigged or has been cancelled.

Only that poor boy has to bear the brunt of which and there is no one to take the news of it. It has a negative impact on our state directly as well as employment is also affected and the literacy rate keeps on increasing instead of decreasing.

विक्रम सिंह मीना ई आर सी पी को लेकर कर रहे है बड़ी तैयारी; जानिये ERCP के बारे में पूरी जानकारी

राजस्थान: इन दिनों राजस्थान में पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना यानी ईआरसीपी को लेकर रार मची हुई है। अब इस परियोजना को लेकर भारतीय किसान यूनियन के युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष विक्रम सिंह मीना राजस्र्थान के लोगो से एकजुट होने की अपील कर रहे है और सरकार को झुकाने की पूरी तैयारी कर रहे है। परियोजना को लेकर विक्रम सिंह मीना बड़े आन्दोलन की तैयारी कर रहे है।

इस समय राजस्थान में पानी का भारी संकट चल रहा है महिलाए धुप में पानी भरने को मजबूर है, करौली हिंडौन भास्कर में ‘जलसंकट का दंश…एक ही कुआ,वह भी गाँव से डेढ़ किलोमीटर दूर, गन्दा पानी छानकर पीने की मजबूरी’ शीर्षक के साथ प्रकाशित मंडरायल के गाँव श्यामपुर झोपड़ी, डोलेपूरा गाँव में 100 से ज्यादा परिवारों की यह पीड़ा है। विक्रम सिंह मीना काफी दिनों से लोगो को इस योजना के प्रति जागरूक करने में लगे हुए है, विक्रम सिंह मीना का कहना है की सरकार को राजनीति पर ध्यान ना देकर 13 जिलो के लिए बनी इस योजना पर ध्यान देना चाहिए! हालांकि इस योजन पर पहले भी वाद विवाद की स्थिति बनी थी लेकिन राजनीति के चलते राजस्थान के नेताओं ने चुप्पी साध ली थी लेकिन गर्मियों के आते है यह योजना याद आ गई और विक्रम सिंह मीना राजस्थान सरकार को घेरने की तैयारी कर रहे है।

2017 में हुई थी परियोजना की घोषणा :
ईआरसीपी योजना 2017-18 के बजट में राजस्थान में तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के नेतृत्व में इस परियोजना की घोषणा हुई थी। इस दौरान बीजेपी सरकार ने कहा था कि (ईआरसीपी परियोजना) झालावाड़, बारां, कोटा, बूंदी, सवाई माधोपुर जैसे 13 जिलों की दीर्घकालिक सिंचाई और पीने की पानी की जरूरतों को पूरा करने में मदद करेगा। 2017-18 के बजट भाषण में राजे ने यह भी कहा था कि राज्य सरकार ने केंद्र सरकार को ईआरसीपी को राष्ट्रीय महत्व वाली परियोजना के रूप में घोषित करने के लिए एक प्रस्ताव भेजा था । वहीं परियोजना को 2017 में केंद्रीय जल आयोग द्वारा भी इसे स्वीकृति मिली थी । तभी से सरकारों की लगातार मांग बनी हुई है। इस प्रोजेक्ट के जरिए इन जिलों में पीने के पानी और 2 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई के पानी की जरूरत पूरी होती रहेगी।

गौरतलब है कि इस संबंध में प्रधानमंत्री मोदी का भी एक वीडियो सामने आया था। जिसमें उन्होंने कहा था कि राजस्थान में इंदिरा गांधी नहर परियोजना के बाद से कोई बड़ा सिंचाई और पेयजल प्रोजेक्ट नहीं आया है। इसके बाद उन्होंने कहा था कि पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (ईआरसीपी) की मांग काफी समय से उठ रही थी । तब उन्होंने इस प्रोजेक्ट के तकनीकी अध्ययन की भी बात की थी।

इसलिए महत्वपूर्ण है पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना:
दरअसल राजस्थान के जल निकायों की बात करें, तो यहां केवल चंबल नदी ही ऐसी है, जिसके बेसिन में अधिशेष (सबसे अधिक) पानी है, लेकिन इस पानी को सीधे उपयोग में नहीं लाया जा सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि कोटा बैराज के आसपास के क्षेत्र को मगरमच्छ अभ्यारण्य के रूप में विकसित किया गया है। लिहाजा ईआरपीसी योजना के तहत यह सोचा जा रहा है कि डायवर्जन, इंट्रा-बेसिन बनाकर, और मेन पंपिंग फीडर को जोड़कर एक चैनल का निर्माण किया जाए। साथ ही जल चैनलों के इस नेटवर्क के जरिए ही ERCP परियोजना के लक्ष्य को पूरा किया जाए। ताकि राजस्थान के 41.6 प्रतिशत के साथ-साथ 23.67 प्रतिशत क्षेत्र के वॉटर लेवल को भी कवर किया जा सके।

जसकौर मीना ने राजस्थान सरकार पर साधा निशाना :
पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना को लेकर सांसद जसकौर मीणा ने राज्य सरकार पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था कि 13 जिलों में पानी पहुंचाने के लिए पूर्ववर्ती वसुंधरा सरकार ने ईस्टर्न राजस्थान कैनाल परियोजना बनाई थी, जिसका निर्माण केंद्र व राज्य का 60:40 की हिस्सेदारी से होता है लेकिन राज्य सरकार ने परियोजना की स्वीकृति को लेकर प्रपोजल नहीं भेजा, इस कारण स्वीकृति नहीं मिली है। उन्होंने कहा राजस्थान कि सरकार अगर इसमें रुचि लेती तो केंद्र सरकार इसी बजट में योजना को मंजूर कर देती, लेकिन राज्य सरकार अपने हिस्से का 40% पैसा ERCP योजना में नहीं देना चाहती जिसके चलते यह योजना अटकी हुई है। केंद्र सरकार अपने हिस्से के 60% देने के लिए तैयार है लेकिन राज्य सरकार की उदासीनता के चलते अभी यह योजना आमजन से दूर है।

आम आदमी पार्टी उत्तराखंड मै इस्तीफा ही इस्तीफा

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आम आदमी पार्टी देखा जाए तो देश मै एक उभरती हुई पार्टी के तौर मानी जा रही है कुछ लोग इसे कांग्रेस के विकल्प के तौर पर देख रहे हैं तो कुछ भाजपा के भी विकल्प पर मान रहे हालाकि “आप” अभी तक ऐसे किसी प्रदेश मै जहां भाजपा सालो से मजबूत हो खास कर नहीं पाई , परंतु राजनीति विद्वानों का माने तो आने वाले चुनावों में यह भाजपा को गहरी चोट से सकती है। लेकिन अगर आप उभरती हुई पार्टी है तो उत्तराखंड मै पार्टी के एक बड़े धरे ने इससे मुंह क्यों मोड़ लिया है।

कर्नल अजय कोठियाल दिया इस्तीफा

आप उत्तराखंड के मुख्यमंत्री चेहरा कर्नल अजय कोठियाल के साथ 334 पार्टी के पदाधकारियों ने इस्तीफा दिया है इसमें कई पूर्व प्रत्याशी भूपेश उपाध्याय, डॉ राजे सिंह नेगी के साथ संगठन के बड़े चेहरे ने भी इस्तीफा दिया है।

आखिर ऐसा क्यों दिया इस्तीफा

माना यह जा रहा है कि कर्नल अजय कोठियाल के इस्तीफे के बाद पार्टी के किसी शीर्ष नेतृत्व ने उनसे बात नहीं की ना यह जानने की कोशिश की ऐसा क्यों हुआ। इसी को लेकर पार्टी के अन्य कार्यकर्ता और पदाधिकारी नाराज़ थे जिसके बाद 334 बड़े पदाधिकारियों ने इस्तीफा पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को सौंप दिया है। सूत्रों से यह भी सामने आया है कि पार्टी शीर्ष नेतृत्व जल्द ही उत्तराखंड का दौरा कर सकती है और फैला हुआ रायता समेटने की कोशिश कर सकती है। हालांकि देखना दिलचस्प होगा क्योंकि उत्तराखंड मै जल्द ही निकाय चुनाव होने हैं और कहा जा रहा है इससे पार्टी को भारी नुकसान सहना पड़ सकता है।

काशी की धरा अब डोल रही है मुक्ति मुक्ति बोल रही है – कविता

काशी की धरा अब डोल रही है
मुक्ति मुक्ति बोल रही है
बाबा का नंदी जाग उठा है
प्रभु के दर्शन को खड़ा है

वक्त का पहिया घूम रहा है
इतिहास के राज खोल रहा है
माँ गंगा का प्रवाह तेज हुआ है
अभिषेक के लिए व्याकुल हुआ है

द्वारपाल तटस्थ हुए हैं
चिताओं की भस्म से महक रहीं है
अघोरीयो की ज्वाला जली है
साधु संतो ने शंखनाद किया है

बाबा विश्वनाथ को याद किया है
औरंगजेब का काल खत्म अब
बाबा महाकाल ने आगाज किया है
काशी की धरा अब डोल रही है

मुक्ति मुक्ति बोल रही है

बोलो जय श्री काशी विश्वनाथ

-अघोरी अमली सिं

The great warrior Maharana Partap

कब तक बोझ संभाला जाए द्वंद्व कहां तक पाला जाए दोनों ओर लिखा हो भारत

सिक्का वही उछाला जाए तू भी है राणा का वंशज फेंक जहां तक भाला जाए

In the turbulent times when the states of Rajputana were suffering from the attack of invaders motivated by the Islamic cruelty and religious extremism when the women and adolescent girls were committing Jauhar for escaping the horrors of capture and protecting their honour. In the honoured fort Kumbhalgarh as a ray of hope, a boy was born (9th May 1540) to the Rana of Mewar Uday Singh II and his wife Jaywanti Bai “The Great Maharana Partap”.  It is said that Rana Partap was brought up by the Bhils of ‘Kuka’ tribe and hence in childhood the name of Rana was ‘Kika’. His Guru was Acharya Raghvendra.

Maharana Partap was extremely talented from his childhood and he was so full of self-respect that people with the foresightedness saw a great warrior in him. He was not only well versed in battle techniques like guerrilla warfare, but also knew the intricate details of Aravali Rnages. In 1567 Mughals invaded Chittor but instead of fighting, Uday Singh decided to leave Chittor and move Golkonda. This step was despised by Pratap and he pressed for war.  His elders successful in persuading him and they left Chittor immediately. This decision proved viable and changed the course of history of Mewar. A temporary court for Mewar was setup in Golkonda by Uday Singh and his courtiers. During this time when the Mughal army(60,000) invaded Chittorgarh Fort stiff resistance was given to them by the Rathore Army(8,000). 

Official documents say that the death toll was 48,000 out of 40,000 were Mughals and a Jauhar took place in the fort of Chittorgarh. After watching this whole scenario Rana took pledge to conquer Chittorgarh back and re establish the old glory of Rajputana. In 1572 after the death of Uday Singh, queen Dheerbai wanted his son, Prince Jagmaal, to be the king. Rana Partap didn’t resisted but senior courtiers insisted that Rana can handle the situation better.  If he is not crowned as a king, the threat of Invasion on Rajputana would increase. Hence on 28 February 1572 was crowned king. Angry to this, Jagmal rebelled and joined the Mughal Army. The capital of Mewar, though was in control of the Mughals. But they could not subdue the whole of Mewar. Akbar sent 6 peace treaties for the consideration of the Maharana but it was declined each time as the Maharana refused to bow down in front of Mughals. On behalf of Akbar, one such treaty was led by Man Singh. But Maharna always despised Maan Singh and wondered how he could sell his motherland to foreign invaders.

When the efforts at peace failed, Akbar decided to assemble his army for war. For the preparation of war, Maharana made Kumbhalgarh as his capital and decided to fight in the Aravali Hills. After the failure of the treaty in 1573, Mewar was surrounded by Akbar and cut it off from Traditional allies many of whom shared blood with Maharana Partap. The main reason was that Akbar wanted a safe passage through Rajputana to Gujarat for trading with other Kingdoms of that time. Akbar appointed Sagar Singh for ruling the won over part of Mewar but to remorse his treason with his brother and motherland, Sagar Singh returned from Chittor and committed suicide in Mughal Court with dagger.  Partap younger brother Shakti Singh who had switched with Mughals realized his mistake, and he came back to Maharana. Then the Historical Battle of Haldighati was fought.  Rana Partap had resolution:

“Either I die of Hunger or thirst it doesn’t matter, Mewar should remain free, If I wander in lifeless lands, I should have the memory of my mother,Born to Rajput mother, I will repay the debt of Rajput blood, Even if my head falls to my feet, I will let Delhi’s ego submit in front of me. In Battle of Haldighati Partap had around 20,000 soldiers and Akbar had around 85,000 i.e., four time more than Partap.

If Akbar had number, then Maharana had Spirit. The main reason why Akbar attacked When Maharana left the Royal Palace, he was accompanied by the Blacksmith of Lohar caste. Who later worked day in and day out to make swords for the army of Mewar  This group is now called Gadia Lohar in M.P., Rajasthan, and Gujarat who supported Maharana till his death. The tribals of Mewar, the Bhils crushed the Mughal rank with their arrows. They thought Maharana as their son, and Rana without any prejudice lived with them. Even today on the Royal Emblem of Mewar Rajput one side and Bhils on other side. With the height of 7.5ft Maharana was so powerful that he used to carry a sword of two sheaths including a spear weighing 80kg and his armour was more than 72kg. 

One of the most famous Battle that is not told in our school books is the Battle of Dewair when an Army of 36,000 Mughals surrendered in front of Rana Partap. Rana was so powerful that during this Battle he sliced Behlol Khan into two equal halves along with his horse. टोप कटे बख्तर कटे, बेहलोल खान का हर अंग कटे। सुरंग रंग का अश्व कटे, तुर्कों का अभिमान कटे।

Maharana horse Chetak is known for his loyalty towards Rana Partap. The place where Chetak got injured has now a tamarind tree and Chetak temple at that place of his death. After winning this Battle the old Prosperity of Mewar came back which was as equal as the prosperity during the reign of Maharana Kumbha. During the testing circumstances, one of Maharana courtier Bhama Shah donated his entire possession to Rana. This was enough money for Military Expense of 12 years.

History can never forget Bahama Shah’s sacrifice for Dharma.Once, Pratap’s general Kunwar Amar Singh attacked the Mughal subedar Abdur Rahim Khan-I-Khana’s fort and took his begum and daughters as captive to be presented in the court. Furious of this behaviour, Pratap scolded Amar Singh and got the captives released respectfully, and made to reach home. Because Maharana believed “War with the enemy is in the battlefield. The abduction of women is taught by the theology of enemy. Our values don’t teach us this.”.

After the battle of Haldighati, Maharana kept pushing back the Muslim invaders from Mewar. Leaving the luxury of his royal palace, he wondered for 20 years in the wilderness. His resolve was such that, even if he had to eat the chapatis of grass, he will, but he would never let the flag of Mewar surrender. In the year 1597, Maharana got mortally wounded in a hunt, and the Maharana was separated from his people. At the end I have only one question to all of you, did we give the place that Rana Pratap deserve in history, did he get the place he was supposed to get in our history books?

आतंकी मंसूबे और कश्मीरी पंडितों पर निशाना

कश्मीर घाटी में एक बार फिर से पंडितों को निशाना बनाया जा रहा हैं, कई सालों से उन्हें घाटी में बसाने के प्रयास चल रहे थे, इसमे कुछ कामयाबी भी मिलने लगी थी, मगर अब इसकी उम्मीद धुंधली पड़ने लगी हैं. बडगाम के चडूरा तहसील कार्यालय में घुसकर जिस तरह इस्लामिक दहशतगर्दों ने एक कश्मीरी पंडित राहुल भट्ट की हत्या कर दी, उससे  स्वाभाविक ही वहां के लोगों में रोष बढ़ा हैं. इससे एक बार फिर पंडितो के घाटी छोड़ने को लेकर चिंता पैदा हो गईं हैं. ताजा घटना की जिम्मेदारी जिस कश्मीर टाइगर्स नामक संगठन ने ली हैं, वह बिलकुल नया जान पडता हैं यानि अब दहशतगर्दों के नए संगठन बन रहे हैं या पुराने संगठन नए नामों से सक्रिय हो गए हैं, इस घटना से यह भी जाहिर हैं कि इस संगठन का निशाना खासतौर से कश्मीरी पंडित हैं.

हालांकि लम्बे समय से वहां सुरक्षाबलों की तैनाती बढ़ी हैं, खुफिया एजेंसियां सक्रिय रहती हैं और सेना के तलाशी अभियान निरंतर चलते हैं, इसके बावजूद इस्लामिक दहशतगर्दो पर नकेल नहीं कसी जा रही हैं, वे नए नामों से सिर उठाने लगे हैं,तो इससे यही रेखांकित होता हैं कि इस दिशा में नए ढंग रणनीति बनाने की जरुरत हैं. बडगाम की ताजा घटना अकेली नहीं है. पिछले साल इसी तरह दवा विक्रेता कश्मीरी पंडित की गोली मारकर हत्या कर दी थी, उसका परिवार शुरू से घाटी में रह रहा था. पिछले महीने भी एक कश्मीरी पंडित की इसी तरह हत्या कर दी गयी. पिछले सात सालों में ऐसी कई घटनाएं हो चुकी हैं. इससे पहले कश्मीरी पंडितों की हत्या का सिलसिला रुक गया था और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय विस्थापित कश्मीरी पंडितों को दोबारा घाटी में लौटने और बसाने का अभियान चला था. घाटी के कुछ मुसलमान भी चाहते हैं कि वो लौटकर अभी जगह-जमीन पर फिर से कब्ज़ा कर ले. मगर कुछ सालों से, ख़ासकर जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त होने के बाद जिस तरह की कटुता वहां पैदा हुई हैं, उसकी प्रतिक्रिया में भी कश्मीरी पंडितों की हत्या हो रही हैं.

पिछले दिनों घाटी से पंडितों के पलायन और नरसंहार को लेकर आई दा कश्मीर फाइल्स नामक फ़िल्म की चर्चा पुरे देश में हुई. उसे लेकर एक बार फिर कश्मीरी पंडितो के हक़ की मांग कुछ तीखे स्वर में उठने लगी. ऐसे में स्वाभाविक रूप से घाटी के अलगाववादी संगठनों की भी कड़ी निंदा हुई. इसकी प्रतिक्रिया भी इन नई घटनाओ के रूप में देखी जा सकती हैं. कश्मीरी पंडितों को घाटी में फिर से बसाने के लिए उन्हें सरकारी नौकरियों में जगह सुरक्षित रखने का प्रावधान किया गया. इस तरह कई विस्थापित पंडितों को वहां नौकरियां मिली और वे अपने पैतृक घरों को सुधार कर रहने लगे. बडगाम में जिस युवक की हत्या कर दी गई, वह भी इसी योजना के तहत वहां रहने गया था.

अब इस घटना से वहां इस तरह वापस गए लोगों में दहशत पैदा होना स्वाभाविक हैं. इसलिए सरकार की जबाबदेही को लेकर सवाल उठने लगे हैं केवल नौकरी देने और विस्थापितों को कश्मीर में वापस लौटाने की कोशिश से इस दिशा में कामयाबी नहीं मिलेगी. उनकी सुरक्षा के भी पुख्ता इंतजाम करने होंगे. जब तक वे सुरक्षित महसूस नहीं करेगें, भला कब तक वहां टिके रह सकेगे. हैरानी की बात हैं कि तहसीलदार के कार्यालय में घुस कर कैसे वहां काम कर रहे युवक को गोली मार कर इस्लामिक आतंकी आसानी से निकल गए.

अभिषेक कुमार (Political -Politics Analyst / Twitter @abhishekkumrr)

मज़हबी चोर को दिल्ली मेट्रो पर तैनात जवान का संरक्षण क्यों?

सोशल मीडिया पर एक वीडियो बहुत वायरल हो रहा है इस वीडियो को @TeamShankhnaad द्वारा ट्विटर पर अपलोड किया गया है। वीडियो दिल्ली के Welcome Metro station का बताया जा रहा है जहाँ पर मजहबी एक व्यक्ति का पर्स चोरी करता है बोलने पर पीड़ित व्यक्ति को ही मारता पिटता है अन्य लोग एकत्रित होते है विचित्र कुमार नामक व्यक्ति इस पूरी घटना को कैमरे में कैद करते है घटना स्थल पर तैनात CISF के जवान आते है और पीड़ित को न्याय दिलाने की जगह पीड़ित के साथ ही दुर्व्यवहार किया जाता है जो वीडियो में साफतौर पर देखा जा सकता है।

चोरी जैसे अपराध को बढ़ावा देना कितना सही है? मेट्रो से सफर करने वाले लाखों यात्रियों को क्या संदेश गया जब चोरी को रोकना ही नही है तो जवानों की तैनाती क्यों? अपराधियों को भय की जगह संरक्षण कई सवालों को खड़ा करता है। एक व्यक्ति दिन रात मेहनत करके फ़ोन लैपटॉप खरीदते हैं और चोर उसे चोरी करके बच निकलता है। वीडियो में देखा जा सकता है कैसे इन मज़हबी चोर के इरादे बुलंद है जवानों के समक्ष पर्स को निकाल कर फेक देता है और उसपर कार्यवाही की जगह वीडियो में पीड़ित की ही गर्दन पकड़ते जवान नज़र आ रहे है। देश ऐसे चलेगा?

हिंद की चादर

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केसरी ये कपाल है।
केसरी गंगा में बेहता
केसरी महाकाल है।

केसरी महाराणा है
और केसरी है इसकी शान।
केसरी है शिवाजी
और केसरी है इसका निशान।

अहिल्या के ही कारन है
केसरी दीप ज्वलंत यहाँ।
जिजाऊ के ही कारन
केसरी प्रण अनंत यहाँ।

अब्बक्का का है
वज्र केसरी।
ओब्बाव्वा की
मुसल केसरी।

चिन्नम्मा का है
तीर केसरी।
रायन्ना का
हर गुरिल्ला केसरी।

लचित का है
अश्व केसरी।
तानाजी का
हर वार केसरी।

उधम की है
भूति केसरी।
भगत का
बलिदान केसरी।

केसरी वीरों को अर्पन
केसरी यहाँ पिंड है।
केसरी शोणित से विभूषित
केसरी पावनखिंड है।

केसरी है विद्रोह इसका
केसरी है हर ग़दर।
केसरी आगोश में यहाँ
केसरी है हर डगर।

सनातन धरा की है
केसरी हर दास्ताँ।
केसरी है आभा इसकी
केसरी है चेतना।

केसरी है माटी इसकी
केसरी है आसमान।
हिंद की चादर में लिप्टा
हिन्द का हिंदुस्तान।