क्या हुआ… बड़े डरे डरे से नज़र आ रहे हो कही मज़हबी नारे सुन कर आ रहे हो?? लगता है कोई अख़बार पढ़ लिया है? मियां पड़ोसी… से भी कतराए जा रहे हो फटाके ही तो फूटे है…. कोई बम नही ख़ामख़ा… शोर मचाये जा रहे हो माना थोड़ी बारूद ज्यादा हो गई थी तुम तो अब्दुल पे उंगली उठाये जा रहे हो? बड़े पढ़े लिखे जान पड़ते हो जनाब फिर क्यू….. यू दुम दबा के भागे जा रहे हो? क्या कहा… शहर जल रहा है फिर भी भाईचारे का पाठ पढ़ाये जा रहे हो? अच्छा! तो ये सियासत की चाले है तो इसीलिए घर से भगाये जा रहे हो?? सुना है… कल मदरसों से असलहे मिले है अफवाह है!.. किसे समझाये जा रहे हो?? अरे…. बिरयानी तो खूब पसंद थी तुम्हे क्या बात है…आज खीर खाए जा रहे हो? अब तो मुस्कुरा दो… बहत्तर हूरे मिलने वाली है ख़ामख़ा मुह लटकाये जा रहे हो.. -- शिवम तिवारी "शांडिल्य"
सहिष्णुजन पर व्यंग
तुष्टिकरण की राजनीति से मुक्ति की और असम
तुष्टिकरण की राजनीति से मुक्ति की और असम
असम सरकार ने हाल ही में घोषणा की है कि अगले माह यानी नवंबर में वो राज्य में राज्य संचालित सभी मदरसों और संस्कृत टोल्स या संस्कृत केंद्रों को बंद करने संबंधी एक अधिसूचना लाने जा रही है। इस फैसले के अंतर्गत असम सरकार द्वारा संचालित या फिर यूँ कहा जाए, सरकार द्वारा फंडेड मदरसों और टोल्स को अगले पाँच महीनों के भीतर नियमित स्कूलों के रूप में पुनर्गठित किया जाएगा। यह फैसला सरकार द्वारा लिए जाने का कारण स्पष्ट करते हुए असम के शिक्षा मंत्री ने कहा कि, “एक धर्मनिरपेक्ष सरकार का काम धार्मिक शिक्षा प्रदान करना नहीं है। हम धार्मिक शिक्षा के लिए सरकारी फण्ड खर्च नहीं कर सकते।” इसके अलावा उन्होंने कहा कि अब वो आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा देगी इसलिए मदरसा बोर्ड को भंग कर संस्थानों के शिक्षाविद माध्यमिक शिक्षा बोर्ड को सौंप दिए जाएंगे। प्रदेश में चलने वाले प्राइवेट मदरसों के बारे में उन्होंने स्पष्ट किया कि वे चलते रहेंगे। असम सरकार की इस घोषणा के साथ ही इसका व्यापक विरोध और राजनीति शुरू हो गई है।
इसे क्या कहा जाए कि इस देश की राजनीति कभी निज स्वार्थ से ऊपर उठ ही नहीं पाई। हमारे राजनेता स्वार्थ की राजनीति से ऊपर उठ कर सोच ही नहीं पाते या सोचना नहीं चाहते।
राजनीति से इतर अगर बात की जाए तो मदरसा दरअसल किसी भी प्रकार के शैक्षणिक संस्थान के लिए प्रयुक्त अरबी शब्द है। अतः मदरसों की बात करने से पहले शिक्षा की बात कर लेते हैं। संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर कहते थे कि जो बालक एवं मनुष्य के शरीर मन और आत्मा का सर्वांगीण और सर्वोत्कृष्ट विकास करे वो ही शिक्षा है। राष्ट्रीय शिक्षा आयोग 1964-66 के अनुसार शिक्षा राष्ट्र के आर्थिक एवं सामाजिक विकास को शक्तिशाली साधन है। वहीं नई शिक्षा नीति में आज की आवश्यकताओं के अनुरूप हमारे युवाओं की क्रिएटिविटी और इन्नोवेशन को बढ़ाते हुए उनमें कौशल विकास पर विशेष बल दिया गया है ताकि अधिक से अधिक युवा आत्मनिर्भर बनकर राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दें।
अब अगर मदरसों की बात की जाए तो सत्य तो यह है कि सरकार से ज्यादा मदरसे चलाने वालों को खुद मदरसों की शिक्षा व्यवस्था पर विचार करने की बेहद आवश्यकता है। हाल ही में जियाउस्सलाम और डॉ एम असलम परवेज़ की किताब “मदरसाज इन द ऐज ऑफ इस्लामोफोबिया ” प्रकाशित हुई है जिसमें बताया गया है कि वर्तमान में किस प्रकार मदरसे मुश्किल दौर से गुज़र रहे हैं और विभिन्न चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। उनके अनुसार वहाँ पढ़ाई जाने वाली फ़िक़्ह (इस्लामिक विधि) की शैली भाषा और उदाहरण प्राचीनकालीन हो चुके हैं। इनके अनुसार ज्यादातर मदरसे दर्से निज़ामी की तालीम देते हैं जिसका निर्धारण कोई 300 साल पहले किया गया था। इसमें आधुनिक विचारों का समावेश नाम मात्र नहीं मिलता। लेखकों के अनुसार परिणामस्वरूप 2019 या 2020 में मदरसों का पाठ्यक्रम वही है जो 1870 में था। बात इतनी ही नहीं है बल्कि बात यह भी है कि इन मदरसों से निकले ज्यादातर ग्रेजुएट स्तर के विद्यार्थियों को कहीं ढंग का रोजगार भी नहीं मिलता।
सच्चर कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट में मुसलमानों को उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा उपलब्ध कराना एवं मदरसों के आधुनिकीकरण की सिफारिश की थी। वहीं कुछ समय पहले शिया वक्फ़ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी ने भी प्रधानमंत्री मोदी को चिट्ठी लिखकर कहा था कि मदरसों में शिक्षित युवा रोज़गार के मोर्चे पर अनुत्पादक होते हैं क्योंकि उनकी डिग्रियां सभी जगह मान्य नहीं होतीं। इसलिए उन्होंने मांग की थी कि मदरसे खत्म करके कॉमन एडुकेशन पालिसी लागू करनी चाहिए। तथ्य यह भी हैं कि एक रिसर्च में यह बात सामने आई थी कि मदरसों से शिक्षा लेने वाले युवाओं में से मात्र 2% युवा ही उच्च शिक्षा में रुचि रखते हैं, 42% भविष्य में इस्लाम का ही प्रचार करना चाहते हैं, 16% मदरसों में ही शिक्षक बनना चाहते हैं, 8% इस्लाम की सेवा करना चाहते हैं, 30% समाज सेवा और 2% धर्मगुरु बनना चाहते हैं। यानी विज्ञान तकनीक अथवा अनुसंधान के प्रति रुचि का तो प्रश्न ही नहीं।
अगर यह कहा जाए कि इन परिस्थितियों के लिए हमारे देश के राजनैतिक दल दोषी हैं तो गलत नहीं होगा। विगत 70 सालों से इस देश का मुसलमान इन दलों के लिए केवल वोट बैंक बना रहा और इनकी शिक्षा जिसे इनकी उन्नति की राहें खुलतीं तुष्टिकरण की राजनीति की भेंट चढ़ा दी गई। राष्ट्रीय सांख्यकीय विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार भारत में केवल 48% मुसलमान बच्चे बारवीं तक की शिक्षा ले पाते हैं और मात्र 14% बारवीं से आगे की शिक्षा। इन परिस्थितियों में अगर देश का एक राज्य मदरसों की सदियों पुरानी व्यवस्था से इतर मुख्यधारा की आधुनिक शिक्षा की नींव रखने की पहल करता है तो राज्य सरकार के इस कदम को राजनैतिक चश्मे से देखने के बजाए खुले एवं व्यापक दृष्टिकोण से देखना चाहिए।
डॉ नीलम महेंद्र
(लेखिका वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
भारत में वामपंथी उग्रवाद: बदलता स्वरूप
किसी राष्ट्र के अपने राष्ट्रीय हित होते हैं. उन राष्ट्रीय हितों की अपनी अपनी श्रेणियाँ भी होती हैं. परंतु जब उंगलियों पर यह गिना जाए कि प्राथमिक राष्ट्रीय हित क्या है, तो “राष्ट्र की सुरक्षा” सभी हितों में सर्वोच्च होता है. यह बात भारतीय इतिहास में आचार्य चाणक्य भी कहते हैं और पाश्चात्य चिंतक हंस मार्गेंथाऊ भी.
भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के समक्ष उत्पन्न प्रमुख चुनौती आतंकवाद है. आतंकवाद के अपने स्वरूप हैं. और यह भारत की आंतरिक सुरक्षा का एक बड़ा मुद्दा है. परंतु आंतरिक सुरक्षा की एक और चुनौती है जो आज नहीं तो कल बड़े स्तर पर विध्वंस का कारण बन सकती है. इसके तेवर बदल रहे हैं. और इसलिए हमें सतर्क रहने की आवश्यकता है.
उस चुनौती का नाम है: नक्सलवाद.
आइए इस लेख के माध्यम से नक्सलवाद से जुड़े तकनीकी पहलुओं को समझने की कोशिश करते हैं. और इस विषय पर आंतरिक सुरक्षा के जानकार और स्वयं सरकार का क्या रवैया था, क्या है और क्या होना चाहिए; इस पर विस्तार से बात करते हैं.
नक्सलवाद वह दिवास्वप्न है, जो आदर्शों के सूखे दरिया पर बड़े बड़े वादों के आदर्श पुल बाँधकर आदर्श जीवन की कल्पना करता है. जिसके नेता स्वयं को दमित, दलित और पीड़ित वर्ग का मसीहा मानते हैं. उन्हें हांथों में बंदूक थमा कर कहते हैं- “जाओ सत्ता बंदूक के नाल से निकलती है.” परन्तु स्वयं काॅफी हाउस में सिगरेट की कश भरते हुए माॅकटेल छलकाते हैं. और कभी कभी अपने पायजामे के नारे ठीक करते देखे जाते हैं.
इनके दायें कंधे पर एक झोला होता है. हाथ में “कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो” ये दुनिया के सवा लाख सज्जनों की मृत्यु के बाद अलौकिक शक्ति धारण किए उत्पन्न एक अवतार हैं. जिनके झोले में समस्त समस्याओं की एक जड़ीबूटी है. ये चुटकियों में सड़क पर आजादी माँगते हुए कितने क्यूट दिखने का प्रयास करते हैं. और अपनी सेक्साधीन मानसिकता को “माई लाईफ मखी च्वाइस” से ढकते रहते हैं.
इनके लिए भारतीय संस्कृति सदैव निम्न का शोषण करने वाली रही है. इन्हें रामायण में श्रीराम -केवट प्रेम नज़र नहीं आता. पर मष्तिष्क में भरे बीट के प्रभाव से इन्हें यह कुतर्क तलाशने में देरी नहीं लगती कि श्रीराम ने बालि का वध धोखे से किया. ये सूपर्णखा के लिए नारीवादी बनते हैं. सुरसा को अपना वंशज मानते हैं. और अब तो रावण से भी नाता जोड़ लिया है.
खैर अब आगे बात करते हैं कि भारत में 1960 के दशक में प्रारंभ हुआ यह आंतरिक आतंक कैसे और कितने चरणों में आगे बढ़ता गया :
प्रथम चरण: जोकि 1967 के बाद अखिल भारतीय समन्वय समिति के रूप में नक्सलवाद के उदय से सम्बन्धित है.
दूसरा चरण: जब नक्सलवाद बंगाल से बिहार, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश की ओर बढ़ा. और इस बीच सैकड़ों नागरिकों और सुरक्षा बलों की हत्या की जा चुकी थी. CPI( ML) का नया रूप PWG पीपल्स वाॅर ग्रुप को प्रतिबंधित किया जा चुका था.
तीसरा चरण: ऐसा चरण था जब नक्सलवाद एक बड़ी चुनौती बना. जब CPI (ML) ने खुले तौर पर सुरक्षा बलों पर सुनियोजित हमले की योजना बनाई. उनकी संख्या में लगातार वृद्धि हुई. तत्कालीन प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह ने “नक्सलवाद ” को भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती भी माना. इसी बीच देश ने कई बड़े नक्सलवादी हमले झेले. 2010 में छत्तीसगढ़ के दांतेवाड़ा में CRPF की पूरी कंपनी पर एंबुश हमला कर के 76 जवानों को मार दिया गया. इस घटना ने ना केवल देश की राजनीति में बल्कि सुरक्षा बलों को भी यह सोचने पर मजबूर कर दिया. कि नक्सलवाद सिर्फ विचारधाराओं का संकट नहीं है, यह सुनियोजित एंटी-इंडिया-मिलिशिया है.
नक्सलवाद का वर्तमान चरण : 2013 के सुकुमा हमले के बाद सुरक्षा रणनीति में बदलाव और सुुुरक्षा बलों के आक्रामक रवैये से एंटी-नकस्ल ऑपरेशन में चरणबद्ध रूप से वृद्धि हुई. फलस्वरूप नक्सलवादी घटनाओं में कमी आई. 2017 में आए गृह मंत्रालय के आँकड़े यही बताते हैं कि राज्यवार घटनाएँ और मृतकों की संख्या में कमी आई है.
वर्तमान में नक्सली हमलों में आई कमी ने सुरक्षा बलों को एक सुखद संदेश तो दिया है. साथ ही वामपंथी नक्सलवादी खेमें में चिंता की लकीरें भी पैदा की हैं और परिणामतः नक्सलवाद अब बदल रहा है. उसने नए तरीकों की खोज की है. नई गुप्त षडयंत्रो से अब साइलेंट वाॅर का लक्ष्य बनाया है.
क्या है बदलता स्वरूप?
सामान्यतः यह माना जाता है कि नक्सली आंदोलन भारत के पिछड़े इलाकों में जनसाधारण द्वारा किया जाने वाला विरोध है. जहाँ की त्रस्त आबादी सामान्य विकास के अभाव में बंदूक उठाने को मजबूर हो गई है. इस प्रकार के तथ्य और कुतर्क उन सभी लोगों के द्वारा रखे जाते हैं जो स्वयं इस गिरोह के सदस्य हैं. मीडिया का एक वर्ग इसे प्रोपेगेंडा का साधन बनाता है. जोकि नितांत झूठ है. पर यह समझना होगा कि पिछड़े इलाकों से नक्सलियों का हुजूम शांत नहीं बैठा है. तब भी भोले भाले लोगों को बहलाकर और धमकाकर हथियार थमाने वाले वामपंथी भारत विरोधी थे और आज भी हैं. कुछ नहीं बदला है. हाँ बदला है तो विरोध का नया तरीका. इनमें एक प्रमुख तकनीक है शहर नक्सलवाद.
शहरी नक्सलवाद, अब माओवादी वामपंथी विचारधारा के संगठन और उसमें कार्यरत लोगों द्वारा दूरदराज़ के बजाय शहरों में भूमिगत काडर विकसित किए जा रहे हैं. इनके द्वारा शहरी छात्रों की भर्ती क्रांतिकारी युवा संगठन के नाम पर की जाती है. जिन्हें वामपंथी, माओवादी और नक्सलवादी विचारधाराओं की ट्रेनिंग दी जाती है. बकायदा लम्बी ब्रेन वाॅश वर्कशाॅप चलती है. ध्यान रहे कि इस काडर का स्वरूप बिल्कुल वैसा ही है जैसे अलकायदा, जैश और आईएम जैसे आतंकी संगठनों के स्लीपरसेल्स होते हैं. ये किसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हो सकते हैं, किसी छात्र संगठन के अध्यक्ष या नेता हो सकते हैं, किसी गैर सरकारी संगठन के संस्थापक या सदस्य हो सकते है, फिल्म संगीत से जुड़े हो सकते हैं. नेता, लेखक, यहाँ तक कि दसवीं तक की होम ट्यूशन लेने वाला ट्यूटर भी.
ये सभी सामान्य विचारधारा से संचालित होते हैं. इन अकादमिशियन और कार्यकर्ताओं में ज्यादातर वे लोग हैं. जो पहले कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया या प्रतिबंधित मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया एवं सिमी (अलीगढ़ का प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन) के सदस्य रहे हैं. इन सभी ने फलाना ढिमकाना नाम का नया मानवाधिकार संगठन खोला है, जिसका उद्देश्य कानूनी शिकंजे से बचना है. 2018 में पाँच बुद्धिजीवियों की गिरफ्तारी ने अर्बन नक्सलवाद को जमीनी और अग्रिम मोर्चे पर ला खड़ा किया. यद्यपि इससे तथाकथित बौद्धिक क्षेत्र के महारथियों और राजनीतिक व्यक्तियों की त्योरियां चढ़ गई. लोकतंत्र की हत्या सरीखे चर्चित और घिसे पिटे नारे लगाए गए. पुलिस ने जिन लोगों को वहाँ पकड़ा था. उनमें पीयूसीएल की राष्ट्रीय सचिव सुधा भारद्वाज और सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता, अरुण फेरारिया भी शामिल हैं, जिन्हें भीमा कोरेगाँव हिंसा में गिरफ्तार किया गया है. इन पर यूएपीए भी लगा है. (यहाँ अपराधियों का नाम और स्वरूप गिनाने का लक्ष्य सिर्फ इतना है कि हमें यह समझना होगा कि नक्सलवाद अब पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़ चुका है.)
यह सभी आज के आज अर्बन नक्सल नहीं बने. एक लम्बे समय से हो रही फंडिंग, राजनीतिक शह और सुनियोजिन से जहरीले सपोले साँप बन गए हैं. आप सोच रहे होंगे कि यह सब पुलिस द्वारा दी गई थ्योरी का हिस्सा है या फिर इस बात का प्रमाण है कि नक्सलवादियों ने ऐसी कोई रणनीति अपनाई है. इसका जीता जागता उदाहरण है; 2014 में सीपीआई (एम) का एक दस्तावेज आया जिसका शीर्षक था – “शहरी परिप्रेक्ष्य: शहरों में हमारा काम. “
इस दस्तावेज में अर्बन नक्सलवाद को बढ़ाने की पूरी रणनीति साफ साफ संकेतित है. यह रणनीति कल कारखानों मे काम करने वाले कामगारों और शहरी गरीबों को लालच देकर लामबंद करने, अग्रिम संगठनों की स्थापना करने और उसमें पढ़े लिखे समान विचारधारा वाले छात्र, मध्य वर्ग के नौकरीपेशा, बुद्धिजीवी, महिलाओं, दलितों और धार्मिक अल्पसंख्यकों को एकत्रित करना है. समान विचाधारा का एक संयुक्त रणनीतिक मोर्चा बनाना है, जिसका लक्ष्य थोड़ी सी बात पर भारत में हिंसा, आगजनी, दंगा आदि अव्यवस्था फैलाना है.
सरकार का रवैया और आगे की रणनीति
गृह मंत्रालय का मानना है कि वामपंथी उग्रवाद से निपटने हेतु अर्बन नक्सलवाद पर नियंत्रण आवश्यक है. और संभवतः आगे इनपर बड़ी कार्यवाही की जा सकती है. देश में विदेशी कट्टरपंथी संगठनों की फंडिंग रोकने और गैर सरकारी संगठनों की आड़ में गैरकानूनी गतिविधियों करने वालों पर लगाम लगाने की आवश्यकता है. कई हालिया कानून आये भी हैं. उन्हीं कानून में एक यह भी है कि सभी NGOs अब मिलने वाले कुल चंदे का लेखाजोखा दिखाएँ और खर्च के स्त्रोत बताएँ. इसके अतिरिक्त UAPA ,NIA जैसे संशोधन जांच एजेंसियों को मजबूत स्थिति प्रदान करती हैं. इन से आशंका होने पर बिना वारंटगिरफ्तारी करने और जाँच का अधिकार भी प्राप्त हुआ है.
मेरा यह भी मानना है कि आने वाले दिनों में बुद्धिजीवियों और भूमिगत काडर का भंडाफोड़ हो सकता है. संभव है कि कई अनपेक्षित स्थानों से गिरफ्तारी हो, कुछ माड्यूल सामने आएँ और कुछ संगठनों पर प्रतिबंध भी लगे.
अंत में, भावी रणनीति क्या होनी चाहिए इस पर बात करते हुए लेख पर विराम चिन्ह लगाना चाहूँगा ;
वामपंथी उग्रवाद से निपटने में सुरक्षा बलों की तकनीकी क्षमता में वृद्धि जैसे नये हथियारों, ड्रोन तकनीकी, सर्विलांस तकनीक, लेज़र डिटेक्टर आदि समय की माँग है. साथ ही संवेदनशील इलाकों में एकीकृत चौकी और चेकपोस्ट की स्थापना करना, वहाँ तैनात सुरक्षा बलों को अतिरिक्त सुरक्षा मुहैया कराना भी आवश्यक है. किसी भी अनपेक्षित नक्सली हमले पर पहली प्रतिक्रिया में राज्य पुलिस की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण होती है. इसलिए क्षति को कम करने और राहत कार्यक्रम आदि के लिए बीट कांस्टेबल स्तर पर विशेष ट्रेनिंग की आवश्यकता है.
आवश्यक है कि राज्य पुलिस, सेंट्रल आर्म्ड फोर्स के जवानों के साथ साझा ड्रिल करें और तकनीकी साझा करते हुए समन्वय बढ़ाएँ. कई बार माँग उठती है कि नक्सली हमले के विरुद्ध सेना का प्रयोग किया जाए. पर मेरा यह मानना है कि सेना देश की बाह्य सुरक्षा के वाए महत्वपूर्ण इकाई है. और साथ ही राष्ट्र के गौरव का सूचक है. आंतरिक सुरक्षा के जानकार और उत्तराखंड पुलिस में शीर्ष आईपीएस अधिकारी IPS अशोक कुमार जी अपनी किताब में इससे सहमत हैं कि सेना का सीधा प्रयोग एक गलत संदेश दे सकता है. इसलिए बेहतर होगा कि एंटी नक्सलवादी ऑपरेशन में सेना की तकनीकी सहायता ली जाए.
एंटी नक्सल ऑपरेशन में अक्सर अंतर्राज्यीय समन्वय की कमी देखी जाती है. एक राज्य से भागकर दूसरे राज्य में शरण लेना एक बड़ी चुनौती है. इसलिए एकीकृत कमांड की स्थापना की जानी चाहिए जिसमें अर्द्धसैनिक बल, राज्य पुलिस, स्थानीय आसूचना ईकाई (LIU) का समन्वय हो. गृह मंत्रालय विभिन्न समितियों की ऐसी अनुशंसाओं पर कार्य कर रहा है.
कोबरा कमांडो, और ग्रे – होंड जैसे माॅडल विशेष रूप से वामपंथी उग्रवाद की कमर तोड़ रहे हैं. साथ ही केन्द्र सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर पिछड़े इलाकों में “वापसी”या “आत्मसमर्पण कार्यक्रम” भी चलाए जा रहे हैं.
स्थिति साफ है कि भारत में सभी विचारधाराओं का सम्मान है. एक व्यक्ति की दूसरे से असहमति भी आवश्यक ही है. परन्तु कोई भी विचारधारा तब अस्वीकार्य हो जाती है जब वह देश की कानून- व्यवस्था, नागरिकों की सुरक्षा और अंतत: राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा साबित हो जाती है.वही राष्ट्रीय सुरक्षा, देश का प्राथमिक राष्ट्रीय हित है.
नक्सलियों पर की गई कार्यवाही पर रोना रोने दोमुँहे लोगों के नाम अंत में एक संदेश,
“भारतीय लोकतंत्र का गला मोम का नहीं बना है कि जब तब कोई भी उसे दबोच कर, लोकतंत्र की हत्या कर सकता है. ये तुम्हारा दोहरा रवैया है कि सुरक्षा बलों के बलिदान देने पर तुम पिशाची चुप्पी सांट लेते हो. और जब वही सुरक्षा बल नक्सलवादियों को असली विकास दिखाते हैं, तो तुम्हारा नंगानाच शुरू हो जाता है.” बंद कर दो ये ढोंग तुम्हारे लाल सलाम में खून के छीटें साफ नज़र आते हैं”
#बड़कालेखक
(यहाँ व्यक्त विचार मेरे स्वयं के हैं. कोट की गई आधिकारिक तथ्यों की जानकारी पूर्णतः प्रमाणिक है. संदर्भ पुष्टि हेतु पुस्तक- “आंतरिक सुरक्षा चुनौतियाँ”)
Indian electoral democracy is any day better than the USA
Honest to god, we are a much better electoral democracy than the United States of America. The nightmarish experiences that the voters are going through in the POTUS elections due on Nov3, 2020 are stunningly unbelievable. We have been independent since 1947. A Republic since 1950. We held our first general elections in 1952. Compare it to the US. They have been independent since 1776 and a Republic since 1789. They have had Presidential elections since then. Registered voters in the US are around 160 million out of a population of 330 million. And not more 80 million have ever voted in their POTUS elections. In India, we have 950 million eligible voters. In 2019, the voter turnout was 67%-630 million, close to twice the US population itself. The numbers tell the story brilliantly.
The framers of our constitution, the 289 members of the Constituent Assembly led by the Pitamaha, Babasaheb Ambedkar, granted adult suffrage from day one. Women got their right to vote along with men. It was a huge, huge development. Look at the facts from the US of A. Beginning in the mid-19th century, several generations of woman suffrage supporters lectured, wrote, marched, lobbied, and practiced civil disobedience to achieve what many Americans considered a radical change of the Constitution. Few early supporters lived to see final victory in 1920.
By 1916, almost all of the major suffrage organizations were united behind the goal of a constitutional amendment. When New York adopted woman suffrage in 1917 and President Wilson changed his position to support an amendment in 1918, the political balance began to shift.
On May 21, 1919, the House of Representatives passed the amendment, and 2 weeks later, the Senate followed. When Tennessee became the 36th state to ratify the amendment on August 18, 1920, the amendment passed its final hurdle of obtaining the agreement of three-fourths of the states. Secretary of State Bainbridge Colby certified the ratification on August 26, 1920, changing the face of the American electorate forever.
The campaign for woman suffrage was long, difficult, and sometimes dramatic; yet ratification did not ensure full enfranchisement. Decades of struggle to include African Americans and other minority women in the promise of voting rights remained. Many women remained unable to vote long into the 20th century because of discriminatory state voting laws.
So much for western feminism and recognition of women as having equal rights. Coming to the ‘voting rights’ in the POTUS elections, that is the nightmare it is. Talk is humongous on ‘suppression, deprivation, denial, exclusion and worse’, as a Yale law Professor puts it. And even as American States, all 50 are voting in, in person, mail in and in drop boxes, the US Supreme Court is bigly into it. SCOTUS has said that in some states, votes can be counted for 3 days beyond Nov,3. In some states, No, they have to be in the counting scroll before 20.00hrs on voting day. Comy Ann Barett, now chosen to the SCOTUS may tilt the balance to a conservative a.k.a. Republican majority. SCOTUS may well decide and not We The People viz. voters in the US, like they did in 2000. Shame.
Each State in the US has a different set of rules, on voting. There is total lack of consistency and uniformity. Voter Ids for exercising your franchise are different. If signatures differ, your vote is gone. A few Courts say, no they won’t be gone, as activists cry foul. Particularly, there is open, defiant and divisive attempt to deprive the blacks and Hispanics from voting, including from personal threats and mails too, said to be sourced to Russia and Iran.
Donald Trump openly admits that “I may not quietly concede defeat and I may decide as POTUS which vote counts and which does not, as I am empowered to do so by Art.II of the Constitution’. Joe Biden, the contender warns that the “American people will have the final say and our institutions are strong enough to handle such dumb Trump bravado’.
One is unable to keep track of all that going on, all over each state, legislatures, streets and above all courts. So many cases before District and Federal courts and before SCOTUs all. As Eric Holder, Attorney General during Barack Obama years, says, “My head is spinning. There is no one common theme. Imagine the plight of the ordinary voter in the US, who is generally apolitical and apathetic. My prayer is that the US voter would do well to take the vote seriously and help America decide who wins and not the courts.” Shocking, to say the least.
And then what takes the cake is that the POTUS is never the person who wins the popular vote. The POTUS would be the one whom the Electoral College chooses. The electors have the last word and it is a over two hundred year vintage that smaller states have a disproportionate say in the election of votes. There have been hundreds of attempts to change this anachromism, but the Republicans have stood firm, as they stand to gain, as the last twenty years have shown that winner in 12 has been the ‘loser in the popular vote’. In Nov,2016 Hillary Rodham Clinton trumped Donald by 3 million popular votes, yet lost in the Electoral College stakes. Just for a sample. It was only in 2020 that SCOTUS ruled, for the first time, that the electors in the Electoral college ‘must vote in alignment with the popular vote in the respective States’. Until 2020, it was as if the voters can choose a Democrat and electors in the electoral College chose a Republican! Downright crazy, if you ask me.
Yes, our electoral machine is not faultless or blameless. Our Central Election Commission is meant to be independent and autonomous and thanks to the bully that the legendary T N Seshan was, it has now cut its teeth. Our CEC prevails and takes over, once the electoral process begins. Look at the Federal Election Commission in the US. It is helpless, as the courts wade into the process, even as the voting is on. Absolutely compounding the confusing dynamics.
No matter what, whoever wins the POTUS prize, purportedly the most powerful office in the universe, be it Donald J Trump or Joe Biden, American democracy is unlikely to have won. In fact, there are conspiracy stories doing the rounds on social media platforms, that Trump may yet declare himself the winner on election night and executively stop the counting process. Scary thought that. But that is all made possible by the inconsistent, unbalanced and chaotic ways of the electoral machine that America boasts of. It is a mystery how they have survived as a democracy, all these years, to become the leader of the free world. Donald J Trump is both, a symptom and product of the fault lines in the American democracy.
Thank heavens, that in our midst,? first past the post gets to be declared the winner, as it ought to be.
(Author- Narasimhan Vijayaraghavan- is practicing advocate in the Madras High Court)
रेगिस्तानी नागफनी
शरण देने वाले ईश्वर तुल्य हुआ करते हैं, शरणार्थी बन कर उन्हीं का गला काट देना क्या है? एक रिवाज, एक प्रथा, या अपने अल्लाह के आंगन में अपनी एक सीट आरक्षित हो जाने की उम्मीद, या आलोचना न सह पाने के कारण विक्षिप्त हो जाने पर किया गया कत्ल।
कुछ भी हो फ्रांस की दुर्घटना मानवता के नाम पर वो कलंक है जो आने वाले समय मे एक ऐसा मानक तो स्थापित कर ही देगा कि तथाकथित शांति समुदाय के शरणार्थियों को शरण देने के लिए कितनी बार सोचें या उनके बारे में सोचने की प्रक्रिया ही निरस्त कर दी जाए।
खैर सोचने वाली बात ये है कि 50 से ज्यादा देशों में शासन होने के बावजूद ये शरण लेने के लिए वहां क्यों नही जाते।
पैंट के पीछे वाली जेब में गला रेतने वाले औजार और आगे वाली जेब में विक्टिम कार्ड रखने वाले इन दहशतगर्दों को शांति के ऊंचे पजामे में फिट होने का लाइसेंस और समर्थन कहाँ से मिलता है।
इनकी शांति के फॉर्मूलों से तंग आ चुकी है दुनिया। क्यों घुसने दिया जाय इन्हें दूसरों की सरजमीं पर गंध मचाने के लिए, कैद कर दिया जाना चाहिए इनकी सोच को इन्हीं के अहाते में, दूसरों के जीवन को नर्क बना देने वालों का क्या काम दूसरों के आंगन में घुसकर उनकी नर्सरी के पौधों को उखाड़ने का, कलियों को मसलने की छूट क्यों दी जाए।
सोचिये, समझिये, विचार कीजिये क्योंकि कुछ सालों बाद आप सोचने, समझने और विचार करने की स्थिति में नही रह जाएंगे। रेगिस्तान के नागफनियों का इलाज बहुत जरूरी हो चला है।
इति
मिर्जापुर- कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना
आखिरकार दो वर्षों के इंतेजार के बाद तथाकथित हिंदी मनोरंजन के दुनिया की सबसे बड़ी वेब सीरीज “मिर्जापुर” का दूसरा भाग रिलीज़ कर दिया गया। जैसा उम्मीद थी गाली गालौच, मार काट, सेक्स के अतिरिक्त इसमें ऐसा कुछ नहीं है जिसे देखा जाए।
राजा हरिश्चन्द्र जैसी पारिवारिक फिल्मों से शुरू होने वाले बॉलिवुड का पतन तो 90 के दशक से ही शुरू हो गया था जिसमें आख़िरी कड़ी मिर्जापुर साबित हुई। लेकिन इस वेब सीरीज ने एक कदम आगे बढ़ते हुए सामाजिक समरसता, भारतीय हिन्दू परिवारों को तोड़ने की नींव भी रख दी, जिसमें बताया गया है कि किस तरह एक ब्राह्मण खानदान के पुरुष अपने घर की बहुओं पर बुरी नजर रखते है, एक तरह से किसी खास धर्म विशेष में होने वाली परंपरा को हिन्दुओं के सर पर फोड़ा गया है।
पूरी वेब सीरीज में तो बहुत से लोगों को जान से मारा गया लेकिन इस वेब सीरीज में मकबूल के परिवार की हत्या को इस तरह से प्रस्तुत किया गया है कि आपको उससे हमदर्दी हो जायेगी, इसके लिए लेखक बधाई का पात्र है लेकिन इसी वेब सीरीज में डॉक्टर की हत्या को प्रदर्शित करते समय वो हमदर्दी क्यों नहीं उत्पन्न की गई? डॉक्टर की हत्या के बाद उसके बेटी के माध्यम से जो संदेश देने की कोशिश की गई उसे कोई भी समझदार व्यक्ति समझ सकता है।
अब थोड़ा इस वेब सीरीज के पात्रों और उनके बैकग्राउंड की चर्चा कर लेते है, इसमें मुख्य विलेन त्रिपाठी खानदान था, उसके बाद बिहार के त्यागी फिर शुक्ला परिवार फिर पंडित जी का परिवार। इन चारों परिवारों के सरनेम में कुछ समानता दिखती है जिसके माध्यम से लेखक ओर निर्देशक की मनोवृत्ति को समझा जा सकता है कि किस प्रकार पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार की हिंसा के लिए एक जाति विशेष को जिम्मेदार ठहराया गया है। दूसरी तरफ नवाब साहब के माध्यम से आत्मसम्मान, मकबूल और बाबर के माध्यम से वफादारी को एक धर्म विशेष से जोड़ा गया है।
यहां तक तो ठीक था लेकिन इस वेब सीरीज ने आगे जो किया वो बर्दाश्त के बाहर है क्योंकि पूर्वांचल के लड़कों के लिए आज भी उनके माता पिता भगवान तुल्य होते है लेकिन इसमें मुन्ना त्रिपाठी के माध्यम से अपनी माता और त्यागी के लिए किए गए कमेंट समझ से बाहर हैं पता नहीं लेखक को ऐसा कौन सा परिवार मिल गया जहां मा बाप को लेकर बच्चे ऐसी बाते करते है और ऐसी बाते किसी दूसरे से सुन कर बर्दाश्त कर जाते लेकिन कोई जादुई शक्ति होगी लेखक के पास जिससे उन्हे ऐसा कुछ दिख गया होगा।
कालीन भैया और उनके पिता जी के मध्य जातिव्यस्था को लेकर किया गया संवाद सीधे सीधे वामपंथ की काल्पनिक थियोरी को जनसामान्य के दिमाग में डालने का प्रयास किया गया है, मुन्ना भैया द्वारा सत्ता के लिए अपने बाप को मारने की कोशिश करना और मकबूल द्वारा अपने मां की हत्या का बदला लेने के लिए वफादारी को किनारे कर देना दोनो सच्ची कहानी है जिसका साक्ष्य इतिहास में मिलता है लेकिन यहां भी लेखक ने किरदारों को आपस में बदल दिया है क्योंकि सत्ता के लिए पिता की हत्या कौन से मजहब के लोग करते है और मां बाप के लिए कौन अपना जीवन कुर्बान कर देता उसके लिए ज्यादा जोर देने की जरूरत नहीं है एक आम इतिहास का विद्यार्थी भी बता सकता है कि ये दोनों परम्परा कहां देखने को मिलती है।
बाकी सब इस वेब सीरीज में ठीक है। गालियां, हत्या, साजिश, सेक्स इत्यादि के लिए इस वेब सीरीज को 5 में से 4 स्टार जबकि सामाजिक पतन की नींव रखने, काल्पनिक कहानियों को धर्म, जाति विशेष से मनमाने तरीके से जोड़ने के लिए इसे पूरे नंबर देना चाहिए।
Is ideological similarity an unmentioned clause of friendship?
A man of principles should always keep his ideology above any other thing in life but at the same time should be tolerant towards the opinions of others, at least as long as they don’t harm our interests.
Being born in a pluralistic country like India and a simple middle class Hindu family, the two basic values I received was to follow and love your culture and NEVER disrespect someone else’s beliefs(religious in particular).
I believed all my friends were taught the same, until few months back. My belief shook when a schoolmate who never bunked even the most boring class at school, left the whatsapp group because some students were writing JAI SHREE RAM to express their joy over the Bhumi Pujan.
While I used to happily ask for Sevai from my friends on Eid and dotingly listened to the stories of their Holy sojourn, none of these people turned up to congratulate me on such an auspicious day of my life.
It is but natural in a democracy for people to have different socio-political inclinations amd hence politics was never a topic of discussion at school. Also I believed that it can never be a bar in friendship. But the myth seemed to break when I heard the most loyal and dedicated love-birds of our school are at the verge of breaking apart because of different political opinions. These two people who presented themselves as epitome of inter-religion love mow struggle to stay together. Things were perfect between them only until the girl did not put forward her political opinions.
Many other friends of mine have also reduced conversation with me after I started putting out Insta stories embracing my faith and political stand. Though this is not a generalisation as many of my friends are the same with me as they were despite their opinions on certain matters being poles apart to that of mine.
But what bothers me the most is that the people who one’s spent hours talking to me now hardly reply to my text (I tried finding other possible reasons but could not).
The only clauses in the contract of friendship were loyalty and unconditional love then how can religion or politics be the cause of breaking or ruining it.
सूमो, नमो और नीमो
सूमो बाबू, को जब CM का संदेसा मिला, तब दोपहर ढल रही थी। वह Secretary के साथ GST Council की दो दिनों में होने वाली meeting की तैयारी में जुटे थे। इतनी हड़बड़ी में बुलाया,यह सुनकर थोडे से चकित भी हुये। फिर उन्होंने हल्कीसी आह भरी। उन्हें मालूम था CM को किस बात की चिंता सताये जा रही थी – १२० सीटे! उन्होने मीटिंग आधे घंटे में खत्म कि,और CM से मिलने चल दिए।
फीकी मिठाई और खाली डिब्बा
३ महीने हो गए इस बात को। सूमो बाबू,आज CM के लिए मिठाई और खुशख़बरी ले जा रहे थे।और उन्हें संतोष इस बात से था, कि बड़ी आसानी से उन्होंने अपना वादा निभा लिया था। उनके हिसाब से बड़ा जरूरी था, के यह खबर मीडिया से पहले वह जा कर CM को देते। तब वह उनका प्रसन्न मुख देखना चाहते थे। पर उस समय बेचारे सूमो बाबू को ज़रा भी अंदाजा नहीं था की उनकी ख़ुशी इतनी अल्पायु होगी।
जब सामना हुआ, तो उन्हें लगा कि मुख्यमंत्री उन्हीके इंतज़ार में बैठे थे। और सूमो बाबूने मिठाई का डब्बा खोलने के पहले CM ने तीर चलाया…
”काजुकतली फीका ही लाये है ना?”
सूमो बाबू थम से गये, दिल की धड़कन तेज हो गई। फिर भी डब्बा खोला और हिम्मत करके बोले,
“आपका इच्छा पूरा हो गया। आप चाहते थे उसे २ और हमारी पार्टी से १ ज्यादा। लीजिये…”
CM ने मिठाई बिना हाथ में लिये, दूसरा तीर चलाया “बड़े भोले है आप…आपके दिल्ली वाले मिठाई ले लिये! और खाली डब्बा छोड़ दिया मेरे और आपके लिये!!”
सूमो बाबू के चेहेरे की मुस्कान अब गायब हो चुकी थी। उन्होंने मिठाई का डब्बा बंद कर दिया।
“आखिर में मामा के लड़के को दूध पिलाकर खड़ा कर दिये।क्या कीजिये १२० सीटों का, बताईयें?” CM
सूमो बाबू इस हमले के लिये बिलकुल तैय्यार नहीं थे। फिर भी उन्होंने अपने आपको संभाला और जवाब दिया… “अरे आप क्यों चिंता कर रहे है इन मार्जिनल प्लेयर्स का? बिठा देंगे कोने में कही पे।”
CM आज रुकने वाले नहीं थे…“ काश आपकी हाई कमान भी इनके बारे में यही सोचती। रोज हम पे जहर उगलता है।और बोलता है के मेरा छाती भी चीर कर देखिएगा तो, मालिक का ही तस्वीर मिलेगा।और देखे नहीं, निर्दलीय का कैसा हेरा फेरी मचा रखा है? ”
“पार्टी ने स्पष्ट किया है, CM तो आप ही रहेंगे।” सूमो बाबू
इसपे CM हस दिये,और बोले “बड़ी मेहेरबानी आपकी…और आपही डिप्टी रहेंगे। पर जब १०० सीट मोटा भाई का,और ५० हमारा, तो क्या CM,और क्या डिप्टी? बताइए ?”
“और फिर साथ में यह घर का चिराग।”
और फिर वह रुक गये…अपनी बातों का असर आँख़ने के लिये।
“यह सब बोलना अच्छा लगता है क्या? पर क्या करे? एक आप ही तो है जो दोनों तरफ की नजर रखते है।”
और फिर अनपेक्षित तरीकेसे उन्होंने मिठाई के डब्बे के तरफ निदर्शन करते हुए सूमो बाबू को बोला “चलिए मिठाई तो खिलाइए।”
अब तो सूमो बाबू को मिठाई सचमुच फीकी लग रही थी।
“बाकी, ‘कोने में’ हम और आप मिलेंगे! २ साल में…” उठते उठते CM ने आखिरी तीर चलाया।
Corona से संक्रमित होने के बाद,AIIMS में पड़े पड़े सूमो बाबू सोच रहे थे,आज इस बात को करीब १ महीना हो गया। जब डॉक्टर ने उन्हें यह बुरी खबर दी, तो उन्होने सबसे पहले CM को इत्तला दी….“मुझे अब २ हफ़्तों के लिए छोड़ेंगे नहीं। यहाँ से पूरा प्रचार आप ही को संभालना पड़ेगा।”
CM “आराम कीजिये। वैसे तो मेरा भी कोई काम नहीं है मंच पे… साहब भाषण देते है मै सुनता हूँ। देखे नहीं FM मैडम ने किस तरह से, जो टीका अभी आया नहीं वह भी टिका दिया? वह भी मुफ़्त में!”
“आपको पता भी था?”
बात तो सही थी। डिजिटल रैली के बाद में यह फिर एक बार High Command ने, बिना सलाह मशवरा किये ‘जनता की भलाई’ का फैसला ले लिया था। और घोषित भी कर दिया था! बात कहीं न कहीं सूमो बाबू को भी खली तो।पर वह अपनी दिल की बात किसे बताते? CM के पास उनका कंधा था। उनके पास कौन था? फिर उनको CM की एक एक बात याद आने लगी।
दोस्त, दोस्त ना रहा…गठबंधन कैसे टुटा?
क्या सचमुच यह उन दोनों को अपाहिज करने की चाल है? क्या यह दोनों का आख़िरी चुनाव होगा? क्या २०२० में बिहार की ‘जोड़ी नंबर वन’ इतिहास जमा हो जाएगी? और इसी तरह के कई सवाल। और जब उन्होंने, मामा के लड़के(CM के दिए हुए इस नाम पे उनको अभी भी हसी आयी) को इलेक्शन रैली में, “हम CM को जेल भिजवायेंगे” यह बोलते हुए सुना, तो वह दंग रह गए! यह क्या हो रहा है?
क्या पार्टी सचमुच उनको निपटाने की तैयारी कर रही है? सोचते सोचते थक से गए। शायद दवाई का असर हो…नींद लग गई।आँख खुली तब अंधेरा छट रहा था…अभी सुबह थोड़ी दूर थी। कहीं दूर से मोर की आवाज़ आ रही थी। सूमो बाबू को घूमने जाने ही इच्छा हुई। फिर याद आया की वह अस्पताल में है। अपनी विफलता पे हँसी आयी। क्या भगवान भी शायद…
उनको, फिर २०१५ याद आया। गठबंधन कैसे टूटा ? उनसे पार्टी ख़ासी नाराज़ हो गयी थी। CM को संभालना उनका काम था। सच्चाई तो यह थी, जीस तरह से पार्टी ने २०१३ के सितम्बर से करवट बदली, उससे CM कमाल के विचलित हुए थे। २०१४ में जब २८० सीटे आई तो उन्होंने मन बना लिया था। और फिर असेम्ब्ली चुनाव के पहले उन्होंने पाला बदल दिया।
अब,सूमो बाबू का दर्द यह था, की युति टूटने का दोष तो उनपे थोप दिया गया; पर २०१७ में वापस युति और सत्ता में वापसी हुई, तब सारा श्रेय High Command ले गयी। उसकी वजह भी सूमो बाबू जानते थे। पार्टी, युति टूटने को मौक़ा मान रही थी…अपना सिक्का राज्य में जमाने का। बताते है, उस मौके पे,सूमो बाबू के बारे में, PM ने कहा था, “इनको CM से छाया से बाहर आना चाइये था,उसके बजाय,यह छाया बन के रह गये।”
नीमो तूफान
भूतकाल से वर्तमान वह आये, घंटी से। उनकी छाया,मतलब धर्मपत्नी के फ़ोन की! डॉक्टरों ने मना करने के बाद भी वह खाना लेके आने वाली थी। और वह फिर, जिस सवाल का उनको डर था वही पूछेगी “२०२५ में तो आप बन जाईगा ना?मैं तो थक गयी हूँ यह डिप्टी लगा के।” और फिर वह हर बार की तरह इस बार भी ,जवाब टाल जायेंगे। पर इसका जवाब इनको दिल ही दिल में मालूम था। उन्हें यह मालूम था की २०१५ से २०१७ ही उनके पास मौका था। और अब वह जा चुका है।
इतने मे दरवाजे पे टक-टक हुई और Security Guard, अख़बार ले आया। शीर्षक देख, सूमो बाबू विस्मित हुए और फिर ख़ुशी से मुस्कुराये।
नीमो तूफान का अवतरण – महागठबंधन की सिट्टीपिट्टी गुम
और निचे, PM और CM की रैली के लिए उमड़ी हुए जन-सैलाब को साथ में, वंदन करते हुए तस्वीर। सूमो बाबू को पत्रकार ने दिया हुआ नाम पसंद आया – नीमो! और दोनों को साथ में देंख वह निश्चिंत हो गए। ना बागी विधयाक,ना मौसम वैज्ञानिक पार्टी…किसी की जरूरत नहीं पड़ेगी।
उन्होंने मोबाइल उठाया और डॉक्टर को फ़ोन मिलाया, “नमस्ते। ५ दिन हो गए यहाँ पड़े-पड़े…कृपा कीजिए और २ दिन में रिहा कीजिये हमें.”
“वरना फिर से जंगल राज आ गया तो आप जिम्मेदार होंगे”
दोनों खिल खिला के हस दिए !!!
Macaulay education system should end
Our India was a slave to the British for about 200 years. India was first ruled by the East India Company from 1757 to 1857 and then the Queen of England reigned till 1947after the first freedom struggle of 1857. The British government realized that the people of India are proud of their ancient culture and that is their glory. The British knew very well that Indians would never be slaves until they were associated with their ancient culture. Then British create a conspiracy to control Indian mindset by creating hatred for their own culture among them because when britishers first stepped into India they saw that Indians were very rich and they found no beggar in India.
For this, they chose a very scathing weapon called education. Earlier, education was in Gurukulas. In Gurukula, learners were also given knowledge of Indian cultural values, Vedas and Puranas along with studies. In 1835, the British brought the English Education Act to India. This destroyed the Gurukula system. It emphasized the western values instead of Indian morals in Indians. Indians were drawn to English language. This education divided the Indian society from within and the ancient culture was abandoned. This also created divisions between Hindus and Muslims, which later led creation of Pakistan in 1947. This led the people of India to think their ancient culture as inferior and to think the Western civilization as a better and of higher degree. The British wanted to loot Indian resources to nurture themselves by making Indian people slave of Britain. The main face that structured this wicked education system is Thomas Babington Macaulay. This person’s mind behind the downfall of India’s culture.
The Education System of the British snatched away the identity of Indians. It was the British diplomacy to tell Indians despicable. Macaulay said that Indians have to make English in ideas, morality and taste with Indian in colour and blood. This makes it clear that the British wanted to move Indians away from their ancient Indian culture to western civilization. The British also tampered with the vast history of India and disappeared a lot of things. Even when India became independent in 1947, the Nehru government continued this wicked education system. It was a kind of education given to all. It has nothing to do with the capability of the learner. No student could study according to his interest. Only the attention was given to cramming and not in understanding. Just as between elephant and the monkey, only monkey can climb on the tree, not the elephant, but the elephant will be treated as a failure according to this education system. Every human being has some merit and his own interest.
There should be an education system that does not suppress the merits of human beings. Today’s India needs its ancient culture. The new education system will have to revive Indian values and build a new India. This will enable our India to regain the title of Vishwa Guru and then Ramraj in India is no far. There is need of again nourishment of Gurukulas in India. Modi government brought a new education policy in 2020, which will be able to improve the education system to a great extent. This education policy is under the formula of 5 + 3 + 3 + 4. It also focuses on Indian values and learning. The student will able to study his favorite subject. It also emphasizes skill development. Therefore, Macaulay education system should end in India forever.
Why is China so ahead of India even when both started from same league?
70 years back India and China were very much similar in terms of GDP and population. After Mao failed economic policies like land collectivization, China opened its economy in 1970’s and moved towards capitalism. At that time China was the only Communist country which applied capitalism.
Whereas India on the other hand opened its economy in 1991, even after being a Democractic country India chose socialism.
In 1979 China re-established diplomatic ties with USA under the leadership of Deng Xiaoping which brought lot of foreign investments from US due to China’s cheap labour and low rental cost.
From the beginning of 1980’s China saw double digit growth rate for the following 15 years and it was the time when it over took India.
Population: Although India and China have same population; China utilized its population wisely. Chinese govt promoted skill development among youth and encouraged its population to join manufacturing sector.
As the large number of people started choosing manufacturing sector, slowly during 1990 and early 2000’s China became World’s production house by simply imitating top brands and developed countries took advantage of this and established their factories in China.
Technology transfer: As lot of developed countries started opening companies in China the then Chinese govt started asking for technology transfer so as to open production house and many companies accepted. That’s why today China had its own Google, YouTube and Whatsapp. Its like “Give a man a fish, he will eat for a day. Teach a man to fish he will be fed forever.”
Long term vision: Democractic countries release manifesto for every five years; whereas Chinese govt release 15 years Manifesto and they follow it religiously. Also one more thing is noone in China questions govt decisions like in India where even small land acquisition by govt becomes a national news.
Economy manipulation: China in early 2000 took 3 times the loan of their then GDP from Chinese central bank without any assurance of paying it back again. Its called GDP to debt ratio which is now 300%, China invested this money to build world class top infrastructure for foreign companies, developed many cities and created Economic zones.
There are also other factors like China saw a century of humiliation which paved the path and hunger to develop and compete with western world whereas we Indians are forgetting what British did to us.