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मिर्जापुर- कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना

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मिर्जापुर- कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना

आखिरकार दो वर्षों के इंतेजार के बाद तथाकथित हिंदी मनोरंजन के दुनिया की सबसे बड़ी वेब सीरीज “मिर्जापुर” का दूसरा भाग रिलीज़ कर दिया गया। जैसा उम्मीद थी गाली गालौच, मार काट, सेक्स के अतिरिक्त इसमें ऐसा कुछ नहीं है जिसे देखा जाए।

राजा हरिश्चन्द्र जैसी पारिवारिक फिल्मों से शुरू होने वाले बॉलिवुड का पतन तो 90 के दशक से ही शुरू हो गया था जिसमें आख़िरी कड़ी मिर्जापुर साबित हुई। लेकिन इस वेब सीरीज ने एक कदम आगे बढ़ते हुए सामाजिक समरसता, भारतीय हिन्दू परिवारों को तोड़ने की नींव भी रख दी, जिसमें बताया गया है कि किस तरह एक ब्राह्मण खानदान के पुरुष अपने घर की बहुओं पर बुरी नजर रखते है, एक तरह से किसी खास धर्म विशेष में होने वाली परंपरा को हिन्दुओं के सर पर फोड़ा गया है।

पूरी वेब सीरीज में तो बहुत से लोगों को जान से मारा गया लेकिन इस वेब सीरीज में मकबूल के परिवार की हत्या को इस तरह से प्रस्तुत किया गया है कि आपको उससे हमदर्दी हो जायेगी, इसके लिए लेखक बधाई का पात्र है लेकिन इसी वेब सीरीज में डॉक्टर की हत्या को प्रदर्शित करते समय वो हमदर्दी क्यों नहीं उत्पन्न की गई? डॉक्टर की हत्या के बाद उसके बेटी के माध्यम से जो संदेश देने की कोशिश की गई उसे कोई भी समझदार व्यक्ति समझ सकता है।

अब थोड़ा इस वेब सीरीज के पात्रों और उनके बैकग्राउंड की चर्चा कर लेते है, इसमें मुख्य विलेन त्रिपाठी खानदान था, उसके बाद बिहार के त्यागी फिर शुक्ला परिवार फिर पंडित जी का परिवार। इन चारों परिवारों के सरनेम में कुछ समानता दिखती है जिसके माध्यम से लेखक ओर निर्देशक की मनोवृत्ति को समझा जा सकता है कि किस प्रकार पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार की हिंसा के लिए एक जाति विशेष को जिम्मेदार ठहराया गया है। दूसरी तरफ नवाब साहब के माध्यम से आत्मसम्मान, मकबूल और बाबर के माध्यम से वफादारी को एक धर्म विशेष से जोड़ा गया है।

यहां तक तो ठीक था लेकिन इस वेब सीरीज ने आगे जो किया वो बर्दाश्त के बाहर है क्योंकि पूर्वांचल के लड़कों के लिए आज भी उनके माता पिता भगवान तुल्य होते है लेकिन इसमें मुन्ना त्रिपाठी के माध्यम से अपनी माता और त्यागी के लिए किए गए कमेंट समझ से बाहर हैं पता नहीं लेखक को ऐसा कौन सा परिवार मिल गया जहां मा बाप को लेकर बच्चे ऐसी बाते करते है और ऐसी बाते किसी दूसरे से सुन कर बर्दाश्त कर जाते लेकिन कोई जादुई शक्ति होगी लेखक के पास जिससे उन्हे ऐसा कुछ दिख गया होगा।

कालीन भैया और उनके पिता जी के मध्य जातिव्यस्था को लेकर किया गया संवाद सीधे सीधे वामपंथ की काल्पनिक थियोरी को जनसामान्य के दिमाग में डालने का प्रयास किया गया है, मुन्ना भैया द्वारा सत्ता के लिए अपने बाप को मारने की कोशिश करना और मकबूल द्वारा अपने मां की हत्या का बदला लेने के लिए वफादारी को किनारे कर देना दोनो सच्ची कहानी है जिसका साक्ष्य इतिहास में मिलता है लेकिन यहां भी लेखक ने किरदारों को आपस में बदल दिया है क्योंकि सत्ता के लिए पिता की हत्या कौन से मजहब के लोग करते है और मां बाप के लिए कौन अपना जीवन कुर्बान कर देता उसके लिए ज्यादा जोर देने की जरूरत नहीं है एक आम इतिहास का विद्यार्थी भी बता सकता है कि ये दोनों परम्परा कहां देखने को मिलती है।

बाकी सब इस वेब सीरीज में ठीक है। गालियां, हत्या, साजिश, सेक्स इत्यादि के लिए इस वेब सीरीज को 5 में से 4 स्टार जबकि सामाजिक पतन की नींव रखने, काल्पनिक कहानियों को धर्म, जाति विशेष से मनमाने तरीके से जोड़ने के लिए इसे पूरे नंबर देना चाहिए।

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