Monday, June 17, 2024
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आदिपुरुष का विरोध मूर्खतापूर्ण

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जिन्हें भी आदिपुरुष के teaser से दिक्कत है कि इसमें आराध्य राम और हनुमान को कैसे दिखाया है? रावण को छपरी दिखा दिया है इत्यादि, उनसे मेरे कुछ सवाल हैं और मैं उन्हें कुछ सुझाव भी देना चाहता हूँ।

रावण से शुरू करें??

फ़िल्म देखे बिना ये कैसे मान लिया कि रावण को कैसा (अच्छा या बुरा) दिखाया गया है?

अगर रावण को बुराई का प्रतीक दिखाया गया है यानी villain दिखाया गया है तो फिर वो उसे जैसा चाहें वैसा look दें, कम से कम hero तो नहीं दिखाया ना। रावण के insights कैसे दिखाए हैं ये तो फ़िल्म देखने के बाद ही पता चलेगा। रावण से अचानक इतनी सहानुभूति क्यों हो रही है? रावण का विद्वान होना महत्त्वपूर्ण है या उसका बुरा होना?

कोई भी रचनाकार अपने आराध्य को अपनी दृष्टि से भी देख सकता है ना? कोई बाल गणेश को bag पहनाकर भी उसकी आराधना कर सकता है। अगर रचनाकार को Hollywood के super powers में अपने आराध्य दिख रहे हैं तो वो उन्हें एक अलग तरीक़े से दिखा रहा है।

आप किसी रचनाकार को आदेशित क्यों करना चाहते हैं?

अगर आपको लगता है कि Bollywood की सोच, उनकी कल्पना आपके हिसाब से सही नहीं है तो आपके पास उसका क्या विकल्प है?

एक विचार ये है कि लोगों को अच्छा नहीं लगा तो लोग ख़ुद नहीं देखेंगे। एक प्रतिक्रिया ये है कि अच्छा नहीं लगा इसलिए अब इसको पूरी तरह से flop करवा दो ताकि बनाने वाले को अकल आ जाए और वो अगली बार से सही बनाये।

अब मैं आपसे पूछना चाहता हूँ कला में सही और ग़लत क्या होता है? जब मणि रत्नम रावण फ़िल्म बनाकर अपने हिसाब से रामायण की कहानी को आधुनिक किरदारों के माध्यम से कहता है तब किसी की भावना आहत होती है? या आपने वो देखा ही नहीं?

इसी तरह कोई भी कलाकार अपने हिसाब से कुछ भी दिखा सकता है लेकिन आप उस पर नियंत्रण कैसे रखेंगे ? ( यदि आप नियंत्रण रखना चाह रहे हैं)

मैं आपको एक सरल उपाय बताता हूँ। यदि आप चाहते हैं कि अमुक कहानी अमुक कथाकार अमुक तरीक़े से कहे तो आप crowd funding करके एक मुहिम चलाइए और अपने मन का जो भी बनवाना है उनको उतने पैसे देकर (जो उनकी फ़ीस है) बनवा लीजिए।

अथवा आप अपने ही लोगों में से कुछ लोगों को अभिनय/निर्देशन/सम्पादन/छायाचित्रण/संगीत/दृश्यात्मक प्रभाव ऐसे सभी क्षेत्रों में प्रशिक्षित कर उनसे फिर अपने मन का और अपनी कल्पनाओं की फ़िल्में बनवाइए। क्योंकि क्या है ना कि अधिकांश जनता २ हफ़्ते में एक बार या छुट्टी पर त्योहार पर सिनेमाघर ज़रूर जाती है। जब नहीं जाती तब TV पर या OTT पर देखती है, सिने-जगत के लोगों को सोशल मीडिया पर follow करती है, उनके lifestyle से प्रभावित होती है, उनके activism से भी प्रभावित होती है। आलम ये है कि stars की देखादेखी corporate जनता honeymoon मनाने मालदीव जाने लगी है।

उनको weekend पर जब फ़िल्म देखने जाना होगा तो वो क्या देखेंगे? क्या आपने विकल्प सोचा है? अगर ब्रह्मास्त्र लगी है तो वो ब्रह्मास्त्र ही देखेंगे ना? आप विकल्प तो दीजिए उन्हें!

या सोशल मीडिया पर अपना रोष प्रकट करके उनसे फ़िल्म सही से बनवा लेंगे? और कब तक ऐसे ही बनवाते रहेंगे? और कौन कौन आपको बात सुनता रहेगा? युवा कलाकारों को इस तरह से प्रोत्साहन मिलेगा?

तो दोनों बातें सोचिए और कुछ ऐसा करिए जिससे एक स्थायी समाधान निकले।

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