Tuesday, July 23, 2024
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कांग्रेस ने कभी भी देश को स्वत्रंत कराने का प्रयास नहीं किया: प्रथम भाग

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Nagendra Pratap Singh
Nagendra Pratap Singhhttp://kanoonforall.com
An Advocate with 15+ years experience. A Social worker. Worked with WHO in its Intensive Pulse Polio immunisation movement at Uttar Pradesh and Bihar.

मित्रो वर्ष १८५७ में हुए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को शुरू करते हुए परमवीर स्व. श्री मंगल पांडे ने मेरठ की छावनी से जब पहली गोली चलाई तो अंग्रेजों को तनिक भी इस तथ्य का आभास ना हो पाया की ये गोली केवल एक गोली नहीं अपितु भारतवर्ष के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की बुनियाद है। उत्तर प्रदेश के मेरठ से निकली ये चिंगारी देखते ही देखते कर्नाटक, अवध, बंगाल, बिहार महाराष्ट्र से होते हुए कब दिल्ली तक आग बन कर धधकने लगी ये उन मक्कार और धूर्त अंग्रेजो को पता ही नहीं चला। बच्चा हो या जवान, प्रौढ़ हो या वृद्ध, महिला हो या पुरुष, सैनिक हो या सामान्य नागरिक, गांव में रहने वाले हो या जंगलो में प्रकृति के साथ साहचर्य  निभाने वाले आदिवासी सभी ने किसी न किसी प्रकार इस स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी भूमिका निभाई।

भारतियों को पाने अत्याचार और दैत्यीय प्रकृति से खून के आंसू रुलाने वाले अंग्रेजो को पहली बार डर महसूस हुआ और ये डर इतना भयानक था की लन्दन में बैठी अंग्रेजो की महारानी के सिंहासन की भी चूलें हिल गयी थी। अंग्रेजो को पहली बार इतने भयानक रक्तपात का सामना करना पड़ा था। भारतियों में स्वतंत्र होने की इतनी प्रबल भावना उत्पन्न हो चुकी थी की वो इसे प्राप्त करने के लिए किसी भी पराकाष्ठा को स्पर्श करने को उत्कंठित व् अत्यधिक व्याकुल हो चुके थे। अंग्रेजो और उनकी पूरी कौम को प्रथम बार डर का एहसास हुआ था। खैर किसी प्रकार उन्होंने इस आंदोलन को अपनी दमनकारी वीभत्स नीतियों से कुचल दिया और तुरंत इस कार्य पर लग गए भविष्य में पुन: इस प्रकार की भावना उत्पन्न ना हो सके, इसके लिए क्या उपाय किया जाय।

अंग्रेजो ने वर्ष १८५७ के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन के कारणों को ढूढ़ने का प्रयास किया और एक की हजार पन्नो की रिपोर्ट तैयार की गयी, जिसे एलन ऑक्टोवियन ह्यूम (A. O. Hyume) को पढ़कर उचित मार्ग ढूढने का परामर्श दिया गया ताकि भविष्य में फिर से वर्ष १८५७ के आंदोलन की पुनरावृत्ति ना होने पाए। अब दोस्तों यंहा पर यह जानना आवश्यक है की आखिर ये एलन ऑक्टोवियन ह्यूम (A. O. Hyume) था कौन। आइये संक्षिप्त परिचय प्राप्त कर लेते हैं।

एलन ऑक्टोवियन ह्यूम (A. O. Hyume) वर्ष १८५७ के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन के समय इटावा के कलक्टर के पद पर ब्रिटिश सरकार द्वारा तैनात किये गए थे। प्रथम भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान १७ जून १८५७ को उत्तर प्रदेश के इटावा मे स्वतंत्रता सेनानियों से अपनी जान बचाने के लिये एलन ऑक्टोवियन ह्यूम (A. O. Hyume) को साड़ी पहन कर ग्रामीण महिला का वेष धारण कर भागना पड़ा था। “इटावा के हजार साल” और “इतिहास के झरोखे में इटावा” नामक ऐतिहासिक पुस्तकों में ह्यूम की बारे में इन अहम बातों का उल्लेख किया गया है। महिला के वेश में गुप्त ढंग से इटावा से निकल कर एलन ऑक्टोवियन ह्यूम (A. O. Hyume) बढ़पुरा पहुंच गये और सात दिनों तक बढ़पुरा में छिपे रहे, इसके पश्चात किसी प्रकार अपनी जान बचायी अत: एलन ऑक्टोवियन ह्यूम (A. O. Hyume) का ह्रदय भी सवतंत्रता सेनानियों के राष्ट्र प्रेम की अभिव्यक्ति से आतंकित था क्योंकि प्रथम बार भारतियों ने अंग्रेजो के अत्याचार और खुनी व्यवस्था का मुंह तोड़ उत्तर दिया था। इन्होंने भारत में भिन्न-भिन्न पदों पर काम किया और 1882 में अवकाश ग्रहण किया।

एलन ऑक्टोवियन ह्यूम (A. O. Hyume) ने उस प्रतिवेदन (रिपोर्ट) का बारीकी से अध्ययन किया और फिर तत्कालीन वायसराय लार्ड डफरिन के समक्ष अपनी योजना प्रस्तुत की जिसके तहत उसने सुझाव दिया की एक राष्ट्रिय स्तर के संगठन का गठन किया जाये जिसके अंतर्गत भारत के सभी नेताओ को सम्मिलित कर लिया जाये। इससे उनकी गतिविधियों पर नजर व् नियंत्रण रखने में आसानी होगी। इसमें ब्रिटिश रंग में रंगे कुछ भारतीयों को भी शामिल किया जाये जिससे यदि कोई भारतीय जनमानस पर छाया हुवा नेता यदि ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध कोई आंदोलन छेड़ने की तैयारी करे तो इसकी गुप्त सुचना ब्रिटिश सरकार को समय रहते हो जाये और उस आंदोलन को कुचल दिया जाये। तत्कालीन वायसराय लार्ड डफरिन को यह योजना बेहद पसंद आयी और उसने इसे क्रियान्वित करने का आदेश दे दिया।

डफरिन से आदेश प्राप्त कर एलन ऑक्टोवियन ह्यूम (A. O. Hyume) इंग्लॅण्ड गए, वँहा उन्होंने भारतियों से बातचीत की और थियोसोफिकल सोसाइटी के सदस्यों. के साथ मिलकर २८ दिसम्बर १८८५ को बम्बई के “गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कालेज” के भवन में एक संगठन का प्रथम अधिवेशन किया जिसे “भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस” के नाम से जाना जाता है। इसके प्रथम सभापति के रूप में “व्योमेश चंद्र बनर्जी” का चयन किया गया और इस प्रकार ब्रिटिश सरकार को भारत में अबाध्य गति से शासन करने में सहयोग करने हेतु कांग्रेस का गठन हुआ।

हिंदुस्तान केसरी परमवीर स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय के शब्दों में यदि हम समझे तो कांग्रेस  ब्रिटिश सरकार के लिए एक सुरक्षा कवच (सेफ्टी वॉल्व) के रूप में अस्तित्व में आयी। इसने भारतीय जनमानस और ब्रिटिश सरकार के मध्य एक बिचौलिए की भूमिका अदा करना शुरू कर दिया| यदि जनता में किसी थतय को लेकर कोई असंतोष उपजता और जनता जैसे ही संगठित होने लगती आंदोलन के लिए तो ये बिचौलिए तुरंत मैदान में कूद पड़ते और थोड़े बहुत रियायते दिलवाकर भारतीय जनमानस के आंदोलन करने की उत्कंठा को दबा देते और इस प्रकार ब्रिटिश सरकार की राह आसान हो जाती है और यही मुख्य कारन था गठित होने के कुछ ही महीनो के पश्चात कांग्रेस में दो धड़े हो गए १) नरम दल और २) गरम दल। जी हाँ दोस्तों गरम दल के नेता जैसे गोपाल कृष्ण गोखले, बाल गंगाधर तीलक। लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पॉल इत्यादि ब्रिटिश सरकार से आमने सामने की बात करने और स्वराज प्राप्त करने की सोच रखने वाले भारतीय थे वंही नरम दल के नेता ब्रिटिश सरकार और भारतीय जनमानस के मध्य बिचौलिए के रूप में कार्य करने और सत्ता का भागीदार होने में ही विश्वास रखते थे।

चूँकि कांग्रेस का जन्म ही १) भारतियों में फ़ैलने वाले असंतोष  से ब्रिटिश सरकार को सूचित करने; २) भारतियों को थोड़ी रियायते और सहूलियतें दिलवाकर उन्हें आंदोलित होने से रोकने; ३) गरम दल के नेताओं सहित अन्य क्रंतिकारियों की गतिविधियों पर नजर रखने तथा समय समय पर ब्रिटिश सरकार को गुप्त सूचनाएं देने तथा ४) भारत में ब्रिटिश सरकार की नीव को और मजबूत करने के उद्देश्य के साथ हुआ था अत: उसके परिणाम भी दिखना शुरू हो गए। हमारे महान स्वतंत्रता सेनानियों, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ उल्ला खान, चंद्रशेखर आज़ाद, बटुकेश्वर दत्त, राजगुरु, सुखदेव  और बलिदानियों के बलिदानी सरदार भगत सिंह इत्यादि ने कांग्रेस से दुरी बना ली और “हिंदुस्तान रिपब्लिक सोसिलिस्ट असोसिएशन” के झंडे तले माँ भारती को स्वतंत्र कराने  के लिए बलिदानी पथ अपनाया।

अंग्रेजों की अमानवीय दमनकारी नीतियों ने भारतीय जनमानस में राष्ट्रवाद की भावना को प्रबल कर दिया, जिसे १९वि शताब्दी में शुरू होने वाले धार्मिक आंदोलनो ने भी विस्तार दिया, कौन भूल सकता है स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी वीवेकानंद व स्वामी शहजानन्द सरस्वती  जैसे अमर विभूतियों को। राष्ट्रवाद के बौद्धात्मक और अध्यातमक स्वरुप को निखारा स्वामी दयानन्द सरस्वती, बंकिमचंद्र चटर्जी, वीर दामोदर सावरकर और अरविन्द घोष इत्यादि जैसे महान और पवित्र आत्माओ ने और इस प्रकार जब सम्पूर्ण देश आज़ाद, भगत और नेताजी के स्वराज्यवादी राष्ट्रवाद के रंग में रंगा जा रहा था और बंकिमचंद्र चटर्जी द्वारा दिया गया मंत्र “वन्देमातरम” सम्पूर्ण भारतीय जनमानस के लिए “संकल्प से सिद्धि” का साधन बना हुआ था, तब ये कांग्रेसी अपने बिचौलियेपन और ब्रिटिश सरकार से वफ़ादरी की कसमे खाते सत्ता का भरपूर आनंद ले रहे थे।

ये कांग्रेसियों के बिचौलियेपन और ब्रिटिश सरकार में सत्ता का सुख प्राप्त करने की अदम्य लालसा ही थी जिसने वर्ष १८८५  से लेकर अमर सेनानी  नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा “आज़ाद हिन्द फौज” के गठन करने तक कोई भी वर्ष १८५७ जैसे स्वतंत्रता संग्राम नहीं हुआ और ब्रिटिश कांग्रेस के कंधो पर विराज होकर भारत में शासन करते रहे।

और यही मुख्य कारण है मित्रो की कांग्रेसियों को आज़ादी से पूर्व भी मातृ भूमि की वंदना करने वाले पवित्र शब्दो से चिढ थी और आज आज़ादी के बाद भी वो इन शब्दों और वाक्यों से चिढ़ते हैं फिर चाहे वो राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ की शाखाओं में  नित्य होने वाली मातृ भूमि के ये वंदना हो:

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम्।
महामंगले पुण्यभूमे त्वदर्थे पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते॥१॥

या फिर आज़ादी से पूर्व और आज भी राष्ट्रवादियों के धमनियों में अग्नि का प्रवाह कर देने वाला स्व श्री बंकिमचंद्र चटर्जी की अमर रचना हो जो निम्नवत है:

वन्दे मातरम्  वन्दे मातरम्

सुजलां सुफलाम् मलयजशीतलाम् शस्यश्यामलाम् मातरम्।

वन्दे मातरम् वन्दे मातरम्|

कांग्रेस का चरित्र कल भी वही था और आज भी वही है। कांग्रेस के आंदोलनों का सच द्रितीय भाग में आप के समक्ष प्रस्तुत करूंगा।

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