Wednesday, April 24, 2024
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आखिरकार रुबिया सईद अपहरण कांड एक राजनीतिक साजिश साबित हो ही गया

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Nagendra Pratap Singh
Nagendra Pratap Singhhttp://kanoonforall.com
An Advocate with 15+ years experience. A Social worker. Worked with WHO in its Intensive Pulse Polio immunisation movement at Uttar Pradesh and Bihar.

आखिरकार #रूबीया_सईद अपहरण काण्ड एक राजनीतिक साजिश साबित हो ही गया। जी हाँ जम्मू कश्मीर के अलगाववादी नेता हिलाल अहमद वार के द्वारा “The Great Disclosures Secrets Unmasked”, शीर्षक से लिखित पुस्तक में उन तथ्यों का सिलसिलेवार खुलासा किया गया।

बात उस १९८९ कि है जब उत्तर प्रदेश के गाओं में एक भोजपुरी गायक श्री बालेश्वर का यह गाना प्रसिद्ध हो चूका था जिसके बोल थे “साला झूठ बोलेला, काली दिल्ली का छोरा साला झूठ बोलेला” और ये काली दिल्ली का छोरा कोई और नहीं बल्कि स्व श्री राजीव गाँधी थे।

फिर इसी के साथ ये नारा मशहूर हो गया कि “राजा नहीं फकीर है, भारत कि तक़दीर है”। और वी पी सिंह पूरे भारत में एक नए नेता के रूप मे उभर आए।

पर इस नौवी लोकसभा का चुनाव था और वी पी सिंह ने उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर संसदीय क्षेत्र से जम्मू कश्मीर के नेता मुफ़्ती मोहम्मद सईद को अपना उम्मीद्वार बना दिया और जनता ने अच्छे के भरम मे बुरे का चुनाव् कई लिया। मुजफ्फरनगर से करीब डेढ़ लाख वोटो से मुफ़्ती मोहम्मद सईद कांग्रेस के श्री आनंद त्यागी को हरा कर चुनाव् जीत जाता है और देश का गृहमंत्री बना दिया जाता है।

अपहरण काण्ड:-

अभी वामपंथियों और भाजपा के सहयोग से वी पी सिंह कि सरकार बने एक हफ़्ता हुआ था कि, जम्मू कश्मीर में एक घटना घटी। तारीख थी ८ दिसम्बर और वर्ष था १९८९, ठीक ३ बजे के करीब मेहबूबा मुफ़्ती से छोटी रूबीया सईद MMBS का कोर्स करने के बाद् श्रीनगर के हॉस्पिटल से इंटर्नशिप कर रही थी, हॉस्पिटल से ड्यूटी पूरी करने के बाद घर के लिए निकली। वो लाल चौक से श्रीनगर के बाहर नौकाम् जा रही एक ट्रांसिट वैन जिसका रजिस्ट्रेशन संख्या JFK 677 में सवार हो गई।

वैन जैसे हि चांनूपुरा चौक के पास पहुँची, उस वैन में सवार ३ लोगों ने बन्दुक के दम पर वैन को रूकवा लिया और किनारे खड़ी नीले रंग कि मारुती वैन में बिठा लिया उसके बाद मारूती वैन वहाँ से चली गई। कहाँ चली गई किसी को कुछ मालूम नहीं।

इस अपहरण काण्ड का जो मास्टर माइंड जिसे बताया गया उसका नाम था “अशफाक़ वन”। इस अपहरण काण्ड का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ये था कि उस ट्रांसिट वैन के मालिक या उसके ड्रॉइवर ने और् न किसी और ने कोई FIR नहीं लिखवाई।

उसके करीब २ घंटे के बाद “जम्मू कश्मीर लीब्रेशन फ्रंट” के कुख्यात जावेद मीर ने एक लोकल अख़बार को फोन करके रूबीया सईद के अपहरण कि जानकारी दी। बस फिर क्या था तमाम सेक्युलर, लिबेरल और कांग्रेसी मीडिआ दहाड़ मार मार के रोने लगा और पूरे देश मे कोहराम मच गया। जम्मू कश्मीर से दिल्ली तक कुर्सियाँ हिलने लगी पुलिस से लेकर खूफिया तन्त्र के बैठको का दौर शुरू हो गया।

आतंकियों और सरकार के बिच मध्यस्थता के चैनेल तैयार किये जाने लगे।

एक चैनल मे श्रीनगर के प्रसिद्ध चिकित्सक Mr. A.A. Guru को लगाया गया वही दूसरे चैनल अब्दुल गनी लोन कि बेटी शबनम लोन, पत्रकार जफ़र मिराज और अब्बास अंसारी को लगाया गया और एक तीसरे चैनल से इलाहबाद हाई कोर्ट के जज श्री मोती लाल भट्ट और एडवोकेट श्री मिया अयूब को लगाया गया। मध्यस्थता कर रहे लोगो के अनुसार आतंकियों ने रूबीया सईद कि रिहाई के बदले २० आतंकियों को छोड़ने कि बात कही गई। लेकिन बाद में आतंकियों ने अपनी माँग में फेरबदल कर ७ आतंकियों कि रिहाई के बदले रूबीया सईद को छोड़ने कि शर्त रख दी।

८ दिसम्बर से १३ दिसंबर का दिन आ चुका था। जँहा पाकिस्तान के सियालकोट मे टेस्ट मैच में सम्भावित हार को टालने के लिए हिंदुस्तान का एक नौजवान (जिसे दुनिया सचिन रमेश तेन्दुलकर के नाम से जानती है) अकेले मोर्चा सम्हाले खड़ा था, वही दूसरी ओर श्री वी पी सिंह के परीक्षा कि घड़ी थी और इसमें श्री वी पी सिंह बुरी तरह परास्त हो गए।

अन्तत: दो केंद्रीय मंत्री एक श्री इंद्र कुमार गुजराल और आरिफ मोहम्मद खान को दिल्ली से श्रीनगर भेजा गया। उसके एक दिन पहले हि जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला लन्दन से वापस आए थे। थोड़े ना नूकुर् के बाद दोपहर तक पॉंच आतंकियों को छोड्ने के साथ सरकार और आतंकियों के मध्य समझौता हो गया। और
शेख मोहम्मद
शेर खान
नूर मोहम्मद कल्वल
जावेद झलकर
अल्ताफ भट्ट
नमक पॉंच खूंखार भेडियों को छोड़ दिया गया एक बार फिर से मासूमों का खून पीने के लिए। और इसके कुछ हि घंटे बाद रूबीया सईद को आतंकियों ने श्रीनगर स्थित जस्टिस मोती लाल भट्ट के निवास स्थान पर करीब ७ बजे के आस पास शुरक्षित छोड़ दिया।

और इतिहास गवाह है कि वी पी सिंह के इस कायराना झुकाव कि वजह से जम्मू कश्मीर में आतंकियों को एक नई ऊर्जा का सन्चार हुआ और जिस अतंकवाद को श्री जगमोहन जी (जम्मू कश्मीर के गवर्नर जनरल) ने कुचल कर रख दिया था उसने फिर से सर उठाया और परिणामस्वरुप वर्ष १९९१ का वह् भयानक मंजर भी आया जब कश्मीरी पंडितो का कत्लेआम करके उनकी बहु बेटियों के साथ बलात्कार और हैवानियत का खेल करके उनको अपने हि घरों से भगा दिया गया।

और इसी का खुलासा अलगाववादी नेता श्री हिलाल अहमद वार ने अपनी इस पुस्तक में किया है। ये एक राजनितिक साजिश थी।

धन्यवाद
नागेंद्र प्रताप सिंह (अधिवक्ता)

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