Thursday, June 24, 2021
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देशी दूध में सिंथेटिक मिलावट के मल्टीनेशनल षडयंत्र का पैरोकार एनजीओ पेटा

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भारत सहित चिली, अर्जेंटीना, अल्सल्वाडोर, ग्वाटेमाल, पूर्वी यूरोप, लैटिन अमेरिकी देशों आदि में कुछ देशी-विदेशी एनजीओ द्वारा विदेशी धन की सहायता से देश की सरकार के विरुद्ध जनमत को प्रभावित करने तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के समर्थन में माहौल बनाने का आरोप लगता रहा है। विगत दिनों एक अमेरिकी एनजीओ पेटा इंटरनेशनल की भारतीय शाखा पेटा इंडिया द्वारा भारत के सबसे बड़े डेयरी उद्योग अमूल के विरुद्ध एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ इंडिया (ए एस सी आई) में एक याचिका दायर की गई, हालांकि ए.एस.सी.आई. ने इसे अस्वीकार कर दिया। इसके बाद पेट अमूल को द्वारा बिना मांगी सलाह दी गई। इस विवाद के अंतर्गत अमूल के वाइस प्रेसीडेंट वलमजी हंबल द्वारा पेटा को उचित जवाब दिया गया और साथ ही प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर पेटा के विरुद्ध सख्त कार्यवाही करने का आग्रह किया गया। इसके बाद इस मामले ने तूल पकड़ लिया और देशभर में चर्चा का विषय बन गया।

कौन है पेटा इंडिया ?
पेटा इंडिया पेटा इंटरनेशनल की भारतीय इकाई है तथा इसका पूरा नाम पशुओं के साथ नैतिक व्यवहार के पक्षधर लोग (पीपल फ़ॉर दी इथिकल ट्रीटमैंट ऑफ एनिमल) है। यह एक पशु अधिकार पर काम करने वाला स्वैच्छिक संगठन है जिसका मुख्यालय अमेरिका स्थित वर्जिनिया के नोरफॉल्क में है। यह दुनिया का सबसे बड़ा पशु अधिकार संगठन होने का दावा करता है लेकिन इसकी कथनी और करनी में व्यापक विरोधाभास देखने को मिलता है। यह दुनियाभर में पशुओं के विरुद्ध हो रहे अत्याचार पर शौर मचाता है लेकिन अकेले अमेरिका में कुल गौमांस का 21% भक्षण होता है, उस पर यह मौन रहता है। दुनिया मे वीगन ( शाकाहारी ) दूध का नारा बुलंद कर रहा है किंतु इसकी जन्मस्थली अमेरिका में डेयरी पशुओं को हाइफेट दूध लेने के लिए मांसाहार युक्त भोजन दिया जाता है उस पर यह एक शब्द नही बोलता। हिन्दू परम्पराओं (जल्लीकट्टू) पर घड़ियाली आंसू बहाता है किंतु ईद पर लाखों बकरों के प्रति इसकी संवेदनाए शून्य हो जाती है। कुल मिला कर पेटा की निष्पक्षता ओर विश्वसनीयता पर बार-बार प्रश्न उठते रहे है जो उपयुक्त भी प्रतीत होते है।

अमूल पर पेटा का घात
पेटा इंडिया ने एक रणनीति के तहत सबसे पहले अभियान चला कर डेयरी दूध के प्रकरण में पशु क्रूरता ओर अशाकाहरी होने का प्रोपगेंडा चला कर दुष्प्रचार किया। इसके पश्चात अमूल के विरुद्ध एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ इंडिया में एक याचिका दायर कर कहा कि, “प्लांट बेस्ड प्रोडक्ट को दूध नही कहा जा सकता, इसलिए अमूल के खिलाफ कार्यवाही की जानी चाहिए।” जब ए.एस.सी.आई. ने यह याचिका अस्वीकार कर दी तो पेटा ने अमूल को बिना मांगे मुफ्त की सलाह दी जिसमे उसने कहा कि, “कोऑपरेटिव सोसायटी अमूल को तेजी से बढ़ रहे वीगन मिल्क मार्केट का लाभ मिलना चाहिए। अमूल को संसाधन बर्बाद करने की जगह प्लांट आधारित डेयरी की बढ़ती हुई मांग का फायदा उठाना चाहिए। अन्य कम्पनियां अगर इसका फायदा उठा रही है तो अमूल भी ऐसा कर सकती है।” अब प्रश्न यह उठता है कि पेटा इंडिया ने अमूल को ही क्यो चुना? वास्तव में आमूल विश्व की 20 सबसे बड़ी डेयरी कम्पनियों में सम्मिलित हैं। यदि अमूल को निशाना बना कर कोई दुष्प्रचार किया जाता और कोई याचिका स्वीकार हो जाती तो डेयरी दूध को पूरी दुनिया मे बदनाम करने ओर सिंथेटिक दूध को उसके विकल्प के रूप में प्रस्तुत करने का आधार बनाया जाता। अपील करने के बाद यदि अमूल स्वैच्छिक तौर पर भी वीगन दूध के क्षेत्र में उतरती तो इससे भी भारतीय बाजार और जनता में सिंथेटिक दूध का व्यापक प्रचार होता।

पेटा पर अमूल का प्रतिघात
पेटा इंडिया के दुष्प्रचार ओर गतिविधियों के विरोध में आमूल के वाइस प्रेसीडेंट वलमजी हंबल ने हमला बोलेते हुए इसे भारतीय डेयरी उद्योग को समाप्त करने की विदेशी कम्पनियों की साजिश करार दे दिया। पशु क्रूरता के आरोप पर श्री हंबल ने कहा कि, भारतीय संस्कृति में पशुधन को परिवार का सदस्य माना जाता है। वीगन दुध के विषय पर उन्होंने कहा कि उनके साथ डेयरी उद्योग में 10 करोड़ से ज्यादा लोग जुड़े है जो इसके बन्द होने से बेरोजगार हो जाएंगे। श्री हंबल ने भारतीय डेयरी उद्योग की तारीफ करते हुए कहा कि यह भारत को दूध और दुग्ध उत्पादों के आयात से बचाता है तथा सकल घरेलू उत्पाद में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसीलिए एक एनजीओ द्वारा भारतीय डेयरी उद्योग को एक साजिश के तहत बदनाम किया जा रहा है ताकि सिंथेटिक दूध निर्माता बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को भारत मे प्रोत्साहन दिया जा सके। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चिट्ठी लिख कर इस विषय को गम्भीरता से लेते हुए पेटा इंडिया और प्रतिबंध लगाने की मांग भी की है।

अमूल पर किसकी नजर?
हालांकि यह विवाद पेटा इंडिया ने खड़ा किया है किंतु पेटा तो एक प्रयोजित उपकरण मात्र था, इस विवाद की वास्तविक कारक तो अमेरिकी की कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियां है। भारत दूध का बहुत बड़ा बाजार है, उनमे भी सर्वाधिक उपभोक्ता शाकाहारी है। अमेरिकी दूध का विक्रय भारत मे प्रतिबंधित है क्योंकि उसके यहां पशुओं को नौंवेजिटेरियन डाइट दी जाती है। भारत के दूध उपभोक्ताओं को अपना दूध बेचने के लिए सबसे पहले यहां के स्थानीय दूध उत्पादकों को प्रतिस्पर्धा से बाहर किया जाना आवश्यक था, अतः सबसे पहले देश मे शाकाहारी दूध का कॉन्सेप्ट फैलाया गया, फिर डेयरी दूध से हिंसा और पशु क्रूरता को जोड़ कर प्रस्तुत किया गया। दूसरे चरण में डेयरी उद्योग पर आरोप लगाए गए, हालांकि पेटा ओर मल्टीनेशनल कंपनियों की चाल सफल नही हो पाई है। यदि यह सफल हो जाते या भविष्य में इनका पैर भारत मे जम पाया तो उन कम्पनियों को इससे जितना लाभ है भारत को उससे कही ज्यादा हानि होगी। सबसे महत्वपूर्ण क्षति तो यही होगी कि हम अपनी दूध और दूध उत्पादों की आवश्यकता के लिए आयात पर निर्भर हो जायेगे साथ ही साथ लगभग 18 करोड़ कार्यदिवस प्रतिदिन का जो सृजन डेयरी उद्योग करता है वो समाप्त हो जाएगा। इससे हमारी अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा ओर हमारी जीडीपी में 1 से 3 प्रतिशत तक कि कमी आ सकती है।

भारत विरोधी प्रचार के पुराने खिलाड़ी रहे है एनजीओ
पेटा इंडिया कोई पहला एनजीओ नही है जो भारत विरोधी प्रचार या गतिविधियों का हिस्सा बना हो, इससे पहले भी भारत मे राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने, विकास परियोजनाओं को बाधित करने तथा किसी विशिष्ट के लिए माहौल बनाने-बिगड़ने में कई एनजीओ का नाम सामने आता रहा है। भारतीय डेयरी दूध के पहले भी चायपत्ती, हाफुज आम, बासमती चावल, भारतीय संस्कृति, योग आदि को बदनाम करने का प्रोपगेंडा चलाया जा चुका है। भारतीय चायपत्ती को बदनाम करने का अभियान तो ग्रीनपीस से लेकर पोएटिक जस्टिस फाउंडेशन तक ने चलाया हुआ है। इन्ही तथाकथित ठेकेदारों के विरोध के फलस्वरूप सरदार सरोवर परियोजना को पूरा होने में वर्षों लग गए, लागत भी 100 गुना हो गई। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने तो भारत के खिलाफ एंटी कश्मीर अभियान छेड़ रखा था, चन्दे की हेरफेर के लिए उसने भारत मे चार -चार छद्म एनजीओ बना रखे थे। यही नही कई एनजीओ पर धर्मांतरण, दंगे भड़काने, साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने, आतंकवादियों की सहायता करने, देश के विरुद्ध षडयंत्र करने के आरोप भी समय-समय पर लगते रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला ने सितंबर 2020 में एक आलेख में इन देश विरोधी एनजीओ के नेक्सस को “विनाशक संस्थागत नेटवर्क” का नाम दे कर इनके विरुद्ध कठोर कदम उठाने की बात कही है। इसके विषय मे जितनी सजगता शासन स्तर पर होनी चाहिए उससे कही अधिक नागरिक समाज को जागरूक होना चाहिए, क्योकि जब भी इन एनजीओ के विरुद्ध कोई कार्यवाही होती है तो इनके पोषक, समर्थक ओर अनभिज्ञ लोग इसे सरकार की असंतोष के दमन की कार्यवाही, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला एवं मानवाधिकारों पर अंकुश लगाने का प्रयास बता कर इन कपटी संगठनों के प्रति समाज की सद्भावना प्राप्त करने में सफल हो जाते है।

Dr. Uttam Mohan Singh Meena, Assistant Professor, SoS in Sociology & Social Work, Vikram University, Ujjain
(Ph.D. “Role Of Voluntary Organization in Tribal Development”)

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