Saturday, February 27, 2021
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अहमदी मुसलमानों से इतनी नफरत क्यों?

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इस्लामी लोग सनातन धर्मीयों के ऊपर जातियों व संप्रदायो में बटे होने का आरोप लगाकर, स्वंय को एकरस में डूबा हुआ सभी को बराबरी का हक देने वाले मज़हब के रूप में स्थापित करने का भरपूर पर असफल प्रयास सैकड़ो वर्षो से करते चले आ रहे हैं।

आइये सच जानते हैं “अहमदीया” मुसलमानों पर हुए भीषण अत्याचार पर चर्चा करते हुए :- इस्लाम के सभी अनुयायी खुद को मुसलमान कहते हैं लेकिन इसलामी क़ानून (फ़िक़ह) और इसलामी इतिहास की अपनी-अपनी समझ के आधार पर मुसलमान कई पंथों या फ़िरक़ों में बंटे हैं।

इस्लाम के दो प्रमुख फिरके हैं:-

सुन्नी व शिया. बाकी के 70 फिरके इन्हीं दो फिरकों से  निकले हुए समूह हैं।

सुन्नी:-
सुन्नी या सुन्नत का अर्थ उस तौर तरीक़े को अपनाना है जिस पर पैगम्बर मोहम्मद (570-632 ईसवी) ने ख़ुद अमल किया था और इसी कारण वे सुन्नी कहलाते हैं।

एक अनुमान के मुताबिक, दुनिया के लगभग 80-85 प्रतिशत मुसलमान सुन्नी हैं जबकि 15 से 20 प्रतिशत के बीच शिया हैं। जहां तक इसलामी क़ानून की व्याख्या का सवाल है सुन्नी मुसलमान मुख्य रूप से चार समूह में बंटे हैं। हालांकि पांचवां समूह भी है जो इन चारों से ख़ुद को अलग कहता है।

आठवीं और नवीं सदी में लगभग 150 साल के अंदर चार प्रमुख धार्मिक नेता पैदा हुए। उन्होंने इसलामी क़ानून की व्याख्या की और फिर आगे चलकर उनके मानने वालों नें उनके नाम से  फ़िरक़े  बना डाले। ये चार इमाम थे-

अबू हनीफ़ा (699-767 ईसवी),

शाफ़ई (767-820 ईसवी),

हंबल (780-855 ईसवी) और

मालिक (711-795 ईसवी)!

हनफ़ी (सुन्नी):- इमाम अबू हनीफ़ा के मानने वाले हनफ़ी कहलाते हैं। इस फ़िक़ह या इसलामी क़ानून के मानने वाले मुसलमान भी दो गुटों में बंटे हुए हैं।

एक देवबंदी हैं तो दूसरे अपने आप को बरेलवी कहते हैं। दोनों ही नाम उत्तर प्रदेश के दो जिलों, देवबंद और बरेली के नाम पर है। दरअसल 20वीं सदी के शुरू में दो धार्मिक नेता मौलाना अशरफ़ अली थानवी (1863-1943) और अहमद रज़ा ख़ां बरेलवी (1856-1921) ने इसलामी क़ानून की अलग-अलग व्याख्या की, है ना मजे की बात इस्लाम का उदय हुआ अरब में पर उसकी व्याख्या उत्तर प्रदेश के देवबंद और बरेली जिले मे पैदा होने वाले मौलानावों ने की…उपमहाद्वीप यानी भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान में रहने वाले अधिकांश मुसलमानों का संबंध इन्हीं दो पंथों से है।

अब आते हैं हम अहमदीया मुसलमानों पर:- इस फिरके का भी संबंध भारत की धरती से ही है।

इस्लामी शिक्षा के विपरीत गुलाम अहमद (1835-1908) को मुहम्मद साहब के बाद एक और पैगम्बर मानते हैं, जो मुसलमानों को स्वीकार नहीं है। मिर्ज़ा साहब ने स्वयं को नबी घोषित किया था जो एक बहुत बड़ा विवाद बना साथ ही साथ मसीह भी घोषित किया था।

मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद:- Adil Hussain Khan. “From Sufism to Ahmadiyya: A Muslim Minority Movement in South Asia” Indiana University Press, 6 apr. 2015 के अनुसार  मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद, मुग़ल बरलास की तुर्क मंगोल जनजाति से था। उनके दादाजी मिर्ज़ा हादी बेग परिवार के साथ समरकंद से भारत आ गए और पंजाब के उस क्षेत्र में बस गए, जिसे अब कादियान कहा जाता है। उसी कादियान में मिर्जा गुलाम अहमद की पैदाइश सन 1835 ई. में हुई।

दिनांक 23 मार्च 1889 को इस्लाम के मानने वालों के बीच एक आंदोलन शुरू हुआ जो आगे चल कर “अहमदिया आंदोलन” के नाम से विख्यात हुआ। इस्लाम धर्म के बीच एक व्यक्ति ने घोषणा की कि “मसीहा” फिर आयेंगे और मिर्ज़ा गुलाम अहमद ने अहमदिया आंदोलन शुरू करने के दो साल बाद 1891 में अपने आप को “मसीहा” घोषित कर दिया। जिसका वर्णन बराहीन अहमदिया, भाग 3 पृष्ठ 238 व रूहानी ख़ज़ायन, भाग 1 पृष्ठ 265 पर मिलता है।

और ईस प्रकार एक नये नबी का जन्म हुआ और इनको मानने वाले मुसलमानों को अहमदीया कहा जाने लगा।

अहमदिया समुदाय के लोग स्वयं को मुसलमान मानते व कहते हैं परंतु शेष सभी मुस्लिम वर्गो के लोग इन्हें मुसलमान मानने को हरगिज़ तैयार नहीं। इसका कारण यह है कि इस समुदाय के लोग  हज़रत मोहम्मद को अपना आखरी पैगम्बर स्वीकार नहीं करते। इसके बजाए इस समुदाय के लोग मानते हैं कि नबुअत (पैगम्बरी ) की परंपरा रूकी नहीं है बल्कि सतत् जारी है। अहमदिया सम्प्रदाय के लोग अपने वर्तमान सर्वोच्च धर्मगुरु (मिर्जा गुलाम अहमद) को नबी के रूप में ही मानते हैं।

पाकिस्तान का दमनचक्र:- पाकिस्तान के धार्मिक पृष्ठभूमि के अनुसार पाकिस्तान में 95 से 98 प्रतिशत इस्लाम को मानने वाले लोग हैं। यहां के मुसलमान 3 प्रमुख फिरकों में विभाजित हैं, जिनमें सुन्नी, शिया और अहमदिया शामिल हैं।

आम सुन्नी मुसलमानों का मत हैं कि स्लाम के अंतर्गत ‘अहमदिया’ वो भटके हुए लोग हैं जिनका इस्लाम से कोई लेना देना नहीं है और ये अपनी हरकतों से लगातार इस्लाम का नाम खराब कर रहे हैं। वैसे पाकिस्तान में 1953 में पहली बार अहमदियों के खिलाफ दंगे हुए। जब उन दंगों की जांच पड़ताल हुई तो पता चला कि वो कट्टरपंथियों के उकसाने पर किए गए थे। 1974 में अहमदिया संप्रदाय के मानने वाले लोगों को पाकिस्तान में एक संविधान संशोधन के जरिए गैर-मुस्लिम करार दे दिया गया।इस दौरान हजारों अहमदिया परिवारों को अपना घर छोड़ने को मजबूर होना पड़ा।

सबसे बड़ी गाज तो तब गिरी, जब1984 में जनरल मुहम्मद जिया-उल-हक के शासन में एक सख्त अध्यादेश जारी किया गया था। जिसमें कहा गया था कि अगर कोई अहमदिया खुद को मुस्लिम बताएगा, तो वो अपराध की श्रेणी में आएगा और ऐसा करने वाले को 3 साल की सजा और जुर्माने की सजा का प्रावधान किया गया है।

और फिर इसके बाद तो अहमदियों पर अत्याचार की दौर शुरू हो गया! उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया गया! इस्लाम से उन्हें बाहर फेंक दिया गया। उनकी मस्जिदों पर ताबड़तोड़ आंतकी हमले शुरू कर दिये गये। उनकी बीबी, बच्चियों, बहनों, मातावों के साथ आतंकीयों व सेना के अफसरो ने मिलकर जुल्म ढाना शुरू कर दिया। अहमदियों को पूर्वी पाकिस्तान (आज का बंग्लादेश) के लोगो की तरह काटा पिटा जाने लगा और जुल्मो सितम की ईंतहा कर दी गयी! 28 मई साल 2010 को पाकिस्तान में तालिबान ने दो अहमदी मस्जिदों को निशाना बनाया।

लाहौर की बैतुल नूर मस्जिद पर फायरिंग की गई और ग्रेनेड फेंके गए साथ ही जिस्म पर बम बांधकर आतंकी मस्जिद में घुस गए जिसमें 94 लोग मारे गए। हिंदुस्तान में भी अहमदी जमात पर शिकंजा कसने की कोशिशें हुईं और देवबंद के दारुल-उलूम ने अहमदियों को काफिर कहे जाने वाले उस फतवे की हिमायत की जो मौलाना अहमद रज़ा ने 1893 में जारी करवाया था। ये जुल्मो सितम व भेदभाव आज भी जारी है।

पाक अहमदिया का नोबेल क़बूल मगर जात नहीं” (मूल से 1 दिसंबर 2017 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 22 नवंबर 2017):- नामक लेख ने स्पष्ट किया कि कैसे अहमदि मुसलमानों के प्रति अन्य मुसलमानों की नफरत अपने चरम पर है! मुसलमान इन्हें काफिर मानते हैं।नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक डॉक्टर अब्दुस सलाम पाकिस्तान के पहले और अकेले वैज्ञानिक हैं जिन्हे फिज़िक्स के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया है। वह एक अहमदिया थे।अब्दुस सलाम को 1979 में भौतिकी के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था! नोबेल पुरस्कार जीतने वाले पहले पाकिस्तानी होने के बावजूद उनकी ऐतिहासिक उपलब्धि का जश्न उनके अपने ही देश में नहीं मनाया गया बल्कि उनकी धार्मिक पहचान को लेकर उन्हें हमेशा हाशिए पर रखा गया! 1996 में सलाम का इंतकाल हो गया। कब्र पर लिखा गया ‘पाकिस्तान के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता’। स्थानीय स्तर पर इसका विरोध शुरू हो गया। अंत में अदालत के आदेश पर कब्र का पत्थर उखाड़ दिया गया। पाकिस्तान सरकार ने अपने स्कूली स्लेबस से विज्ञान में अपनी इकलौती उपलब्धि से जुड़ी हर बात हटा दी।

“एक्टिंग के लिए ऑस्कर जीतने वाले पहले मुस्लिम एक्टर बने महेरशला अली भी अहमदीया मुसलमान थे। अत: धार्मिक चरमपंथीयों ने इन्हें भी अब्दुस सलॉम की भाँती कोई तवज्जो नहीं दी और अहमदी होने के नाते उन्हें हमेशा हासिये पर ही रखा। पाकिस्तान में रहने वाले अहमदिया अपनी इबादतगाह को मस्जिद नहीं कह सकते हैं! उनके सार्वजनिक रूप से कुरान की आयतें पढ़ने और हज करने पर भी पाबंदी है। पाकिस्तान में जैसे-जैसे चरमपंथ बढ़ा है इन लोगों पर होने वाले हमले भी बढ़े हैं।

विश्वव्यापी स्थिती:-

पाकिस्तान के अलावा इंडोनेशिया और अल्जीरिया में भी इन्हें अपनी विचारधारा और हजरत मुहम्मद को आखिरी रसूल न मानने के लिए भांति-भांति के अत्याचारों का सामना करना पड़ रहा है जिसके चलते अब समुदाय अलग अलग देशों में शरण लेने को भी मजबूर दिख रहा है।सऊदी अरब ने उनके हज करने पर रोक लगा रखी है|अगर वे हज करने के लिए मक्का पहुँचते हैं तो उनके गिरफ़्तार होने और डिपोर्ट होने का ख़तरा रहता है| गौरतलब है कि आज के समय में पूरे विश्व में करीब 45 लाख अहमदिया मुसलमान वास करते हैं और इनकी एक बहुत बड़ी संख्या पाकिस्तान (25 लाख) और उसके बाद इंडोनेशिया और अल्जीरिया में वास करते हैं।

परंतु मेरा प्रश्न उन मुस्लिम समाज के ठेकेदारों से हैं जो सनातनी दलित समाज से झूठी सहानुभूति दिखाकर पूरे सनातन समाज को बदनाम करने की कोशिश करते हैं वो अपने गिरेबान में झाँक कर क्यों नहीं देखते, आखिर पाकिस्तान के मुसलमान पूर्वी पाकिस्तान के मुसलमानों के साथ मिलकर क्यों नहीं रह पाया? आज सिंध व बलोचिस्तान के मुसलमानों को पाकिस्तान से आजादी क्यों चाहिये?

संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा भी पाकिस्तान की सरकार को कई बार हिदायत दी जा चुकी है कि वे अहमदियों की हत्यावों पर रोक लगाये|पर आज भी अहमदियों को डर के साये में जीना पड़ता है क्योंकि उनका दुश्मन कोई और नहीं बल्कि उनके ही अपने मुसलमान बंधु है।

नागेंद्र प्रताप सिंह (अधिवक्ता)

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