Saturday, February 27, 2021
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नापाकियों से आज़ादी चाहे सिंध का वैभव

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मित्रो जैसा की हम सब जानते हैं की नापाक इरादों से धर्म के नाम पर भारतवर्ष का विभाजन कर पाकिस्तान को जन्म दिया गया था। पाकिस्तान अपने कुत्सित/निम्न कोटि की निकृष्ट मानसिकता के कारण कभी भी एकजुट होकर नहीं रह पाया। मोठे तौर पर देखे तो पाकिस्तान के पांच  महत्वपूर्ण प्रान्त थे पंजाब, सिंध, बलोचिस्तान, पूर्वी पाकिस्तान व् खैबर पख्तूनखा लेकिन पाकिस्तान पर हुकूमत केवल पंजाबियो ने की। जन्म लेने के बाद पिछले ७२ वर्षो से पूरा पाकिस्तान पंजाबियो के हाथो में रहा, जिसका परिणाम ये निकला की वर्ष १९७१ में शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व में पूर्वी पाकिस्तान के बंगालियों ने अपनी संस्कृति, भाषा व् सभ्यता की रक्षा के लिए जबरदस्त विद्रोह किया और भारत के सहयोग से आज़ादी प्राप्त की। आज बंगलादेश के नाम से अपनी पहचान बना चुके हैं, कुछ वैसी ही चाहत सिंध के लोगो के दिलो में भी हिलोरे ले रही है।

पाकिस्तान की सेना हो या वंहा का प्रसाशन हर स्थान पर पंजाबियो का बोलबाला है। सिंध के लोगो को दोयम दर्जे का समझा जाता है। भाषा, संस्कृति व् सभ्यता का मजाक बनाया जाता है व् उन्हें अपमानित किया जाता है जिससे सिंध के नौजवान, बच्चे, बूढ़े व् औरते सभी आज़ाद सिंध के सपने को पूरा करने का बीड़ा उठा नापाक पाकिस्तानियों को सबक सीखने के लिए हर वक्त कमर कस के तैयार बैठे हैं।

सिंध की प्राचीनता

प्राचीन काल में सिन्ध का नाम ‘सप्त सैन्धव’ था जहां सिन्धु सहित शतद्रु, विपाशा, चन्द्रभागा, वितस्ता, परुष्णी और सरस्वती नदियाँ बहती थीं।ऋग्वेद कहता है “मधुवाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः।” कालान्तर में इस भूभाग से सप्त सिन्धव लुप्त होकर केवल सिन्ध रह गया है, जो दुर्भाग्य से सन 1947 मे हुए भारत के विभाजन के पश्चात अस्तित्व में आये पाकिस्तान का एक प्रांत है।

सिन्ध संस्कृत के शब्द ‘सिन्धु’ से बना है जिसका अर्थ है समुद्र। सिंधु इस प्रदेश के लगभग बीचोंबीच बहती है। फ़ारसी “स” को “ह” की तरह उच्चारण करते थे। उदाहरणार्थ दस को दहा या सप्ताह को हफ़्ता (यहां कहने का अर्थ ये नहीं कि ये संस्कृत शब्दों के फ़ारसी रूप थे पर उनका मूल एक ही हुआ होगा)। अतः वे इसे हिंद कहते थे। 

सर्वविदित है की ईसापूर्व 3300 से ईसापूर्व 1900 तक यहां सिंधु घाटी की सभ्यता फली-फूली, जो मिस्र व मेसोपोटामिया की सभ्यता के कही प्राचीन व विकसित सभ्यता थी! 500 ईसापूर्व यहां ईरान के हख़ामनी शासकों का अधिकार हो गया। 328 ईसापूर्व में यह यवनों के शासन में आया! 305 ईसापूरव में यह मौर्य साम्राज्य का अंग बना तथा ईसापूर्व 185 से 100 ईसापूर्व तक ग्रेको-बैक्टि्रयन शासन में रहा। इसके बाद ये गुप्त साम्राज्य के अधीन रहा! 

अल-हज्जाज बिन युसुफ़ (Hajjaj bin Yusuf) इस्लाम के शुरूआती काल में ख़लीफ़ा अब्द अल-मालिक बिन मरवान (उमय्यद ख़िलाफ़त) के प्रति निष्ठावान एक अरब प्रशासक, रक्षामंत्री और राजनीतिज्ञ था! इसी ने अपने रिश्तेदार मोहम्मद बिन कासिम को भारतीय उप महाद्वीप के सिंध और पंजाब के क्षेत्रो पर अधिकार करने के लिये भेजा! उस समय (लगभग 700 ईस्वी) में हिन्दू ब्राह्मण राजा दाहिर सेन सिन्ध के शासक थे। 

प्रचंड युद्ध मे हिंदु राजावों के आपसी वैमनस्यता का फायदा उठाकर मुहम्मद बीन कासिम ने सिंध पर अपना अधिकार कर लिया! और “ईस्लाम कबूल करो” या “मौत कबूल करो” के भयानक व खूंखार नारो से व रक्त मे डूबी तलवारो को हल पर पूरे क्षेत्र मे ईस्लाम को फैला दिया! 

और तब से लेकर अब तक ईस्लाम की प्रमुखता यहाँ बनी हुई है!

सिंध का योगदान:-

सिंध पाकिस्तान का सबसे धनी प्रांत है और देश के राजस्व का 70 प्रतिशत सिंध से हासिल होता है लेकिन सिंधियों का उस पर कोई अधिकार नहीं है! इसका क्षेत्रफल 140,914 किमी2 (54,407 वर्गमील)

“DISTRICT WISE CENSUS RESULTS CENSUS 2017” (PDF) के अनुसार सिंध की जनसंख्या 47,886,051!

देश के राजस्व मे सबसे ज्यादा योगदान करने के पश्चात भी सिंध के निवासीयों को पंजाबीयों के अत्याचार व दमन के साये मे जीवन जीना पड़ता है, बलोचियों की तरह ना तो उनकी बहु बेटियों की इज्जत बचती है और ना ही जिंदगी उन्हे हमेशा पाकिस्तानी सेना व पंजाबीयों के दया पर निर्भर रहना पड़ता है जिससे इनमें व्यापक असंतोष पनपता रहता है! नके प्रमुख शहर कराची के बंदरगाह पर पाकिस्तान का पूरा कब्जा रहता है जिसका फायदा केवल पंजाब के लोगो और पाकिस्तानी सेना को मिलता है और बेचारे सिंधी खून का घूँट पीकर रह जाते हैं! सिंध के प्राकृतिक संसाधनों पर भी पाकिस्तान का कब्जा है, सिंध को कुछ नही मिलता!

वे आजादी का सपना पिछले 72 वर्षो से लगातार पाले हुए हैं! 

गुलाम मुर्तजा शाह सैयद का जन्म 17 जनवरी, 1904 को हुआ था! वे सिन्ध के राजनेता एवं दार्शनिक थे। १९७० के दशक में उन्होने “जीयै सिंध मुत्ताहिदा महाज़” नामक सिन्धी राष्ट्रवादी दल बनाया जिसका उद्देश्य सिन्ध को पाकिस्तान से स्वतंत्र करना था। 25 अप्रैल, 1995 को मृत्यु के अंगीकार करने तक वे हमेशा अपने सिंध की आजादी के लिये दिनरात प्रयास करते रहे!

पाकिस्तान में चारो ओर आजादी की चिंगारी अब तेजी से भड़क रही है। बलूचिस्तान और लाहौर में आजादी को लेकर चल रहे प्रदर्शनों के बाद अब स्वतंत्र सिंधुदेश की मांग को लेकर सिंधु समुदाय के हजारों लोग कराची की सड़कों पर उतर आए। सिंधुदेश को स्वतंत्र देश के अस्तित्व मे देखने वाले राष्ट्रवादी सिंधी भारत से भी सहायता की उम्मीद लगाये बैठे हैं, वे कहते हैं कि जैसे बंगलादेश की आजादी मे भारत ने सक्रिय भूमिका निभाई थी वैसा ही कुछ सिंधुदेश के लिये भी करे! 

सिंधी समुदाय का ये स्पष्ट मानना है कि सिंध अपने आप में अलग राष्ट्र है, लेकिन पाकिस्तान ने उस पर जबरन कब्जा जमा रखा है जैसे उसने बलोचिस्तान पर अवैध कब्जा जमा रखा है। 

जैसा की हम जानते हैं कि पाकिस्तान से स्वतंत्र सिंधुदेश बनाने की मांग पहली बार पुरे जोशो खरोश से, वर्ष 1972 में सिंधी नेता जीएम सईद ने उठाई थी। सिंधुदेश पाकिस्तान का वो इलाका है जहां सिंधी बोलने वाले लोग हैं, जो संस्कृति, रीति-रिवाज, इतिहास में पाकिस्तान से बिल्कुल अलग पहचान रखते हैं। पाकिस्तान ने इस आंदोलन को जुल्म और संगीनों के साए तले दबा कर दुनिया से छुपाए रखा था। कई बार अहिंसक आंदोलनकारियों पर गोलियां चलाईं गईं और दुनिया को पता तक नहीं चला। मानवाधिकारों का जबरदस्त व् भयानक तरीके से उलंघन होता रहा परन्तु इसे बड़ी ही बेशर्मी से दबा दिया गया। 

आजाद होने की प्रबल प्रखर उत्कंठा:-

सिंध के निवासियों में आजाद होने की इतनी प्रबल व प्रखर उत्कंठा है कि उन्होने राष्ट्रगान तक बना लिया है। सिंधुदेश का झंडा तक अस्तित्व मे आ चुका है, जो लाल रंग का है, बीच में एक सफेद गोले में काले रंग में फरसा लिए हुए एक हाथ है। 

इस झंडे के तले लंबे वक्त से आजादी की मांग कर रहे आंदोलनकारियों की मांग है कि पाकिस्तान सिंध में जनमत संग्रह कराए ताकि हुक्मरानों को पता चल सके कि जनता क्या चाहती है।हाथों में सिंधुदेश के प्रतीक लाल झंडे लिए हजारों लोगों ने स्वतंत्र देश के समर्थन में नारे लगाए। जय सिंध कौमी महाज जेएसक्यूएम के अध्यक्ष सुनान कुरैशी और अन्य राष्ट्रीय नेताओं ने सिंधी भाषा और संस्कृति को बचाने व् सिंध को आज़ाद करने के लिए जबरदस्त आंदोलन निरंतर चलाये हुए हैं।

सिंधु समुदाय के समर्थन में आवाज उठाने वाले नेताओं के खिलाफ इमरान सरकार आपत्तिजनक नारेबाजी, विद्रोह, आतंकवाद और आपराधिक साजिश की धाराओं के तहत मामले दर्ज कर रही है। आतंकवाद रोधी कानून के तहत दर्ज मामलों में आरोप लगाया गया कि जेएसक्यूएम के अध्यक्ष सुनान कुरैशी, उप अध्यक्ष इलाही बख्श एवं कई और नेताओं ने देश सरकार व संस्थानों के खिलाफ विद्रोह भड़काने की कोशिश की।

सिंधीयो पर अमानुषिक अत्याचार व् उनकी भाषा, संस्कृति व  समाज का  दमन ठीक उसी प्रकार हो रहा है जैसा कभी पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) के वाशिंदो के साथ हुआ करता था, जैसा की बलोचिस्तान के बलूचों के साथ हो रहा है व  जैसा की चीन अपने यंहा के उइगर मुस्लिमो के साथ कर रहा है।

उनकी बहु, बेटियों, बीबियो व बच्चियों को कोई न कोई “टिक्का खान” (जिसे बलोचो का कसाई व् बुचर आफ बांग्लादेशी के नाम से भी जाना जाता है) जैसा हैवान अपनी हैवानियत व् हवस का शिकार बना लेता है। नौजवानो को देखते ही देखते गायब कर दिया जाता है और बाद में उनकी छत विछत लाश नालो में फेकि हुई मिलती है।

आज सिंध को आज़ाद करने का वक़्त आ चूका है। जब यहूदियों ने अपना मुल्क इजराइल ले लिया, बांग्लादेशियो ने अपना मुल्क ले लिया, तो फिर सिंधीयो और बलोचो का अपना मुल्क क्यों नहीं हो होना चाहिए। सिंध का इतिहास विश्व के सबसे प्राचीन इतिहासों में से एक है और जब भारत का  राष्ट्र गान सिंध के बिना पूरा नहीं हो सकता तो हिन्द का वैभव सिंध नापाक पाकिस्तानियो के कब्जे में क्यों रहे।  

नागेंद्र प्रताप सिंह (अधिवक्ता)

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