Wednesday, February 1, 2023
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क्या आयुर्वेदिक चिकित्सको को सर्जरी अर्थात शैल्य क्रिया से वंचित किया जा सकता है?

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Nagendra Pratap Singh
Nagendra Pratap Singhhttp://kanoonforall.com
An Advocate with 15+ years experience. A Social worker. Worked with WHO in its Intensive Pulse Polio immunisation movement at Uttar Pradesh and Bihar.

जिनके पुर्वज महर्षि सुश्रुत निर्विवाद रूप से संपूर्ण विश्व में “शैल्य चिकित्सा” के जनक माने जाते हैं व जिन्होने संपूर्ण विश्व को आयुर्वेद का उपहार देते हुये शैल्य क्रिया की नीव रखी!

जी हाँ  मित्रो

मैं अपने भारतीय चिकित्सा संघ (Indian Medical Association) के चिकित्सक भाईयों से पूछना चाहता हूँ कि वे किस अधिकार से आयुर्वेदीक चिकित्सको को 58 प्रकार की शैल्य क्रिया करने की आज्ञा देने वाले आदेश का विरोध कर रहे हैं! अरे एलोपैथी का पढ़ाई करने वाले भाईयों तुम्हे सर्जरी (शैल्य क्रिया) तो उन लोगो ने सिखायी जिन्होंने केवल २00 से २५० वर्ष पहले  ये विद्या अरबो से सिखी, जबकी आयुर्वेद तो २५००  वर्षों से ज्यादा प्राचिन है!

आईये देखे  विश्व “शैल्य चिकित्सा” की उत्पत्ति व “आयुर्वेद” से उसके रिश्तो का निरूपण कैसे करता है!

Monier-Williams, Monier (1899). A Sanskrit-English Dictionary. Oxford: Clarendon Press. p. 1237 के अनुसार सुश्रुत से तात्पर्य  “अच्छे प्रकार से सुना गया / सुविख्यात/ प्रसिद्ध” होता है!

श्री कुंजलाल (Bhishagratna, Kunjalal 1907) ने सुश्रुत सम्हिता का अगंरेजी भाषा में अनुवाद किया,  जिसके अनुसार  महाभारत नामक प्राचीन ग्रंथ में महर्षि सुश्रुत को महर्षि विश्वामित्र का पुत्र बताया है

Mr. Manish C. Champaneria, (MD, Department of Plastic Surgery, Loma Linda University Medical Center )के द्वारा लिखी गयी पुस्तक “Annals of Plastic Surgery”: July 2014 – Volume 73 के अनुसार वह (सुश्रुत) शैल्य क्रिया और प्लास्टिक शैल्य क्रिया के जनक माने जाते हैं!

श्री के बी कांसूपाड़ा(Kansupada, K. B.) व श्री जे डब्लू ससानी (Sassani, J. W. (1997)) ने अपनी पुस्तक “Sushruta: the father of Indian surgery and ophthalmology”. Documenta Ophthalmologica. Advances in Ophthalmology. 93 (1–2): 159–167 में सुश्रुत को “शैल्य चिकित्सा का जनक” माना है!

श्री जी डी सिंघल (Singhal, G. D. (1972)) ने अपनी पुस्तक “Diagnostic considerations in ancient Indian surgery: (based on Nidāna-Sthāna of Suśruta Saṁhitā)” में वर्णित किया है कि ” सुश्रुत सम्हिता की सभी सिद्धांतों मे जहाँ एक ओर “मेडिसीन” की बात की गयी है वहीं दुसरी ओर “शैल्य चिकित्सा” का विस्तृत विवरण दिया गया है, अत: ईसिलिये ईन्होने भी सुश्रुत को ” शैल्य चिकित्सा का जनक” माना है!

श्री एफ रूडोल्फ होर्नले (Hoernle, A. F. Rudolf (1907)  ने अपनी पुस्तकों  “Studies in the Medicine of Ancient India” Osteology or the Bones of the Human Body” ( Oxford: Clarendon Press. p. 8.)  में माना है कि सुश्रुत संहिता के कुछ कन्सेप्ट “शतपथ ब्राह्मण” में भी पाये  जा सकते  हैं जो लगभग 600 BCE प्राचीन  है

बोस्लॉफ (Boslaugh 2007, p. 547, Quote):-ने अपनी रचना में स्पष्टतया लिखा कि  कि “हिंदु रचना सुश्रुत सम्हिता संभवत: सबसे पहला प्रयास था रोगो और चोटो (घावो) को विश्लेषित करने का ,बोस्लॉफ ने भी ईसे छठी शताब्दी के आस पास की माना है!

कृष्णाचार्य, टी. आर्. (1910)  “Sriman Mahabharatam” ईन्होने भी अपनी पुस्तक “श्रीमन महाभारतम” में ये बताया है कि प्राचीन पवित्र ग्रंथ महाभारत में भी सुश्रुत को महर्षि विश्वामित्र के बच्चो की सूची मे स्थान दिया, यही संबंध “सुश्रुत सम्हिता” में भी बताया गया है

Wujastyk, Dominik (2003) ने अपनी पुस्तक  “The Roots of Ayurveda. London etc.: Penguin. pp. 149–160” में लिखते हुये बताया है कि सुश्रुत का नाम छठी शताब्दी मे प्रचलित “बोवर मनुस्क्रिप्ट” में आया है,  जिसमें उन्हें हिमालय मे निवास करने वाले 10 संतो मे से एक माना गया है

Meulenbeld 1999, pp. 203–389 (Volume IA) के अनुसार The Sushruta Samhita (सुश्रुतसंहिता) संस्कृत भाषा की एक प्राचीन “मेडिसीन व शैल्य चिकित्सा” की पुस्तक है व उपलब्ध सबसे प्राचीन सिद्धांतो मे से एक है

और ईसिलिये विद्वानों ने माना है कि “सुश्रुत संहिता  का संकलन आयुर्वेद (भारतीय पारंपरिक चिकित्सा) के संस्थापक ग्रंथों में से एक है, जिसमें चरक-संहिता, बेहल संहिता -सौत, और बोवर पांडुलिपि के चिकित्सकिय भाग शामिल हैं।”

सुश्रुत सम्हिता में 184 अध्याय हैं जिसमे 1120 बिमारीयों (ब्याधियों) का वर्णन किया गया है इसके साथ ही 700 औषधीय पौधों, 64  खनिज स्रोतों से तैयारी और 57 पशु स्रोतों पर आधारित तैयारी का वर्णन किया गया है!

सुश्रुत संहिता दो भागो मे विभक्त है

प्रथम भाग “पूर्व तंत्र” के नाम से जाना जाता है!  द्रितीय भाग “उत्तरा तंत्र” के नाम से जाना जाता है!

पूर्व तंत्र :- पाँच पुस्तको व 120 अध्यायो मे विभक्त है!

जो निम्नवत है!

1:- निदानस्थान:- व्यधिनिदान विज्ञान के बारे मे पूर्ण जानकारी देती है!

2:- शरीरास्थान:- भ्रूण विज्ञान व् शरीर रचना विज्ञान से संबंधित पूर्ण जानकारी उपलब्ध कराती है!

3:- कल्पस्थान:- आम तौर पर वीज़ा तंत्र के रूप में जाना जाता है जो जहर की प्रकृति के साथ-साथ प्रबंधन का वर्णन करता है।

4:- चिकित्सा स्थान :- विभिन्न सर्जिकल स्थितियों के प्रबंधन के सिद्धांत सहित  प्रसूति आपात स्थिति, जराचिकित्सा और कामोत्तेजक के बारे में बात करता है ।

उत्तरा तंत्र:-The Uttaratantra holds the other four specialties that are

 शल्क्या (Salakya),  कायचिकित्सा(Kayacikitsa), कूमारंभफेफर्त्या (Kaumarabhfefefrtya) and भूतविद्या (Bhutavidya)

The Uttaratantra is entirely known as the (उपद्रविका)Aupadravika (have description of many complications of surgical procedures like “Hiccough, Fever, Krmi-roga, Pandu, Dysentery, Cough, Kamala, etc”.

शल्क्यतंत्र में नाक, कान आँख व शिश से संबंधित विभिन्न प्रकार की बिमारीयों का वर्णन किया गया है , आचार्य सुश्रुत ये पुस्तक भारतीय चिकित्सा में एक नवीन स्थान पर है। इस पुस्तक को आयुर्वेद की नीव भी कहा जाता है। इन्होने की इस पुस्तक में आठ प्रकार के शल्य क्रिया के बारे वर्णन किया है –

छेद्य, भेद्य, लेख्य, वेध्य, ऐष्य, अहार्य, विश्रव्य और सीव्य ।

इस चिकित्सा ग्रन्थ में इन्होने कई उपकरणों का भी वर्णन किया है इन्होने 24 प्रकार के स्वास्तिकों,  2 प्रकार के संदसों,  28 प्रकार की शलाकाओं तथा 20 प्रकार की नाड़ियों का विशेष रूप से विस्तृत वर्णन किया है। शैल्य क्रिया के पूर्व एनेस्थेसिया का प्रयोग सर्वप्रथम महर्षि सुश्रुत ने किया था । इसके साथ साथ इन्होने ये भी बताया है कि शल्यचिकित्सा के पहले रोगी को मदिरापान कराया जाता था, क्योकि आचार्य को इसके विभिन्न गुणों जैसे एंटीसेप्टिक होने का भी पूर्ण ज्ञान था।  आचार्य सुश्रुत की  “सुश्रुत सहिंता” में शरीर सरंचना, कार्य सहिंता, स्त्री रोग,  मनो रोग,  नेत्र एव सर रोग,  औषधि विज्ञानं, शल्य विज्ञानं और विष विज्ञानं का विस्तृत वर्णन है। 

इसमें नाक, कान, होंठो की प्लास्टिक सर्जरी का वर्णन भी किया है।  सफल चिकित्सक बनने के लिए आवश्यक गुणों का बखान करते हुए उन्होंने पुस्तकीय ज्ञान और प्रायोगिक ज्ञान पर बल दिया। आचार्य सुश्रुत (Sushruta) शरीर के किसी भी भाग में मास कट फट जाने,  घाव लग जाने या किसी विकृति के कारण उस अंग को ठीक करने के लिए एक स्थान से चमड़ी निकालकर इसे दूसरे स्थान पर प्रतिस्थापित कर दिया करते थे। हालांकि यह प्रक्रिया आचार्य सुश्रुत से पूर्व भी प्रचलन में थी। लेकिन इस पर प्रभावी रूप से कार्य करने वाले सुश्रुत पहले चिकित्सक थे। आचार्य सुश्रुत (Sushruta) के द्वारा लिखी पुस्तक का कई विदेशी भाषाओ में अनुवाद भी हुआ था। 

अरबी अनुवादकिताबे सुसतरनका अरब चिकित्सको ने इसका भरपूर लाभ उठाया था। इरानी चिकित्सा शास्त्री “राजी”  ने आचार्य सुश्रुत के ज्ञान पर आधारित पुस्तक लिखी जिसमे हल्दी एवं लहसुन आदि के गुणों का वर्णन किया गया।धीरे धीरे उनका ज्ञान रूस भी पहुचा और अंग्रेज मात्र 200 वर्ष पूर्व उनके प्लास्टिक सर्जरी को अपने यहाँ ले गये और आगे विकसित किया था। आचार्य द्वारा विकसित शल्यचिकित्सा विधि, पट्टी बाँधने , सिलने आदि की विधिया आज भी उपयोग में आती है। 

नागर्जुन नामक महान चिकित्सा शास्त्री ने ” सुश्रुत सहिंता ” का संपादन कर उसे नया स्वरुप प्रदान किया था।  यह ग्रन्थ आज भी अनुसन्धान का विषय है। इनके द्वारा किये गए इन्ही कार्यों के कारण इन्हें विश्व का प्रथम शल्य चिकित्सक भी कहा जाता है।

श्री आई ए मेनन व श्री एच एफ हैबरमन(Menon IA, Haberman HF (1969)) ने अपनी पुस्तक”Dermatological writings of ancient India”. Med Hist. 13 (4): 387–392 में स्पष्ट किया है कि सुश्रुत संहिता को “चरक संहिता” के बाद संकलित किया गया और कुछ बिंदुवो और उसमे वर्णीत तथ्यो के अलावा दोनो पुस्तको में कई विषयों के समान सिद्धांतों का वर्णन किया गया है! दोनो संहितावों मे एक बड़ा अंतर ये है कि सुश्रुत संहिता जहाँ शैल्य चिकित्सा क्रिया को आधार प्रदान करता है वही “चरक संहिता” मेडिसीन चिकित्सा को आधार प्रदान करता है ।

Meulenbeld 1999, p. 352 (Volume IA)में स्पष्ट व विवछित रूप से माना है कि सुश्रुत संहिता के अनुवाद अरबी भाषा में किया गया जिसे “किताब शाह सून अल हिंदी” या “किताबी सुसुरूद” के नाम से जाना जाता है, जिसे आठवी शताब्दी में बगदाद में रहने वाले बरमकीद नामक परिवार के सदस्यो को निर्देश पर अनुवाद किया गया था!

Charles Burnett (2015), The Cambridge World History, Volume 5, Cambridge University Press,  के अनुसार याह्या ईब्न बार्माक ने विशेष प्रयास किया था अरबी भाषा में श्री वग्भाता द्वारा रचित अष्टांगहृदय संहिता व श्री रवीगुप्ता द्वारा रचित सिद्धाश्रा व सुश्रुत संहिता को अरबी भाषा में अनुवाद करने का!

उपर्युक्त विश्लेषण से ये स्पष्ट है की आई एम् ए (IMA) का ये कहना की “केंद्र सरकार का ये कदम  ‘मिक्सोपैथी’ है तथा आयुर्वेद डॉक्टर्स के सर्जरी करने की काबिलियत पर सवाल उठाना और इस प्रकार भारतीय चिकित्सा प्रणाली के खिलाफ अविश्वास पैदा करना” न केवल संविधान के द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण है अपितु अनुच्छेद २१ का घोर उलंघन है!  आयुर्वेदिक चिकित्सको को उन्ही की चिकित्सा प्रणाली से दूर रखना असवैंधानिक है  और ये आई एम् ए (IMA) कौन होता है किसी की योग्यता का मापदंड तय करने वाला ! वैसे सम्पूर्ण विश्व इस तथ्य से अवगत है की कई  मामलो में आयुर्वेद के चिकित्सको के पास एलोपैथिक चिकित्सको से ज्यादा कारगर चिकित्सा होती है अत: आयुर्वेदिक चिकित्सको को पूरा अधिकार है की वो अपनी २५०० वर्ष प्राचीन “शैल्य क्रिया” में पून सिद्धहस्त होकर जनता जनार्दन की सेवा करे!

धन्यवाद
नागेंद्र प्रताप सिंह

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