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परम पूज्यनीय से भेंट

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परम पूज्यनीय से भेंट

“मै एक साधारण स्वयंसेवक” इस अर्ध वाक्य का परिचय कैसे दूं यही दुविधा का विषय है! संघ कार्यालय में पड़ी हुई धूल से ढकी हुई पुस्तक जिसपर पूज्यनीय गुरू जी का चित्र है, मेरी सोशल मीडिया के बायो के रूप में, या मेरे साथ हुए अनुभव के रूप में? शायद इन सब का अपना स्थान अपने रूप में आरक्षित है।

सामान्य व्यक्ति के लिए शायद यह लेख ‘तिल का ताड़’ हो, किंतु एक स्वयंसेवक के लिए अभूतपूर्व अनुभव हो सकता है। संघ की शाखा, मतलब ३६५ दिन चलने वाली अनवरत साधना, एक निश्चित स्थान, निश्चित समय, निश्चित कार्यक्रम, यह सब कुछ हिंदू समाज को एकत्रित लाने का प्रयास। हम एक ही लक्ष्य लेकर चल रहे है “नित्य सिद्ध शक्ति” का जागरण, उसके लिए “शाखा का चलना” हमारा एक ही कार्य है।

मै एक कार्यकर्ता कैसे बना ये ज्यादा रोचक नहीं है लेकिन जिसने कार्यकर्ता के रूप में गढ़ा वो रोचक है। ७ दिन का प्राथमिक संघ शिक्षा वर्ग करके आरम करने की सोच ही रहा था कि तत्कालीन भाग सह कार्यवाह (उस समय दायित्व शायद यही था) मेरे पास मिलने आए। हरीश जी (हम नाम में “जी” स्वाभाविक ही जोड़ देते है): कितना शुल्क था वर्ग का?
मै: २०० रुपए
हरीश जी: कितने दिन रहे ?
मै: ७ दिन
हरीश जी: ७ दिन का भोजन २०० में मिलता है क्या?
मै: नहीं
हरीश जी: अब संघ का कर्ज है आपके ऊपर भोजन का, उसे कैसे चुकाओगे?
मै: कैसे?
हरीश जी: संघ की शाखा लगा के।

बस श्री गणेश हो गया, जिसे तैरना नहीं आता और पानी में धक्का दे दिया जाए, मेरी वहीं हाल था।

“नमस्ते, कैसे है, घर पे सब कैसे, किधर हो? शाखा में आईए, अपना उत्सव है।”

उपर्युक्त शब्द दिनचर्या बनते गए। सुबह की मुंबादेवी शाखा में प्रार्थना के बाद जब बैठक के लिए कार्यालय पहुंचा। नगर कार्यवाह ने व्यक्तिश तारीख बताई और कहा कि पूजनीय सरसंघचालक मोहन जी प्रवास पर इधर आने वाले है। आप व्यवस्था में जा सकते हो क्या? मन प्रसन्न हो गया,चेहरे पर संकेत देखे जा सकते थे। नगर में ढिंढोरा पीट दिया कि पूज्यनीय सरसंघालक जी की व्यवस्था में जा रहा हूं, अनेकों प्रकार की निवेदन आने लगे, आप फोन करना, हमे मिलाना, ये प्रश्न पूछ लेना, इत्यादी।

तय दिवस पर दादर रेलवे स्टेशन, सब सुरक्षा के प्रबंध के बीच में उनका आगमन, जैसे ही डिब्बे से वो बाहर निकले, शासकीय कर्मचरियों ने अभिवादन जय हिन्द से किया’, अपने आप को शूरवीर समझने वाला, मै उनके माथे के तेज को देखकर आत्ममुग्ध हो गया, सामान लेकर गाड़ी में बैठा और वही परिचय हुआ।

मोहन जी: तो अनुराग जी बनारस का पान खाते है कि नहीं?
उत्तर “नहीं” था।
मोहन जी: कैसे बनारसी है आप की बनारस का पान भी नहीं खाते?

मेरे पास कोई उत्तर नहीं था। समय अनुसार हम यशवंत भवन पहुंचे। सुरक्षा कर्मियों के हाव भाव बड़े उदासीन से लगते है या फिर कर्त्तव्य का बोझ ही इतना ज्यादा है, ये लिफ्ट में फ्लोर गिनते समय विचार आने लगे।  किसी जौहरी के लिए जैसे पारस दिख जाए, उसकी आँखों में जो चमक हो जाये। मेरी परिस्थिति भी कुछ वैसे ही हो गयी थी।

मन में विचार आया की जीवन के इस ऐतिहासिक प्रसंग को इष्ट जानो के साथ साझा किया जाए। हर युवा की तरह फेसबुक और व्हाट्सप्प के स्टेटस में समाचार जारी हो गए। और फिर इनबॉक्स में एक वाक्य यह इंगित करते हुए लिखा था “आप पूजनीय सर संघचालक जी के साथ हो, ये अनुभव का विषय है या सबको बताने का विषय है, उनके साथ आपकी एक तस्वीर ले लेना, लेकिन व्यक्तिगत ही रखना। ”

अब अहसास हुआ अपनी गलती का और भारी मन से सारी चीजे हटा दी। दो दिन में क्या काम किया ये महत्त्व का विषय नहीं था, उनका सानिध्य मिला ये महत्व का था। कमरे की साफ़ सफाई करवाना,भोजन और दवा,सब कुछ समय सारिणी के अनुसार। दो दिन में दो कार्यक्रम जो की तय था वो टीवी पर या तो ऑनलाइन ही देखना पड़ा।

१- संघ के पूर्व सर सरकार्यवाह एकनाथ रानडे जी, जिनके किये गए अन्यान्य सामाजिक कार्यो में, तमिलनाडु में विवेकानंद शिला स्मारक के निर्माण को विशेष रूप से याद किया जाता है, उनके जीवन के ऊपर एक पुस्तक का विमोचन मराठी भाषा में किया गया।

२-संघ के एक प्रचारक के नाम पर चलने वाले सेवा कार्य (टाटा कैंसर हॉस्पिटल के समीप ही) “नाना पालकर स्मृति समिति” के ५० वे वर्षगांठ पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया। उसमे मोहन जी के साथ रतन टाटा जी भी मुख्य अतिथि थे।

उन दो कार्यक्रम के आलावा बहोत सारे महानुभावो का आगमन उनसे मिलने के लिए होता रहा, जिसमे से एक पत्रकार महोदय का विशेष उल्लेख करना चाहूंगा, जो की दिल्ली से मिलने आये हुए थे, चुकी प्रवास के कारण, समय का आभाव था और ये दो दिन में उनसे मिलने के लिए तय किया गया। सबके जलपान की देख रेख करना, यही थोड़ा काम रहा।

सायं काल में उन्हें चाय देने के लिए गया, मन में संकोच था की केतली से कितनी चाय कप में पड़ेगी, और वो सामने ही कुर्सी पे बैठे थे, मेरे संकोच को शायद उन्होंने पढ़ लिया और कहा की यहाँ से चाय दिखनी चाहिए उतनी भर दीजिये। मेरे हांथो में थोड़ा कम्पन हुआ और मोहनजी बोल उठे, डरिये मत, और चेहरे पर हसी आ गयी।

अगले दिन उन्हें एयरपोर्ट पर छोड़ने जाना था, शुरुआत में मन में जो प्रश्नो का ज्वार था जिन्हे लेकर मै चला था, वो लहर शांत हो चुकी थी। उनके साथ एक तस्वीर जो स्मृति के लिए रखनी थी, उसका भी अनुरोध नहीं कर सका। ट्राली पर सामन लेकर जा रहा था और सुरक्षा कर्मी सबको एक तरफ हटा रहे थे, पास में खड़ी महिला ने बगल में कड़ी अपनी स्वजन से पूछा, “Who?”, उत्तर मिला Mohan Bhagwat।

मेरे मन में ये विचार आया की वो आपके लिए वो सिर्फ मोहन भागवत हो सकते है, हमारे लिए वो अभिवावक, त्याग का मापदंड, हिन्दू समाज का उदयीमान दीपक, राष्ट्र के लिए त्याग की प्रेरणा देने वाला व्यक्तित्व और अनेकानेक विशेषण से परिभाषित किया जाने वाला व्यक्तित्व।

उम्र के जिस पड़ाव में लोग सेवानिवृत होकर आराम से जीवन जीना चाहते हैं, उस समय वो मनुष्य जिसका शरीर अब ढलान की तरफ बढ़ रहा है, उसकी दिनचर्या देख के, इतनी उम्र में भी पुरे भारत भर में प्रवास, बैठक, चर्चा। मन में तनिक भी अभिमान नहीं, इतना मिलान सार व्यक्तित्व (जो की हर प्रचारक का वैशिष्ट्य है)। उस संस्मरण ने, उसके बाद मेरे “नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे” के सुर बदल दिए और समझाया की पूजनीय गुरु जी ने क्यों कहा “मै एक साधारण स्वयंसेवक”।

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