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इमरजेंसी: लोकतंत्र का काला अध्याय

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इमरजेंसी: लोकतंत्र का काला अध्याय

25 जून 1975 को सूर्यास्त होने के बाद शायद ही किसी को आभास हुआ होगा कि यह अंधेरा लम्बे समय तक छटने वाला नही है। उस रात की कालिमा ने भारतीय लोकतंत्र पर 19 महीने तक ग्रहण लगा दिया। चंद घण्टे पहले दिल्ली के रामलीला मैदान में सम्पन्न हुई इंदिरा-विरोधी रैली में लाखों की भीड़ जुटी थी। कोर्ट द्वारा चुनाव धांधली में संलिप्त पाए जाने पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का रायबरेली चुनाव निरस्त करने और उनपर 6 साल तक किसी भी चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने के फैंसले से उत्साहित जनता का गगनभेदी नारा गूंज उठा- ‘सिंहासन खाली करो, के जनता आती है!’

श्रीमती गांधी पूरी तरह बोखला गई। वह किसी भी कीमत पर सिंघासन छोड़ना नही चाहती थी ….और कीमत भारत के लोकतंत्र ने चुकाई! लोकसभा चुनाव में अयोग्य ठहराए जाने के फैसले और जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में लामबंद हुए विपक्ष के धारदार प्रहारों से इन्दिरा गांधी इस कदर बौखला गई कि उन्होंने पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे की सलाह पर धारा-352 के तहत देश में आंतरिक आपातकाल लगाने का प्रस्ताव राष्ट्रपति फखरूदीन अहमद से आधी रात को मंज़ूर करवाकर देश में इमरजेंसी घोषित कर दी।

एक झटके में देशवासियों के नागरिक अधिकार अनिश्चित काल के लिए समाप्त कर दिये गए। लोकतंत्र से ‘लोक’ हटा कर ‘तानाशाही’ लिख दिया गया। जिस आज़ादी के लिए असंख्य देशभक्तों ने अपना सर्वस्व बलिदान दिया, अमानवीय यातनाएं झेली, उस आज़ादी को इंदिरा गांधी ने पिंजरे में कैद कर लिया। जिस संविधान की शपथ लेकर श्रीमती गांधी सिंघसनस्पद हुई थी, सिंहासन बचाए रखने के लिए उसी संविधान पर ताला लगा दिया। सभी नागरिक अधिकार छीन लिए गए। भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में सबसे काला अध्याय जुड़ चुका था।

इमरजेंसी लागु होते ही आंतरिक सुरक्षा कानून यानि मीसा के तहत धड़ाधड़ गिरफ्तारियाँ हुईं और एक के बाद एक विपक्ष के सभी बड़े नेता सर्वश्री जय प्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, चन्द्रशेखर, मोरारजी देसाई, लालू प्रसाद यादव और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ नेताओं को ढूंढ़-ढूंढ़ कर जेलों में ठूस दिया गया। सरकार के विरुद्ध कुछ भी लिखने पर निष्पक्ष पत्रकारों को भी जेल भेज दिया जाता था। यह कहना गलत नही है कि हिंदुस्तान का लोकतंत्र ही जेल की सलाखों के पीछे बंद कर दिया गया था।

आपातकाल के दौरान पुलिस की भूमिका किसी खलनायक से कम नहीं थी। अपने ही देश की पुलिस के अत्याचार ब्रिटिश राज के अत्याचारों को भी मात दे रहे थे। जो जहाँ, जिस हालत में मिला, उसे जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया। देश के आम व्यक्ति की तो हैसियत ही क्या थी जब नामी-गिरामी राजनेताओं को रातों रात गिरफ्तार कर जेलों में ठूस कर अमानवीय यातनायें दी गई। चप्पे-चप्पे पर पुलिस के सीआईडी विभाग वाले नजर बनाए रहते थे। आंतरिक सुरक्षा कानून यानी ‘मीसा’ के तहत पुलिस द्वारा कैद में लिए गए लोगों को न्यायालय में पेश करने की जरूरत नहीं थी, और ना ही जमानत की कोई व्यवस्था थी। इस दौरान एक लाख से ज्यादा लोगों को जेलों में डाला गया। धर-पकड़ और आरोपी बनाने का ऐसा सिलसिला चला, कि आम लोग तो क्या अदालतें भी स्तब्द रह गयी!

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आपातकाल के दौरान संजय गांधी के पांच सूत्रीय कार्यक्रम के तहत नसबंदी अभियान चलाया गया जिसके अंतर्गत शहर से लेकर गांव-गांव तक लोगों के ऑपरेशन कर दिए गए। टारगेट पूरा करने के चक्कर में अनेक ज्यादतियां हुई। पुलिस की दबिश के डर से घर के घर खाली हो गए और अनेक स्थानों पर परिवार के पुरुष सदस्यों को भूमिगत होना पड़ा। मीडिया पर पाबंदी लगाकर सरकार ने खूब मनमानी की। उस समय कई अखबारों ने मीडिया पर सेंसरशिप के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की, पर उन्हें बलपूर्वक कुचल दिया गया। आपातकाल में सरकार की मनमानी से तंग आकर प्रसिद्ध अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने अपने सम्पादकीय पृष्ठ को पूरी तरह से खाली छपवाकर विरोध प्रकट किया।

विशुद्ध लोकतन्त्र रूपी जिस रत्न को माँ भारती के पवित्र ग्रन्थ संविधान में संजो कर रखा गया था, उसे श्रीमती गांधी ने आपातकाल जैसे काले कानून की कटार चलाकर शत-विक्षत कर दिया। लेकिन बदलते वक़्त के साथ लोकतंत्र ने फिर करवट ली और लोगों ने बता दिया कि हिन्दुस्तान में लोकतंत्र की जड़ें कितनी गहरी हैं! आपातकाल खत्म होने के बाद हुए 1977 के आम चुनवों में कोंग्रेस के संसद सदस्यों की संख्या 350 से घटकर 153 रह गयी! कोंग्रेस को उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और बिहार में एक भी सीट पर जीत नहीं मिली। खुद इंदिरा गाँधी रायबरेली और उनका बेटा संजय अमेठी से चुनाव हार गए। मुरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी जिसने आपातकाल के दौरान लिए गए सभी निर्णयों की समीक्षा के लिए उच्चस्तरीय समिति का गठन किया और अपने ढाई वर्ष के कार्यकाल में संविधान में ऐसे प्रावधान कर दिए जिससे देश में फिर आपातकाल न लग सके।

-प्रो. विधु रावल
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