Home Hindi विवाह मण्डप: श्रीरामजन्मभूमि ट्रस्ट के सदस्यों को समर्पित सार्वजनिक पत्र

विवाह मण्डप: श्रीरामजन्मभूमि ट्रस्ट के सदस्यों को समर्पित सार्वजनिक पत्र

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विवाह मण्डप: श्रीरामजन्मभूमि ट्रस्ट के सदस्यों को समर्पित सार्वजनिक पत्र

आदरणीय सदस्यगण,

सादर प्रणाम।

करोड़ों श्रद्धालुओं की आँखें जिस दिन की बाट जोह रहीं थी वो दिन अब निकट आता जा रहा है। माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्णय के उपरांत श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर के निर्माण हेतु प्रक्रिया का आरंभ ट्रस्ट के निर्माण से मूर्त रूप में आ चुका है।

प्रभु श्रीराम के जन्मस्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण न केवल हिंदुओं की अडिग आस्था का प्रकटीकरण होगा अपितु समाज की सांस्कृतिक जिजीविषा एवं स्वत्व की रक्षा के लिए सब कुछ बलिदान करके दुरूह लक्ष्यों की प्राप्ति के संकल्प का एक चिरकालिक प्रेरक पुंज भी होगा। केंद्र व राज्य शासन भी अयोध्या को विश्व के सर्वाधिक भव्य धार्मिक स्थल के रूप में स्थापित करने के लिए प्रयासरत हैं।

श्रीराम जन्मभूमि को जन-जन के जीवन में अधिक गहराइयों से सम्बद्ध करने हेतु मैं एक सुझाव देना चाहता हूँ।

विवाह-संस्कार मनुष्य के जीवन को नवीन दिशा प्रदान करता है। साथ ही परिवार एवं पारिवारिक  मूल्यों का आधार भी बनता है। अतः मैं अयोध्या के श्रीरामजन्मभूमि मंदिर परिसर या उससे सम्बद्ध भूमि पर एक विवाह मंडप (कल्याण मण्डप) का प्रस्ताव करता हूँ। यद्यपि नागर शैली के मंदिरों मे विवाह मण्डप की व्यवस्था नहीं रही है फिर भी सृजन की नवीनता एक सतत प्रक्रिया है। विजयनगरम मंदिर शैली के कल्याण मण्डप के अनुकरण में ऐसी व्यवस्था समाज को धर्म से सन्निकट करेगी तथा अपनी मूल परंपराओं से जोड़ने का नया माध्यम बनेगी।

कल्याण मण्डप का प्रबंध एक समिति के द्वारा किया जा सकता है। ये समिति कुछ अनिवार्य तथा कुछ वैकल्पिक रूप से निम्न संसाधन उपलब्ध करा सकती है-

  • विवाह सम्पन्न कराने हेतु सुशिक्षित आचार्यों की व्यवस्था
  • मुहूर्तों को सूचीबद्ध कर समयवार स्थल का आवंटन
  • विवाह कार्य मे आवश्यक मूलभूत सामग्री की व्यवस्था
  • उन सामग्रियों की एक सूची उपलब्ध करना जिनका प्रबंध वर-वधू को करना है
  • मूलभूत न्यूनतम साज सज्जा का विकल्प देना
  • इच्छुक साज-सज्जा करने वाली संस्थाओ की सूची वर-वधू को उपलब्ध कराना

इन कार्यों के सम्पादन हेतु एक न्यून शुल्क निर्धारित किया जा सकता है।

कालांतर में एक वैदिक पाठशाला का प्रबंधन भी इस समिति से सम्बद्ध किया जा सकता है जो प्रशिक्षित ब्राह्मणों की एक शृंखला का निर्माण कर सके।

साथ ही यह समिति दंपति एवं उनके परिवार को एक सूची उपलब्ध कर सकती है जहाँ श्रीराम जन्मभूमि ट्रस्ट के साथ ही धर्म के अन्य कार्यों (यथा संस्कृत पाठशाला, वैदिक विद्यालय, गौशाला, मंदिर जीर्णोद्धार, धर्मग्रंथों के प्रकाशन-अनुवाद आदि) में संलग्न संस्थाओं को आर्थिक योगदान का विकालप्प उपलब्ध हो। इन संस्थाओं को सूचीबद्ध करने से पहले उनके कार्यों की एक न्यूनतम समय सीमा निर्धारित की जा सकती है एवं दंपति स्वतंत्र रूप से स्वयं उनकी समीक्षा कर सकते हैं।

 समाज आज भौतिकतावाद के एक अराजक वातावरण में है। जहाँ विवाह जैसा महत्वपूर्ण संस्कार विकृत रूप धर चुका है। विवाह संपादित कराने वाले आचार्य (ब्राह्मण) बहुत ही सीमित मात्र में सुप्रशिक्षित हैं। साथ ही समाज के अनावश्यक दबाव मे व्यक्ति उन दिखावों के प्रति अधिक आसक्त है जिनका सनातन परंपराओं से संबंध नहीं है। साथ ही अनावश्यक व्यय के बढ़ते प्रतिमान सामाजिक कुंठा का भी कारण बनते है क्योंकि साधारण परिवारों पर भी समाज की प्रवृत्तियों के अनुरूप कार्यक्रम का दबाव होता है। कुप्रवृत्तियाँ पूर्ण रूप से विवाह समारोहों पर अधिकार कर चुकी हैं। ऐसे वातावरण में धन का जो अपव्यय समाज को दूषित करने मे प्रयुक्त होता है उसे समाज के संस्कारों के संरक्षण और संस्कृति के पुनरुद्धार मे लगाया जा सकता है। इस कार्य हेतु प्रभु श्रीराम के जन्मस्थल से अच्छा स्थान नहीं हो सकता जो पुनः सनातन धर्म को उचित मार्ग प्रदर्शित कर सके।

समय के साथ यह प्रवृत्ति यदि अन्य महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों तक विस्तारित होती है तो सनातन धर्म के लिए और अधिक हर्ष की बात होगी। ‘सनातन धर्म की जय’ के उद्घोष के साथ मैं यह विचार इस आशा के साथ आप महानुभावों को समर्पित करता हूँ की आप इस पर गंभीर मंथन करेंगें।

                               जयश्रीराम।

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