क्या प्रेम ही समाधान है?

आपने बहुत सारे लोगों को कहते हुए सुना होगा की प्रेम से हर चीज का समाधान निकाला जा सकता है और प्रेम से ही संसार को जीता जा सकता है। कबीर ने भी अपने दोहे में प्रेम को ही सर्वोच्य बताया है।

“पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।। “इसका सीधा मतलब ये है की किताबी ज्ञान से कोई पंडित नहीं बन पाया है लेकिन प्रेम के ढाई अक्षर पढ़ कर पंडित बना जा सकता है। हमारी फिल्म इंडस्ट्री ने न जाने कितने अनगिनत फिल्में ऐसी बनाई हैं जिसका मूल उद्देश्य प्रेम को हर चीज से ऊपर दिखना ही रहा है।लेकिन क्या सच में प्रेम ही हर चीज का समाधान है और क्या प्रेम से सच में हर चीज का समाधान निकाला जा सकता है?

महाभारत में कृष्ण की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता,यहाँ कृष्ण की चर्चा मैं इसलिए कर रहा हूँ क्यूँकि कृष्ण को प्रेम के प्रतिक के रूम में देखा जाता है। अर्जुन का प्रेम ही था अपने भाइयों के लिए जिस कारन वो युद्ध नहीं करना चाह रहे थे,लेकिन कृष्ण के उपदेश के बाद ही उन्होंने शस्त्र उठाने का फैसला किया और फिर महाभारत का युद्ध हुआ। रामायण में रावण माता सीता का हरन कर के ले गया यह एक तरह का जबरन प्रेम दर्शाने का तरीका था। श्री राम द्वारा लंका जा कर रावण का संघार करना उनके अपने पत्नी के प्रति प्रेम को स्थापित करता है और अगर यह न हुआ होता तो रामायण भी नहीं होता। पुरे विश्व में अनगिनत फिल्में ऐसी बनती हैं जिसमे नायक अपने प्रेम को साबित करने के लिए कई तरह के परेशानियों को झेल कर निकलता है और अंततोगत्वा प्रेम की ही जीत होती है।

अभी लोकसभा चुनाव में नफरत की राजनीती के काफी चर्चे हैं, राहुल गाँधी जी द्वारा कई बार ऐसे वक्तव्य दिए गए हैं जिसमे उन्होंने कहा है की वो नरेंद्र मोदी जी से प्रेम करते हैं। राहुल गाँधी जी का प्रेम दिखाना जायज है लेकिन चुनाव प्रेम से नहीं लड़ के जीते जाते हैं। अगर प्रेम से ही चुनाव जीते जाते तो यह नहीं कहा जाता की कांग्रेस पार्टी चुनाव लड़ रही है बल्कि ये कहा जाता की कांग्रेस पार्टी प्रेम कर रही है,और यह काफी हास्यास्पद होता। वैसे जिस तरह के नारे कांग्रेस पार्टी द्वारा पिछले कई चुनाव में दिए गए हैं उस हिसाब से यह भी मुमकिन है की ये प्रेम का नारा भी किसी चुनाव में उपयोग में लाया जाये और कम से कम यह नारा एक सकारात्मक नारा होगा “चौकीदार चोर है” “विकाश पागल हो गया है” जैसा नकारात्मक नारा नहीं।

वैसे प्रेम की एक खासियत यह है की यह आपको कमजोर बना देता है, हो सकता है आप इस बात से तवज्जो न रखते हों लेकिन अगर आप प्रेम की तह में उतरेंगे तो आप समझेंगे की प्रेम आपको लाचार और कमजोर करता है।प्रेम आपको ऊर्जावान तो बनता है लेकिन दुनिया से लड़ने की ताकत या बगावत करने की हिम्मत तब आती है जब आप अपने किसी प्यारी चीज को खोने की कगार पर होते हो या खो चुके होते हो।मांझी की कहानी से आप जरूर अवगत होंगे की कैसे उसने पहाड़ को अकेले ही ध्वस्त कर दिया, जिस पहाड़ के कारन उसके पत्नी की मृत्यु हुई थी। उस पहाड़ को चीर देने की ताकत,रास्ता बनाने की हिम्म्मत तब नहीं आयी जब उसकी पत्नी जीवित थी, यह तब मुमकिन हुआ जब उन्होंने अपनी पत्नी को खो दिया।आज समाज में प्रेम विवाह का चलन बढ़ा है और समाज का वो तबका जो इसके सक्त खिलाफ हुआ करता था थोड़ा बहुत लचीला जरूर हुआ है। आप किसी भी प्रेमी युगल में बगावत को अगर देखेंगे, तो वह तब होता है जब एक दूसरे से बिछरने का डर उनके मन में घर कर जाता है न की तब जब वह प्रेम के मैदान में भविष्य का खेल खेलते रहते हैं। हालाँकि प्रेम के विफल होने की कहानियाँ हमारे समाज में ज्यादा है अपेक्षाकृत सफल होने की कहनियों से। असफलता का कारन भी प्रेम ही है,अगर प्रेम की ताकत इतनी न हो की समाज से लड़ सके या अपने अपनों के खिलाफ खड़ा हो सके तो इसका साफ़ मतलब है की आपका समाज या अपने परिवार के प्रति प्रेम ज्यादा है आपके खुद के प्रेम से और यह गलत भी नहीं है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और अगर आपको समाज में रहना है तो समाज के कायदे कानून को मानना चाहिए। बगावत करने की ताकत न होना आपकी कमजोरी को दर्शाता है और आप उस जंग के रस्ते से गुजरते ही नहीं हो तो सफलता मिलना तो नमुमकिन ही है।

प्रेम की ऊर्जा,प्रेम की ताकत आपको प्रेम के प्रति जागृत तो करती है लेकिन सफलता तक पहुंचने के लिए आपको लड़ना ही परता है। गाँधी की विचारधारा गलत नहीं है की एक गाल पे थप्पड़ परे तो दूसरा आगे कर दो लेकिन गाँधी की विचारधारा के साथ साथ सुभास चंद्र बोस का नारा “तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा” भी जरुरी है। अगर अहिंसा के धर्म से ही केवल आजादी मिलती तो भगत सिंह जैसे वीर सपूत इस देश में पैदा नहीं होते।किसी भी प्रेम को शाबित करने के लिए एक ऐसे पथ से गुजरना परता है जो जुंग-ए-मैदान से हो कर गुजरती है। आप प्रेम को जंग से अलग नहीं कर सकते, निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए आपको इस रास्ते से गुजरना ही पड़ेगा।प्रेम समाधान दो दे सकता है लेकिन जंग के बिना नहीं, फैसला आपको करना है की प्रेम में रहकर आप केवल कमजोर रहना चाहते हैं या जंग कर के हांसिल करना।

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