राफेल डील से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्य, जो आरोप लगाने के जुनून में नज़रअंदाज़ किए जा रहे हैं

जैसे-जैसे 2019 का आम चुनाव नज़दीक आ रहा है, राहुल गाँधी को लगता है कि ‘राफेल ङील’ ही वो रास्ता है जिस पर चलकर वो मोदी के खिलाफ कुछ हवा बना सकते हैं, यही वजह है कि आए दिन वो और उनकी पार्टी के सदस्य, राफेल सौदे को लेकर थोक के भाव आरोप लगाते रहते हैं। मीडिया भी राहुल गाँधी द्वारा कहे गए हर वाक्य को ‘सत्य’ मानकर उन आरोपों का प्रचार-प्रसार करती रहती है।

सबसे पहले यह जान लेना आवश्यक है कि ये ‘Offset Obligation’  क्या है, क्योंकि सारा चक्कर इसी Offset का है। दरअसल, फ़्रांस के साथ यह समझौता करने से पहले यह शर्त रखी गई थी कि इस डील से जो भी रकम Dassault कंपनी को प्राप्त होगी, उनमें से 50% राशि वह भारत में ही निवेश करेगी। इसी को Offset Obligation कहा गया है। इस आर्टिकल में बार-बार यही शब्द आपको पढ़ने को मिलेगा। इसी सन्दर्भ में यह आवश्यक हो जाता है कि राहुल गाँधी द्वारा लगाए गए आरोपों को तथ्यों की कसौटी पर तौला जाए-

क्या मोदी ने राफेल जेट को भारत में बनाए जाने के सौदे को HAL से छीनकर Reliance कंपनी को दिया है?

नहीं। यह आरोप पूरी तरह निराधार है, जिन 36 लड़ाकू जहाजों को भारत, फ़्रांस से खरीद रहा है, उन सभी एयरक्राफ्ट का 100% निर्माण फ़्रांस में किया जाएगा। एक भी एयरक्राफ्ट का निर्माण भारत में नहीं होना है। अतः इसके उत्पादन का ठेका HALसे छीनकर Reliance को देने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। हाँ, यदि भविष्य में भारत सरकार और अधिक राफेल जेट खरीदना चाहेगी तो उसका उत्पादन भारत में किया जा सकता है, लेकिन उसके लिए एक अलग से सौदा करना पड़ेगा, वर्तमान 36 एयरक्राफ्ट वाले सौदे से उसका कोई संबंध नहीं होगा।

क्या अनिल अंबानी ने 20 बिलियन डॉलर का कॉन्ट्रैक्ट हासिल किया है, जैसा कि आरोप लगाया जा रहा है?

नहीं। भारत, फ़्रांस को 36 लड़ाकू विमानों के लिए 8.9 बिलियन अमेरिकी डॉलर का भुगतान करेगा। जैसा कि भारत सरकार ने सौदे में ही Offset नियम जोड़ दिया था, अतः Dassault कंपनी को 50% राशि वापस भारत में निवेश करनी होगी। राहुल गाँधी ने आरोप लगाया था कि Reliance को इस डील से 4 बिलियन अमेरिकी डॉलर का फायदा होगा, जो हास्यास्पद है, क्योंकि यह राशि पूरे डील की लगभग आधी बैठती है। यानि कि राहुल गाँधी का कहना था कि Offset नियम के तहत जो भी पैसा आएगा, वो अकेले Reliance के पास चला जाएगा। उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि “Rafale lifecycle Contract” के तहत Reliance को 16 बिलियन अमेरिकी डॉलर अलग से प्राप्त होंगे, जबकि इस नाम का कोई ‘डील’ ना ही किसी ने साइन किया है और ना ही इसका कोई अस्तित्व है।

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अरुण जेटली के शब्दों में कहें तो यह ‘मसखरे राजकुमार’ के दिमाग की उपज है। 4 बिलियन डॉलर और 20 बिलियन डॉलर की दोनों राशि फ़र्ज़ी हैं, और ना ही Reliance को Offset निवेश की पूरी रकम मिलने वाली है।

क्या Reliance भारत में Dassault कंपनी की एकमात्र पार्टनर है?

नहीं। Offset बाध्यता के तहत निवेश प्राप्त करने वाली Reliance एकमात्र कंपनी नहीं है। Dassault ने लगभग 72 ऐसी कंपनियों से करार किया है जो उन्हें विभिन्न कलपुर्जे और सर्विसेज निर्यात करेंगे। उनमे से एक कंपनी है Dassault Reliance Aerospace. इनके अलावा L&T, महिंद्रा ग्रुप, कल्याणी ग्रुप, गोदरेज और टाटा ग्रुप के साथ Dassault ने करार किया है। Offset नियमों के तहत Dassault कंपनी अपने लिए पार्टनर चुनने के लिए स्वतंत्र है। साथ ही यह भी आवश्यक नहीं है कि ये भारतीय कंपनियां सिर्फ राफेल सौदे पर ही काम करें, वे Dassault कंपनी के लिए दूसरे प्रोजेक्ट पर भी काम कर सकती हैं।

Dassault अभी भी कई अन्य कंपनियों से बातचीत कर रहा है। लड़ाकू जहाज बनाना बहुत ही पेचीदा होता है, जिसके लिए हज़ारों तरह के कलपुर्जों की आवश्यकता होती है, यह कलपुर्जे अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग कंपनियों द्वारा बनाये जाते हैं। Dassault जैसी कंपनियाँ इन कलपुर्जों को दुनिया भर से आयात करती हैं और अपने मुख्य फैक्ट्री में Assemble करती हैं। राफेल सौदे में Offset बाध्यता जोड़ने का उद्देश्य ही यही था कि भारत में निवेश वापस आए, जिससे नए रोजगार का सृजन हो और देश की अर्थव्यवस्था को बल मिले।

इस सूची में एक कंपनी ऐसी है जिसका उल्लेख करना आवश्यक है, वो है Snecma HAL Aerospace Ltd जो HAL (भारत) और Snecma (फ़्रांस) का संयुक्त उपक्रम है। यह संयुक्त उपक्रम राफेल जेट के Snecma M88 इंजन के लिए कुछ पुर्जों का निर्माण करेगी। अतः यह कहना कि ‘HAL’ इस पूरे डील से गायब है, सरासर झूठ है। राफेल जेट का निर्माण फ़्रांस में होना है, जेट के कुछ कलपुर्जे भारतीय कंपनियाँ सप्लाई करेंगी और उन कंपनियों की लिस्ट में ‘HAL’ भी शामिल है।

एयरक्राफ्ट बनाने के लिए अनुभव नहीं होने के बावजूद आखिर Reliance को क्यों चुना गया?

Reliance कंपनी का एक अंग ‘Reliance Defence’ है, जो Reliance ग्रुप द्वारा Pipavav Shipyard को खरीदने के बाद अस्तित्व में आई थी। Pipavav कंपनी पहले से ही भारतीय नौसेना के लिए जंगी जहाज और युद्धपोत बनाने का काम कर रही थी। इसका मतलब यह हुआ कि इस कंपनी को इस क्षेत्र में काम करने का अनुभव पहले से था। साथ ही भारत के रक्षा क्षेत्र में निजी साझेदारों को शामिल करने की मंजूरी अभी-अभी प्राप्त हुई है। यही वजह है कि देश में ऐसी बहुत कम कंपनियां हैं जो इस क्षेत्र में थोड़ा बहुत अनुभव रखती हैं। यह भारतीय कंपनियाँ भी कुछ विशेष उपकरण ही बना पाती हैं, पूरा प्रोडक्ट बनाने की क्षमता अभी इनके पास नहीं है।

उल्लेखनीय है कि UPA के कार्यकाल में जब MMRCA के लिए बोली लगाईं गई थी, तब भी Dassault कंपनी ने इसी Reliance कंपनी को अपना पॉर्टनर बनाया था, जो उस समय एक नयी-नवेली कंपनी थी और उनको ख़ास अनुभव भी नहीं था।

..तो फिर Reliance का इस डील से क्या संबंध है?

जैसा कि हमने पहले भी बताया है कि राफेल जेट भारत में नहीं बन रहे हैं, इसका मतलब यह हुआ कि Reliance उसे नहीं बना रहा है। यहाँ तक कि Reliance राफेल जेट के छोटे-मोटे कलपुर्जे (Parts) भी नहीं बना रहा है। जबकि सरकारी क्षेत्र की कंपनी HAL और कुछ अन्य कंपनियाँ राफेल के पार्ट्स बना रही हैं। Reliance कंपनी Dassault Aviation के Falcon 2000 जेट के लिए कुछ पार्ट्स बनाएगी जो एक सिविल जेट प्लेन है। Reliance कंपनी अब Dassault Aviation के निर्यातकों की लिस्ट में शामिल हो गया है, बल्कि इसने काम भी शुरू कर दिया है और कुछ पार्ट्स फ़्रांस भेजने भी शुरू कर दिए हैं।

राफेल जेट की खरीद प्रक्रिया में शामिल किये गए Offset बाध्यता के तहत, Dassault कंपनी इस संयुक्त उपक्रम में 100 मिलियन यूरो निवेश करने वाली है। यानि कि कुल Offset मूल्य का सिर्फ 3% रिलायंस कंपनी में निवेश के रूप में वापस आएगा। अतः Reliance को 20 बिलियन अमेरिकी डॉलर नहीं मिलने वाला जैसा कि राहुल गाँधी आरोप लगा रहे हैं। निवेश की गई राशि को यूरो से डॉलर में कन्वर्ट करने पर लगभग ‘120 मिलियन’ अमेरिकी डॉलर होते हैं। अतः 20 बिलियन अमेरिकी डॉलर एक मनगढंत राशि है।

फ़्रांस के पूर्व राष्ट्रपति होलांद का क्या आरोप था?

दरअसल उन्होंने कुछ भी आरोप नहीं लगाया था। सबसे पहले एक फ्रेंच मैग्ज़ीन ने राष्ट्रपति होलांद के हवाले से कहा कि भारत सरकार ने Reliance को पार्टनर बनाने की सिफारिश की है। उनके इस बयान के बाद फ़्रांस की वर्तमान सरकार और Dassault कंपनी ने बयान जारी किया। फ्रेंच सरकार ने अपने बयान में कहा कि Dassault और Reliance के बीच हुए समझौतों से फ्रेंच सरकार का कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि ये दोनों एक प्राइवेट फर्म हैं। वहीँ Dassault कंपनी ने अपने बयान में कहा कि उन्होंने Reliance को अपनी शर्तों पर पार्टनर चुना है, इसके लिए किसी ने उन पर कोई दबाव नहीं डाला है। बाद में पूर्व फ्रेंच राष्ट्रपति ने भी माना कि इस तरह के किसी दबाव की उन्हें जानकारी नहीं है।

यह सच है कि अनिल अंबानी को पार्ट्स बनाने के कॉन्ट्रैक्ट हासिल हुए हैं, लेकिन वे कॉन्ट्रैक्ट नागरिक विमानों के कलपुर्जे बनाने के हैं, ना कि राफेल जेट के, जिन्हें भारत सरकार खरीद रही है।

The article was originally published in English.

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