Thursday, July 25, 2024
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Emergency Special: इन्दिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद से अपदस्थ कराने वाली दो शख्सियतें जिन्हें इन्दिरा भुला नहीं सकी

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आज का दिन भारतीय लोकतंत्र का ‘काला अध्याय’ के रूप में याद किया जाता है। इसकी शुरुआत 12 जून 1975 को हुई जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकील जगमोहन लाल सिन्हा ने प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी को उनके पद से अपदस्थ कर दिया। ताज्जुब की बात है जहां कभी कमरा नंबर 15 में इंदिरा के पिता पंडित जवाहर लाल नेहरू और उनके दादा मोतीलाल नेहरू अपनी वकालत किया करते थे‌ उसी कमरे में जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा की अदालत लगी, यही वो वकील थे जिनकी तुलना वाटरगेट कांड के न्यायाधीश सिरिका से की गई। इसके बाद इन्दिरा गांधी का एक रिश्ता बरेली से हमेशा-हमेशा के लिए जुड़ गया। एक समय ऐसा भी आया जब इन्दिरा के घोर प्रतिद्वंद्वी रहे हनुमान को उन्हीं की पार्टी ने अंगूठा दिखाया। किसे कहा जाता था हनुमान? कौन थे जस्टिस सिन्हा? इन्दिरा का बरेली से क्या था कनेक्शन? क्या थी पूरी कहानी? पढ़िए..

वर्ष था 1975। प्रयागराज जिसे गंगा और यमुना नदियों के संगम के स्थान के रूप में जाना जाता है वो अब प्रतिद्वंद्वी सियासत का सबब बनने जा रहा था।मामला मार्च 1971 में हुए आम चुनावों में कांग्रेस पार्टी को जबरदस्त मिली जीत को लेकर था।भारत की आजादी के बाद से, सत्तारूढ़ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस रायबरेली से कभी चुनाव नहीं हारी थी। इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी ने 1951-52 में भारत के पहले चुनाव में वह सीट जीती थी, और उन्होंने पांच साल बाद अपने प्रदर्शन को दोहराया था।अब इंदिरा की बारी थी कि वे इस निर्वाचन क्षेत्र पर एक बार फिर से अपनी दावेदारी पेश करें। वहीं राजनारायण के व्यक्तित्व के बावजूद यह उनके लिए अच्छा मौका था। यदि राजनारायण चुनाव जीतते तो यह सम्भव था कि गांधी परिवार अपने दामन प्रिय निर्वाचन क्षेत्र को हमेशा के लिए खो बैठता। लेकिन चुनाव में राज नारायण हार गए, उन्हें कुल मतों का केवल एक चौथाई हिस्सा हासिल हुआ, इंदिरा गांधी ने उन्हें दो-तिहाई मतों के साथ पछाड़ दिया।राजनीतिक नुकसान से निराश होकर, राज नारायण ने ट्रैक बदल दिया, और लड़ाई को कानूनी क्षेत्र में स्थानांतरित करने का फैसला किया। उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की, जिसमें मौजूदा प्रधानमंत्री द्वारा चुनावी गड़बड़ी का आरोप लगाया गया था। बाद में यह मुकदमा ‘इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण’ के नाम से चर्चित हुआ।गौरतलब बात है इंदिरा गांधी तब एक किंवदंती से अधिक थीं, उन्होंने कांग्रेस में अपने वरिष्ठों को दिखाया कि वह “गूंगी गुड़िया” नहीं थीं और ना ही उनकी “पेटीकोट सरकार” थी।

जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा की एंट्री

मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में पहुंचा। जगमोहन लाल सिन्हा साल 1970 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश नियुक्त हुए थे। राजनारायण की ओर से इस केस की पैरवी करने वाले मशहूर वकील शांति भूषण लिखते हैं, “इंदिरा गांधी को कोर्ट रूम में बुलाने से पहले उन्होंने भरी अदालत में ऐलान किया कि अदालत की परंपरा है कि लोग तभी खड़े हों जब जज अदालत के अंदर घुसे इसलिए जब कोई गवाह अदालत में घुसे तो वहां मौजूद लोगों को खड़ा नहीं होना चाहिए” जब श्रीमती गांधी ने प्रवेश किया, तो उनके अपने वरिष्ठ वकील एस.सी. खरे के अलावा कोई नहीं उठा, जो केवल आधे ही उठे थे। बेशक, न्यायमूर्ति सिन्हा ने श्रीमती गांधी को एक आरामदायक कुर्सी की पेशकश की ताकि वह बैठ सकें और अपना सबूत पेश कर सकें।

जहां बाप-दादा ने की थी वकालत वहीं इन्दिरा को मिली सज़ा

ताज्जुब की बात है जहां कभी कमरा नंबर 15 में इंदिरा के पिता पंडित जवाहर लाल नेहरू और उनके दादा मोतीलाल नेहरू अपनी वकालत किया करते थे‌ उसी कमरे में जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा की अदालत लगी। कांग्रेस प्रतिनिधित्व घबराया हुआ था।पत्रकार कुलदीप नैय्यर ने अपनी किताब इमरजेंसी रीटोल्ड में इसका जिक्र किया कि “कैसे एक कांग्रेसी सांसद को 5 लाख रुपए के साथ इलाहाबाद भेजा गया लेकिन दाल नहीं गली।” प्रधानमंत्री के एक निजी डॉक्टर थे केपी माथुर, जिनके जस्टिस डीएस माथुर से अच्छे संबंध थे। वह सन् 1975 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश थे। न्यायमूर्ति माथुर उच्च न्यायालय के जस्टिस बनने से पहले भारतीय सिविल सेवा से संबंधित थे। कई आईसीएस न्यायाधीश केवल अन्य आईसीएस न्यायाधीशों के साथ मुलाकात की शर्तों पर थे। जस्टिस माथुर इससे पहले कभी जस्टिस सिन्हा के घर नहीं गए थे। उन्होंने जस्टिस सिन्हा को सुप्रीम कोर्ट का न्यायधीश बनाने का प्रलोभन दिया लेकिन जस्टिस सिन्हा उनके इस प्रलोभन में नहीं आए और इन्दिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया। जस्टिस सिन्हा सर्वोच्च सत्यनिष्ठा, वस्तुनिष्ठता, योग्यता और न्यायिक शुद्धता वाले न्यायाधीश थे। उन्होंने न केवल भ्रष्ट आचरण के आधार पर श्रीमती गांधी के चुनाव को रद्द कर दिया था, बल्कि उन्हें छह साल के लिए अयोग्य भी घोषित कर दिया था।

इन्दिरा का एक रिश्ता बरेली से भी जुड़ा

12 जून 1975 को जस्टिस सिन्हा के साथ-साथ इन्दिरा गांधी का एक रिश्ता बरेली से भी जुड़ गया।इंदिरा को प्रधानमंत्री पद से बेदखल करने वाले जज बरेली के ही थे। उन दिनों बरेली के सुर्खियों में आने की अहम वजह इलाहाबाद हाईकोर्ट में जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा बनें। बरेली के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार निर्भय सक्सेना लिखते हैं, यही वो जज थे जिन्होंने कांग्रेस सरकार की लाख कोशिशों पर पानी फेर दिया था। राजनीति का चक्र तेजी से बदला और आपातकाल को देश पर थोपा गया। जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा, जिन्होंने दुर्जेय निर्णय दिया इनका रिश्ता झुमका शहर बरेली से ऐतिहासिक तौर पर हमेशा-हमेशा के लिए जुड़ा गया। उन्होंने बरेली कॉलेज में पढ़ाई की थी। कानून में बेहतर स्कूली शिक्षा प्राप्त की। वहीं उन्होंने 1943 से 1955 तक बरेली में कानून की प्रैक्टिस भी की। बरेली के ही कवि कन्हैया लाल बाजपेयी जी की इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा के दिए गए निर्णय के बाद लिखी कविता उन दिनों चाय घाट ‘फाइव स्टार’ पर बहुत सुनी जाती थी। वह थी … ‘बरुआ भैया कुछ तो जुगत बताओ, जा राजनारायण को जल्दी ही जेल भिजवायो’।

जब हनुमान को उन्हीं की पार्टी ने दिखाया अंगूठा

एक जमाने में राज नारायण खुद को हनुमान कहते थे। यह 29 मार्च 1979 का दौर था जब जनता पार्टी के 150 से अधिक सांसदों ने जन्मदिन विरोधी गतिविधियों के लिए पूर्व स्वास्थ्य मंत्री राज नारायण को जन्मदिन समारोह से निष्कासन की चिंता जताते हुए अपने हस्ताक्षर के साथ एक ज्ञापन का आयोजन किया और 2 अप्रैल को बर्थडे पार्टी से राजनारायण को निष्कासित कर दिया गया। यह वही राजनारायण थे जिन्होंने 1977 के चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को हराया था। इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनकी याचिका पर रायबरेली से इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध करार दिया था, हालांकि बाद में राजनारायण के समर्थकों ने कहा कि उन्होंने खुद जनता पार्टी छोड़ दी है। जन्मदिन समारोह से राजनारायण के निष्कासन के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई पर यह दबाव था कि राजनारायण को वापस ले लिया जाए, लेकिन उन्होंने साफ इन्कार कर दिया। उनकी जगह रवि राय को स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया।

राजनारायण में लोकतंत्र की तस्वीर देखते थे लोहिया

राजनारायण समाजवादी प्रमुख राम मनोहर लोहिया के निकट रहे। एक बार परिवार के सदस्यों में खटास आ गई। राजनारायण ने अनोखे तरीके से इसको दूर किया। राजनारायण 1962 के विधानसभा चुनाव में हार गए थे। गौरतलब है कि 1952 से वे पहली बार बैठक से बाहर हुए। यह स्थिति 5 साल तक बनी रही। ऐसे में लोहिया की इच्छा के विपरीत भी उन्होंने 1962 में राज्यसभा का चुनाव लड़ा, और जीत भी गए। लोहिया को यह पसंद नहीं था, उनका मानना था कि राजनारायण ने सिद्धांतों के खिलाफ गए हैं। इसलिए उन्होंने राजनारायण से बात करना बंद कर दिया। अब घर-बार आना भी अब बंद हो चुका था। राजनारायण ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की, लेकिन लोहिया अब पीछे नहीं हटे। लोहिया को मनाने के लिए राजनारायण ने खास तरीका निकाला। अगले कुछ महीनों तक वे राज्यसभा से निकलने के बाद गेट पर धरने पर बैठ जाते थे, जहां से लोहिया जी वापस लौटते थे। जब उन्होंने ऐसा करना जारी रखा, तो लोहिया जी को झुकना पड़ा।

वाटरगेट कांड के न्यायाधीश सिरिका से की गई जस्टिस सिन्हा की तुलना

मशहूर वकील शांति भूषण के पुत्र प्रशांत भूषण की किताब “द केस दैट शुक इंडिया” की भूमिका लिखते हुए न्यायमूर्ति हिदायतुल्ला ने जस्टिस सिन्हा की तुलना वाटरगेट मामले के न्यायाधीश सिरिका से की, जो राष्ट्रपति निक्सन के पतन के लिए जिम्मेदार थे। वहीं शांति भूषण लिखते हैं, श्रीमती गांधी के मामले में जस्टिस सिन्हा का फैसला 12 जून, 1975 को सुनाया गया था। मैं वहां के उच्च न्यायालय में बैक बे रिक्लेमेशन केस के लिए बॉम्बे में था। 11 जून को, जब खबरें आईं कि फैसला 12 जून को सुनाया जाना है, तो मैं बंबई में मोरारजी देसाई से मिलने गया और उन्होंने मुझसे पूछा कि मेरे विचार से श्रीमती गांधी के खिलाफ याचिका में सफलता की क्या संभावना है? मैनें उत्तर दिया कि न्यायाधीश एक बहुत ही सक्षम न्यायाधीश थे और पांच सप्ताह की बहस के दौरान उन्होंने हर पोइंट को अच्छी तरह से समझ लिया था। आमतौर पर मुझे लगता था कि हमारी जीत निश्चित है, लेकिन इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी मौजूदा प्रधानमंत्री के भाग्य का फैसला केवल उच्च न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा किया जा रहा है और यह कहना मुश्किल था कि न्यायाधीश का साहस किस हद तक था।

कर्तव्यनिष्ठ न्यायधीश थे जस्टिस सिन्हा

जस्टिस सिन्हा के निधन पर शांति भूषण ने लिखा -“जस्टिस सिन्हा एक ज्यादा महत्वाकांक्षी व्यक्ति बिल्कुल नहीं थे और एक कर्तव्यनिष्ठ, सक्षम और बुद्धिमान न्यायाधीश के रूप में माने जाने से संतुष्ट थे जो एक अच्छे इंसान भी थे। जस्टिस सिन्हा का जीवन हम सभी के लिए एक सबक है। महानता धन इकट्ठा करने, या उच्च पदों के लिए ललकारने से प्राप्त नहीं होती है, बल्कि एक व्यक्ति के ईमानदारी और निष्पक्षता के साथ काम करने की लगन से होती है। जस्टिस सिन्हा के निधन से देश ने अपना एक बेहतरीन जज खो दिया है जो अमर हो गया है।”

(लेखक- प्रत्यक्ष मिश्रा स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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