Tuesday, April 20, 2021
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दिल्ली दंगों को हिन्दू आतंकवाद की झूठी कहानी बनाने में विफल रहे अर्बन नक्सली और इस्लामी कट्टरपंथी समूह

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Rakesh Kumar Pandeyhttp://rakesh-thoughts.blogspot.com
Associate Professor in Physics at Kirori Mal College since 1990. Activist associated with NDTF functioning in Delhi University. Ex-President of NDTF.

उदारवादी-वामपंथी कहे जाने वाले अर्बन नक्सली और इस्लामिक कट्टरपंथियों का गठजोड़ वैसे तो बहुत पुराना है मगर वर्तमान परिस्थितियों ने इन्हें और भी इकठ्ठा कर दिया है। केरल के महामहिम राज्यपाल और विद्वान श्री आरिफ मोहम्मद खान साहब अक्सर कहते हैं कि उन्होंने आज़ादी से पहले पाकिस्तान की मांग करने वाले कई इस्लामी कट्टरपंथियों को रातो रात आज़ादी के बाद उदारवादी-वामपंथी बनते हुए देखा है। हिन्दुस्तान का बंटवारा करने के बाद पूरे भारत को पाकिस्तान बनाने वाली सोच रखने वाले इस्लामी कट्टरपंथियों ने भी उदारवादी वामपंथियों का झूठा चोला पहन लिया। इन्हीं कट्टरपंथियों की सोच से जन्मा सेक्युलरिज्म का षडयंत्र भारत के देशवासियों को ही अपनी जड़ों से उखाड़ कर इस्लामी कट्टरपंथी सोच के लिए सहुनुभूति जगाने का काम करने लगा। ये लॉबी अकादमिक जगत में इतिहास लेखन के नाम पर झूठ परोसने का काम करता रहा, फिल्मों में इसी पॉलिसी के तहत आतंकियों का मानवीयकरण और हिन्दू धर्मावलंबियों का आतंकी करण होता रहा। और ऐसे कामों के लिए इन्हें विदेशों से कभी तो एनजीओ तो कभी हवाला के माध्यम से फंडिंग भी मिलती रही।


राम मंदिर आंदोलन के साथ सेक्युलरिज्म के नाम पर साम्प्रदायिकता का ज़हर फैलाने के विरोध में एक मुहिम शुरू हुआ। इस मुहिम को अप्रत्याशित सफलता मिलनी शुरू हुई और देखते ही देखते अटल जी के नेतृत्व में केंद्र में एनडीए सरकार बन गई। हिंदू जागरण के इस नए अध्याय से आहत पाकिस्तान परस्त इस्लामी कट्टरपंथी और उन्हीं के उदारवादी वाम समूह ने भगवा आतंकवाद का खयाली हौवा बनाने का प्रपंच चलाया। उस समय हुए गोधरा काण्ड के फलस्वरूप फैले गुजरात दंगों को इन्होंने हाथो हाथ इसी मंशा से लपक लिया।

गोधरा काण्ड की पूरी तरह से अनदेखी करके गुजरात दंगों को इन्होंने उल्टा राष्ट्रवादी ताकतों द्वारा ही रचित एक साजिश के रूप में स्थापित करने की कोशिश की। आज भी गुजरात दंगों को 800 मुसलमानों और 250 हिन्दुओं की पीड़ादायक हत्या की जगह एक खयाली आंकड़ा बनाकर 2000 मुसलमानों की हत्या के नाम से जाना जाता है। आज भी हमारे याददाश्त से 40 महिलाएं और बच्चों के साथ साथ 60 तीर्थयात्रियों के ज़िंदा जला डालने के आंकड़ों को नकारकर यही लॉबी इन दंगों को प्रिंट और विज़ुअल मीडिया में पूरी तरह से एक भगवा आतंकवाद का नमूना बनाकर पेश करती रही है। सारे रिपोर्ट्स और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला इनके खिलाफ आने के बावजूद इन लोगों ने गुजरात दंगों को बीजेपी के द्वारा एक प्रायोजित भगवा हिंसा के रूप में स्थापित करने में सफलता हासिल कर लिया।

इसी सफलता को दोहराने का षडयंत्र इस बार फिर दिल्ली में इन्हीं शक्तियों के द्वारा किया गया। गुजरात दंगों के तौर पर पहले इन शक्तियों ने हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा करके दंगा करने की शुरुआत की। और उसी प्लान के तहत बाद में भड़के हिंसा में सिर्फ एकतरफा रिपोर्ट करके सरकार को घेरने का फिर से षडयंत्र रचा। दिल्ली हिंसा की शुरुआत में ही 24 फरवरी को दिल्ली पुलिस की एक पेट्रोलिंग टुकड़ी पर गोधरा अंदाज़ में ही उन पुलिस वालों के मुकाबले कई गुना ज़्यादा लोगों ने चारों तरफ से घेर कर जानलेवा हमला कर दिया।

उनके हिंसक घेरे में फंस चुकी पुलिस की टुकड़ी में डीसीपी अमित शर्मा, एसीपी अनुज कुमार को बुरी तरह से जख्मी किया गया, हेड कांस्टेबल रतनलाल की तो गोली मारकर निर्मम हत्या ही कर दी और उनके कई साथियों को भी बहुत ही बुरी तरह से जख्मी कर दिया गया। इसके बाद की कई हत्याएं, दंगाई हत्या की जगह सोची समझी और निर्ममता से अंजाम दी गई कई हत्याएं हुईं जिसमें अंकित शर्मा की हत्या ने तो अमानवीयता की सारी हदें ही पार कर दीं। मगर अपनी पुरानी गुजराती सफलता के मद में अंधे अर्बन नक्सली और इस्लामी कट्टरपंथी ताकतों ने भड़काने वाली निर्मम हत्याओं की जगह उसके फलस्वरूप भड़के हुए दंगों को अपने फ्रेम में डाल कर सिर्फ और सिर्फ उन्हीं की चर्चाओं से शुरुआती साजिशी हत्याओं को भुलाने की कोशिश में लग गए।

मगर इस बार उन्हें सफलता हासिल नहीं हुई। एक तो सरकार की चुस्ती से दंगा भड़कने के कुछ ही घंटों में दंगों पार काबू पा लिया गया। गुजरात की तरह इन शक्तियों को 800 मुसलमानों का 2000 और 240 हिन्दुओं का शून्य बनाने का मौका नहीं मिला। आज दिल्ली दंगों को लोग हिन्दू विरोधी दंगों के नाम से जानते हैं। शाहीन बाग और उसके उसके जैसे कुछ और बागों में जो हिन्दू विरोधी ज़हर फैलाने का काम चल रहा था उसका पूरा प्रपंच देश के सामने नंगा हो गया। अब खिसियानी बिल्ली की तरह एक प्रकाशन पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके इन्होंने जिस सच को विश्व के सामने लाने से रोकने की कोशिश की, वो सच अब इनके सर के ऊपर चढ़कर बोलेगा ऐसा इन्होंने खुद ही सुनिश्चित कर दिया है। अर्बन नक्सलियों और इस्लामी कट्टरपंथियों के द्वारा गुजरात में किए गए प्रयोग की सफलता इन्हें गुजरात में भले ही ना मिली मगर उसकी सफलता उन्हें गुजरात से बाहर और दूसरे बाहरी देशों में ज़रूर मिली थी मगर इस बार इनका दिल्ली प्रयोग उस लिहाज से भी पूरी तरह उल्टा पड़ गया। कसाब की तरह हिन्दू आतंकवाद की कहानी बनाने की कोशिश में खुद ही पकड़ लिए गए और देश के सामने नंगे हो गए।

सच को सामने लाने के लिए सुश्री सोनाली चितलकर, सुश्री प्रेरणा मल्होत्रा और एडवोकेट मोनिका अरोरा का हृदय से आभार। आइए हम सभी दिल्ली रायट्स 2020 – द अनटोल्ड स्टोरी पढ़ कर सच को पूरी तरह से जाने और समझें।

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