Tuesday, June 22, 2021
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सदाशिव भगवान शिव श्री “गुरू गोरखनाथ” महिमा एवं “गोरख-धंधा” शब्द अनुचित

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जैसा कि आपको भी विदित होगा आजकल प्रिन्ट मीडिया “गोरख-धंधा” शब्द का प्रयोग धडल्ले से बिना भगवान शिव के महायोगी स्वरूप को जाने हर अवैध व अनैतिक कार्य के संबंध में कर रहा है। इसी के प्रत्युत्तर में कुछ जानकारी दे रहा हूं आशा है आपका न्यूज पोर्टल / प्रकाशन करोड़ों जनमानस को इस और भी ध्यान दिलाएगा ताकि भगवान शिव की गरिमा का अपमान भी न हों एवम भक्तों की धार्मिक भावनाओं को ठेस भी न पहुंचे! 

अनैतिक कार्यों के लिए गोरख-धंधा शब्द का प्रयोग भगवान शिव के महायोगी स्वरुप गुरु गोरखनाथ का अपमान।

गोरखधंधा शब्द सर्वथा अनुचित क्यों है: यह जानने के लिये आप को श्री भगवान गुरू गोरक्षनाथ कौन है ये समझना महत्वपूर्ण है। 

कौन है भगवान गुरू गोरक्षनाथ  अनन्त कोटि ब्रह्मांड नायक भगवान सदाशिव अर्थात भगवान शिव गुरू स्वरुप में गुरु गोरक्षनाथ के नाम से जाने जाते हैं। आप उन्हे भगवान शिव के योग स्वरुप भी कह सकते हैं। गुरू गोरक्षनाथ कोई अवतार नही हैं, वह तो भगवान शिव ही हैं। देवाधिदेव महादेव का स्वरूप हो या भक्तों के दुःख हरने वालेे “भोलेनाथ” का या गुरू स्र्वरुप में योग ज्ञान की शिक्षा देकर परमात्मा से एकाकार होने वालेे “गुरू गोरक्षनाथ”का। यह तो शिव ही हैं और रहेंगेे। वह तो हर युग में धरती पर ही रहते हैं और युगो युगों मैं किसी के गुरू भी बनते है और योग ज्ञान की दीक्षा भी देते हैं। आज श्री गुरू गोरक्षनाथ गुरू गोरखनाथ के नाम से अधिक प्रचलित हैं।


 “गौ-रक्ष” या “गोरख” जिसका अर्थ है “गौमाता के रक्षक”। या धर्म के रक्षक। हिन्दू पुराणों में “गौ” को 33 कोटि का निवास माना गया है। संक्षेप में” “गुरु स्वरुप” महायोगी भगवान शिव “गुरू गोरक्षनाथ” जी के रुप में 33 कोटि देवी-देवताओं की रक्षा करते हैं। यह ऐसे है जैसे वट वृक्ष पर पत्ते तो अनेक है पर उनका संरक्षण व पालन जड़ में स्थित प्राण ऊर्जा से किया जा रहा हो। इन पत्तों की सजीवता व सुंदरता तो केवल वट वृक्ष के जड़ की प्राण ऊर्जा के क्रिया शील होने से ही संभव है। कहने की आवश्यकता नहीं इस जगत की उत्पत्ति पालन पोषण व संचालन इसी महाप्राण ऊर्जा से ही संचालित है। 

हिन्दू पुराणों में वर्णन आता है जब भगवान शिव महायोगी गुरू स्वरुप में माता पार्वती को सरोवर के किनारे योग की शिक्षा दे रहे थे तब सरोवर मैं मछलि के गर्भ मैं जो बालक पाल रहा था उसने वह सारा योग ज्ञान सीख लिया। अब यह ब्रह्म ज्ञान जानकर वह बालक ब्रह्म ज्ञानी बन चुका था। भगवान शिव को अपनी त्रिकाल दृष्टि से समझ आया कि मछलि के गर्भ मैं जो बालक है वह ब्रह्म ज्ञानी बन गया है। जब वह बालक जन्म लेता है तो भगवान शिव उसे अपना शिष्य बना लेते हैं। वही बालक आगे चलकर गुरू मछिंदरनाथ के नाम से जाना जाता है। यह सब भगवान शिव की लीला ही है। भगवान शिव गुरू मछिंदरनाथ को आदेश देते हैं कि जो योग ज्ञान उनके पास है।

वो समस्त संसार मैं बँटे ताकि जगत के समस्त मनुष््यगण जनम मरण के बंधनों से छूटकर मुक्ति का मार्ग पा सकें। जब गुरू मछिंदरनाथ संसार में गये तो बहुत पाप देखा। स्वार्थ, ई, लालच के वशीभूूूत मनुष््य बुरे कर््म करते पाया। इसीलिए गुरू मछििंदरना थ भगवान शिव को पुकारते है कि ऐसे मार्ग पर चलते हुए प्राणी मात्र को किस प्रकार सदमार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करें। तब भगवान शिव ने अपने शिष्य के लिये स्वयं पृथ्वी पर जाने का निर्णय किया। इधर जब गुरू मछिंदरनाथ एक गाँव मे भ्रमण कर रहे थे तब एक स्त्री संतान प्राप्ति की इच्छा से उनसे मिलती है। गुरू मछिंदरनाथ उसे विभूति देते हैं और पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद भी देते हैं।

जब वह स्त्री घर पर जाकर अपने पति को सब बतलाती है तो उसके पति कहते है ऐसे बाबाओं पर भरोसा मत करो और वह स्त्री विभूति को गोशाला में फेंक देती है। 12 वर्ष पश्चात जब गुरू मछिंदरनाथ उसी गाँव मे आते हैं तो वही स्त्री उनसे मिलने आती है। जब वह उस स्त्री से पुत्र के बारे मैं पूछते हैं। “माई पुत्र कैसा है” तो वह स्त्री सब बतला देती है।तब गुरू मछिंदरनाथ जी उस स्त्री को गोशाला ले जाने के लिये कहते हैैं जहां दंपति ने विभूति अविश्वास पूर्वक फेंक दी थी।  

गुरू मछिंदरनाथ फ़िर उसी स्थान पर पहुंच कर आवाज़ लगाते हैं! अलख निरंजन! और वहाँ से आवाज आती है “आदेश गुरू का”
गुरू मछिंदरनाथ पुनः आवाज़ लगाते हैं !!! अलख निरंजन!!! फिर वही आवाज़ आती है “आदेश गुरू का” 
गुरू मछिंदरनाथ पुनः आवाज़ लगाते हैं !!! अलख निरंजन!!! फिर वही आवाज़ आती है “आदेश गुरू का”

और अबकी बार एक 12 वर्ष का बालक प्रकट होता है। यह सब देख कर स्त्री पश्चातापपूर्वक रोने लगती है और कहने लगती है मेरा बालक मुझे दे दीजिए। गुरू मछिंदरनाथ उसे कहते हैं माई! जब इसने तुम्हारे गर्भ से जन्म ही नही लिया तो तुम्हारा पुत्र कैसा! यह तो अजन्मा है। यह तो स्वयं भगवान शिव ही हैं जो मेरे लिये और योग ज्ञान के लिये इस धरती पर प्रकट हुए हैं। अब क्योकि यह गौशाला मैं प्रकट हुए इसीलिए इस बालक का नाम गोरक्षनाथ रखता हूँ! जिस स्थान पर सदाशिव भगवान श्री गुरू गोरक्षनाथजी प्रकट हुए उसे आज हम गोरखपुर के नाम से जाना जाता है!

यह गुरू गोरक्षनाथजी ही है जिन्होने नाथ पंथ का सबसे ज्यादा प्रचार किया और नवनाथों में इनका सर्वोच्च स्थान है। लोगों की यह मान्यता है कि गुरू गोरक्षनाथजी ग्यारहवी शताब्दी के योगी हैं यह सर्वथा गलत है क्योंकि राजा भर्तहरी पहली सदी के उज्जयनी नगरी के राजा थे और उनके गुरू, श्री गुरू गोरक्षनाथ जी ही थे। अगर आज से 5100 वर्ष पहले द्वापर युग की बात करें तो भगवान श्रीकृष्ण द्वारा रचित “श्री गोरक्ष स्तवन” की स्तुति व उल्लेख “कल्पद्रुम तन्त्र” में भी मिलता है। यहाँ तक की स्कन्द पुराण, ब्रह्म पुराण और शिव पुराण मैं भी भगवान शिव के गुरू स्वरूप श्री गुरु गोरक्षनाथजी का उल्लेख मिलता है। यह सत्यापित करता है कि भगवान शिव गुरू गोरक्षनाथ के रुप में हर युग में विद्यमान रहे हैं जिनको समय के किसी भी काल में बांधना अनुचित है। शिव तो अजन्मे हैं और शिव ही अटल सत्य भी हैं।

यह शब्द किस प्रकार प्रयोग में आया –भारत की सारी संत—परंपरा सदाशिव भगवान श्री गुरू गोरक्षनाथजी की ऋणी है। जैसे पतंजलि के बिना भारत में योग की कोई संभावना न रह जायेगी; जैसे बुद्ध के बिना ध्यान की आधारशिला उखड़ जायेगी; जैसे कृष्ण के बिना प्रेम की अभिव्यक्ति को मार्ग न मिलेगा—ऐसे गुरू गोरख के बिना उस परम सत्य को पाने के लिये विधियों की जो तलाश शुरू हुई, साधना की जो व्यवस्था बनी, वह न बन सकेगी। शिव अवतारी गुरू गोरखनाथ ने जितना आविष्कार किया मनुष्य के भीतर परमात्मा से एकाकार के लिये, उतना शायद किसी ने भी नहीं किया है।

उन्होंने इतनी विधियां दीं कि अगर विधियों के हिसाब से सोचा जाये तो सदाशिव भगवान श्री गुरू गोरख सबसे बड़े आविष्कारक हैं। इतने द्वार तोड़े मनुष्य के अंतरतम में जाकर उस परम ब्रह्म परम सत्य परमपिता परमेश्वर से एकाकार करने के लिए , इतने द्वार तोड़े कि लोग द्वारों में ही उलझ गये। यह उलझाव इस सीमा तक जा पहुँचा कि लोग हताश होने लगे तथा गोरख-धंधा शब्द प्रचलन में आ गया। जो समझ में ना आ सके वो गोरख-धंधा है। कालाँतर में इन विधियों का दुरुपयोग नकारात्मक प्रवृत्ति के लोगों द्वारा धार्मिक लोगों को छलने में भी होने लगा जिसके कारण समय के साथ साथ यह शब्द और नकारात्मक होता चला गया। 

दुर्भाग्यवश सभी न्यूज चैनल और हिंदी प्रेस पत्रकारिता से जुड़े सज्जन इस शब्द का प्रयोग नकारात्मक या बुरे कामो के लिये करते हैं। अज्ञानतावश ही सही पर बिना ये जाने कि सदाशिव भगवान श्री गुरू गोरखनाथजी कौन है और गोरख-धंधा शब्द किस तरह प्रचलन में आ गया। कलियुग के इस दौर में रुपयापैसा एकत्रित करने की दौड़ में किसी भी प्रकार के अनैतिक कार्य करने के मकड़जाल नेटवर्क को आज हम बार बार “गोरख धंधा” कहकर अनजाने में न केवल भक्तों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचा रहे हैं अपितु भगवान शिव की गरिमा का भी अपमान कर रहे हैं जो सर्वथा अनुचित ही है.भगवान् सदाशिव स्वरुप भगवान शिवगोरक्षनाथ की क्या लीला है यह कोई नहीं जानता। पर उस परम ब्रह्म परम सत्य परमपिता परमेश्वर की लीला को “धंधा” नाम देना सर्वथा अनुचित है।

सुझाव: अगर भारतीय लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ “प्रेस” इस पहलू का स्वतंत्र भावना से इस अवांछित शब्द के स्थान पर किसी बेहतर संज्ञा जैसे लूट खसोट /घ्रणित कारोबार /कलंकित धंधा/काला धंधा /अवैध धंधा/ अनैतिक धंधा / भ्रष्टाचार /भंवरजाल /मकड़जाल /घपला / गोलमाल / घोटाला / तिलिस्मी जाल/गडबडझाला /गडबडघोटाला/ डर्टी धंधा / ठगधंधा इत्यादि जैसे शब्दों का प्रयोग करें और रिपोर्टिंग टीम को इस पहलू की ओर भविष्य में भी सचेत करें तो आपकी ज्वलंत पत्रकारिता उम्दा ही प्रतीत होगी। 

अलख निरंजन!

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