Wednesday, January 20, 2021
Home Hindi ABVP: व्यक्तित्व निर्माण की अनूठी पाठशाला

ABVP: व्यक्तित्व निर्माण की अनूठी पाठशाला

Also Read

Abhishek Ranjanhttp://abhishekranjan.in
Eco(H), LL.B(University of Delhi), BHU & LS College Alumni, Writer, Ex Gandhi Fellow, Ex. Research Journalist Dr Syama Prasad Mookerjee Research Foundation, Spent a decade in Students Politics, Public Policy enthusiast, Working with Rural Govt. Schools. Views are personal.

विश्व का सबसे बड़ा विद्यार्थी संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् 70 वर्ष का हो गया। निरंतर प्रवाहमान विद्यार्थियों को संगठित करने की जो यात्रा 9 जुलाई 1949 को प्रारंभ हुई थी, वह आज भी अनवरत जारी है। बीते 70 सालों में छात्र राजनीति के नामपर दुकान चलाने वाली अनेक संगठन बने, बिखरे, विलीन हुए, कुछ विलुप्त होने के कगार पर है। लेकिन परिषद् का कारवां बिना थके रुके आगे ही बढ़ता जा रहा है। जहाँ बाकी के विद्यार्थी संगठन महज दिखावटी संघर्ष, अप्रासंगिक हो चुके विदेशी विचारधारा में सिमटे हुए और अपने अस्तित्व को बचाने का जद्दोजहद करते नज़र आते है, परिषद् का न केवल कार्य विस्तार हो रहा है बल्कि “व्यक्ति निर्माण से देश निर्माण” का मन्त्र लिए वह समाज के हर क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराती नज़र आती है। चाहे वह स्थान जेएनयू हो अथवा बीएचयू, कालाहांडी हो या कन्नूर, परिषद् कार्यकर्त्ता की पहचान एक ही होती है। यह पहचान ही उसे आपस में जोड़ती है और साथ मिलकर एक लक्ष्य लेकर कार्य करने को प्रेरित करती है। उसे छद्म नामों व संगठनों से जुड़े होने की आवश्यकता नही पड़ती, जैसा की वामपंथी संगठनों में प्रायः देखने को मिलता है।

आखिर ये पहचान कौन सी है? वे कौन सी बातें है, जो परिषद् कार्यकर्त्ता कहलाने मात्र से ही अप्रत्यक्षतः बोध हो जाता है? परिषद् अपने कार्यकर्ताओं के बीच इस एकसमान पहचान को कैसे बना लेती है? कौन से पहलु है, जो परिषद् को बाकी संगठनों से अलग करते है? परिषद् कार्यकर्त्ता होने के अनुभव से जब उपरोक्त दोनों जिज्ञासाओं को शांत करने की चेष्ठा करते है तो कई तरह की बातें ज़हन में आती है।

नए संपर्क में आये विद्यार्थियों के लिए परिषद् की छवि शायद आन्दोलन या फिर छात्र राजनीति में सक्रीय संगठन के रूप में हो सकती है। वही पुराने कार्यकर्ताओं के लिए परिषद् व्यक्तित्व निर्माण की पाठशाला। लेकिन समग्रता में परिषद् को जब एक कार्यकर्त्ता देखता है तो सबको एक ही स्वरुप दिखाई देता है कि परिषद् छात्रहित के साथ साथ देशहित में कार्य करने वाला प्रवाहमान संगठन है। वैचारिक रूप से अलग मत रखने वाले संगठन परिषद् से भले ही बाकी विषयों पर मतभिन्नता रखते हो, परिषद् की सांगठनिक क्षमता उनके लिए सदैव उल्लेख करने वाला विषय रहता है। समाज के बीच परिषद् ने एक राष्ट्रभक्त संगठन के रूप में अपनी पहचान बनाने का कार्य किया है, जो परिषद् के कार्यकर्ताओं की तरफ सदैव आशाभरी निगाहों से देखता है। परिषद् ने अपनी अनूठी कार्य पद्धति एवं सांगठनिक क्षमता से समाज के एक बड़े वर्ग को अपना शुभचिंतक बनाया है, जो कार्यकर्ताओं के व्यवहार, वैचारिक प्रतिबद्धतता एवं उनके रचनात्मक व आंदोलनात्मक कार्यों से बनी है।

1949 ई। से लेकर अबतक की अपनी यात्रा में परिषद् की पहचान उसके विचार, उस विचार के प्रति प्रतिबद्धता व प्रतिबद्धता के साथ किये गए कार्यों से बनी है। परिषद् ने लक्ष्य नही बदले, न ही संघर्षों के समय अथवा अनुकूलता की स्थिति में अपनी कार्यपद्धति से कोई समझौता किया। जैसे किसी संगठन का मिशन और विज़न उसकी यूएसपी होती है, परिषद् में भी यही देखने को मिलती है। स्थापना के समय परिषद् ने तय किया कि वह राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के व्यापक संदर्भ में शिक्षा में आदर्श छात्र आंदोलन खड़ा करने के उद्देश्य से कार्य करेगा। यह कार्य शिक्षा परिवार की सामूहिक शक्ति में विश्वास, रचनात्मक दृष्टिकोण से छात्रों का वैचारिक संवर्धन एवं सत्ता व दलगत राजनीति से परे रहकर राष्ट्रीय दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर होगा। विद्यार्थी, शिक्षक, शिक्षकेत्तर कर्मचारी सब एक परिवार के सदस्य के नाते कार्य करें, यह सोच परिषद् ने रखी, जो भारतीय संकल्पना के आधार पर शैक्षिक परिवार की व्यवहारिक व अनुकूल अवधारणा थी। बात छात्र आंदोलन की भी हुई तो ये आंदोलन विरोध के लिए विरोध करना नही बल्कि समाज परिवर्तन एवं विकास हेतु आंदोलन की बात कही गई, जो रचनात्मकता को समेटे हुई थी। एक दुसरे से लड़ाने वाली स्वार्थी राजनीति नही, राष्ट्रनीति अर्थात “देश पहले” के विचार से लोक शिक्षा, लोक सेवा व लोक संघर्ष का भाव रखते हुए कार्य करना परिषद् ने तय किया।

ज्ञान-शील-एकता के मंत्र को न केवल आत्मसात किया बल्कि इसके लिए विद्यार्थी परिषद् ने छात्र समुदाय व संगठन के दर्शन का भी विकास किया, जिसकी जड़े भारतीय थी तो वही लक्ष्य वैश्विक विचारों से परिपूर्ण था। “छात्र शक्ति- राष्ट्र शक्ति” हो अथवा “छात्र कल का नही आज का नागरिक है” जैसे दर्शन का विकास काफी चिंतन मनन व आधुनिक समय की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए हुआ। जहाँ साम्यवादी संगठन छात्रों की रचनात्मक उर्जा का बेजा इस्तेमाल कर रहे थे, वही परिषद् ने युवा तरुणाई की उर्जा को सकारात्मक दिशा देने की ठानी और देश के सामने आनेवाली चुनौतियों के समाधान के लिए उसे साध्य बनने को प्रेरित किया। जाति, पंथ, क्षेत्र, रंग, लिंग से परे एक राष्ट्र- एक पहचान का भाव परिषद् के विचारों व कार्यों में स्पष्ट परिलक्षित होता है। परिषद् ने अपने मिशन पर केन्द्रित सोच के जरिये वैसे युवाओं की कई पीढियाँ तैयार की। परिषद् ने विश्व की प्राचीनतम सभ्यता, गौरवशाली इतिहास व श्रेष्ठ संस्कृति की पवित्र भूमि भारत को शक्तिशाली, समृद्धशाली व स्वाभिमानी राष्ट्र बनाने का संकल्प ले कार्य करने हेतु युवा मन को तैयार करने व अपनी अपनी भूमिका में इस लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में अपना योगदान हेतु प्रेरित किया।

बात चाहे परिषद् के शैक्षिक कार्यों की हो अथवा सामाजिक कार्यों की, परिषद् का मिशन और विजन सदैव कार्यकर्ताओं के लिए आजीवन मार्गदर्शक बने रहते है। वह चाहे परिषद् का सक्रीय कार्यकर्त्ता बनकर रहे अथवा सामाजिक जीवन के किसी अन्यत्र क्षेत्र में जाकर कार्य करें, उसकी कार्य पद्धति में परिषद् का संस्कार स्वतः परिलक्षित होता रहता है। स्वदेशी का विचार हो या फिर राष्ट्रीय एकात्मता का भाव, परिषद् कार्यकर्त्ता के लिए आजीवन इसके लिए आग्रह बना रहता है। यह परिषद् की एक विशेष पहचान ही तो है।

सांगठनिक रूप से विद्यार्थी परिषद् ने राजनीतिक दलों के मुखौटे के रूप अपनी पहचान कभी नही बनने दी। यही वजह रही कि परिषद् ने अपनी एक अलग व गैरराजनीतिक पहचान बनाई। वैचारिक रूप से एक होने के बाद भी इसने किसी राजनीतिक दल के साथ अपनी पहचान को नही जोड़ा। भाजपा के छात्र संगठन के रूप में प्रचारित होने के बावजूद परिषद् ने अपनी परिधि को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया और कार्यकर्ताओं के बीच भी इस संदेश को सदैव प्रमुखता से आत्मसात करने के लिए प्रेरित किया है कि हम दलगत राजनीति से परे होकर कार्य करने वाले संगठन है, जो राष्ट्र सर्वोपरी की सोच के साथ कार्य करता है। शायद यही वजह है कि परिषद् राजनीतिक जीवन की एंट्री-पॉइंट बनने के वजाए समाज जीवन को प्रभावित करने वाला सेंटर-पॉइंट बनना स्वीकार किया। परिषद् की इसी सोच का परिणाम है कि इसके कार्यकर्ता देश-समाज से जुड़े हर क्षेत्र में प्रभावशाली रूप से मौजूद दिखाई देते है।

विद्यार्थी परिषद् ने केवल सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि से ही नही, व्यक्तिगत दृष्टि से भी कार्यकर्ताओं के विकास की अनूठी कार्यपद्धति विकसित की। अभ्यास वर्ग अथवा आंदोलन, सभी प्रमुख कार्यों में सामानांतर प्रशिक्षण का भी कार्य चलता रहता है, जिस वजह से परिषद् की एक पहचान व्यक्तित्व निर्माण की पाठशाला के रूप में भी बनी है।

आज वैसे समय में जब पर्सनालिटी डेवलपमेंट शब्द काफी लोकप्रिय होता जा रहा है, टीम लीडरशिप पर बड़े बड़े शैक्षणिक संस्थान पाठ्यक्रम चला रहे है, इवेंट मैनेजमेंट व्यवसायिक दृष्टि से एक बड़ा क्षेत्र बन गया है, जिसपर केन्द्रित डिग्रियां लेने के लिए विद्यार्थी लाखों रुपए सहर्ष खर्च कर रहे है, परिषद् में ये सब स्वतः मिल जाती है। प्रेस विज्ञप्ति लिखनेवाला कार्यकर्त्ता कब लेखक और पत्रकार बन जाता है, छोटी सी जिम्मेवारी से कार्यक्रम संयोजक तक के दायित्व कब एक बेहतर आयोजक के रूप में किसी व्यक्ति को तब्दील कर देता है, पता ही नही चलता। बैठक से लेकर मंच संचालन तक के कार्य करते करते, कार्यसमिति के सदस्य से लेकर महामंत्री तक के दायित्व पर कार्य कर चुके कार्यकर्त्ता के जीवन यात्रा को देखे तो आपको व्यक्तित्व निर्माण की अभिनव कहानी ध्यान में आती है। संगठन की शक्ति को समझना, व्यक्तिगत संबंध के जरिये किसी उद्देश्य से जोड़ना और सामूहिक शक्ति से किसी लक्ष्य को प्राप्त करना, ये कुछ ऐसे गुण है जो परिषद् में कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं में स्वतः समाहित हो जाता है।

सामाजिक समरसता पर केन्द्रित कार्यों ने परिषद् की सर्वग्राही व सर्वव्यापी पहचान बनाने में बड़ा योगदान निभाया है। “सब भारतीय है” और “सब मिलकर इस देश को महान बनाएंगे” के विचार लेकर समाज के हर वर्ग के बीच परिषद् कार्य का विस्तार हुआ है। आरक्षण से लेकर जनजाति विषयों को लेकर परिषद् ने राष्ट्रीय दृष्टिकोण को सदैव प्राथमिकता दी। इसी वजह से परिषद् का परिचय किसी खास समूह के विद्यार्थियों की संगठन की कभी नही बनी। आज देश के सभी हिस्सों में सभी वर्गों के बीच परिषद् का कार्य है।

परिषद् ने देश के संवेदनशील मुद्दों को लेकर भी न केवल देश का ध्यान का आकृष्ट करवाया बल्कि नीति नियंताओं को भी कई फैसले लेने को मजबूर किया। चाहे असम का आन्दोलन हो या फिर आपातकाल के विरुद्ध संघर्ष, बंगलादेशी घुसपैठ का विषय हो अथवा शिक्षा के व्यवसायीकरण, परिषद् ने सत्ता के जनविरोधी नीतियों, भ्रष्टाचार, राष्ट्रीय सुरक्षा के सवालों को लेकर सदैव मुखर रही है। वही दूसरी ओर नीति-निर्माण से जुड़े विषयों को लेकर संवेदनशील बनाने हेतु थिंक इंडिया, रचनात्मक कार्यों हेतु विकासार्थ विद्यार्थी, उत्तर पूर्वी राज्यों की संस्कृति से देश के बाकी हिस्सों को परिचित कराने के लिए अंतर्राज्यीय छात्र जीवन दर्शन प्रकल्प, तकनीकी विद्यार्थी के बीच टीएसविपि, मेडिकल विद्यार्थियों के बीच मेडी विजन आदि प्रकल्पों के जरिये न केवल युवा प्रतिभाओं को जोड़ा बल्कि उन्हें रचनात्मक मंच मुहैया कराकर सामाजिक जीवन जीने की एक व्यापक दृष्टि भी दी। जहाँ देश के बाकी संगठन महिला सुरक्षा के प्रश्न को लेकर सरकार को कोसने में जुटे थे, परिषद् मिशन साहसी के जरिये छात्राओं को निडर और समाज में महिला सम्मान की एक नई परिभाषा लिखने में जुटी थी। यही तो समय से आगे की सोच। सामाजिक अनुभूति के जरिये गाँव और ग्रामीण समाज के प्रति युवाओं को संवेदनशील बनाने का अनूठा अभियान भी कुछ ऐसा ही है। आज युवाओं से जुड़े अनगिनत प्रकल्प परिषद् कार्यकर्ताओं के जरिये संचालित हो रहे है। विविध क्षेत्रों में अलग-अलग कार्यों के बावजूद एक ही लक्ष्य, यह विशेष पहचान भी किसी छात्र संगठन में विरले ही देखने को मिलती है।

आज जब भी परिषद् के कार्यों के आउटकम अर्थात परिणाम की बात होती है, तो वे तमाम आंदोलन, रचनात्मक गतिविधियाँ ध्यान में आती है, जिसने देश की युवा पीढ़ी को नई राह दिखाई, कई ज्वलंत समस्याओं को लेकर जनसामान्य को जागृत किया, अपनी रचनात्मक भूमिका से कई चुनौतियों से निबटने में सहायता की। उन कार्यकर्ताओं के नाम बड़े गर्व के साथ गिनाये जाते है जिन्होंने राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक जीवन के विविध कार्यों में न केवल अपनी पहचान बनाई बल्कि उनके योगदानों से देश व समाज को काफी लाभ भी हुआ है। परिषद् ने अपनी पहचान छात्र संगठन के नाते तो बनाई ही है, इसने समाज को समर्पित व कर्तव्यनिष्ठ नागरिक गढ़ने वाले संगठन के रूप में भी बनाई है, जहाँ कार्यकर्त्ता देशहित जीने के विचार से जुड़ते है और आजीवन उस विचार के साए में एक भव्य और स्वामी विवेकानंद के स्वप्नों के समृद्ध भारत के संकल्प लिए अपना योगदान देने की कोशिश करते है। यही तो परिषद् की पहचान है। उम्मीद है परिषद् इसी तरह सदैव भावी पीढ़ी के साथ कार्य करती रहेगी।

स्थापना दिवस पर शुभकामनाएं। जय जय भारत!

  Support Us  

OpIndia is not rich like the mainstream media. Even a small contribution by you will help us keep running. Consider making a voluntary payment.

Trending now

Abhishek Ranjanhttp://abhishekranjan.in
Eco(H), LL.B(University of Delhi), BHU & LS College Alumni, Writer, Ex Gandhi Fellow, Ex. Research Journalist Dr Syama Prasad Mookerjee Research Foundation, Spent a decade in Students Politics, Public Policy enthusiast, Working with Rural Govt. Schools. Views are personal.

Latest News

USA is now a constitutional relic & not a republic

All the founders of the US Constitution and even our own framers from the Constituent Assembly must be squirming in their graves, on what is playing out in the US.

पराजय नहीं, गौरवपूर्ण इतिहास है हमारा…

महाराणा का जीवन वर्तमान का निकष है, उनका व्यक्तित्व स्वयं के मूल्यांकन-विश्लेषण का दर्पण है। क्या हम अपने गौरव, अपनी धरोहर, अपने अतीत को सहेज-सँभालकर रख पाए? क्या हम अपने महापुरुषों, उनके द्वारा स्थापित मानबिन्दुओं, जीवन-मूल्यों की रक्षा कर सके?

Perseverance of Mewar

All of the Persia, England, Arabia felt honoured in sending costly embassies to Mughal Court, but Pratap sent word of defiance.

Right to protest of few privileged ones vs. Rights of the unorganized masses

Are the demands made by protesting groups are justified or not? Who are participating in the protest? Are they really farmers? Who are the organizers?

तां ड व !

OTT पर वेब सीरीज के नाम पर सेक्स, गालिया और नग्नता परोसी जाती ये तो हम सब जानते है। पर शायद पहली...

Who else knew about Balakot besides Arnab? Watch..

An another targeting of this fearless journalist!

Recently Popular

Girija Tickoo murder: Kashmir’s forgotten tragedy

her dead body was found roadside in an extremely horrible condition, the post-mortem reported that she was brutally gang-raped, sodomized, horribly tortured and cut into two halves using a mechanical saw while she was still alive.

5 Cases where True Indology exposed Audrey Truschke

Her claims have been busted, but she continues to peddle her agenda

Daredevil of Indian Army: Para SF Major Mohit Sharma’s who became Iftikaar Bhatt to kill terrorists

Such brave souls of Bharat Mata who knows every minute of their life may become the last minute.

गुप्त काल को स्वर्ण युग क्यों कहा जाता है

एक सफल शासन की नींव समुद्रगप्त ने अपने शासनकाल में ही रख दी थी इसीलिए गुप्त सम्राटों का शासन अत्यधिक सफल रहा। साम्राज्य की दृढ़ता शांति और नागरिकों की उन्नति इसके प्रमाण थे।

“Power over People”: A tale of two democratically elected leaders

We talk about some parallels between two world leaders (Trump and Mrs. Gandhi) from the oldest and the largest democracies who chose power over people and had a very unfortunate and sad ending.