Sunday, August 9, 2020
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किम जोंग उन और कोरियाई प्रायद्वीप का संक्षिप्त विवरण

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anonBrook
Manga प्रेमी| चित्रकलाकार| हिन्दू|स्वधर्मे निधनं श्रेयः| #AariyanRedPanda दक्षिणपंथी चहेटक (हिन्दी में कहें तो राइट विंग ट्रोल)| कृण्वन्तो विश्वं आर्यम्|
 

हाल-फिलहाल उत्तर कोरिया खबरों में छाया हुआ है। कोरिया के भविष्य के बारे में काफी अटकलें भी लगाई जा रहीं हैं।

कोरिया का भविष्य जानने से पहले उसका इतिहास जानना जरूरी है। बहुत ज्यादा विस्तार में गए बिना मैं एक संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कर रहा हूँ। ७ वीं शताब्दी में, कोरियाई प्रायद्वीप के तीन प्रतिद्वंद्वी साम्राज्यों को कोरियो राजवंश ने अपने अंतर्गत एकजुट किया था, इसी राजवंश के नाम से “कोरिया” शब्द व्युत्पन्न हुआ। १३०० वर्षों तक कोरिया एक संगठित राज्य रहा। १९१० में जापान ने कोरिया पर कब्जा कर लिया और द्वितीय विश्व युद्ध के अंत तक कोरिया पर जापान का ही नियंत्रण रहा।

विश्व युद्ध के अंत होने पर जापान पराजित हो चुका था और ‘पोस्टडाम घोषणा’ के अनुसार उसे ताइवान और कोरिया के राज को समर्पित करना पड़ा। पर उस समय अमरीका की इतनी क्षमता नहीं थी की वह पूर्ण कोरियाई प्रायद्वीप पर नियंत्रण कर सके। और इसलिए अमरीका ने प्रस्ताव रखा कि ३८ डिग्री अक्षांश के उत्तर की ओर का हिस्सा सोवियत रूस के प्रशाशन में रहे और उसके दक्षिण का हिस्सा अमरीका के प्रशाशन में रहे। यह व्यवस्था स्थायी समाधान नहीं थी और भविष्य में दोनों हिस्सों को सम्मिलित करने की योजना थी।

संयुक्त राष्ट्र ने कोरिया के दोनों हिस्सों पे चुनाव नियत किए जो निष्पक्ष व लोकतान्त्रिक होने थे। इस तरह दक्षिण भाग में सिंगमन ऋ चुने गए और कोरिया गणराज्य (दक्षिण कोरिया) स्थापित हुआ। मगर उत्तर में सोवियत रूस ने निष्पक्ष चुनाव नहीं होने दिये और एक समाजवादी राष्ट्र की स्थापना हुई, जिसके नेता किम इल संग बने जो वर्तमान नेता किम जोंग उन के दादा हैं। १९४९ तक दोनों हिस्सों से अमरीका और रूस ने अपनी अपनी सेनाएँ हटा लीं। और जहाँ चीन एवं रूस ने उत्तर कोरिया को हथियार व धन मुहय्या कराये वहीं अमरीका ने दक्षिण कोरिया की कोई मदद नहीं की। परिणाम स्वरूप दक्षिण कोरिया सुभेद्य हो गया।

१९४७ से १९९१ तक चले शीत युद्ध के दौरान अमरीका और सोवियत रूस अलग-अलग जगहों पर छद्म युद्ध करते रहे। मूलतः यह युद्ध समाजवाद की विचारधारा और पूंजीवाद की विचारधारा के बीच था। इस दौरान अमरीका और रूस के बीच सीधे तौर से तो जंग नहीं हुई पर परोक्ष रूप से कोरिया, वियतनाम और अफ़ग़ानिस्तान में लड़ाई होती रही।

जून १९५० में उत्तर कोरिया नें स्टालिन के निर्देश पर एकाएक चीन और रूस की मदद से हमला कर दिया। अमरीका ने भी बचाव में युद्ध छेड़ दिया। ३ साल तक चली इस जंग में किसी शांति समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए, केवल एक युद्धविराम समझौता हुआ जिसके अंतर्गत अस्थायी रूप से शस्त्र-विराम लगा। यानि की देखा जाए तो तकनीकी रूप से दोनों कोरिया के बीच में आज भी जंग जारी है। आज दोनों कोरिया के बीच का एक मील चौड़ा गैरफौजीकृत क्षेत्र विश्व का सबसे ज्यादा सैन्यकरण किया हुआ हिस्सा है, और दुनिया के सबसे खतरनाक इलाकों, जहाँ गंभीर युद्ध कभी भी हो सकता है, उनमें से एक है।

 

वर्तमान समय में उत्तर कोरिया को चीन का समर्थन प्राप्त है क्योंकि इससे चीन को अपने और अमरीका के बीच एक अंतर्रोध मिल जाता है। साथ ही साथ इससे अमरीका का पूर्वी एशिया में प्रभाव पर भी क्रियाशील रोक लग जाती है। चीन के समर्थन के कारण ही अमरीका उत्तर कोरिया पर सैन्य कार्यवाही करने में असमर्थ है।

खैर, ये तो थी इतिहास की पृष्ठभूमि। अब मौजूदा परिस्थिति की ओर रुख करते हैं।

२०१७ में उत्तरी कोरिया ने एक के बाद एक कई मिसाइल प्रक्षेपण किए। सबसे पहले फ़रवरी में जापानी समुद्र के ऊपर मिसाइलें चलाईं, फिर उसने ४ जुलाई को अपनी पहली इंटरकांटिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल या आईसीबीएम का सफल परीक्षण किया और १८ अन्य मिसाइल टेस्ट किए। और तो और भारत सहित लगभग १५० देशों पर ‘वानाक्राई’ नामक एक साइबर हमला भी किया, जिससे इन देशों के बैंकों से लेकर अस्पतालों तक काफी व्यवस्थाएँ प्रभावित हुईं।

 

किम जोंग उन द्वारा युद्ध की धमकी कोई नयी बात नहीं थी, लेकिन इस बार अमेरिका और अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा ट्विटर पे इसके ऊपर प्रतिक्रिया दी गयी। विडम्बना ये है कि उत्तर कोरिया में इंटरनेट सेवाएँ किसी नागरिक के पास नहीं हैं। इसके बावजूद डोनाल्ड ट्रम्प ने ट्विटर पर किम जोंग उन का मखौल उड़ाना नहीं बंद किया, और इसके जवाब में किम ने भी अपनी सरकारी मीडिया के माध्यम से ट्रम्प पर निशाना साधा। धीरे धीरे तनाव अपने उच्चतम स्तर पर पहुँच गया।

और फिर अचानक सब-कुछ बदल गया।

किम जोंग उन ने घोषणा की कि २०१८ प्योंगचांग में आयोजित होने वाले शीतकालीन ओलंपिक खेलों में उत्तर कोरिया भी भाग लेगा। न सिर्फ इतना ही, उत्तर कोरिया दक्षिण कोरिया के साथ एक संयुक्त ध्वज के अंतर्गत हिस्सा लेगा। और इस प्रकार किम जोंग उन ने न केवल दो खिलाड़ी भेजे बल्कि साथ ही साथ अपनी बहन और संदेहजनक रूप से उत्साहित प्रशंसकों के एक प्रतिवेश को भी दक्षिण कोरिया भेजा।

मिसाइल परीक्षण अचानक बंद हो गए और किम ने अमरीकी विदेश सचिव के साथ मुलाकात भी की। किम ने पहली बार सर्वोच्च अधिनायक के रूप मे विदेश यात्रा भी की और चीन में शी जिनपिंग से मुलाक़ात की। और फिर अब तक की सबसे बड़ी खबर आयी। वह यह कि उत्तर और दक्षिण दोनों में कोरियाई शिखर सम्मेलन का आयोजन हुआ जहां किम ने दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति को गले लगाया, और दक्षिण कोरियायी भूमि पर कदम भी रखा।

किम जोंग उन दक्षिण कोरिया के मून जाए इन के साथ दक्षिण कोरिया में आते हुए

यह ​​उत्तर कोरिया की ओर से समान्यतया अपेक्षित व्यवहार से पूर्ण रूप से उलट है। सिर्फ ५ महीनों में किम का रुख मिसाइल परीक्षणों और युद्ध की धमकियों से बदल कर दोस्ताना मुस्कुराहट और आलिंगन में परिवर्तित हो गया। जहाँ एक तरफ कई लोगों के लिए यह विचित्र और बेतुके घटनाक्रम हैं वहीं दूसरी तरफ कई लोगों के लिए यह ट्रम्प की सफल विदेश नीति के स्पष्ट परिणाम हैं। लेकिन किम के ये कदम जो निराशा या निवर्तन या मूर्खता ही की तरह प्रतीत हो सकते हैं वे वास्तव में केवल एक लंबे समय से चलती आयी सोची समझी, बहुत ही तर्कसंगत, बहुत ही सटीक गणना की हुई, उत्तरजीविता रणनीति है।

तो वास्तव में क्या चल रहा है और अंत में इसका परिणाम क्या होगा?

यह समझने के लिए आपको पहले किम जोंग उन के उद्देश्य, उसके प्रत्येक कृत्य के पीछे की प्रेरणा को समझना पड़ेगा। किम का एक ही उद्देश्य है- सत्ता पर काबिज़ रहना। किम के लिए सत्ता का अर्थ है धन, ऐशो-आराम और अपने परिवार की सुरक्षा। अब आप सोचेंगे कि यदि यह ध्येय है तो क्यों न शांत रहा जाए और इन चीजों का आनंद लिया जाये। लेकिन किम इसका उलट करते हुए दिखाई देता है, और अमेरिका जैसे देश को चुनौती देकर सब कुछ जोखिम में डालते हुए प्रतीत होता है। इसीलिए अधिकांशतः लोग किम को वाकई में पागल और सनकी समझते हैं और मीडिया, ज़ाहिर है, इस डर और चिंता को और भड़काती है। डर और चिंता उनका व्यावसायिक आधार है।

लेकिन किम सिरफिरा कतई नहीं है। उसके नज़रिये से वह बेहद ही बुद्धिमत्ता से काम कर रहा है और उसका हर कदम तर्कसंगत है।

किम को विरासत में एक बहुत ही गरीब, भूखे, और अविकसित राष्ट्र की सत्ता मिली है। और अगर वह कुछ न करे तो उत्तर कोरिया कुम्हला कर पूरी तरह से बर्बाद हो जाएगा। पर एक स्वावलंबी देश बनने के लिए आर्थिक दोषनिवृत्ति की आवश्यकता है। दोषनिवृत्ति सभी के लिए श्रेष्ठतर जीवन परिस्थिति लाएगी, जो कि किम के लिए क्रांति का खतरा पैदा कर देगी। एक प्रजा जो किसी भी प्रकार से खुद का मात्र भरण कर सकती हो, उसके पास सिर्फ यही करने का समय होता है। क्रांतियाँ भूखे पेट नहीं होती हैं। बेहतर जीवन का अनुभव, उसका एक स्वाद मात्र, उन्हें क्या मिल सकता है इसकी एक झलक भर नागरिकों को विद्रोह के लिए प्रोत्साहित करने में सक्षम है। दोषनिवृत्ति फलतः उत्तर कोरिया को सफल बना सकती है, परंतु इसका अर्थ यह होगा कि किम को सत्ता गंवानी पड़ जाएगी। यानि कि किम को संसाधन तो चाहिए पर वह आर्थिक सुधार बर्दाश्त नहीं कर सकता क्योंकि उसमे विद्रोह का जोखिम है। समाधान एक ही है- उसी तरह का समाजवाद जिसका इस देश ने सदैव ही स्वप्न देखा है पर कभी हासिल नहीं कर सका- साझा संसाधन/संपत्ति (जिसके ऊपर किम का एकाधिकार होगा)।

उत्तर कोरिया के लिए संसाधन का अर्थ है विदेशी आर्थिक सहायता। लेकिन किसी यातना-शिविरों से भरे सर्वसत्तावादी देश को आर्थिक मदद क्यों और कैसे मिल सकती है?

जवाब- भय!

लेकिन विश्व के संपन्न देशों को डराना कठिन कार्य है। यदि कोरिया के पास उनकी सामरिक क्षमता की बराबरी करने के लिए धन-संपदा होती तो उन्हें प्रथमतः ही इस भय की रणनीति का उपयोग करने की आवश्यकता नहीं पड़ती इसलिए कोरिया ने परंपरागत हथियार जैसे तोप इत्यादि को छोड़ सीधे परमाणु हथियार के विकसित करने का प्रयत्न किया, जो अब सफल हो चुका है। एक अकेली परमाणु मिसाइल आंतरिक विद्रोह और बाह्य युद्ध दोनों के ही समक्ष एक प्रभावशाली ढाल है। जो इस मिसाइल को संधिक्रम के लिए एक दोषहीन उत्तोलन का साधन बना देता है। उत्तर कोरिया को परमाणु रहित करने का विचार मात्र ही इतना आकर्षक है कि पूरा विश्व इसके लिए कुछ भी करने को तत्पर है, यदि इसकी सूक्ष्मतम संभावना भी दिखे।

उत्तर कोरिया की रणनीति साफ है। सर्वप्रथम वो एक विनिर्मित संकट पैदा करता है और तनाव को जितना हो सके उतना ऊंचे स्तर तक पहुंचता है। जब समाचारों के शीर्षक दुनिया को कहने लगते हैं कि कोरियायी प्रायद्वीप जंग की कगार पर है, तब उत्तर कोरिया की सरकार परक्रामण का प्रस्ताव रखती है। इस प्रस्तुति को विश्व चैन की सांस भरते हुए तत्परता से स्वीकार कर लेता है और कोरियाई राजनयिकों को अधिकतम लाभ एवं रियायतें निचोड़ लेने का उत्तोलन मिल जाता है।

उत्तर कोरिया हर बार यही करता है।

किसी भी क्षण किम या तो पूर्ण आक्रामक मुद्रा में होता है जिससे हम (वैश्विक समुदाय) संधि-परक्रामण के लिए आतुर हो जाते हैं या तो पूर्ण सौष्ठ मुद्रा में होता है, जैसा कि अभी है। यह आक्रामकता-सौष्ठव और फिर इसकी आवृत्ति का चक्र जो अभी हो रहा है, यह किसी भी मायने में नया नहीं है। इससे पहले भी संधिक्रम की छः कोशिशें हो चुकीं हैं। उत्तर कोरिया को २००५ में जो उन्होनें मांगा वो मिला और उन्होनें विपरमाणुकरण के लिए मंजूरी दी थी पर फिर वे अपने वादे से मुकर गए।

लेकिन इस बार परिस्थिति थोड़ा अलग है। कोरिया के परमाणु कार्यक्रम का पिछले ४० वर्षों तक एक मात्र लक्ष्य था- अमेरिका की मुख्य भूमि तक हमला कर सकने की क्षमता प्राप्त करना। जब तक यह नहीं हुआ था तब तक कार्यक्रम छोड़ने की कोई यथार्थवादी अवस्था नहीं थी। यह उनका एकमात्र प्रतिरोध है। किम ने इराक के सद्दाम हुसैन और लीबिया के गद्दाफ़ी के हश्र से सबक सीख लिया है।

२८ नवंबर को उत्तर कोरिया ने ह्वासोंग-१५ का परीक्षण किया, और यह साबित कर दिया कि वो अमेरिका में कहीं पर भी हमला करने की मारक क्षमता रखता है और इसके सिर्फ २ महीने बाद ओलंपिक में शामिल हो गया और सौष्ठव मुद्रा धारण कर ली। इस समय का चुनाव करना कोई संयोग नहीं है। उत्तर कोरिया ने अपना लक्ष्य पूरा कर लिया है। और अधिक मिसाइल परीक्षण की अब कोई ज़रूरत नहीं रह गयी है। अब तो समय है कि अमेरिका पर निशाना लगाने की क्षमता का डर दिखाकर इन परीक्षणों का जितना हो सके उतना प्रतिफल बटोरा जाए।

किम इससे बेहतरीन समय का चुनाव नहीं कर सकता था। संभवतः चीन किम पर शांत हो जाने के लिए दबाव बना रहा था और अमेरिका के साथ तो भी कोरिया का तनाव परवान चढ़ ही चुका था। साथ ही साथ अमरीकी प्रशासन भी वास्तव में यह दिखाने के लिए आतुर है कि उसकी रणनीति ने काम किया है, और ये हालात किम जोंग उन को किसी भी संधि वार्ता में एक अति अनुकूल परिस्थिति प्रदान करते हैं।

इन सब का फल क्या होगा? क्या अंततः कोरिया में शान्ति की संभावना है? कहना मुश्किल है। अभी हाल ही की खबर के अनुसार दक्षिण कोरिया और अमरीका के बीच के सामरिक अभ्यास का बहाना बना के दक्षिण कोरिया के साथ तय बैठक को रद्द कर दिया और सिंगापुर में प्रस्तावित अमरीकी राष्ट्रपति के साथ होने वाले ऐतिहासिक शिखर सम्मेलन को भी रद्द करने की धमकी भी दी है। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार यह मात्र “बार्गेनिंग टैक्टिक” है जिससे किम अपनी स्थिति और मजबूत करना चाहता है, वहीं कुछ और विशेषज्ञों के अनुसार यह उत्तर कोरिया से शांति की अपेक्षा रखने का अपरिहार्य परिणाम है।

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