कांग्रेस के राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ को मुफ्तखोर कहने के बाद यहां की जनता कांग्रेस को क्यों चुने?

वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में कांग्रेस के बचे कुचे कुछ ही मुख्यमंत्रियों में से एक सिद्दारमैया जी हैं। आगामी चुनाव में कर्नाटक राज्य में सत्ता बनाए रखने के लिए उन पर और पार्टी पर भारी दबाव है। मुख्यमंत्री जी यह सुनिश्चित करने के लिए सभी संभव रणनीति का उपयोग कर रहे हैं जिससे कि उनकी मजबूत स्थिति बनी रहे। समाज में दरार पैदा कर उनको कुरेद कर विभाजनकारी एजेंडे का लगातार सहारा लिए जा रहे हैं।

आधिकारिक राज्य ध्वज का मुद्दा, ‘हिंदी अधिरोपण’ और लिंगायत समुदाय को एक अलग धर्म का दर्जा देने के लिए प्रोत्साहन इसके कुछ उदाहरण हैं। इसके अलावा, एक लेख में मुख्यमंत्री ने उत्तर भारत के गरीब राज्यों में करों के हस्तांतरण के तर्क पर सवाल उठाया है।

अपने ‘विकासित दक्षिण अधिक आबादी वाले उत्तर को सब्सिडी दे रहा है’ शीर्षक लेख में, मुख्यमंत्री ने दावा किया है कि दक्षिणी राज्यों को अपने स्वयं के राज्य में एकत्रित धन खर्च करने के लिए पर्याप्त स्वायत्तता नहीं दी गई है। वह विशेष रूप से अपने लेख में आबादी का मुद्दा उठाते हैं वह लिखते हैं:

“ऐतिहासिक रूप से, दक्षिण उत्तर को सब्सिडी दे रहा है। विंध्या के दक्षिण में छह राज्य अधिक करों का योगदान करते हैं और उन्हें कम मिलता है। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश द्वारा दिए गए प्रत्येक एक रुपए के टैक्स के लिए कि राज्य को 1.79 रुपये मिलते हैं कर्नाटक द्वारा योगदान किए गए प्रत्येक एक रुपये के लिए, राज्य को 0.47 रुपये प्राप्त होता है। यद्यपि मैं क्षेत्रीय असंतुलन को सुधारने की आवश्यकता को समझता हूं, विकास के लिए प्रोत्साहन कहाँ है? दक्षिण के राज्यों में जनसंख्या वृद्धि दर लगभग प्रतिस्थापन स्तर पर पहुंच गए हैं। फिर भी, जनसंख्या केंद्रीय करों के हस्तांतरण के लिए एक प्रमुख मानदंड है। हम कब तक जनसंख्या वृद्धि को प्रोत्साहन प्रदान कर सकते हैं?”

अगर इस तर्क को व्यापक सामाजिक संदर्भ में लागू किया जाए, तो मेहनती मध्यम वर्गों से एकत्रित किए गए कर को पीडीएस चावल या कल्याणकारी नीतियों पर खर्च नहीं किया जाना चाहिए, जो मुख्यमंत्री जी राज्य में चला रहे हैं। मध्य वर्ग पहले से ही पूछ रहे हैं कि ‘हम अल्पसंख्यकों और गरीबों को किस तरह वित्तपोषण कर रहे हैं, जो बड़े परिवार के आकार वाले हैं?’

इसी तर्क को बढ़ाया जा सकता है ‘मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि का प्रोत्साहन हिन्दू कितने समय तक कर सकते हैं?’ सिद्दारमैया जी ऐसा सुझाव देते हुए प्रतीत हो रहें हैं कि दक्षिणी राज्यों से अर्जित किया गया कर उत्तरी राज्यों के साथ साझा नहीं किया जाना चाहिए।

यद्यपि यह प्रकथन मौलिक रूप से प्रगतिशील करों के स्वीकार्य तर्क (यानी कि अधिक अमीरों पर अधिक कर) के खिलाफ है, इस सुझाव से राष्ट्रीय संदर्भ में भी भौहें तन जानी चाहिए। यदि हर समृद्ध व्यक्ति या अमीर राज्य गरीब वर्गों या गरीब राज्यों से करों के रूप में धन का एक हिस्सा साझा करने से इनकार करने लगे, तो समाज और राष्ट्र दूरगामी परिपेक्ष में कैसे कार्य कर सकते हैं?

क्या कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी इस तर्क को स्वीकार करते हैं? अगर वे उत्तर प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे उत्तर भारतीय राज्यों में इस वर्ष सत्ता में आएंगे तो क्या वे सिद्दरामिया के तर्कों को स्वीकार करेंगे? क्या लोगों को एक ऐसी पार्टी स्वीकार कर लेनी चाहिए जो दक्षिणी राज्यों की भावनाओं पर निभाता है, जबकि इस वक्तव्य से सीधे राष्ट्रीय एकता और विकास को खतरे में डालता है? क्या इन राज्यों ने राष्ट्रीय महत्त्वाकांक्षी पार्टी द्वारा दिया गया “नि:शुल्क सवारों” की उपाधि या पहचान स्वीकार कर लिया है?

(it is a Hindi translation of this article)

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