आज की युवा पीढ़ी जग गई है, अब उसे छला नहीं जा सकता, उसे अंधेरे में नहीं रखा जा सकता है। अब युवा पीढ़ी ने स्वयं नया इतिहास लिखना शुरू कर दिया है। उस नए इतिहास के एक स्वर्णिम अध्याय का नाम है वीर सावरकर। जिसके भाई को जेल भेज दिया गया हो, पत्नी और भाभी बेघर हो गईं हो, ससुर की नौकरी छीन ली गई हो, वह इन मुसीबतों में भी अपने लक्ष्य से पीछे नहीं हटा, बल्कि मुसीबतों के पहाड़ को चीरता चला गया। उस त्याग, समर्पण और राष्ट्रभक्त का नाम है सावरकर।
सावरकर आजीवन क्रांतिकारी थे। ऐसे बहुत कम देखने को मिलता है कि जितनी ज्वाला तन में हो उतना ही उफान मन में भी हो, जिसके कलम में चिंगारी हो और उसके कार्यों में भी क्रांति की अग्नि धधकती हो। वीर सावरकर ऐसे महान सपूत थे जिनकी कविता भी क्रांति मचाती थी और वह स्वयं भी क्रांतिकारी थे। उनमें तेज भी था, तप भी था और त्याग भी था।
27 फरवरी 1966 को द टाइम्स ऑफ इंडिया ने वीर सावरकर के निधन के बाद अपने संपादकीय में लिखा था– “विनायक दामोदर सावरकर अपनी अंतिम सांस तक क्रांतिकारी थे। इतिहास हमेशा उन्हें एक विलक्षण भारतीय के रूप में सलामी देगा। एक ऐसा व्यक्ति जिसका इतने उतार चढ़ाव के बाद भी देश के प्रति अटूट विश्वास बना रहा। उनका जीवन एक महागाथा की तरह है। उनकी कथनी और करनी में समानता थी। भारतीय सीमाओं की सुरक्षा के प्रति उनका उल्लेखनीय योगदान रहा। उनकी निर्भीक आत्मा आनेवाली पीढ़ियों को हमेशा झकझोरती रहेगी।”
वीर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को नासिक में हुआ था। वे अपने माता- पिता की चार संतानों में से एक थे। उनके पिता दामोदर पंत शिक्षित व्यक्ति थे। वे अंग्रेजी के अच्छे जानकार थे। लेकिन वे अपने बच्चों को अंग्रेजी के साथ – साथ रामायण, महाभारत, महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी आदि महापुरूषो के प्रसंग भी सुनाया करते थे। सावरकर अल्प आयु से ही निर्भीक होने के साथ – साथ बौद्धिक रूप से भी संपन्न थे। उनकी पहली कविता मात्र दस वर्ष की आयु में प्रकाशित हुई थी। राष्ट्रीय एकता और अखंडता की भावना उनके रोम – रोम में भरी थी। उनके अदम्य साहस और समर्पण की भावना से अंग्रेजी शासन हिल गया था। सावरकर पहले भारतीय थे जिन्होंने विदेशी कपड़ो की होली जलाई थी। सावरकर को किसी भी कीमत पर अंग्रेजी दासता स्वीकार नहीं थी। वे हमेशा अंग्रेजों का प्रतिकार करते रहे। उन्होंने इंग्लैंड के राजा के प्रति वफादारी की शपथ लेने से मना कर दिया था। फलस्वरूप उन्हें वकालत करने से रोक दिया गया। 24 साल की आयु में सावरकर ने इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस नामक पुस्तक की रचना कर ब्रिटिश शासन को झकझोर दिया था।
लंदन को बनाया कुरुक्षेत्र और फिर रचा चक्रव्यूह-
1906 में वीर सावरकर कानून की पढ़ाई के लिए लंदन गए। पढ़ाई के लिए लंदन जाना तो उनका बहाना था, उनका असली लक्ष्य देश को आजाद कराना था, वहां रह रहे भारतीयों में जोश भरना था,उनका स्वाभिमान जगाना था। सावरकर ने लंदन में भारतीय युवाओं को एकत्रित किया, आजादी को लेकर रणनीति तैयार की। उन्होंने मैजिनी की आत्मकथा का मराठी में अनुवाद किया और उसकी प्रस्तावना लिखी। उस प्रस्तावना की कॉपी भारत भेजी गयी। उसकी प्रतियों को छपवाने के लिए पैसे कम पड़े तो सावरकर की पत्नी और उनकी भाभी ने अपने गहने बेच दिए। सरकार उस प्रस्तावना को जब्त न कर ले इसलिए हजारों युवाओं ने उसे याद कर लिया और एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने का कार्य किया। उस प्रस्तावना से अंग्रेजी सरकार हिल गई थी। लंदन में रहते हुए उन्होंने मदनलाल ढींगरा के साथ योजना के तहत बम बनाने की कला सीखी, हथियार एकत्रित किया और फिर स्वाधीनता की चिंगारी सुलगाने का काम किया जिससे अंग्रेजी शासन का संभलना मुश्किल हो गया।
1857 के गदर को बनाया स्वतंत्रता का अमर संग्राम
1907 में जब इस संग्राम के 50 साल पूरे हो रहे थे तब अंग्रेजों ने इस दिन को विजय उत्सव के रुप में मनाया। ब्रिटिश अखबारों में अंग्रेजों की शौर्यता का गुणगान किया गया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों की निंदा की गई। जगह जगह नाटक का मंचन किया गया। मंगल पांडे, रानी लक्ष्मीबाई आदि स्वतंत्रता सेनानियों को हत्यारा और उपद्रवी बताया गया। क्या हमें अंग्रेजों के दमन को उनके दुष्प्रचार के रुप में स्वीकार कर लेना चाहिए था, क्या हमें अपने वीरों को कायर और हत्यारा बताने वाले अंग्रेजों के इतिहास को स्वीकार कर लेना चाहिए था? अगर नहीं तो इस नहीं की दिशा में सबसे पहला कदम था वीर सावरकर का। सावरकर ने अंग्रेजों की धरती से ही इसका प्रतिकार किया , विरोध किया और इसे भारतीय स्वातंत्र्य समर के उच्च सिंहासन पर प्रतिष्ठित किया। अगर तब सावरकर ने असाधारण प्रयास नहीं किया होता तो आज 1857 महज एक सिपाही विद्रोह के रुप में इतिहास में दर्ज होता।
सावरकर ने लंदन में रहते हुए करीब डेढ़ वर्ष तक इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी और ब्रिटिश म्यूजियम लाइब्रेरी में दस्तावेजों का अध्ययन किया और 1857 के संग्राम का छिपाया गया सच खोज निकाला। जिसके बाद सावरकर ने1907 में ओ मार्टियर्स के नाम से चार पन्नों का पैंफ्लेट प्रकाशित किया। सावरकर ने लिखा था कि 10 मई 1857 को शुरू हुआ यह युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ है। यह तब तक जारी रहेगा जब तक उस लक्ष्य को पूरा करने वाली कोई तारीख नहीं आएगी। उन्होंने लिखा ‘ओ महान शहीदों’ अपने पुत्रों के इस पवित्र संघर्ष में अपनी प्रेरणादायी उपस्थिति से हमारी मदद करो, हमारे प्राणों में वह जादू फूंक दो जिसने तुमको एकता सूत्र में गूंथ दिया था। सावरकर के इस लेख से अंग्रेजी शासक हिल गया था। ब्रिटिश अखबारों में इस लेख को राजद्रोह और कांतिकारी की चिंगारी सुलगाने वाला बताया था। इस लेख से अंग्रेजी सरकार इतनी हिल गई थी कि सावरकर पर जम मुकदमा दर्ज किया गया और उन्हें कारावास की सजा सुनाई गई तो इसी चिंगारी भरे पत्र का उल्लेख किया गया।
सावकर एक मात्र ऐसे भारतीय थे जिन्हें एक ही जीवन में दो बार आजीवन कारावास की सजा सुनाई गयी थी। काले पानी की कठोर सजा के दौरान सावरकर को अनेक यातनाएं दी गयी। अंडमान जेल में उन्हें छ: महीने तक अंधेरी कोठरी में रखा गया। एक -एक महीने के लिए तीन बार एकांतवास की सजा सुनाई गयी। सात – सात दिनों तक दो बार हथकड़ियां पहनाकर दीवारों के साथ लटकाया गया। इतना ही नहीं सावरकर को चार महीने तक जंजीरों से बांध कर रखा गया। सावरकर जेल में रहते हुए भी स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे। वह जेल की दिवारों पर कोयले से कविता लिखा करते थे और फिर उन कविताओं को याद करते थे। जेल से रिहा होने के बाद सावरकर ने उन कविताओं को पुन: लिखा था।
यह भी अजीब विडंबना है कि इतनी कठोर यातना सहने वाले योद्धा के साथ तथाकथित इतिहासकारों ने न्याय नहीं किया। किसी ने कुछ लिखा भी तो उसे तोड़ मरोड़ कर पेश किया। सावरकर आजीवन भारत और भारतीयों को एक सूत्र में बांधने के लिए प्रयास करते रहे। वह किसी भीऊंच-नीच जाति- पंथ के भेदभाव से मुक्त थे। भारत की एकता और अखंडता के प्रति उनकी असीम श्रद्धा थी। यही कारण है कि उन्होंने धर्म के आधार पर विभाजन को अस्वीकार कर दिया था। उनका मत था कि संपूर्ण भारत एक है और इस भूखंड पर रहने वाले सभी एक है। वे किसी भी रोपित प्रचार -प्रसार से घृणा करते थे। वे आजीवन भाईचारे और भारत को एक करने के लिए संघर्ष करते रहे। आज सिर्फ वैचारिक मतभेद या राजनीतिक द्वेष की वजह से देश के वीर सपूतों को बांटना, उनकी आलोचना करना ठीक नहीं है।
कोरोना वायरस के चलते श्रमिकों ने जिन समस्याओं का सामना किया है अपने घर वापस जाने के लिए, उसके चलते यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने एक बहुत बड़ा बयान दिया हैं की, अब से अगर किसी और राज्य को हमारे यहाँ से कामगार चाहिए होंगे तो उनको यूपी सरकार से अनुमति लेनी होगी। उन्होंने ये साफ़ बोल दिया हैं की कोई भी दूसरा राज्य उनके अनुमति के बिना यूपी के लोगो को नौकरी पर नहीं रख सकता।
ऐसा फैसला उन्होंने क्यों लिया? उन्होंने कहा के ये जो श्रमिक यहाँ पर हैं ये हमारी सबसे बड़ी संपत्ति हैं और हम उन्हें यूपी में ही काम देंगे।
दो बड़ी बातें उन्होंने की हैं एक तो श्रमिकों को उन्होंने राज्य का संसाधन कहा हैं और दूसरी बात ये की उन श्रमिकों को रोजगार हम आपने ही प्रदेश में प्रदान करेंगे। उनके अनुसार कोरोना के इस आपदा में मजदूरों की उचित व्यवस्था किसी भी राज्य ने नहीं की, कहने का तात्पर्य ये हैं की मजदूरों को राज्य की सरकारों ने और कंपनी के प्रशासन ने मजदूरों को इस वैश्विक संकट में उन्हके हाल पर छोड़ दिया गया।
योगी आदित्यनाथ जी का ये बयान एक हद तक सही भी है। पुरे देश ने देखा के श्रमिक किस परेशानी से आपने घर जा रहे हैं, सोचने की बात ये हैं की, इतने सारे मजदूर जब किसी प्रदेश की सेवा में थे और अब इस वैश्विक संकट में कोई प्रदेश की सरकार इन मजदूरों को उचित सेवा प्रदान नहीं कर पायी।
ये उन प्रदेशो के लिए एक शर्म की बात हैं जो प्रदेश अन्य प्रदेशो के मजदूरों से अब तक सेवा प्राप्त करते रहे और जब उनको सेवा देने का समय आया तो ये प्रदेश असफल साबित हुए।
कोरोनोवायरस लॉकडाउन में घर लौटने की कोशिश के दौरान सड़क दुर्घटनाओं में कम से कम 42 प्रवासी श्रमिकों की मौत हो गई, सेव लाइफ फाउंडेशन द्वारा जारी एक रिपोर्ट से पता चलता है।
भूक और डर मजदूरों को पलायन करने पे मजबूर कर रही है। कई सरे मजदूर अपनी घरो के लिए भूके ही पैदल निकल गए। कुछ मजदूर आपने घर पोहच गए और कुछ मजदूरों की घर पहोचने के पहले ही मृत्यु हो गयी। ये मृत्यु कोरोना वायरस से नहीं बल्कि किसी की मृत्यु भूक से, किसी की मृत्यु चलने से,तो किसी की मृत्यु सड़क दुर्घटना में हुई है।
इन्ही मजदूरों के बलबूते लाखो करोडो की संपत्ति कमाने वाले कंपनी मालको ने अगर इन मजदूरों का थोड़ा भी ख्याल रखा होता तो आज ये दिन उन मजदूरों को नहीं देखने पड़ते। इन सभी कम्पनीओ के मालको को एक किसान से सिख लेनी चाहिए।
राजधानी के तिगीपुर गाँव के एक मशरूम किसान पप्पन सिंह ने अपने 10 मजदूरों को बिहार से वापस घर भेजने के लिए हवाई टिकट के लिए ७०,००० रुपये का भुगतान किया है। उनके पास भी अब लगभग दो महीने से उन्हें खाना खिलाया और शरण दे रहा है।
किसान पप्पन सिंह ने कहा, “मुझे लगा कि अगर रास्ते में उनके साथ कुछ हुआ है तो मैं खुद को माफ़ नहीं कर पाऊंगा। यही वजह है कि मुझे लगा कि विमान उन्हें सुरक्षित घर भेज सकता है … वे मेरे अपने लोगों की तरह हैं।”
कम से कम यह तो स्वीकार करना ही होगा कि अशोक की महानता के साक्ष्य बहुत कमजोर है और ज्यादा से ज्यादा यह कह सकते हैं कि वह गंभीर संदेह के दायरे में है।”
भारतीय इतिहास के भूमिका वाले पन्नो पर आमतौर पर अशोक ‘महान’ या अकब र’महान’ या फिर नेहरू ‘चाचा’ जैसे चुनिंदा ‘हैंडपिक्ङ’ भारतीयों को एक ऐसी जगह स्थापित कर दिया गया है कि फिर पूरा इतिहास ही इन ‘महान’ लोगो के चारो ओर घूमता नजर आता है, जैसे राजनीतिक सत्ता स्वाभाविक रूप से पाटिलीपुत्र या दिल्ली जैसे देश के भीतरी हिस्सो मे केंद्रित रही हो, और शेष भारत महज प्रान्त बनकर रह गया हो।
इन महान नेतृत्वकर्ताओ की तारीफ़ में पढ़े गये कसीदों पर प्रश्न-चिन्ह लगाना सर्वदा अकादमिक-पाप की दृष्टि से देखा जाता रहा हैं। हमारा ‘पूर्वपक्ष’, ‘इतिहास की तोपों’ से वैधानिक मान्यता प्राप्ति का प्रयोजन भर नही है।
महानता की चादर काफी दागदार है
भारतीय इतिहास के “सिक्स ग्लोरियस एपोच” में सावरकर ने सबसे पहले ‘महान’ अशोक के कथानक को तथ्यों की स्क्रूटनी पर कसने की कोशिश की थी। संजीव सान्याल जैसे अन्य लोगों ने भी यह तर्क दिया है कि “भारतीय सेकुलर स्टेट ने अशोक को केंद्र में रखकर एक झूठी कथा का निर्माण किया, जो किसी उचित जांच पर खरी नहीं उतरती।”
कोइनार्ड एलस्ट कहते हैं कि “जवाहर लाल नेहरू के शासनकाल में बौद्ध धर्म को भारत के अनौपचारिक स्टेट रिलेशन के तौर पर प्रोत्साहन मिला। बौद्ध सम्राट अशोक के सिंह-स्तंभ को राज्य का प्रतीक बनाया गया और 24 तीलियों वाले धर्म चक्र को राष्ट्रीय ध्वज में स्थान दिया गया।”
यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि नेहरूवादी गणराज्य खुद को एक आदर्शवादी ‘अशोकअन एंपोरियम’ के रूप में प्रदर्षित करने के लिए प्रयासरत दिखाई देता था।
आजादी के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि ख्यातिनाम इतिहासकारों को ‘महान’ अशोक का कथानक गढ़ने के लिए और ज्यादा बढ़ावा दिया गया ताकि जवाहरलाल नेहरु के समाजवादी प्रोजेक्ट के लिए भारतीय इतिहास में एक व्युत्पत्ति प्रदान की जा सके और इसके लिए असुविधाजनक हिस्सो को दबा दिया गया। एक बात तो स्वीकार करनी पड़ेगी कि वर्तमान समय की समस्याओं के समाधान की खातिर अतीत की तरफ झांकने वाले भारतीयों पर इसका जादुई असर हुआ।
सजा देने का हम भारतीयों का स्वदेशी तरीका है, भुला देना।
हमारी स्कूली शिक्षा में अशोक को ‘महान’ घोषित किया गया है। जहां उसे भारत के दो सबसे महान सम्राटों में अकबर के साथ चित्रित किया जाना, इसी परियोजना का हिस्सा है
लेकिन ये सब इस तथ्य के खिलाफ जाता है कि भारतीय परंपरा में नहीं, बल्कि उन देशो में लिखे गए प्रसंसात्मक बौद्ध ग्रंथों में उसे महान राजा के तौर पर याद किया गया है जिन्होंने उनके शासन का अनुभव नहीं किया था। वास्तव में इस शासक को उसके ‘महान कर्मों’के साथ भुला दिया गया था। जब तक कि दो शताब्दियों पहले जेम्स प्रिंसेप जैसे ओपनिवेशिक प्राच्यविदों ने उसकी ‘पुनर्खोज’ की घोषणा नहीं की।
रोमिला थापर भी “अशोक और मौर्यो के पतन” में लिखती हैं कि “भारतीय धर्मनिरपेक्ष स्रोतों में अशोक काफी हद तक राजवंशी सूचियों में एक नाम बना रहा, बाद की शताब्दियों में उन अस्पष्ट अभिलेखों की लिपि के रूप में जिसमें उसे उनके संपादकों ने उकेरा था। तथ्य यह है कि एक सम्राट के रूप में अशोक के कामो को भारतीय इतिहास से विस्मृत कर दिया गया और सोचा नही जा सकता था”।
ऐसा क्यों हुआ? हमारे पूर्वजों ने इस कथित महान सम्राट को क्यों भुला दिया? यहाँ इसके ही कुछ कारणों की जानने की कोशिश की गई है। मैं स्पष्ट कर देना चाहूंगा कि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि अशोक का ये पक्ष बिल्कुल ही अप्रकाशित है बल्कि तथ्य यह है कि मुख्यधारा के लेखनों में उनकी पूर्वनिर्धारित गुणवत्ता को बनाये रखने के लिए इन तथ्यों को हमेशा से दबाया जाता रहा है।
‘चंड-अशोक’ का खिताब और महानता का उद्दघाटन
लगभग सारे विवरण इस बात पर सहमत हैं कि अशोक का प्रारंभिक शासनकाल हिंसक और अलोकप्रिय था, उसे ‘चंड अशोक’ कहा जाता था। मगर मुख्यधारा की किताबो में दी जाने वाली कहानी के मुताबिक कुछ साल बाद अशोक ने कलिंग पर हमला किया और मौतों और तबाही से व्याकुल होकर उसने बौद्ध धर्म अपना लिया और शांतिप्रिय बन गया।
अशोक का 13वां शिलालेख कलिंग युद्ध का वर्णन करता है। जबकि किसी भी बौद्ध ग्रंथ में इस युद्ध की चर्चा नहीं की गई है।
262 ईसा पूर्व में अशोक ने कलिंग पर हमला किया था जबकि लघु शिलालेखों से हमें पता है कि अशोक लगभग 2 साल पहले ही बौद्ध धर्म अपना चुका था। कोई भी बौद्ध ग्रंथ उसके धर्म परिवर्तन को युद्ध से नहीं जोड़ता और चार्ल्स ऐलन जैसे अशोक के प्रशंसक भी सहमत हैं कि उसने कलिंग युद्ध से पहले धर्म परिवर्तन कर लिया था। इसके अलावा धर्म परिवर्तन करने से एक दशक पहले से उसके बौद्धों के साथ संबंध प्रतीत होते हैं। यह साक्ष्य साबित करता है कि उसका बौद्ध धर्म अपनाना उत्तराधिकार की राजनीति ज्यादा रही होगी, युद्ध की त्रासदी से उपजा पश्चाताप कम।
शायद मौर्य वैदिक दरबार के रीति-रिवाजों का पालन करते थे (निश्चित ही उनके कई उच्चाधिकारी ब्राह्मण थे) लेकिन निजी जिंदगी में उनके असंकीर्ण धार्मिक जुड़ाव थे। प्रतीत होता है वंश का संस्थापक चंद्रगुप्त वृद्धावस्था में जैनियों के संपर्क में था, जबकि उसका पुत्र बिंदुसार आजीवक नाम के एक नास्तिक संप्रदाय का पक्षधर था। भारतीय धर्मों के परिवार में यह कोई असामान्य प्रबंध नहीं है। आज भी यह शानदार खुली नीति कायम है और भारतीय धर्मों के अनुयायी एक-दूसरे के पूजा स्थलों पर प्रार्थना करने में कोई दोष नहीं मानते हैं।
तो यह हो सकता है कि जब अशोक ने सिंहासन पर कब्जा किया तो परिवार के उन लोगों ने उसका विरोध किया हो जिनके जैनों और आजीवकों से संबंध थे। उसने समर्थन पाने के लिए उनके विरोधी बौद्धों से संपर्क करके इसका जवाब दिया हो सकता है।
उसके धर्म परिवर्तन की पटकथा में कलिंग पर उसके आक्रमण का विशेष स्थान है। मुख्यधारा का मानना है कि कलिंग स्वतंत्र राज्य था जिस पर अशोक ने हमला किया था लेकिन यह मानने के कुछ कारण मौजूद है कि कलिंग या तो विद्रोही प्रांत था या ऐसा अधीनस्थ जिस पर अब विश्वास नहीं किया जा सकता था।
हम जानते हैं कि मौर्यों का पूर्ववर्ती नंद वंश पहले ही कलिंग को जीत चुका था और इसलिए यह संभव है कि जब चंद्रगुप्त ने साम्राज्य की बागडोर संभाली तो यह मौर्य साम्राज्य का हिस्सा बन गया। जो भी हो, यह अजीब लगता है कि मौर्यो के समान बड़े और विस्तारवादी साम्राज्य ने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र और उसके मुख्य बंदरगाह ताम्रलिप्त के इतने करीब मौजूद एक स्वतंत्र राज्य को बर्दाश्त किया होगा। दूसरे शब्दों में, बिंदुसार के अधीन कलिंग पूरी तरह से स्वतंत्र राज्य नहीं रहा होगा -वह याँतो एक प्रांत रहा होगा या नजदीकी अधीनस्थ। स्पष्ट रूप से अशोक के शासन के शुरू के सालों में कोई बदलाव जरूर आया होगा और मेरा अनुमान है कि इसने या तो उत्तराधिकार की लड़ाई में अशोक के शत्रुओं का साथ दिया होगा या इस सारी गड़बड़ी में खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया होगा।
अशोक का क्रोध जगाने की असली वजह कुछ भी रही हो मगर 262 ईसा पूर्व में एक विशाल मौर्य सेना ने कलिंग पर हमला किया। अशोक के अपने अभिलेख बताते हैं कि युद्ध में एक लाख लोग मारे गए थे और उससे भी बड़ी तादाद में लोग जख्मो औऱ भूख से मरे थे। इसके अलावा डेढ़ लाख लोगों को बंदी बनाया गया था।
आधिकारिक कहानी के मुताबिक अपनी ही निर्ममता को देखकर अशोक सहम गया और बौद्ध व शांतिप्रिय बन गया। मगर जैसा कि हमने देखा है, उस समय तक वह धर्म का पालन करने वाला बौद्ध हो चुका था, और उसके प्रारंभिक शासन से हमें जितना पता है, वह ऐसा इंसान तो कतई नहीं था जो खून देखकर इतनी आसानी से विचलित हो जाता। उसके पश्चाताप का खास सुबूत उसके अपने अभिलेखों में मिलता है। मगर यह बहुत ही जिज्ञासा भरा है क्योंकि हम इस “पश्चाताप” का जिक्र केवल उड़ीसा से दूर स्थित स्थानों पर मिले अभिलेखों में ही पाते हैं (जैसे उत्तर-पश्चिम पाकिस्तान के शाहबाजगढ़ी में)। ओडिशा में मिले किसी भी अभिलेख में पश्चाताप नहीं झलकता; धौली में अशोक के अभिलेख पहाड़ी की तली में एक चट्टान पर खुदे हुए हैं। उन्हें पढ़ने वाले किसी भी व्यक्ति का इस ओर ध्यान जरूर जाएगा कि ये पश्चाताप के किसी संकेत तक का भी जिक्र नही करते । ये खामोशी चुभती है।
अगर अशोक को वाकई पश्चाताप हुआ था, तो वह यकीनन उन लोगों से माफी मांगने की जहमत उठाता जिनके साथ उसने गलत किया था। यह तो दूर, उसने बंदियों को आजाद करने तक की पेशकश नहीं की, बाद में इन कैदियों ने अपने आपको खेतिहर-दासों के रूप में पाया। तथाकथित रूप से पश्चाताप भरे अभिलेखों तक में वन्य जनजातियों समेत दूसरे समूहों के खिलाफ हिंसा की स्पष्ट धमकी है। जिनमें स्पष्ट रूप से ‘उन्हें दंड देने की शक्ति के बारे में बताया जाता है जो प्रायश्चित करने के बावजूद देवनामप्रिय के पास है, जिससे वे अपने अपराधों पर शर्मिंदा हो और मारे ना जाएं।’ यह तो बिल्कुल भी शांतिप्रियता नहीं है।
काफी रोचक है कि बौद्ध साहित्य में अशोक को एक क्रूर व्यक्ति के रूप में तभी तक दर्शाया गया है जब तक कि उसने बौद्ध धर्म को स्वीकार नहीं कर लिया और बौद्ध धर्म में धर्मांतरण की घटना लगभग ‘आकस्मिक’ परिस्थितियों में हुई ऐसा भी बतलाया जाता है। इतिहास की ‘रेखीय प्रकृति’ में विश्वास इसकी वजह हो सकता है, लेकिन हम जानते है कि इतिहास सीधी रेखाओं पर नही चलता। समान परिस्थितियां यां सिद्धांत भी भिन्न परिणाम पैदा करती है।
अशोकावदान की एक कथा में ये वर्णित है कि अशोक अपनी कुरूपता के कारण अपने पिता बिंदुसार का प्रिय नहीं था। अशोक ने बिंदुसार द्वारा चयनित उत्तराधिकारी, सुसीम को अपदस्थ कर (उसने ऐसा यूनानी सेनिको की मदद से किया था) शासन की बागडोर संभाली थी। वास्तविक उत्तराधिकारी को जलते कोयले की खाई में डलवा दिया। सत्ता में आने के बाद उसने मंत्रियों की विश्वसनीयता की परीक्षा ली। उनमें से 500 का उसने स्वंम सिर कलम किया, जो उसकी अपेक्षा पर खरे नहीं उतर सके।
अशोक ने अपने परिवार के सभी पुरुष प्रतिद्वंदियों को मरवा दिया था। बौद्ध ग्रंथ बताते है कि उसने अपने सगे भाई तिस्सा को छोड़कर बांकी सभी निन्यानबे भाइयों को भरवा दिया था। इस हद्द-दर्जे की क्रुरता के वाले ग्रहयुद्ध के बाद 270 ईसा पूर्व, में आखिरकार वह राजा बना था।
एक बार राजप्रसाद के अन्तःपुर की किसी स्त्री के व्यवहार से अशोक ने स्वयं को अपमानित महसूस किया, उसने बदले में वहां की सभी स्त्रियों को जिंदा जलवा दिया। यातनाएं उसे अभिभूत करती थी। उसने एक नर्क का भी निर्माण करवा रखा था। यह एक प्रकार का एक ‘यातना कक्ष’ था जिसके दृश्यों से वह आनंदित होता था। वहां दुर्भाग्यशाली कैदियों को प्रताड़ना दी जाती थी।
जुआन-जांग जो 7वीं सदी में भारत आया था, उसने अपने यात्रा वृत्तांत में अशोक के इस यातना-स्थल की चर्चा की है।
अशोकावदान ही एक दूसरी जगह बताती है कि कथित रूप से शांतिप्रिय होने के कई साल बाद भी सम्राट द्वारा नरसंहार के अनेक कृत्य किए गए थे जो विशेष तौर पर जैन और आजीवन सम्प्रदाय के खिलाफ थे। सभी उपलब्ध जानकारी के अनुसार वह मुख्यधारा के हिंदुओं के साथ टकराव से बचा था और ब्राम्हणों के प्रति सम्मानपूर्ण था। अशोकावदान याद करता है कि किस तरह एक बार बंगाल में अशोक ने अठारह हजार आजीवकों को एक साथ मौत के घाट उतरवा दिया था। अगर यह सच है, तो भारतीय इतिहास में बड़े पैमाने पर हुई धार्मिक हत्याओ का यह पहला ज्ञात उदाहरण है (मगर, अफसोस कि आखिरी नही)।
अशोकावदान में वर्णित ये एकमात्र घटना नही है। पाटलीपुत्र के एक जैन श्रद्धालु को एक तस्वीर बनाते हुए पाया गया जिसमें बुद्ध एक जैन तीर्थंकर के आगे नमन कर रहे थे। अशोक ने आदेश दिया कि उसे और उसके परिवार को उसके घर में बंद कर दिया जाए और भवन को जला दिया जाए। फिर उसने आदेश दिया कि जैनो के हर कटे सिर के लिए, वह एक असर्फी देगा। यह संहार तब जाकर रुका जब किसी ने गलती से अशोक के अपने एकमात्र बचे सगे भाई बौद्ध भिक्षु वीतशोक (इसे तिस्सा भी कहा जाता था) को मार दिया।
यह कहानी आज के कट्टरपंथियों से डरावने समानांतर की ओर इशारा करती है जो उन कार्टूनिस्टों को मार देते है जिन पर वे अपने धर्म के अपमान का आरोप लगाते हैं।
धम्म अगर स्वर्ग के लाभ देने वाला था तो प्रशासन, सांसार के लाभ देता!
शोक की निर्ममता के अलावा हमारे पास यह मानने के भी कारण है कि अशोक सफल प्रशासक नहीं था। अशोक ने अपने जीवित रहते ही अपने साम्राज्य को बिखरते हुये देखा। जिसमें चंद्रगुप्त के समय, सेल्युकस से हांसिल किया गया राज्य का उत्तर-पश्चिमी भाग भी था। 232 ईसा पूर्व, में ही जब अशोक की मृत्यु को कुछ ही समय बीता था, सातवाहनों ने दक्षिण भारत के ज्यादातर हिस्सो पर कब्जा कर लिया और कलिंग भी अलग हो गया।
जरा सी सावधानी के साथ विश्लेषन करने पर यह समझा जा सकता है कि अशोक की महानता संदिग्ध है। वह एक क्रूर, अलोकप्रिय और राज्य हड़पने वाला नजर आता है जिसने अपने पिता और दादा के बनाए एक विशाल और सुव्यवस्थित साम्राज्य को तोड़ने का काम किया। कम से कम यह तो स्वीकार करना ही होगा कि अशोक की महानता के साक्ष्य बहुत कमजोर है और ज्यादा से ज्यादा यह कह सकते हैं कि वह गंभीर संदेह के दायरे में है।
अशोक का अध्ययन इस मायने में आज उपयोगी हो गया है कि इससे हम आज के नेताओ की ‘लफ्फाजी’ के ऐतिहासिक उद्गगम का पता लगा सकते है।
लेकिन अशोक के अभिलेखों में उसका जो शानदार चेहरा दिखता है, उसका क्या?
संभव है कि अशोक निर्ममता की अपनी छवि को दूर करने के लिए अपने अभिलेखों को राजनीतिक प्रोपेगेंडा के साधन की तरह इस्तेमाल कर रहा हो। जैसा कि किसी भी नेता से उम्मीद की जाती हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि उसने अपना व्यवहार बदल लिया था। इसके अलावा उसके अनेक अभिलेख ऐसे स्थानों पर लगे हैं जहां उस काल का औसत नागरिक या अधिकारी उन्हें पढ़ नहीं सकता था। नयनजोत लाहिरी समेत कई इतिहासकारों ने इस पर हैरानी जताई है। क्या यह मुमकिन है कि कुछ अभिलेख असल में उसके समकालीनो के लिए नहीं बल्कि बाद की पीढ़ियों के लिए थे? (संभवतः उसके आधुनिक प्रसंसको के लिये?)
चार्ल्स एलन जैसे पश्चिमी लेखको ने ‘श्वेत व्यक्ति के भार’ वाले अभिमान के साथ लिखा है कि किस तरह भारतीयों ने अशोक जैसे महान राजा के लिए संम्मान न दिखाकर मूर्खता की। करीब से देखने पर प्रतीत होता है कि उन्हें पता था कि वो क्या कर रहे हैं। ज्यादा चिंता की बात यह है कि आधुनिक भारतीयों ने कितनी आसानी से इतने कम साक्ष्यो पर आधारित कथानक को कैसे स्वीकार कर लिया है?
जरूरी नहीं कि सच आपको सूट ही करे।
अशोक के समर्थक दावा कर सकते हैं कि ये घटनाएं झूंठी है और बहुत बाद में कट्टरपंथी बौद्ध लेखको ने जोड़ी है। हालांकि यह पूरी तरह संभव है मगर मैं उन्हें याद दिलाना चाहूंगा कि मेरा वैकल्पिक कथानक भी उन्हीं ग्रंथों पर आधारित है जो अशोक की प्रशंसा करते हैं। शायद सारे साक्ष्य पर समान संदेह भाव को समान रुप से लागू करना चाहिए, न कि ग्रंथ के ऐसे कुछ हिस्सों पर जो मुख्यधारा के कथानक को संतुष्ट नही करते।
सस्ते वैचारिक मंतव्य कुछ भी हों पर अकादमिक तथ्य नही होते।
ऐसे कथानकों के फलने फूलने की वजहें तो अनेक है लेकिन यहां एक बात स्पष्ट करने की ज्यादा ज़रूरत है। आज के दौर में, गंभीर रिसर्च के लिए पैसे उपलब्ध नहीं हैं। इतिहास विभागों के गिरते स्तर के मद्देनज़र महंगी तथ्यात्मक रिसर्च पर सस्ते वैचारिक लेखों को हमेशा प्राथमिकता मिलेगी। ऐसे माहौल में कहानियां बुनने वाले हमेशा जीतते हैं। इस खेल में धोखा सिर्फ भोली जनता खाती है, जो इन हवाई कथानकों में अपनी पहचान खोजती है। वरना अकादमिक प्रतिष्ठानों और उनके भड़काऊ प्रतिनिधियों के लिए ये एक कमाऊ तरीका है और लक्षित राजनीतिक नेता इसे पसंद करते हैं- ऐसे किरदारों के सहारे जितना सामुदायिक चिह्नीकरण को बढ़ावा मिलेगा, उन्हें उतने ही अधिक वोट मिलेंगे. यानि ये सबके लिए फायदे वाली स्थिति है सिवाय इतिहास के। मैं आजादी चाहूंगा, इस ‘धोखाधड़ी’ के खिलाफ होने की।।
आँखे फोड़ने के बाद उनकी खाल भी उतारी। उसके बाद नमक का पानी डाला गया। फिर भी उन्होने इस्लाम नहीं कबूला। हाथ पाव तोड़कर उनके सर को काँटा गया। फिर भी उन्हें सनातन धर्म ही भाया।
छत्रपती संभाजी महाराज की जय।
ऊपर के पंक्ति में मुझे नाम बताने कि आवश्यकता नहीं आप खुद ही समझ गए होंगे की मैं किस महावीर, महानायक के बारे में बात कर रहा हूँ। छत्रपति शिवाजी महाराज जी के पुत्र छत्रपति संभाजी महाराज जी के वीर गाथा और उनके बलिदान के बारे में लिखू तो उपन्यास बन जाएगा पर मैं कोशिश करता हूँ उनके बारे में कम से कम शब्दो में आपको बताने का।वैसे शूरता-वीरता के साथ निडरता का वरदान भी संभाजी को अपने पिता शिवाजी महाराज से मानों विरासत में प्राप्त हुआ था।शिवाजी राजे के जेष्ठ पुत्र ने केवल १३ साल की उम्र में १३ भाषाएं सीखी। जिनमे अधिक तर यूरोपियन भाषा है। लेकिन संस्कृत भाषा और प्राकृत मराठी भाषा का दामन नहीं छोड़ा।छत्रपति बनते ही ९ सालो में १२१ लाढ़ाईया लड़ी। लेकिन एक भी नहीं हारे।संभाजी महाराज का जीवन एवं उनकी वीरता ऐसी थी कि उनका नाम लेते ही औरंगजेब के साथ तमाम मुगल सेना थर्राने लगती थी। संभाजी के घोड़े की टाप सुनते ही मुगल सैनिकों के हाथों से अस्त्र-शस्त्र छूटकर गिरने लगते थे।औरंगजेब खुद दिल्ली छोड़ उनके पीछे पीछे भागता रहा। लेकिन हमेशा पीटा।
छत्रपति शिवाजी की रक्षा नीति के अनुसार उनके राज्य का किला जीतने की लड़ाई लड़ने के लिए मुगलों को कम से कम एक वर्ष तक अवश्य जूझना पड़ता। छत्रपति शिवाजी महाराज जी के बाद संभाजी महाराज की वीरता भी औंरगजेब के लिए अत्यधिक अचरज का कारण बनी रही। उन्होंने अपने पिता की जुझारु एवं दूरदर्शी रक्षा नीति को चार-चांद लगाने का कार्य उस समय कर दिखाया कि जब उनका रामसेज का किला औरंगजेब को लगातार पांच वर्षों तक टक्कर देता रहा। औरंगजेब को स्वीकार करना पड़ा कि संभाजी पर विजय पाना तो दूर, उन्हें परास्त करने के लिए प्रभावी नीति चुनौती है। संभाजी महाराज पर नियंत्रण के लिए उसने तीन लाख घुड़सवार और चार लाख पैदल सैनिकों की फौज लगा दी। लेकिन वीर मराठों और गुरिल्ला युद्ध के कारण मुगल सेना हर बार विफल होती गई।औरंगजेब ने बार-बार पराजय के बाद भी संभाजी से महाराज से युद्ध जारी रखा। इसी दौरान कोंकण संभाग के संगमेश्वर के निकट संभाजी महाराज के ४०० सैनिकों को मुकर्रबखान के ३००० सैनिकों ने घेर लिया और उनके बीच भीषण युद्ध छिड़ गया। इस युद्ध के बाद राजधानी रायगढ़ में जाने के इरादे से संभाजी महाराज अपने जांबाज सैनिकों को लेकर बड़ी संख्या में मुगल सेना पर टूट पड़े।
मुगल सेना द्वारा घेरे जाने पर भी संभाजी महाराज ने बड़ी वीरता के साथ उनका घेरा तोड़कर निकलने में सफल रहे। इसके बाद उन्होंने रायगढ़ जाने की बजाय निकट इलाके में ही ठहरने का निर्णय लिया। मुगल इसी सोच और हताशा में था कि संभाजी इस बार भी उनकी पकड़ से निकलकर रायगढ़ पहुँचने में सफल हो गए, लेकिन इसी दौरान बड़ी गड़बड़ हो गई कि एक मुखबिर ने मुगलों को सूचित कर दिया कि संभाजी रायगढ़ की बजाय एक हवेली में ठहरे हुए हैं। यह बात आग की तरह औरंगजेब और उसके पुत्रों तक पहुँच गई कि संभाजी एक हवेली में ठहरे हुए हैं। जो कार्य औरंगजेब और उसकी शक्तिशाली सेना नहीं कर सकी, वह कार्य एक मुखबिर ने कर दिया। इसके बाद भारी संख्या में सैनिकों के साथ मुगल सेना ने हवेली की ओर कूच कर उसे चारों तरफ से घेर लिया। संभाजी को हिरासत में ले लिया गया।
15 फरवरी, 1689 का यह काला दिन इतिहास के पन्नों में दर्ज है। संभाजी की अचानक हुई गिरफ्तारी को लेकर औरंगजेब और पूरी मुगलिया सेना हैरान थी। संभाजी का भय इतना ज्यादा था कि पकड़े जाने के बाद भी उन्हें लोहे की जंजीरों से बांधा गया। बेडि़यों में जकड़ कर ही उन्हें औरंगजेब के पास ले जाया गया। इससे पूर्व उन्हें ऊंट की सवारी कराकर काफी प्रताडि़त किया गया।
संभाजी महाराज को जब ‘दिवान-ए-खास’ में औरंगजेब के सामने पेश किया गया औरंगजेब के सामने संभाजी राजे और कवराज बंदी अवस्था में खड़े थे। औरंगजेब से आज तक किसीकी हिम्मत नहीं हुई थी नजर से नजर मिलाने की। लेकिन संभाजी राजे सर बिना नीचे झुकाए उसके नजर से नजर मिला रहे थे। इस पर संभाजी के साथ कैद कवि कलश ने कहा-‘हे राजन, तुव तप तेज निहार के तखत त्यजो अवरंग।’ “आखे निकाल दो इस काफीर कि” औरंगजेब गुस्से से बोला और उसने कपडे से बंधा हुआ मुह खोलने का आदेश दिया।
“सुवर् के औलाद, हम मराठा शेर जैसे जीते है और शेर जैसे मारते है।” मुह के ऊपर का कपड़ा खुलते हुए गुस्से से बोले। औरंगजेब का आज तक ऐसा अपमान किसीने नहीं किया था। औरंगजेब गुस्से से लाल हो गया।
“आखे निकालने से पहले इसकी जबान काट डालो और ये सजा पहले इस कवी पर आजमाओ” औरंगजेब निकल गया पर जाने से पहले उसने एक धूर्त चाल चली। उसे लगा जब कविराज पर ये सजा आजमाई जाएगी तब संभाजी राजे का दिल टूट जायेगा और स्वयं के प्राणों की रक्षा हेतु वह इस्लाम कबूल कर लेंगे, लेकिन औरंगजेब को मालूम नहीं था ये शेर का छावा था अपने धर्म पर मर मिटने वाला । उसे मृत्यु का भय नहीं था।
कविराज की पहले जबान काटी गई। आँखें निकाली गयी। यही सजा बाद में संभाजी राजे को दी गयी। इतनी कठिन सजा भुगतने के बाद भी दोनों के मुख से एक भी आवाज नहीं निकली। यह देखकर इखलास खान भड़क गया। उसने नए जल्लाद की फ़ौज बुलाई और उन्हें आदेश दिया,”देखते क्या हो उखाड़ दो इनकी खाल और डालो नमक का पानी इन काफिरों पर” इखलास चिल्लाया। जल्लाद आगे बढे। दोनो की खाल उखड़ी गई।
इस घटना के बाद से ही संभाजी ने अन्न-जल का त्याग कर दिया। उसके बाद सतारा जिले के तुलापुर में भीमा-इन्द्रायनी नदी के किनारे संभाजी महाराज को लाकर उन्हें लगातार प्रताडि़त किया जाता रहा और बार-बार उन पर इस्लाम कबूल करने का दबाव डाला जाने लगा। आखिर में उनके नहीं मानने पर संभाजी का वध करने का निर्णय लिया गया। इसके लिए 11 मार्च, 1689 का दिन तय किया गया क्योंकि उसके ठीक दूसरे दिन हिन्दू वर्ष प्रतिपदा थी। औरंगजेब चाहता था कि संभाजी महाराज की मृत्यु के कारण हिन्दू जनता वर्ष प्रतिपदा के अवसर पर शोक मनाये। उसी दिन सुबह दस बजे संभाजी महाराज और कवि को एक साथ गांव की चौपाल पर ले जाया गया। पहले कवि कलश की गर्दन काटी गई। उसके बाद संभाजी के हाथ-पांव तोड़े गए, उनकी गर्दन काट कर उसे पूरे बाजार में जुलूस की तरह निकाला गया।
संभाजी महाराज जी ने अपने प्राणों का बलिदान कर हिन्दू धर्म की रक्षा की और अपने साहस व धैर्य का परिचय दिया। उन्होंने औरंगजेब को सदा के लिए पराजित कर दिया।देश धरम पर मिटने वालाशेर शिवा का छावा था।महा पराक्रमी परम प्रतापीएक ही शंभू राजा था।।तेजपुंज तेजस्वी आंखेंनिकल गयीं पर झुका नहीं।दृष्टि गयी पर राष्ट्रोन्नति कादिव्य स्वप्न तो मिटा नहीं।।दोनों पैर कटे शंभू केध्येय मार्ग से हटा नहीं।हाथ कटे तो क्या हुआसत्कर्म कभी तो छूटा नहीं।।जिह्वा कटी खून बहायाधरम का सौदा किया नहीं।शिवाजी का ही बेटा था वहगलत राह पर चला नहीं।।वर्ष तीन सौ बीत गये अबशंभू के बलिदान को।कौन जीता कौन हारापूछ लो संसार को।।मातृभूमि के चरण कमल परजीवन पुष्प चढ़ाया था।है राजा दुनिया में कोईजैसा शंभू राजा था।।’ -द. वा. आंबुलकरछत्रपति संभाजी महाराज का इतिहास वामपंथियों ने दबा दिया।इसका एक प्रमुख कारण है। क्योंकि छत्रपति शिवाजी महाराज के देह त्याग के बाद औरंगजेब ने अपना धर्म परिवर्तन का कार्य तीव्र कर दिया था।एक बात तो स्पष्ट है कि जो कार्य औरंगजेब और उसकी सेना आठ वर्षों में नहीं कर सके, वह कार्य एक भेदिये ने कर दिखाया
संभाजी महाराज जी ने अपने प्राणों का बलिदान कर हिन्दू धर्म की रक्षा की और अपने साहस व धैर्य का परिचय दिया। उन्होंने औरंगजेब को सदा के लिए पराजित कर दिया।देश धरम पर मिटने वालाशेर शिवा का छावा था।महा पराक्रमी परम प्रतापीएक ही शंभू राजा था।।तेजपुंज तेजस्वी आंखेंनिकल गयीं पर झुका नहीं।दृष्टि गयी पर राष्ट्रोन्नति कादिव्य स्वप्न तो मिटा नहीं।।दोनों पैर कटे शंभू केध्येय मार्ग से हटा नहीं।हाथ कटे तो क्या हुआसत्कर्म कभी तो छूटा नहीं।।जिह्वा कटी खून बहायाधरम का सौदा किया नहीं।शिवाजी का ही बेटा था वहगलत राह पर चला नहीं।।वर्ष तीन सौ बीत गये अबशंभू के बलिदान को।कौन जीता कौन हारापूछ लो संसार को।।मातृभूमि के चरण कमल परजीवन पुष्प चढ़ाया था।है राजा दुनिया में कोईजैसा शंभू राजा था।।’ -द. वा. आंबुलकरछत्रपति संभाजी महाराज का इतिहास वामपंथियों ने दबा दिया।इसका एक प्रमुख कारण है। क्योंकि छत्रपति शिवाजी महाराज के देह त्याग के बाद औरंगजेब ने अपना धर्म परिवर्तन का कार्य तीव्र कर दिया था।
छत्रपति संभाजी महाराज ने औरंगजेब का हर धर्म पर्वतन का प्रयत्न असफल कर दिया । और बहुत लोगो को तलवार की धार पर मुस्लिम बनने से रोक दिया। शायद इसी लिए उन्हें शालेय किताबो से दूर कर दिया गया।
संभाजी महाराज के जाने से मराठा साम्राज्य बिखरा नहीं उल्टा और बड़ा हुआ।लगभग पूरा भारत जीतने वाले स्वदेशी मराठा साम्राज्य ने अफ़ग़ानिस्तान तक अपनी सीमाओं को बढ़ाया।आपको स्कूलों में यह सिखाया गया होगा के मुगलों के गिरने से अंग्रेज़ ताकतवर हुए।सच बात तो यह है के मुग़ल स्वराज के वजह से सिर्फ दिल्ली तक सिमट कर रह गए थे।स्वराज गिरा इसी लिए अंग्रेजो की ताकत बढ़ी।मुग़ल तो कब के कमजोर हो गए थे।छत्रपति शिवाजी महाराज के पुत्र छत्रपति संभाजी महाराज के जीवन को यदि चार पंक्तियों में संजोया जाए तो यही कहा जाएगा कि:
देश धरम पर मिटने वाला, शेर शिवा का छावा था।
महा पराक्रमी परम प्रतापी, एक ही शंभू राजा था।।’आखिर में इतना कहता हूं के “खुदको बादशाह ए हिंदुस्तान कहलवाने वाला औरंगजेब मृत्यु शैय्या में बोला था के ऐ अल्लाह तूने मेरे एक भी बेटे को क्यों ऐसा नहीं बनाया। अगर मेरा एक भी बेटा उस शिवा (छत्रपति शिवाजी महाराज) का बेटा संभा(छत्रपति संभाजी महाराज) की तरह होता तो मै चैन से मरता।”
लॉक डाउन के दौरान सोमवार की शाम पीरटांड़ प्रखंड के खुखरा थाना अंतर्गत तुइयो गांव के एक सरकारी तालाब में गाय का चमड़ा फेंके जाने का मामला प्रकाश में आया। घटना के बाद तुरंत ही आसपास के लोग जुटे और मामले की सूचना पुलिस को दी। मंगलवार को पीरटांड़ के अंचल निरीक्षक रामनरेश सिंह, खुखरा थाना के एएसआई नितिन झा सदल बल घटनास्थल पर पहुंचे और मामले की जांच कर गाय के खाल को जेसीबी के माध्यम से जमीन के अंदर गड़वा दिया।
इस बाबत वहां के ग्रामीण बबलू उर्फ़ बासुदेव कुमार यादव ने बताया कि सोमवार की देर शाम वह शौच के लिए तालाब के पास गया था। शौच कर हाथ मुंह धोकर वह वापस घर लौट ही रहा था। तभी उसने लाल गाड़ी से किसी को तालाब के पास आते देखा पर उसने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। लेकिन फिर उसे छापक की आवाज सुनाई दी ऐसा लगा जैसे किसी ने कुछ भारी चीज पानी में फेका हो। आवाज़ सुनकर बासुदेव को लगा शायद कोई तालाब में गिर गया। उसने आवाज लगाई और पूछा कि क्या हुआ। लेकिन किसी ने कोई उत्तर नहीं दिया बल्कि गाड़ी से आए लोगों ने भागो भागो कहते हुए भागना शुरू किया। यह सुनते हुए बासुदेव को शक हुआ और वह फौरन तालाब के पास पहुंचा। वहां पहुंचते ही बासुदेव अचंभित रह गया क्योंकि वहां उसे गाय का चमड़ा/खाल पड़ा हुआ दिखा।
ग्रामीण बासुदेव यादव
बासुदेव का कहना है कि मुस्लिम समुदाय के लोगों ने ही गाय को काटकर उसका खाल बोरेे में भरकर तालाब में फेंका है। बताया कि इसी तालाब में गांव के लोग लोक आस्था का महापर्व यानी छठ पूजा करते हैं।इसी तालाब में लोग हाथ मुंह भी धोते हैं। इसलिए उन लोगों को ऐसा नहीं करना चाहिए था। हो हल्ला मचने पर तुरंत ही आसपास के लोग घटनास्थल पर पहुंचे और मामले की संवेदनशीलता समझते हुए प्रशासन को इस बात की सूचना दी। मंगलवार को पीरटांड़ के अंचल निरीक्षक रामनरेश सिंह, खुखरा थाना के एएसआई नितिन झा आदि सदल बल संबंधित तालाब के पास पहुंचे और जांच पड़ताल शुरू की।
मामले की संवेदनशीलता को समझते हुए तुरंत ही इलाके में पुलिस जवानों ने मोर्चा संभाल लिया। जिसके बाद जेसीबी के माध्यम से गाय के खाल को जमीन के अंदर गड़वा दिया। बासुदेव यादव ने कहा कि जब उसने चमड़े के फॉरेंसिक जांच के बाद कहीं तो पुलिस पदाधिकारियों ने कहा कि देखने से ही यह स्पष्ट हो जा रहा है कि यह गाय का मांस है इसलिए फॉरेंसिक जांच की जरूरत नहीं है। इस पर गांव वालों ने भी हामी भरी जिसके बाद खाल को जमीन में गाड़ दिया गया। फिलहाल पुलिस मामले की गहन पड़ताल कर रही है। भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार प्रत्यक्षदर्शी ग्रामीण बासुदेव यादव ने गांव के ही एक व्यक्ति के खिलाफ खुखरा थाना में मामला दर्ज करवाते हुए दोषी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। साथ ही अपनी जान को खतरे में बताते हुए पुलिस से सुरक्षा प्रदान करने की गुहार लगाई है।
The fiction writers of the Left who wrote our history had a habit of appropriating various personalities. Appropriate, in this context means “take (something) for one’s own use, typically without the owner’s permission”. They ‘put’ such figures in ‘boxes’ they created to make it look like they were their descendants. It was a propaganda carried out posthumously (after death) making it more convenient. Another reason was that it became more acceptable to use the shoulder of someone else to fire from. Something which they realised as they knew they lacked relevance, themselves. Netaji Subhash Chandra Bose and Bhagat Singh were two such personalities who got ‘appropriated’ like that.
Netaji Bose and Bhagat Singh
Netaji Bose was mocked and taunted by Indian communists with jibes like ‘Tojo’s dog’, when he was alive. But, they admitted it was a mistake after almost half a century later, when they lost popularity. They found it more convincing to prop him up as a Communist like them and use that perception to counter the regime of today.
Indian Communists abusing SC Bose
Bhagat Singh, who has been ‘appropriated’ by the Communists, was not a part of the the Communist Party of India (CPI). He formed the HSRA (Hindustan Socialist Republican Association) and carried on his work. He did not name it as First/Second International. He fought and gave his life for Indian Independence.
Shehla Rahsid’s attempts to turn Bhagat Singh into a Communist
While the propagandists will emphasise that he read Lenin, they won’t tell you about his praise for Swami Vivekananda. Nor would they tell you that he published Veer Savarkar’s book, secretly in India. ‘The Indian War of Independence’ was Savarkar’s book which was banned by the British. Here’s a snippet from the book.
Snippet from Veer Savarkar’s The Indian War of Independence
Support for Savarkar
Veer Savarkar’s daring act of making an escape at the Marseilles port also won’t be known to many. It was not just a physical act of extreme courage but, a well thought out strategy too. He knew the legal and diplomatic implications on the British empire, even if they managed to catch him on French soil. Read this to know more about the attempt to escape at Marseilles and how he got betrayed.
Savarkar’s jump and subsequent recapture had taken the international community by storm. The French socialist press protested. There were two reasons for it – violating rights of Savarkar and the French sovereignty. The French Ambassador in London condemned the arrest of Savarkar. When this matter reached before the Hague Tribunal, it was the liberals and communists who supported him. It was Karl Marx’s grandson who represented him, there.
Why is he hated now?
Savarkar was a staunch Hindu nationalist though he was NOT the traditional gau sevak or a devotee. But, he was a reformer, who fought hard to abolish the evils of caste discrimination. His works called for unity of India and the emphasis of Hindutva (Hinduness), which have made him revered among the nationalists. RSS’s affinity towards Hindutva has made the leftists forget that he was not its founder. Savarkar’s Hindu Maha Sabha and RSS may have had overlapping goals but, they had differences and were not clones.
It was the Congress which continued to attack Savarkar the most, years after his death. They feared that once Indians got to know Savarkar fully, Nehru and the Congress would be washed away. The fear of Indian Independence movement being democratised would mean the end of Nehru dynasty’s divine right to rule. Savarkar’s life would open a can of worms for them since it would include his meeting with freedom fighters like Rash Behari Bose, Madanlal Dhingra etc. Many such freedom fighters were not given a deserving position in the History written by Marxists.
But, in states like Maharashtra where Savarkar is revered, the Congress usually prefers not to vilify him. They know that such a misadventure would call for backlash, even from their allies. For the Left, it’s appeasement which stands in the way of appropriating him and turning him into a “Communist”. They found it harder to appropriate him than Ambedkar, whose views on Islam and Communism were almost successfully concealed.
This mad tussle from those corners to disown and attack Savarkar has slowly seen a change. As some players in the Congress ecosystem are coming up with ‘neutral opinions’ on him, it signals various changes in the anti Savarkar ecosystem. It may either be an attempt to appropriate him, or use him as a stick to beat today’s regime.
A Congress supporter, on Savarkar
However, as long as the main plank of today’s opposition parties remains as ‘Anti Hindutva’ (acceptable version of Anti Hindu), Savarkar may not be appropriated in the near future. The only ‘use’ they can put him to is to blame today’s regime for a long extinct caste system. Or Gau Seva, which is very much a part of our Constitution. They would find more votes coming in by attacking Savarkar, than keeping quiet on him or endorsing him. Especially when India’s largest party’s chief has a Savarkar portrait at home. Today, on Veer Savarkar’s birthday, it’s just another opportunity for Congress to castigate him.
वैसे तो आप रोज नया नया तरह के जिहाद का नाम सुनने की आदी हो चुके होंगे मुझे इस नए प्रकार का जिहादो का नाम सुनकर कुछ आश्चर्य नहीं होता और ये FIR jihad उन्हीं सब में एक हैं। जी न्यूज की सुधीर चौधरी जी ने जिहाद का क्या सटीक विशलेषन किया हैं लेकिन उन्होने भी सभी प्रकार के जिहादो के बारे में नहीं बता पाए आखिर इतने कम समय में वो कैसे बता पाते क्योकि जिहाद की शुचि बहुत लंबी हैं।
FIR Jihad के बारे में जानने से पहले article 295 और article 19 A के बारे में जानना जरूरी हैं।
Article 295 के अनुसार कोई भी जानबूझकर किसी भी भारतीय नागरिक के धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाता हैं या अपमान करता है या उनके धार्मिक विश्वास का मजाक उड़ाता हैं तो यह दंडनीय अपराध हैं और उन्हें तीन साल का जेल या जुर्माना या दोनो हो सकता हैं।
Article 19 ये हमे बोलने की स्वतंत्रता देती हैं यह हमे इस बात कि स्वतंत्रता देती है की हम अपनी विचार वक्त कर सके।
वैसे तो आज कल राष्ट्रवादीयो पर FIR करना एक फैशन बन गया है जैसे अर्णव गोस्वामी जी पर सिर्फ सोनिया गांधी का असली नाम लेने पर FIR करना हो या सुधीर चौधरी पर जमीन जिहाद का सच्चाई उजागर करने पर यहाँ हम ऐसे ही कुछ घटनाओ का जिक्र करेंगे।
1) झारखण्ड की फल विक्रेता
झारखण्ड मे एक फल विक्रेता पर सिर्फ इसलिए FIR हो गया की उन्होने अपनी दुकान का नाम हिन्दू फल दूकान रखा था। वह भी सिर्फ किसी का एक ट्वीट के चलते जैसे उन्हें कुछ और काम ही नहीं और ऐसी ही एक घटना कर्णाटक में भी घटी जब ठेला से भगवा पताको को हटा दिया गया।
वैसे यहा गौर करने वाली बात यह हैं की इनको हलाल सर्टिफिकेशन से कोई तकलीफ नहीं और नहीं मुस्लिम दुकानो के नाम पर मुसलमान तो हर जगह अपना झंडा लगाकर रखते हैं लेकिन किसी को कोई परेशानी नहीं होती। एक बार अजान मे जो लाउडस्पीकर से कहा जाता है उसके बारे मे भी पता कर लीजिए वो article 295 का उल्लंघन नहीं है?
2) ऑपइंडिया पर FIR
OpIndia के अजीत भारती जी पर सिर्फ इसलिए FIR टर दिया गया कि उन्होने एक पीड़ित बच्चे के पिता का बयान दिखाया ये अलग बात है की वो अपने बयान से बाद मे पलट गये।
यहाँ भी गौर करने वाली बात है कि The Wire, The Quint, The Print, NDTV हमेशा गलत समाचार चलाते हैं लेकिन उनपर कोई FIR नहीं होती और न ही वो माफी मांगते हैं। यहाँ article 19 काम करती हैं।
3) आचार्य अंकुर आर्य।
आचार्य जी के ऊपर आरोप लगाया गया की उन्होने ख्वाजा गरीब नवाब को हिजड़ा बोला लेकिन अभी तक ये सिद्ध नहीं कर पाया। पर अगर उन्होने ऐसा कहा भी तो उनसे पहले एक मौलाना साहब ने भी वही बात कही और गूगल भी वही मानती हैं।
पर उन्हें इस बात का पता लग गया होगा की उन्होने गलत व्यक्ति से पंगा ले लिया है क्योंकि उनके समर्थन मे जो ट्विटर पर सनातनी एकता दिखी वो इससे पहले कभी नहीं देखी।
वो FIR करके हमारी साहस को तोड़ना चाहते हैं पर ऐसा होने वाला नहीं। उनका सिर्फ एक ही ईलाज है की हमे भी article 295 को समझकर उसका सही इस्तेमाल करना होगा।
भारतीय मीडिया की एक महान विशेषता है कि उसके पास किसी अपराधी या आतंकी के अपराध को छुपा देने की रेसिपी है। ये इस प्रकार खबरों को चलाएंगे कि आपको पता भी नहीं चलेगा और आतंकी एक हीरो बना दिया जाएगा।
खबरें कुछ इस प्रकार होंगी,
रियाज नाइकू : गणित का मास्टर जो आतंकी बन गया लेकिन क्यों?
पुलवामा का वो आतंकी जो कभी क्रिकेट का बहुत बड़ा फैन था।
गरीब हेडमास्टर का बेटा क्यों बना हिजबुल कमांडर।
कहने का तात्पर्य यह है कि खबरें इस प्रकार चलाई जाएं कि आतंकियों का आतंकवाद द्वितीयक स्थिति में पहुँच जाए और प्राथमिक स्थिति में उनकी गरीबी, उनका पैशन और उनकी पारिवारिक स्थिति दिखाई दे।
यह सब आज से नहीं है। वामपंथी मीडिया गिरोह द्वारा यह कार्य दशकों से होता आया है लेकिन आज सोशल मीडिया की उपलब्धता और ऑपइंडिया जैसे मीडिया मंचों के कारण इस दुराग्रही मीडिया की सच्चाई हमारे और आपके सामने आ रही है। वास्तव में भारतीय मीडिया कभी भी भारत का हितैषी नहीं रहा है। दशकों से भारतीय मीडिया पर वामपंथियों और भारत विरोधी एजेंडा चलाने वालों का दबदबा रहा है लेकिन आज जब उन्हें राष्ट्रवादियों से अच्छी खासी प्रतिस्पर्धा मिल रही है, तब ये वामपंथी और भारत विरोधी मीडिया दूसरे मीडिया मंचों को गोदी मीडिया या बिकाऊ मीडिया जैसे नामों से पुकारने लगा।
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि मीडिया में अब ऐसे लोग नहीं हैं जो अपना भारत विरोधी एजेंडा चलाते हों। फ्रीडम ऑफ स्पीच के नाम पर इन्होने टेलीविजन और प्रिंट मीडिया में जबरदस्त गन्दगी मचा रखी है। अब तो डिजिटल मीडिया का भी समय अपने चरम पर है। यहाँ भी ऐसे लोग सक्रिय हैं जो आए दिन फैक्ट चेक और ग्राउंड रिपोर्ट के नाम पर भारत विरोधी और अंततः हिन्दू विरोधी एजेंडा चला रहे हैं।
ये ऐसे पत्रकार और मीडिया मंच हैं जिनका ध्यान कभी भी इस बात पर नहीं गया कि आतंकियों से लोहा लेते समय वीरगति को प्राप्त होने वाला सेना का जवान भी क्रिकेट का फैन हो सकता है या उसका पिता भी एक गरीब किसान या रेहड़ी-ठेला लगाने वाला एक साधारण सा व्यक्ति हो सकता है। वामपंथी संगठनों से चंदा लेने वाले आपको कभी भी उस माँ की कहानी नहीं बताएंगे जिसका एक बेटा पहले ही आतंकियों से लड़ते हुए उसे छोड़ गया था और अभी उसका दूसरा बेटा भी भारत की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर करने के लिए निकल गया है। आप कभी भी इन भारत विरोधी पत्रकारों से भारतीय सेना के शौर्य और बलिदान की कहानी नहीं सुनेंगे। सुनेंगे तो मात्र आतंकियों का जीवन परिचय।
आपने सुना होगा कि कई बड़े संगठनों के मुखपत्र होते हैं जैसे आरएसएस का मुखपत्र है पाञ्चजन्य, शिवसेना का मुखपत्र सामना है और भाजपा का कमल सन्देश।
उसी प्रकार आतंकियों के मुखपत्र हैं ये वामपंथी मीडिया समूह जो प्रत्यक्ष रूप से न सही किन्तु अप्रत्यक्ष रूप से आतंकियों का गुणगान करते रहते हैं। इनके लिए आतंकियों का मानवाधिकार सेना के उन जवानों से बढ़कर है जो दिन रात भारत की रक्षा के अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करते हैं। पाकिस्तान को भारत में अपना एजेंडा चलाने के लिए कभी भी बहुत ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती है। पाकिस्तान का यह कार्य भारत के अंदर रहने वाले पत्रकार और मीडिया हाउस आराम से करते रहते हैं। ये शब्दों का ऐसा जाल बिछाते हैं कि आपको पता भी नहीं चलता और आपके मन में आतंकियों के लिए सहानुभूति उत्पन्न हो जाती है। ये ऐसा चक्रव्यूह रचते हैं कि पाठक, श्रोता अथवा दर्शक उस वैचारिक चक्रव्यूह में घुस तो जाते हैं किन्तु निकलते उनकी मर्जी से ही हैं और अपने अंतःकरण में क्या लेकर निकलेंगे, इसका निर्धारण ये वामपंथी करते हैं।
वामपंथी मीडिया और प्रभाव समूहों की सबसे बड़ी विशेषता है कि ये अपने आपको भयंकर निष्पक्ष समूह के रूप में प्रदर्शित करेंगे किन्तु अंतिम तौर पर ये व्यवस्था विरोधी ही होंगे। भारत किसी भी रूप में अपनी सम्प्रभुता की रक्षा करे लेकिन भारत का एक बड़ा मीडिया समूह मात्र आलोचना ही करता है।
अब ये सोचना आपका कर्तव्य है कि क्या एक आतंकी को भारत में जिहाद फैलाने का अधिकार मात्र इस कारण मिल जाना चाहिए की वह एक गरीब हेडमास्टर का बेटा है। कोई आतंकवादी इस कारण दोषमुक्त किया जा सकता है क्योंकि वह धोनी का अथवा क्रिकेट का बहुत बड़ा फैन है। गणित पढ़ाने वाला मास्टर यदि भारत विरोध में बन्दूक उठाता है तो क्या वह आतंकी या जिहादी कहलाने योग्य नहीं रहा।
इस तर्क से देखें तो कश्मीरी पंडितों को नब्बे के दशक से ही हथियार उठा लेना चहिए था क्योंकि उनसे अधिक अन्याय तो भारत में आज तक किसी ने नहीं झेला। बंगाल और केरल के हिन्दुओं को भी हिंसा का मार्ग चुन लेना चाहिए क्योंकि आज जब लोकतंत्र अपने चरम पर है तब भी इन राज्यों में हिन्दू तुष्टिकरण की भेंट चढ़ रहे हैं। पकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यकों में भी रक्त पिपासा जागनी चाहिए क्योंकि इन तीनों देशों में तो उनका जीवन नर्क के समान हो चुका है। लेकिन हिन्दू ऐसा कभी नहीं कर सकता क्योंकि हिन्दू वास्तव में सहिष्णु है।
इन आतंकियों को दोष देने के स्थान पर ये वामपंथी सदैव से ही भारत की कश्मीर नीतियों और सेना के कार्यकलापों पर प्रश्न करते आए हैं। पहले यह बड़ा सरल था लेकिन जब से मीडिया और अन्य प्रिंट साधनों में राष्ट्रवादी और निर्भीक पत्रकार और कार्यकर्त्ता आते जा रहे हैं, वामपंथियों का कार्य कठिन हो गया है।
अब हमें क्या करना चाहिए? हमें करना ये चाहिए कि हम उन तमाम न्यूज और यूट्यूब चैनलों को देखना बंद करें जो भारत विरोध में एक भी अक्षर बोलें। हमें उस डिजिटल और प्रिंट मीडिया का बहिष्कार करना चाहिए जो हमारे राष्ट्र और धर्म पर खबरों के माध्यम से आघात करते हैं। हमारे और आपके दिए हुए चंदे की सहायता से ये टुटपुँजिए फ्रीडम ऑफ स्पीच का गलत लाभ उठाते हैं और भारत की जड़ें खोदते हैं। अपने विवेक का उपयोग कीजिए और पहचानिए कि कौन भारत के हित में है और कौन भारत के विरोध में।
जो भारत के हित में हैं उनका सहयोग कीजिए और जो भारत के विरोध में हैं उन्हें बता दीजिये कि भले ही कोई मास्टर अंग्रेजी पढ़ाए, गणित पढ़ाए अथवा विज्ञान किन्तु यदि भारत की अखंडता पर आघात करेगा तो ठोंक दिया जाएगा। भले ही कोई क्रिकेट, फुटबाल या हॉकी का फैन है लेकिन यदि भारत में जिहाद का सपना लेकर आएगा तो उससे जीवन का अधिकार छीन लिया जाएगा।
ऐसे न जाने कितने बुरहान वानी, रियाज़ नाइकू आए और चले गए लेकिन भारतवर्ष वैसा ही अनवरत अपनी यात्रा में आगे बढ़ रहा है और आगे भी बढ़ता रहेगा। यह प्रभु राम और श्री कृष्ण की कर्मभूमि है। यह मर्यादा में रहकर युद्ध करना भी जानता है तो अधर्म को अधर्म से ही कुचलना भी इसे अच्छी तरह से आता है।
श्री राम जन्मभूमि व प्रभु श्री राम जी की मंदिर के लिए हिन्दू समाज 450 वर्षों से भी अधिक समय से संघर्ष कर ही रहा था। अधक परिश्रम, संघर्ष, श्रद्धा ठीक वैसा ही जैसा प्रभु श्री राम जी की जीवन में संघर्ष थे, उनको भी आखिर में जीत मिली और हिन्दुओं की आस्था की भी जीत हुई।
अनगिनत तारीख मिले ना जाने किन किन कारणों से, षडयंत्रों से मंदिर निर्माण के कार्य को लटकाए रखा गया, सिर्फ अपनी राजनीतिक लाभ को साधने के लिए। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र में खुदाई के दौरान को साक्ष्य मिले है मां भारती के गर्भ से वो सिद्ध करता है कि सत्यता क्या है और कितना कठोर कोशिश की गई है हमारे आस्था को चोट पहुंचाने की। परंतु जब खुदाई हुई और खूब हुई जेसीबी ने काम शुरू किया और धरती मां सबूत देने लगी जैसे मानो वो भी चीख के कह रही हो की हा प्रभु श्री राम जी यही जन्मे थे।
खुदाई में प्राचीन युग की मंदिरों के खंडित प्रतिमाएं, खंभे, शिवलिंग वो भी 5 फुट का , आदि निकालने लगे, जिसके बाद भारतीय पुरात्त्व विभाग ने उसे प्रमाणित भी किया। और के माना कि ये आकृतियां यहां कई सालों से दबी थी।
Debris being removed&land being levelled at Ram Janmabhoomi since past 10 days. Discovered pillar in debris of the structure&carvings on sandstone. Found a Shivling there&a similar one at Kuber Teela: Champat Rai,General Secy,Sri Ram Janmabhoomi Tirth Kshetra Trust,Ayodhya (20.5) pic.twitter.com/fjLiwciX2q
एक अत्यंत दुखद पहलू हैं जो विचार करने योग्य है और किया भी जाना चाहिए, और ये मेरा सवाल भी है कि इसे बर्दाश्त कैसे किया गया? श्री राम मंदिर का मामला जब तक कोर्ट में रहा उसमे एक पक्षकार राम लला बिराजमान को बनाया गया क्यों? इसका अर्थ तो यही होता है कि कोर्ट ने भी भगवान श्री राम के होने का प्रमाण दे दिया था वो भी सबसे पहले फिर भी कांग्रेस पार्टी ने 2007 में कोर्ट में ये कह दिया कि श्री राम हुए ही नहीं, वो काल्पनिक है, और पूरा समाज, वो संविधान भी कुछ नहीं कर पाया जिसके मूल कॉपी पे यदि कोई प्रथम चित्र है तो वो है “भगवान श्री राम जी” का। ये कैसा कानून था हमारा?
किन कारणों से इतना बड़ा पाप किया गया? यदि श्री राम जी का अस्तित्व ही नहीं था, वो काल्पनिक थे, तो कोर्ट ने उन्हें एक पक्षकार क्यों बनाया था? ये कोई नई घटना नहीं है, हिन्दुओं की आस्था को चोट पहुंचने का काम हमेशा से लेफ्ट व कांग्रेस करती आई है। इतना ही नहीं ये कांग्रेस पार्टी, जिन्होंने गांधी जी के नाम पे अवैध कब्जा किया हुआ है, उनको राम लला के अस्तित्व को नकारने से पहले ये तो सोचना चाहिए ना की यदि राम काल्पनिक है तो गांधी जी का दिखाया हुआ रामराज्य का मार्ग क्या एक ढोंग था? छलावा था? गांधी जी ने तो मरते वक़्त भी राम का ही नाम लिया था, उनका पूरा जीवन प्रभु श्री राम जी के आदर्शो पे रहा। यदि राम काल्पनिक है तो गांधी जी का पूरा जीवन झूठ और ढोंग से ज्यादा कुछ भी नहीं है।
26 मई से श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र में मंदिर निर्माण का कार्य शुरू हुआ, केंद्र सरकार ने उसके लिए 450 करोड़ का फंड भी दिया। पर राक्षश प्रवृति के लोग आज भी श्री राम जी के नाम से भय तो खाते ही है, इसलिए इस समय भी वो अपनी पूरी कोशिश कर रहे है जिससे मंदिर निर्माण का कार्य रुक जाए। आरोप पे आरोप लगाए जा रहे है सरकार पे, कि इस आपदा की परिस्थिति में सरकार को मंदिर के लिए पैसा ना दे कर किसी और काम में लगाना चाहिए। मेरा उनसे यही कहना है कि आप चाहे अपनी इक्षा से कुछ भी सोच लें, वैसे भी सोचने और बोलने की आजादी सबसे ज्यादा आप लोगों को ही है, पर मंदिर निर्माण का कार्य अब पूर्ण होने से पहले नहीं रुकने वाला है।
श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र पे निर्माण कार्य शुरू हुआ, इसके पीछे अनेकों राम भक्तो की वीरगति को प्राप्त होने की वेदना है, अनेकों सैनानियों की तपस्या व संघर्ष है जो आज फलित हुआ है। इस निर्माण कार्य को शुरू होते ही उनको एक छोटी ही सही पर सची श्रद्धांजलि मिल ही गई है। और जल्द ही कार्य पूर्ण होने पे उन वीर आत्माओं को, कोठारी बंधुओ को, अनेकों भक्तो को जिनको गोली मार दी गई, उनको मुक्ति मिल ही जाएगी।
श्री दिग्विजय नाथ जी महाराज से लेकर श्री अशोक सिंघल जी, आडवाणी जी, स्वर्गीय श्री अटल जी, उमा भारती जी, शेर मुख्यमंत्री श्री कल्याण सिंह जी, प्रमोद महाजन जी, मोदी जी व अन्य ना जाने कितनो ने इसे जन आंदोलन बनाया। और इन आंदोलनों का सही रूप से संचालन किया आरएसएस ने जिसने अपनी पूरी निष्ठा से परिश्रम किया और आज जीत हो ही गई। मै तो इनको सिर्फ श्री राम सेनानी कह सकता हूं।
एक बार आप विचार जरूर करें कि भगवान श्री राम जी का अपमान करने वाले कौन कौन थे और अब उनकी स्थिति कैसी है? उदाहरस्वरूप देख दीजिए देश के सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी का क्या हस्र है अभी? क्या हस्र है समाजवादी पार्टी का, बहुजन समाज पार्टी का? लेफ्ट पार्टियां आज किस स्तिथि में है? विचार कीजिए क्या इन लोगो ने जो पाप किया है भगवान श्री राम जी का अपमान कर के उसे बिना भोगे मुक्ति पा लेंगे ? कभी नहीं।
दूसरी तरफ देखिए जिन्होंने प्रभु श्री राम जी के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया, वीरगति को प्राप्त हो गए, जिन्होंने जन आंदोलन बनाया, जिन्होंने व्यक्तिगत रूप से व संगठनात्मक रूप से संचालन किया वो आज किस स्तिथि में है व उनकी सुखी जीवन की क्या अनुभूति है? जब जीत सत्य की होती है तब धर्मा की स्थापना करने वाले ही राज चलाते है, और आने वाले 60 वर्षों से अधिक समय के लिए बीजेपी व आरएसएस का प्रचण्ड जन समर्थन बना रहेगा देश में।
28 वर्ष तक श्री रामलला के दर्शन ना करने का संकल्प था महंत नृत्यगोपाल दास जी महाराज का. ये संकल्प छोटा नहीं था, उनका अकेला नहीं था.
अनवरत प्रतीक्षा थी श्री राम भक्तों की…
और विशेषकर मुझ जैसे अयोध्यावासी जिनसे हर जगह बस एक सवाल रहता था, आपके यहां राममंदिर कब बनेगा? मैं और अन्य अयोध्यावासी बस यही बोलते, ‘जब राम जी चाहेंगे, स्वयं बन जाएगा.’
हमने ये धैर्य और धीरज को भी राम जी से आशीर्वाद में प्राप्त किया. ऐसे राम जी, जिन्होंने सम्पूर्ण जीवन निर्लिप्त रहकर व्यतीत किया. जिन्हें सत्ता मिलने वाली थी, उन्हें वनवास प्राप्त हुआ. पर मेरे प्रभु ने हंसते हुए ना केवल स्वीकारा बल्कि निभाया भी.
जब महाराजा दशरथ जी वनवास की बात सुनकर अधीर हो गए, तो मुस्कुरा कर बोल पड़े थे रघुवीर, “थोरहि बात पितहिं दुख भारी.” मेरे राम तो त्याग, मर्यादा, सुचरित्र, तेज के पुंज हैं.
हमनें क्या नहीं सीखा है उनसे, हमने उनके साथ धैर्य बनाकर सरकारी हरकतों को भी झेल लिया. हमने वो रातें भी देखीं हैं, जब चौराहे पर पुलिस के पहरे थे. और गलियों में बंधी बांस बल्लियों की बैरिकेडिंग.
हां, हमें दर्द होता था अक्सर. तब तो और ज्यादा, जब कोई भी आकर प्रश्न दाग देता कि बताओ रामलला का जन्मस्थान अयोध्या ही है, इसका क्या प्रमाण है?
हमें तब भी दर्द हुआ, जब पुरानी सरकार के ही बड़े पसंदीदा वकील ने तारीख टालने का भरसक प्रयास किया. जब हर रोज़ कचहरी में रामलला घूमते रहे.
दर्द तब तब भी हुआ जब अखिल कोटि ब्रह्मांड नायक मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्री राम चंद्र जी को तिरपाल में देखा. यद्यपि हम तो उनके बच्चे हैं और बच्चे माता पिता को किसी भी अवस्था में उतने ही प्यारे होते हैं.
राम जी ने हमारा बहुत ध्यान रखा. हमने लोहों की जालियों में घिरी संकरे रास्ते से दूर बैठे रामलला के दर्शन किए. प्रतिदिन उनका श्रृंगार किया. उनका विधिवत् पूजन किया.
हमने हर रोज बस एक आशा की लौ भक्ति के तेल से डबाडब भर कर जलाए रखी. कि हमारे रामलला का मंदिर फिर से बनेगा.
गोस्वामी जी ने जब श्री रामचरित मानस के प्रारंभ में देवता, ऋषि मुनियों, नाग गंधर्वों, किन्नर की आराधना की, तो असुरों, राक्षसों, और पापियों को भी क्षमा किया है.
श्री राम मंदिर निर्माण आंदोलन में सेवारत सभी रामभक्तों का कल्याण तो निश्चित है ही. परंतु यदि सभी वे मंदबुद्धि और मलीन कुबुद्धिधारी जीव जो रामद्रोह करते हैं या करते रहे, यदि राम जी के चरणों में सच्ची श्रद्धा के साथ समर्पण कर दें, तो दयानिधान कल्याण कर सकते हैं.
रामलला का भव्य मंदिर पुन: उसी स्थान पर निर्मित किया जाएगा, शुरुआत हो चुकी है.
यह एक यज्ञ है, इस यज्ञ में आप सभी का प्रेम और स्नेह समिधा है, और परिश्रम से उत्पन्न अग्निकुंड भी है.
आइए एक साथ मिलकर के अपनी भक्ति रूपी घृत की वसोर्धारा भी अर्पित करते हैं. याद है ना आपको, लाखों कारसेवक जब जंगलों और खेतों के रास्ते सरकारी आलाकमान की बाड़े बंदी को धता बताते अयोध्या पहुंचे थे.
तो सबमें ललक थी इसी दिन की, आज वो शुभदिन आ गया है.
सम्पूर्ण विश्व के कल्याण की कामना और विश्व शांति हेतु प्रार्थना करते हुए… धन्यवाद!