Tuesday, October 20, 2020
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संस्कृति के अस्तित्व का संघर्ष और सनातन की तैयारी

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दीपावली से रक्षा बंधन तक सनातन संस्कृति के समस्त पर्व निशाने पर हैं। दही हांडी की ऊँचाई न्यायालय तय करते हैं। जलीकट्टू मनाना है या नहीं न्यायाधीश बताते हैं। बिंदी और करवा चौथ पिछड़ापन सिद्ध हो चुका है। वर्ष के 365 दिन कोई न कोई स्टैंड अप कॉमेडियन सनातन संस्कृति का उपहास करता रहता है।

सारांश ये कि सनातन संकृति आज अपनी उद्भव भूमि पर ही अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है।

ये स्थिति न तो सहसा उत्पन्न हुयी है और न ही इसका मात्र एक कारण है, ये वामपंथ और छद्म धर्मनिरपेक्षता का वर्षों वर्ष पालित बहुकोणीय षड्यंत्र है जो अब अनावृत हो रहा है अर्थात संस्कृति के अस्तित्व का ये संघर्ष सहस्त्रों वर्ष पुराने सनातन धर्म, जिसका सहज रूप आज हिन्दू है उसने चुना नहीं है वरन उस पर थोपा गया है।  

सांस्कृतिक संघर्ष चाहे थोपा गया हो या चुना गया हो या संस्कृति के प्रवाह के बीच सहज ही आ गया हो उसे जीतने के लिए वैचारिक सामर्थ्य और समर्पण की आवश्यकता होती है।  

क्या आज के सनातन अवलम्बियों में यह सामर्थ्य और समर्पण है या क्या वे इसे अर्जित करने का प्रयास कर रहे हैं?

कुछ उदाहरण देखते हैं; एक संस्था युवा महिलाओं की आकांक्षाओं, अभिरुचियों, जीवन पद्धति आदि को समझने के लिए उनके साथ समूहों में चर्चा कर रही थी। चर्चा के दो प्रश्नों के उत्तरों को समझना यहाँ महत्वपूर्ण है। एक प्रश्न था – आपको क्या करना सबसे अधिक अच्छा लगता है, इसके उत्तर में अधिकांश मुस्लिम महिलाओं का उत्तर था, दीनी किताबें पढ़ना, इस्लाम को समझना जबकि हिन्दू महिलाओं के उत्तर थे – शॉपिंग करना, फिल्म देखना, घूमने जाना। एक अन्य प्रश्न था, आप अपना खाली समय कैसे बिताती हैं, अधिकांश मुस्लिम महिलाओं का उत्तर था, दीनी किताबें पढ़ना जबकि हिन्दू महिलाओं के उत्तर थे- टी.वी. देखना, फोन पर बातें करना।

आश्चर्यजनक रूप से ये हिन्दू महिलाएं – दीपावली और होली जैसे महत्वपूर्ण पर्वों के सांस्कृतिक महत्त्व को ठीक से नहीं बता सकीं। इनमें से किसी को भी हिंदी माह, शुक्ल पक्ष- कृष्ण पक्ष, तिथि इत्यादि की समझ नहीं थी। कहते हैं स्त्री संस्कृति की वाहक ही नहीं संरक्षक भी होती है। क्या अपनी संस्कृति से अनभिज्ञ ये गृह स्वामिनियाँ किसी सांस्कृतिक संघर्ष में खड़ी हो पाएंगी?

हमारे एक परिचित दम्पति इसलिए अपने माता –पिता से अलग रहने लगे क्योंकि उनका कान्वेंट में पढ़ने वाला बच्चा अपनी दादी के साथ सुबह शाम आरती करने की ज़िद करता था और उनको लगता था कि ये बच्चे के भविष्य के लिए ठीक नहीं। बच्चे को घंटा बजाने वाला पंडित नहीं बनाना है। क्या ऐसे बच्चे किसी सांस्कृतिक संघर्ष का अंग बन पाएंगे?

एक दिन एक पारिवारिक मित्र मंदिर में मिले, बताया बेटी की परीक्षाएं हैं, अच्छी निकलें यही प्रार्थना करने आया था, अच्छा है,  बेटी नहीं आई? हमने पूछा। नहीं, आजकल के बच्चे कहाँ मानते हैं ,उसने कहा मैं इस अन्धविश्वास में नहीं पड़ती। स्पष्ट था दो पीढ़ियों के बीच कहीं न कहीं संस्कृति का प्रवाह अवरुद्ध है।

एक दम्पति ने सामाजिक समरसता का विषय उठाते हुए गर्व से बताया, हमने तो अपने बच्चे को बताया ही नहीं कि तुम  हिन्दू हो। घर में ऐसा कुछ नहीं करते जिससे बच्चा अपनी कोई धार्मिक पहचान बनाये। यद्यपि इस निश्चय से जुड़े आगे के प्रश्नों का उनके पास कोई तार्किक उत्तर नहीं था  किन्तु  वो प्रसन्न थे कि वो बच्चे को एक धर्मनिरपेक्ष नागरिक बना रहे हैं।

किसी भी संस्कृति के संरक्षण और उसे प्रवाहमान रखने के लिए उस संस्कृति की संतानों में अपनी संस्कृति की पर्याप्त समझ; उससे आत्मिक जुड़ाव, अपनापन ,लगाव और उस पर गर्व करना आवश्यक है। वर्तमान सनातन धर्मियों के एक बड़े वर्ग में  इनका पूरी तरह अभाव है।

संस्कृति के वर्तमान संघर्ष में सनातनियों की तैयारी ऐसी है कि जिस बात को लज्जा से कहना चाहिए उसे वो गर्व से कहते हैं,  जैसे गर्व से कहना, “हमें हिंदी तिथियाँ समझ में नहीं आतीं” या फिर, “मना लेते हैं दीवाली, ये सब नहीं पता क्यों,क्या, कैसे?” या फिर, “हम तो बच्चे से कहते हैं सब धर्मों का एक ही मतलब है, केवल इंसानियत ही धर्म है” वो बात अलग है कि, इंसानियत धर्म की परिभाषा पूछने पर ये बगलें झाँकने लगते हैं।

इस सामाजिक वातावरण में यदि कृष्ण, हनुमान और नारद पर किये गए स्तरहीन प्रहारों को “हास्य-व्यंग्य” की संज्ञा दी जाती है ; दही हांडी  से लेकर पटाखे तक माननीय की दया का पात्र हो जाते है तो आश्चर्य कैसा? हर दिन एक लड़की के तथाकथित प्रेम के नाम पर मतांतरित होने पर आश्चर्य  कैसा? ये तो हमारी अनभिज्ञता की स्वाभाविक परिणति है।

कुछ लोग एक दिन में सहस्त्रों निरीह पशुओं की हत्या कर उनके रक्त से धरती रंगकर भी अपनी संस्कृति पर गर्व करते हैं और कुछ लोग गाय को माँ कहने में भी लज्जा की अनुभूति करते हैं। यह स्थिति बदलनी होगी।

कुछ छोटे छोटे प्रयास ही बड़ा बदलाव ला सकते हैं। पर्वों से जुड़े पौराणिक, सामाजिक और आर्थिक संदेशों को समझें और इन्हें पारंपरिक उत्साह के साथ मनाएं। अपने पंचांग को जानें। राम चरित मानस जैसी कृतियों को कम से कम एक बार अवश्य पढ़ें। प्रतीकात्मक मान बिन्दुओं का अपमान न करें न सहन करें। सांस्कृतिक चरित्रों पर आधारित हास्य व्यंग्य का विरोध करें।

स्मरण रहे – अपनी संस्कृति को न जानना गर्व का नहीं लज्जा का विषय है।

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