क्या कांग्रेस अब कभी सत्ता में वापसी कर पाएगी?

यह सवाल पढ़ने-सुनने में अजीब लग सकता है लेकिन आज लोकसभा चुनावों के नतीजे आ जाने और उन नतीजों पर कांग्रेस पार्टी की प्रतिक्रिया देखने के बाद यह सवाल हर कोई पूछ रहा है. कांग्रेस पार्टी को सत्ता में वापस आने के लिए क्या करना चाहिए, उसके बारे में मैं भी कई बार लिख चुका हूँ और देश भर में और भी कई लेखक-पत्रकार लिख रहे होंगे. कांग्रेस के साथ समस्या यही है कि एक लम्बे समय तक गलत तौर-तरीकों से सत्ता हथियाने और उसे भोगने के बाद उसे यह लगने लगा है कि सरकार चलाने का यही तरीका सही है और जिन नीतियों पर उसने साथ सालों तक सरकार चलाई है, उनके ऊपर दुबारा से विचार करके उनमे सुधार करने की कोई जरूरत नहीं है.

केंद्र में 2014 तक जब कांग्रेस सरकार सत्ता में रही, जबरदस्त भ्रष्टाचार में लिप्त रही. कांग्रेस जहां जहां सत्ता में आती है, भ्रष्टाचार एक अभिन्न अंग बनाकर वहां सरकार के साथ ही आ जाता है. इसका सबसे ताज़ा उदाहरण मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कुछ ही महीनों पहले बनी कांग्रेस सरकारों का है. 6 महीने से कम समय में ही इन कांग्रेसी सरकारों ने इन तीनों राज्यों में इस कदर भ्रष्टाचार मचाया कि कुछ ही महीनों बाद लोकसभा चुनावों में जनता को एक बार फिर इस पार्टी का सूपड़ा साफ़ करना पड़ गया.

कांग्रेस आज भी इस गलतफहमी में जी रही है कि देश के बहुसंख्यकों को उसने आरक्षण के जरिये अलग-अलग जातियों में इस तरह से बाँट दिया है, जिससे वे सब कभी “एकता” का प्रदर्शन न कर सकें और चुनावों में उम्मीदवार की योग्यता के आधार पर वोट न देकर, उसकी जाति के आधार पर वोट करें, चाहे उस जाति का उम्मीदवार उस जाति की जनता की भलाई के लिए कुछ भी करे या न करे. मोदी के आने के बाद से बहुसंख्यक हिन्दुओं ने कांग्रेस की 70 सालों से चली आ रही इस साज़िश को पहचाना है और जाति-धर्म से ऊपर उठकर उस उम्मीदवार को वोट दिया है, जो जनता की भलाई के लिए काम करता है.

कांग्रेस पार्टी ने अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों की भलाई के लिए आज तक कोई काम नहीं किया लेकिन पार्टी मुस्लिम तुष्टिकरण इस तरह से करती रही मानो वह मुसलमानों की सबसे बड़ी शुभचिंतक हो. इसका एक उदाहरण पूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह का वह बयान है जिसमे उन्होंने तुष्टिकरण की सभी सीमाएं लांघते हुए कहा था कि इस देश के सभी संसाधनों पर अल्पसंख्यकों (खासकर मुसलमानों) का पहला अधिकार है. इस फ़िज़ूल की बयान बाज़ी से मुसलमानों को तो कोई फायदा नहीं हुआ, हाँ हिन्दू कांग्रेस से जरूर दूर हो गए. अब जब मोदी जी ने अपनी सभी योजनाएं इस तरह से लागू करनी शुरू की हैं, जिनका लाभ समाज के सभी वर्गों को बिना किसी जाति-पाति और धर्म को देखे बिना मिल रहा है, तब कांग्रेस की जमीन खिसकनी स्वाभाविक ही है.

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में एक कार्यक्रम हुआ और वहां “पकिस्तान जिंदाबाद” और “भारत तेरे टुकड़े होंगे” जैसे देशद्रोही नारे लगाए गए. कांग्रेस इन नारे लगाने वालों के समर्थन में एकदम कंधे से कन्धा मिलाकर डट कर खड़ी रही. कांग्रेस के हिसाब से यह देशद्रोह के नारे नहीं, बल्कि “अभिव्यक्ति की आज़ादी” थी. इसके बाद मोदी सरकार ने एक के बाद एक दो सर्जिकल स्ट्राइक पाकिस्तान पर कीं, लेकिन कांग्रेस पार्टी इनका सुबूत मांगकर मोदी सरकार की खिल्ली उड़ाने में ही व्यस्त रही. बालाकोट हमले पर कांग्रेस ने जो बेशर्मी दिखाई, उससे यह बात अंतिम रूप से देशवासियों के मन में घर कर गयी कि कांग्रेस कोई राजनीतिक पार्टी नहीं, बल्कि एक आतंकवादियों से सहानुभूति रखने वाला देशद्रोही संगठन है.

2014 तक जिस कांग्रेस पार्टी को सिर्फ भ्रष्टाचार के लिए जाना जाता था, 2019 आते-आते, उसके बायो डाटा में “भ्रष्टाचार” के अलावा “देशद्रोह” की एक और उपलब्धि और जुड़ गयी. इसका नतीजा 23 मई 2019 को कांग्रेस को मिल भी गया लेकिन कांग्रेस अभी भी इन सब बातों को मानने के लिए तैयार नहीं है. लोग अपने जीवन में सफल-असफल होते रहते हैं. कुछ लोग अपनी गलतियों से सबक लेकर दुबारा प्रयास करते हैं और दूसरी बार सफल हो जाते हैं. लेकिन सोचिये कि कोई व्यक्ति अगर असफल होने के बाद भी अपनी गलती को नहीं सुधारे बल्कि और ज्यादा गलतियां करे तो क्या वह दुबारा सफल हो सकता है. जिन लोगों में मैनेजमेंट की पढाई की है, वे जानते होंगे कि एक जीतने का एक सिद्धांत यह होता है कि जब कभी किसी दूसरे व्यक्ति से प्रतिस्पर्धा में जीत हासिल करनी हो तो अपने प्रतिद्वंदी की लकीर को छोटा करने की बजाये जो व्यक्ति अपनी लकीर बड़ी करने की कोशिश करता है, जीत उसी की होती है. पिछले 5 सालों से कांग्रेस मैनेजमेंट के इस बेसिक उसूल के खिलाफ काम करते हुए “मोदी” की लकीर छोटा करने के चक्कर में नकारात्मक राजनीती करने में ही लगी रही और मोदी देश के अंदर विकास और देश के बाहर देश का नाम रोशन करते हुए अपनी लकीर बड़ी करते चले गए.

यह बात मैंने पहले ही लिखी है कि सफल वही सो सकता है, जो अपनी असफलताओं से सबक लेकर उनमे सुधार करने के लिए तैयार हो. कांग्रेस पार्टी और उसके नेता बार-बार हारने के बाद हर बार देशवासियों को यह आश्वासन दे चुके हैं कि वे लोग अपनी नीतियों में कोई बदलाव नहीं करेंगे.इन चुनावों के बाद भी राहुल गाँधी का यह बयान आया था कि यह दो विचारधाराओं की लड़ाई है-हम अपनी विचारधारा पर अडिग हैं. कांग्रेस की क्या विचारधारा है -भ्रष्टाचार और देशद्रोह ! अगर कांग्रेस इन दोनों विचारधाराओं पर अडिग है तो इस देश की जनता भी अपने निर्णय में आने वाले चुनावों में अडिग ही रहेगी और कांग्रेस को तब तक सत्ता से दूर रखेगी, जब तक यह अपनी विचारधारा को “ईमानदारी और राष्ट्रवाद” में तब्दील न कर ले.

कांग्रेस अपनी इस विचारधारा में कोई बदलाव करेगी, मेरे हिसाब से तो यह नामुमकिन है क्योंकि कांग्रेस ने “देशद्रोह और करप्शन” की विचारधारा पर “सेक्युलरिज्म” की पैकिंग चढ़ाई हुई है. 60 सालों तक लोग पैकिंग देखकर जिस “प्रोडक्ट” को खरीदते रहे, अब वे सब सयाने हो गए हैं और पैकिंग के अंदर के असली “प्रोडक्ट” की भी जांच-पड़ताल कर रहे हैं.

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