Wednesday, February 8, 2023

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Indian Judiciary System

अनावश्यक रूप से की गयी गिरफ्तारी, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बाधित करती है

Joginder Kumar vs State Of U.P (on 25 April 1994, (1994 AIR 1349), 1994 SCC (4) 260) इसमें आदरणीय न्यायालय ने इसी मुद्दे पर गंभीरता से विचार करते हुए व्यक्तियों के गिरफतारी के संदर्भ में कुछ दिशा निर्देश जारी किये हैं, जो एक सामान्य व्यक्ति की प्रतिष्ठा को सुरक्षित रखने में अत्यधिक कारगर साबित होंगे।

Hon. CJI Ramana, please educate us which ‘Constitution’ is the Supreme Court of India following?

Judges and their families lives are more precious while our lives are meant for sacrifice. Must be somewhere in your constitution.

माननीय सीजेआई रमना, कृपया हमें शिक्षित करें कि भारत का सर्वोच्च न्यायालय किस ‘संविधान’ का अनुसरण कर रहा है?

महोदय, कृपया हमें यह भी शिक्षित करें कि संविधान के किस भाग में कहा गया है कि अपराधियों और आतंकवादियों को पीड़ितों और नागरिकों की तुलना में अधिक अधिकार प्राप्त हैं।

Criminal justice system is ‘creaking’

The system is creaking. No doubt. Senior Advocate Harish Salve goes brutal to say it is ‘broken’. And it needs fixing. The issues flagged off by the Justices and the Union Law Minister are intermingled. It deserves structural changes.

Nupur Sharma in the Supreme Court: Enlighten us more, My Lords!

What My Lords said in open court against her is what we wish to understand.

राष्ट्रपति महामहिम रामनाथ कोविंद जी को खुला पत्र

कल भारतीय शरिया न्यायालय नयी दिल्ली द्वारा खुले में किये गए शौच के सन्दर्भ में उनके नियोक्ता महामहिम राष्ट्रपति को भेजा गया खुला पत्र।

Corruption is the mother of all laws

Describing Tamil Nadu as a gifted land with many waterbodies, Chief Justice of Madras High Court Munishwar Nath Bhandari spoke on June 15th,2022 about the wilful negligence of certain corrupt officials, who fail to take prompt action, was spoiling the resources. He

Ancient judicial wisdom for modern Bharat

The meaning of the Indianisation of the judiciary, as explained by Justice Ramana, is to be more and more conscious of the existing realities in the country in order to provide greater access to justice for the poor.

न्यायालय या कानून के आधार पर फैसले देने वाले सरकारी कार्यालय

हर आदमी ये सोचता है कि न्यायालय से उसे न्याय मिलेगा परन्तु क्या न्यायालय कि शरण में जाने पर उसे वाकई न्याय मिलता है या फिर न्याय कि आस में वर्षो न्याय के दरवाजे पर दस्तक देते देते उसकी उमर निकल जाती है पर उसका केस उसके मरने के बाद भी जिंदा रहता है और कोर्ट या अदालतो में वैसे हि अकारण तारीखें पड़ती रहती हैं।

न्यायपालिका का आँख चुराना

बात यहाँ न्यायपालिका की है जिसके फ़ैसलों को अब देश का एक बड़ा वर्ग संदेह की दृष्टि से देखने लगा है, और इसके लिए न्यायपालिका स्वयं ज़िम्मेदार है।

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