Friday, February 26, 2021

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वैलेंटाइन वीक में युवराज के लिए लड़की ढूंढ़ते कांगी: बेवकूफी इज मस्ट

आपको इस बौद्धिक पिछड़े के लिए कहीं बेवकूफी मिले, तो इसको इत्तला करें, वैसे उसके दरबारी पत्तलकार और चाटुकार इसे सदी की महानतम लव स्टोरी बता वैलेंटाइन वीक का मजा ले रहे हैं।

गोडसे की याद में

क्या जो 1947 में जो मिली वो आज़ादी थी या बटवारा था उस हिंदुओं के धरती का जिसे प्रभु श्री राम, चन्द्रगुप्त, नेताजी, महाराणा प्रताप, वीर सावरकर, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, जगदगुरु शंकराचार्य आदि वीरों ने महापुरुषों ने अपने बलिदान से अपने ज्ञान अपने शौर्य से अपने पराक्रम से अपने वीरता से निर्माण किया था।

किसान और क़ानून के बीच अम्बानी अडानी का विरोध क्यों?

एक समाज, एक व्यवस्था एक देश के नाते हमें अब ये तय करना होगा कि ऐसे कोई भी मुँह उठा कर दिल्ली न घेरने लगे, किसान गरीब मजदूर जैसे जार्गन्स से ऊपर उठ कर देश को ध्यान में रखना होगा तभी इन विदेशी नाचने वाली पॉप और पोर्न स्टार्स से लड़ और जीत पाएंगे।

वर्तमान की युवापीढ़ी और फैंसी आंदोलन

साम्यवाद के भ्रमित करने वाले शब्द व स्वर को आधुनिक शब्द छलावा में पेश कर कविता आवृत्ति होती है। बस किसी भी तरह देश की आंशिक जनसंख्या को प्रभावित करके मिथ्या प्रोपगंडा को सच्चाई में बदलने का कोशिश चालू रहता है।

मोदी विरोध का मानसिक पतन

किसान बिल या विरोध को समझने के लिए चार नामों में गीता कही बेहतर शिक्षित, तार्किक, व्यवस्थित और सक्षम है। परन्तु बंजारों की पसंद मिया खलीफा, रीरी और ग्रेटा है। कारण स्पष्ट है, पहले तीन नाम बंजारों को समर्थन देने वाले है।

दंगाईयों की सरकारी पैरवी असंवैधानिक

गणतंत्रता दिवस को ट्रैक्टर मार्च के नाम पर कथित किसानों ने दिल्ली में न केवल उत्पात मचाया बल्कि लाल किले पर तिरंगे झंडे का अपमान किया और 394 पुलिस वालों को जख्मी कर दिया था, जिनको बचाने के लिए पंजाब सरकार ने 70 वकीलों का पैनल बनाया है!

श्रीकृष्‍ण-द्रौपदी संवाद से न‍िकली राह पर बीएचयू का ‘मूल्य प्रवाह’

बीएचयू ने मानवीय मूल्यों पर आधार‍ित एक व‍िजन डॉक्यूमेंट ‘मूल्य प्रवाह’ यूजीसी को सौंपा है ज‍िसका उद्देश्य छात्रों के शैक्ष‍िक ही नहीं, चार‍ित्र‍िक न‍िर्माण और इसके माध्यम से राष्ट्र न‍िर्माण के महत्व को जन जन तक पहुंचाना है।

पत्रकार मनदीप पूनिया के प्रति मेरी घोर संवेदनाएं है!

मनदीप पूनिया एक पात्र है और ऐसे हजारों छात्र देश के हर विश्वविद्यालय में ट्रैप में फंसते हैं। व्यवस्था विरोध में फेक न्यूज की फैक्ट्री ही नहीं नक्सली भी बनते हैं। वो वैचारिक जोम्बी बनकर अपने आला का हुक्म बजाते हैं। फिर जोम्बिज का श्रृंखला बनता ही रहता है।

षड्यंत्र (सत्ता के लिये)

इस षड्यंत्र की शुरुआत हुई 2014 से। जब देश को अपने बापों की जागीर समझने वाले राजनीतिक घरानों और सबसे महत्वपूर्ण उन राजनीतिक घरानों पर अपनी वोट की एकता का दबाव डालने वाले तथाकथित अल्पसंख्यक समुदाय और उन अल्पसंख्यकों को राजनीति संरक्षण देने के लिये सत्ताधारी राजनीतिक घरानों को धन देने वाली विदेशी ताक़तों को एक अप्रत्याशित (unexpected) झटका लगा।

दिल्ली में किसानों के वेश में गुंडों-दंगाइयों-आतंकियों का हिंसक प्रदर्शन

गणतंत्र-दिवस के दिन इन्होंने अपनी काली करतूतों से समस्त देशवासियों का सिर पूरी दुनिया में झुका दिया है। इतिहास इन्हें कभी माफ़ नहीं करेगा।

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