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मसला-ए-कश्मीर

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कश्मीर-समस्या के हल के बारे में अक्सर यह कहा जाता है कि हल तो तब निकलेगा जब समस्या की असली पहचान कर ली जाय। सरकारें अभी तक इस समस्या से निपटने के नाम पर बिना किसी ठोस योजना या उम्मीद के बड़े-बड़े आर्थिक पैकेज देने के अलावा कुछ भी नहीं कर सकी हैं। इससे भी इस सम्भावना को बल मिलता है कि कहीं हम समस्या को परिभाषित करने में ही तो गलती नहीं कर रहे!

प्रस्तुत लेख कश्मीर-समस्या को समझने का एक प्रयास है। समाधान की चर्चा फिर कभी की जायेगी।

मोटे तौर पर कश्मीर की समस्या यह है कि महाराज हरि सिंह के जम्मू-कश्मीर राज्य के तीन टुकड़े हो चुके हैं: सबसे बड़ा और सबसे अधिक आबादी वाला टुकड़ा भारत के पास है जिसमें लगभग 70% जम्मू क्षेत्र, 50% कश्मीर घाटी, और लगभग पूरा लेह-लद्दाख का क्षेत्र शामिल है। उससे छोटा टुकड़ा जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का लगभग 37% है, पर पाकिस्तान का कब्जा है, और शेष 16% पर चीन का कब्जा है जिसका एक भाग पाकिस्तान ने चीन को भेंट कर दिया है।

महाराज हरि सिंह द्वारा लिखे गये राज्य-हस्तांतरण पत्र के अनुसार भारत पूरे राज्य को अपना अंग मानता है। भारत के दृष्टिकोण से कश्मीर-समस्या तब हल होगी जब पाकिस्तान और चीन के कब्जे वाले क्षेत्रों पर भी भारत का कब्जा हो जाय। इस लक्ष्य की प्राप्ति एक भीषण युद्ध के बिना संभव नहीं है- या फिर भारत अपनी सैन्य-शक्ति इतनी बढ़ा ले कि पाकिस्तान और चीन डर के मारे खुद ही अपने-अपने हिस्से भारत के नाम लिख दें। अतः कश्मीर की वृहत्तर समस्या का केवल सैनिक समाधान ही हो सकता है, कोई अन्य नहीं।

अब इस वृहत्तर समस्या के अंदर भी एक समस्या है जो इतनी जटिल है कि हममें से अधिकांश लोग उसे ही कश्मीर-समस्या मानते हैं। समस्या यह है कि कश्मीर घाटी जो भारतीय जम्मू कश्मीर राज्य के कुल क्षेत्रफल की मात्र 16% है, और जहाँ राज्य की जनसंख्या के लगभग 57% लोग रहते हैं, और जहाँ की आबादी लगभग 97% मुस्लिम है, के लोग भारत के साथ नहीं रहना चाहते। ऐसा तब है जब जम्मू-कश्मीर भारत के समृद्धतम राज्यों में है जहाँ प्रति व्यक्ति केंद्रीय सहायता किसी अन्य राज्य के मुकाबले लगभग दस गुनी है, अतः घाटी के निवासियों की भारत से अलग होने की सदिच्छा को वहाँ की बेरोजगारी और विकास की कमी से जोड़ना केवल और केवल दुराग्रह है। भारत के लिए समस्या यह है कि वह कश्मीरियों की इच्छाओं का सम्मान करते हुए उन्हें अपनी ज़मीन के साथ भारत से अलग नहीं होने दे सकता: कश्मीर को उसे अपने साथ रखना ही होगा चाहे इसका मतलब समूची घाटी को सेना के बूटों तले रौंद डालना ही क्यों न हो, और चाहे इसके खिलाफ़ शेष भारत सहित विश्व के सेकुलर नेता कितना भी शोर मचाते रहें क्योंकि कश्मीर भारत से अलग होने वाला पहला राज्य होगा, आखिरी नहीं। भारत कश्मीर को नहीं छोड़ सकता क्योंकि कश्मीर के अलग होते ही अलग होने वालों की लाइन लग जायेगी।

यह तो समस्या का लक्षण हुआ; अब मूल समस्या पर आते हैं। यह ऊपर कहा जा चुका है कि कश्मीरियों की भारत से अलग होने की सदिच्छा का ठीकरा वहाँ की आर्थिक स्थिति पर नहीं फोड़ा जा सकता। इसके बाद अब एक ही चीज़ बचती है जो कश्मीर को शेष भारत से अलग करती है, वह है-इस्लाम। इस्लाम, जो अरब राष्ट्रवाद के अतिरिक्त अन्य किसी राष्ट्रवाद को मान्यता नहीं देता (कृपया देखें-अनवर शेख कृत इस्लाम: अरब साम्राज्यवाद पृष्ठ 88-89 तथा अली मुहम्मद नक़वी कृत Islam and Nationalism का सातवाँ अध्याय), इस्लाम जो अपने अनुयायियों से यह अपेक्षा करता है कि वह किसी ग़ैर इस्लामी हुक़ूमत में शांति से न रहें-पहले उसे दार उल हरब (युद्ध का क्षेत्र) और उसके बाद उसे दार उल इस्लाम बना देने तक संघर्ष करते रहें- (इसी का नाम जेहाद है) कृपया देखें-जस्टिस मुनीर कमिटी रिपोर्ट के पृष्ठ 221-223), कश्मीरियों को भी भारत से अलग होने की प्रेरणा देता है। निस्संदेह पाकिस्तान का पड़ोस में होना भी इसमें बहुत बड़ी भूमिका निभाता है, पर वह केवल इस्लाम की शिक्षाओं को घाटी के लोगों तक पहुँचाता है जिसके कारण सीधे-सादे और शांतिपूर्ण जीवन के हिमायती (जो मनुष्य की एक स्वाभाविक वृत्ति है) मुसलमान भी सच्चे मुसलमान बनकर जेहाद में हिस्सा लेने में गौरव का अनुभव करने लगते हैं, पर अलगाववाद की मूल प्रेरक शक्ति तो इस्लाम ही है। इस्लाम के अनुयायियों की जम्मू क्षेत्र में भी आबादी लगभग 33% है, जो अनुकूल वातावरण मिलते ही अपने कश्मीरी सहधर्मियों का साथ देकर जम्मू क्षेत्र को भी अपने साथ ले उड़ने को तैयार हैं, मीरपुर के हत्याकाण्ड में जिसमें पाकिस्तानी सेना के द्वारा एक दिन में लगभग 15000 लोग मार डाले गये थे, में हम ऐसा देख चुके हैं जिसमें स्थानीय मुसलमानों ने पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर जमकर बवाल काटा।

जब तक इस्लाम को कश्मीर-समस्या के मूल के रूप में चिह्नित कर विचारधारा के स्तर पर उससे निपटने की नीति नहीं बनायी जाती, लाखों करोड़ के आर्थिक पैकेज बाँटने से कुछ नहीं बदलेगा।

हमने देखा कि कश्मीर की समस्या का प्राथमिक लक्षण यह है कि घाटी ले लोग भारत के साथ नहीं रहना चाहते। इसका मूल कारण इस्लाम को बताया गया। प्रश्न उठता है कि अगर इस्लाम कश्मीरियों के भारत में न रहने की इच्छा के लिए जिम्मेदार है, तो इस्लाम तो भारत के अन्य प्रान्तों में भी है। क्या अन्य प्रान्तों के इस्लाम मतावलम्बी भी भारत के साथ नहीं रहना चाहते? फिर और लोग भी हैं जो भारत के साथ नहीं रहना चाहते। उनकी चर्चा किये बिना कश्मीर-समस्या पर चर्चा अधूरी ही रहेगी।

पहले इस सवाल को लेते हैं: अगर इस्लाम अपने अनुयायियों को गैर-इस्लामी मुल्क में शांति से न रहने की शिक्षा देता है, तो क्या कश्मीर से इतर प्रांतों में रहने वाले इस्लाम मतावलम्बी भी भारत के साथ नहीं रहना चाहते? प्रश्न जटिल है, और इसके कई उत्तर हो सकते हैं। गणित का विद्यार्थी इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले हर राज्य के लगभग १०% इस्लाम मतावलम्बियों के रैंडम सैंपल से उनके भारत के साथ रहने की इच्छा/ अनिच्छा पर कुछ प्रश्न करना चाहेगा, और उनके उत्तरों पर लीनियर रिग्रेशन एनालिसिस के बाद ही वह कह सकेगा कि कितने प्रतिशत इस्लाम मतावलम्बी भारत के साथ रहना चाहते हैं, बशर्ते कि सैंपल में शामिल व्यक्तियों ने पूछे गये प्रश्नों के सही उत्तर दिये हों। एक नेता के लिए इस प्रश्न का उत्तर देने में कोई झंझट ही नहीं है: बिना किसी अध्ययन के वह पूरे आत्मविश्वास के साथ कह सकता है: भारत के सभी मुसलमान देशभक्त हैं! इस प्रकार के उत्तरों को ‘राजनीतिक सत्य’ (political truth) कहा जाता है, जो इस बात का द्योतक है कि यही कहा जाना चाहिए यद्यपि यह सत्य नहीं है। फिर सत्य क्या है?

अब सत्य का अनुसन्धान नेताओं की तर्ज पर तो हो नहीं सकता। कुछ भी बोल दिया जाय, और उसी को बार-बार दुहरा कर जनता को उसे सत्य मानने पर मजबूर कर देने की बाजीगरी एक या दो चुनावों में विजय दिलाने में तो सहायक हो सकती है, पर एक गंभीर समस्या के स्थायी समाधान के उद्देश्य से समस्या को परिभाषित करने के लिए इस तरकीब का इस्तेमाल किया जाय, तो यह तो धोखाधड़ी ही होगी। सत्य ऐसा हो जो कम से कम सत्य जैसा लगे, और जिसके लिए अगर प्रत्यक्ष नहीं तो अनुमान या आगम प्रमाण तो उपलब्ध हों!

तो सत्य यह है कि इस्लाम की गैर इस्लामी हुक़ूमत में शांति से न रहने की शिक्षा के बावजूद अगर देश के कश्मीर घाटी से इतर भागों में इस्लाम मतावलम्बी गैर इस्लामी धर्मों के अनुयायियों के साथ शान्ति से रहते दीखते हैं, तो केवल इसलिए कि उनके लिए जिहाद की खुलेआम घोषणा कर देने के उस प्रकार के अवसर नहीं हैं, जो कश्मीरियों को पाकिस्तान के पड़ोस में रहने और घाटी से गैर इस्लामी जनसंख्या के लगभग पूर्ण सफाये के कारण उपलब्ध हैं। सही अवसर मिलने पर शेष भारत के इस्लाम मतावलंबी भी जेहाद में भाग लेकर अपने को सच्चा मुसलमान सिद्ध करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे, अकबरुद्दीन ओवैसी और इमरान मसूद जैसे कम से कम हज़ारों की ताली पीटती भीड़ के सामने दिये गये हिंसक बयान, डॉ ज़ाकिर नायक के आतंकवाद को इस्लाम से जोड़ते हुए दिये गये भड़काऊ बयान, और आज़म ख़ान को सीधे-सीधे भारत माता को डायन बताने वाले बयान इसके आगम प्रमाण हैं, और 1948-49 की भिम्बर और मीरपुर की घटनाएं, 1946-47 की कलकत्ता और नोआखाली की घटनाएं, और उसके भी पहले मोपला की घटनाएं, जिसमें अपने इस्लाम मतावलम्बी पड़ोसियों की योजनाओं से अनभिज्ञ अन्य धर्मावलम्बी गाजर-मूली की तरह काट डाले गये थे, इसके अनुमान प्रमाण हैं, और देश के विभिन्न क्षेत्रों में यदा-कदा दिख जाने वाले पाकिस्तानी झण्डे इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

इस्लाम मतावलम्बियों साथ अन्य वर्ग भी हैं जो इस देश की परम्परागत हिन्दू धर्म को मानने वाली और बहुसंख्या में न होने के बावजूद अभी तक इस देश की नीति-निर्धारक रही आबादी से इतनी तीव्र घृणा रखते हैं जितनी शायद इस्लाम मतावलम्बी भी नहीं करते, और मजबूरी में इस देश में बने हुए हैं। उनकी ओर से अगर देश से अलग होने की आवाज़ें इतनी तीव्रता से सुनायी नहीं देतीं, तो इसका कारण यह है कि वह मूलतः हिंसक नहीं हैं, और कम से कम अभी तलवार के ज़ोर से अलग हो जाने में सक्षम नहीं हैं, पर देश के अगड़ी जाति के हिंदुओं से उनकी घृणा इतनी तीव्र है कि अगर इस युग में भी शाप और आशीर्वाद फलित होते, तो सारे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य कब के जल कर भस्मीभूत हो गये होते। घृणा के पोषक इस वर्ग का नाम दलित है। बाबासाहेब अम्बेडकर इनके भगवान हैं जिन्होंने कभी इनके लिए अलग अछूतिस्तान की माँग की थी, और महाप्राण जोगेंद्र नाथ मण्डल और पेरियार इनके पैगम्बर हैं। ज्ञातव्य है कि जोगेंद्र नाथ मण्डल की पाकिस्तान के निर्माण में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका रही थी, और वह पाकिस्तान की पहली सरकार में कानून-मन्त्री भी बने।

कश्मीर की समस्या अगर भारत में न रहने के इच्छुक लोगों का भारत में एकीकरण है, तो दलित वर्ग के भी एकीकरण के बिना भी इस समस्या का समग्र समाधान नहीं खोजा जा सकता। कश्मीर की समस्या का हल खोजने वालों को इस सवाल का उत्तर खोजना होगा कि आखिर लोग भारत के साथ क्यों नहीं रहना चाहते।

इस सवाल का एक उत्तर तो यह है कि भारतीय राज्य-तन्त्र समस्याओं की सही पहचान करने में ही अनिच्छा का प्रदर्शन करता रहा है, जिसका कारण है राज्य का पर्याप्त शक्तिशाली न होना। पर्याप्त शक्ति के न होने के कारण हमारी सरकारों को यह विश्वास ही नहीं हो पाता कि समस्याओं की वास्तविक पहचान कर लेने के बाद उनसे सीधे टकरा जाने में वह सक्षम भी हैं।
सारांश यह है कि कश्मीर की समस्या के दो आयाम हैं:
1. कश्मीर घाटी के लोग भारत के साथ नहीं रहना चाहते जिसका मूल कारण है-इस्लाम, और
2. भारतीय राज्य का पर्याप्त शक्तिशाली न होना जिसके कारण वह समस्या की सही पहचान करने में भी डरता है।

इति वार्ताः।

एक पत्र लेफ्ट लिबरल्स के नाम

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प्रिय लेफ्ट लिबरल्स,

आप लोगों के करीब करीब एक शताब्दी तक अपना एजेंडा चला लिया और हमको बेवकूफ बना लिया। क्या आप लोगों का मन नहीं भरा अभी भी? कितनी और तबाही लाओगे कितने और पीढ़ियां बर्बाद करोगे तब जा के तुमको चैन आएगा? कितने सालों तक हम आँख मूँद कर इनकी एक एक बात पर विश्वास करते रहे, कितने दिनों तक इनकी दिखाई राह पर चलते रहे और किसी धार्मिक इंसान की तरह इनकी बातों को धर्म मान कर, तवज्जो देते रहे। नतीजा क्या हुआ? हम बुरी तरह से ठगे गए। बहुत बुरी तरह से। लेकिन अब और नहीं। बहुत हो गया और हमारी सहनशक्ति का पैमाना अब छलक चूका हैं।

इनकी सबसे खतरनाक चाल हैं, कि ये किसी एक जाति, वर्ग, संप्रदाय, धर्म या आंदोलन के रहनुमा बन जाते हैं। उनकी चौधराहट अपने नाम कर लेते हैं। और हम इनकी इस चाल में बार बार आते रहे। कभी ये आदिवासियों के रहनुमा बनते हैं, कभी दलितों के, कभी O.B.C. के। इनको अगर कोई ठीक से फायदा दिखा दे, तो ये रास्ते में पड़े एक पत्थर के टुकड़े को भी अगड़े पिछड़े में बाट कर उसके भी सिरपरस्त बन जायेंगे। हम इनकी चाल में फंसते चले गए खभी यह ध्यान नहीं दिया, कि जिसको देश की परवाह होती हैं, तो वह सबको साथ ले कर चलता हैं, बल्कि उनको और विभाजित नहीं करता हैं। इन्होने कभी भी सबको ले कर चले की बात नहीं की। हमारे देश में, इनकी भाषा में दबे, कुचले, वंचित, शोषित, हैं तो कभी भी लेख नहीं लिखे गए, कि सब मिल कर इसको कैसे ठीक कर सकते हैं। आम जनता अपनी तरफ से क्या करे और क्या न करे। सरकार ने कानून बना दिया पिछड़े वर्ग के लिए, लेकिन उसको सख्ती से लागू करने के लिए आप ने किसी पत्रकार, बुद्धिजीवी, कलाकार, नाटककार को सरकार का और नौकरशाही का, कभी बैंड बजाते देखा? कभी देखा हो तो ज़रूर बताइयेगा।

हमारे न्यायालय में करोड़ो मुक़दमे लंबित पड़े हैं, और मीलॉर्ड स्कूली बच्चों की तरह गर्मी की छुट्टियों पर जाते हैं, कभी किसी कलाकार ने एक नुक्कड़ नाटक भी किया ? कभी जनमत बनाने की कोशिश हुई? कभी किसी ने जंतर मंतर पर धरना दिया? किसी आक्रामक पत्रकार ने लेख लिखे? किसी एक्टिविस्ट का ईमान जागा? किसी की अंतरतमा के कचोटा? नहीं जी, इनको तो ये बताने से फुर्सत नहीं कि एक फलाने नेता की नाक अपनी दादी से मिलती हैं। हमको यही बता कर ये धन्य हो गए, और चाहते है, यह जान कर हम भी धन्य हो जाएँ। पलक पावड़े बिछा दें। इन अज्ञानियों को यह भी नहीं पता, कि कब पत्रकार से यह मज़ाक के पात्र बन गए। अभी भी ये अपने आइवरी दुर्ग में रहते हैं, और सोचते हैं कि सुचना को जब जैसे चाहे छल बल से हमको परोस देंगे और हम गटक लेंगे। जमीन पर आ कर देखें, अपनी औकात पता चल जाएगी। एक बहुत बहुत पुराणी पार्टी के अध्यक्ष रोज रोज नया झूठ परोसते हैं, और उनके पीछे एक से बढ़ कर एक पत्रकार , बुद्धिजीवी , कलाकार, लेखक एक्टिविस्ट खड़े रहते हैं। इनके मुँह में दही जमी रहती हैं और समय समय पर ये पत्रकार जनता को ये भी बताते रहते हैं कि कैसे वह अध्यक्ष महोदय एक नेता के रूप में विकसित हो रहे हैं , इस बात पर वह तो धन्य हो जाते हैं और चाहते हैं कि हम भी धन्य हो जाए। बिचारे अभी भी सन सत्तर में ही रह रहे हैं। और हमारे पास सोचना का जरिया सिर्फ यही गिने चुने लोग हैं।

पत्रकार अपने मन की एक और बात समय समय पर साँझा करते हैं। मोदी साक्षात्कार नहीं देते। नहीं तो उनसे हम कड़े सवाल पूछते। यही पत्रकार जब एक और पार्टी की नेत्री से साक्षात्कार लेते हैं, तो ऐसे ऐसे सवाल पूछते हैं, कि जिन प्रोफेसरों से इन्होने पत्रकारिता की शिक्षा ली हैं, अगर ये उनके हाथ पड़ जाएँ तो इनको किसी सार्वजानिक जगह पर दंडस्वरूप मुर्गा बना दें. जब एक खास पार्टी की प्रेस कांफ्रेंस होती हैं तो यही पत्रकार कड़े सवाल पूछने की जगह डिक्टेशन लेकर चले आते हैं , और ये सोचते हैं की जनता गाँधी जी के तीन बन्दर हैं, जिनको न तो दिखता हैं, न सुनता हैं, न बोलना जानते हैं। और जब सोशल मीडिया पर इनका काम जनता करने लगती हैं तो ये पीड़ित- पीड़ित खेलने लगते हैं। बाकी समय यह हम सबको पीड़ित बनने से मना करते हैं।

प्रिय लेफ्ट लिबरल्स, तुम्हारी दास्तान बहुत लम्बी हैं, एक पोस्ट में समिति नहीं जा सकती। पूरी किताब लिखनी पड़ेगी। लेकिन ये जान लो, तुम्हारी नौटंकियों का समय अब समाप्त होता हैं। बहुत दिनों से हमको बहुत बेवकूफ बना लिया अब और नहीं। तुम्हारी एक एक चाल हम समझते है और समय पड़ने पर तुमको कड़ी टक्कर मिलती रहेगी। तुमने बहुत से टॉप के अखबार, मैगज़ीन, फिल्म, फिल्मवालों गाने, गानेवालों, नाटक, नाटकवालों, आर्ट,आर्टवालों, साहित्य, साहित्यवालों, शिक्षा, शिक्षावालों, N.G.O.  N.G.O. वालों को मिला कर अपनी मंडली बनायीं हैं। हम इन मंडली वालो को जानते हैं और पहचानते हैं। तुमने इनके आस-पास जो आभामंडल बनाया था, वह अब पूर्णतया खंडित हो गया हैं। तो अब तुम लोग क्या बन गए हो? तुम लोग अब मनरंजन का साधन बन गए हो, बालाजी सीरियल्स से ज्यादे आनंद तुम्हारे सीरियल्स देखने में आता हैं। इसलिए तमाशा जारी रखो।

आतंकवाद के आंतरिक समर्थक

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कभी तो पाकिस्तान वाले भी सोचते होंगे कि हमने अकारण ही 3 युद्व हिंदुस्तान के साथ लड़े और दुनिया मे हँसी का पात्र बन गए, या फिर वो सोचते होंगे कि अगर हमने पाकिस्तान को लेने की जल्दी न कि होती तो आज पूरे हिंदुस्तान को ही पाकिस्तान बना देते। जी हां दोस्तो, आपको पढ़ के थोड़ा अजीब जरूर लग रहा होगा लेकिन वास्तविकता से मुँह नही मोड़ा जा सकता। भारत को बर्बाद करने के लिए किसी पाकिस्तान किसी चीन की कोई जरूरत नही है, न ही किसी बाहरी के बस की बात है कि वो भारत को नुकसान पहुँचा दे। इस नेक कार्य को अंजाम तक पहुचने के लिए तो भारत में बैठे कुछ क्रांतिकारी, उदारवादी, धर्मनिरपेक्ष जमात ही बहुत है।

वर्तमान में अंतर्राष्ट्रीय कोर्ट में चल रहा कुलभूषण केस इसका ताजा उदाहरण है। जब पाकिस्तान के पास खुद ऐसा कोई सबूत नही मिला जिससे वो कुलभूषण जाधव को भारतीय जासूस साबित कर सके, ऐसी मुश्किल की घड़ी में उसके काम आया भारत के ही तीन महान पत्रकारों का लिखा हुआ लेख, जिसे कोर्ट में दिखा कर पाकिस्तान के वकील ने कहा देखिए, हिंदुस्तान के सच्चे पत्रकार खुद मान रहे है कि कुलभूषण जाधव जासूस है। बताइये ऐसे हिंदुस्तानियों के बारे में क्या कहे। इतिहास गवाह है रावण को मरवाने में विभीषण और बाली को मरवाने में सुग्रीव का बड़ा अहम योगदान रहा है, यहाँ भी उसकी पुनरावृत्ति होती दिख रही है।

भारत मे बैठा ये बुद्धिजीवी जमात सदाचार, संविधान, सच्चाई, स्वतंत्रता और आधुनिकता कि आड़ में विषयों को कुछ इस प्रकार क्षत-विक्षत कर देता है कि आप भी एक वक्त के लिए सोच में पड़ जाएंगे कि बात तो सही है। लेकिन उस सही बात की आड़ में जो गलत धंधा चलाया जाएगा उसके बारे में आपको पता भी नही चलने दिया जाएगा। अभी हाल ही में 14 फरवरी को पुलवामा में भारतीय जवानों पे  हुए आतंकी हमलों का मूल्यांकन करते हुए, कुछ महात्मा लोग बताने लगे कि यह भारत सरकार की विफलता है। हमारे सैनिकों को अच्छा खाना नही मिलता, CRPF के जवानों को पेंशन तक नही देती सरकार। अब आपको सुनने में लगेगा कि बात तो सही है, ये बात सच भी है। लेकिन ध्यान से सोचिए कि कितनी धुर्तता के साथ आपका ध्यान आतंकवाद के मुद्दे से हटाकर सुविधाओं की कमी की तरफ मोड़ दिया गया।

जरा सोचिए क्या सुविधाओं की कमी के कारण आतंकवाद को न्यायोचित ठहराया जा सकता है? क्या अच्छा खाना दे देने से जवानों की बम ब्लास्ट में मृत्यु नही होती? क्या पेंशन दे देने से आतंकी घटना नही होती? ये सोचने का विषय है। इन मक्कार कुतर्कवादियों का हमला एक तरफ से नही होता, ये अलग अलग रूपो में हमे अलग अलग दिशाओं में ले जाकर वास्तविकता से भटकाने का प्रयास करते है। कुछ इन्ही की जमात के महान लोगो ने शहीदों की जातियों का गहन मूल्यांकन करके ये बहुमुल्य जानकारी पता लगाई की किस जाति के कितने लोग शहीद हुए, और अपने इस अनुसंधान से यह सिद्ध करने में जुट गए कि भारत मे मनुवाद की जड़े कितनी गहरी है। अगर कभी आप इन्ही जातिवादियों से आतंकवाद की जाति या मजहब पूछेंगे, तो इस देश के सारे रंगे सियार एक सुर में बोलेंगे – आतंकवाद का कोई धर्म नही होता।

ऐसे धूर्त लोगो से बचिए, अपने समाज, अपने देश को भी बचाइए। सरहद पर खड़ी सेना बाहर के दुश्मनों से तो मुकाबला कर सकती है, लेकिन अंदर के इन दुश्मनों से हमे ही निपटना होगा। जिन महान व्यक्तियों ने देश की एकता, अखंडता, स्वतंत्रता के लिए अपना बलिदान दिया वो आज जहाँ से भी हमे देख रहे होंगे, बस यही कह रहे होंगे-  हम लाये है तूफान से कश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्हाल के..

लोकसभा चुनाव: भाजपा की अगली सबसे बड़ी चुनौती होगी ‘कांग्रेस पार्टी का घोषणा पत्र’

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नयी दिल्ली. माना जा रहा है कि मार्च के पहले सप्ताह में ही लोकसभा चुनावों का ऐलान हो सकता है, ऐसे में सभी पार्टियाँ अपने आखिरी दौर की तैयारियों में जुट गई हैं। गठबंधन के लिहाज से देखें तो भाजपा की हालत अच्छी नज़र आ रही है। जिन राज्यों में भी गठबंधन हो सकता था वहाँ उन्हें सफलता हाथ लग चुकी है। दूसरी ओर बहुत चर्चा होने के बावजूद विपक्ष का ‘महागठबंधन’ अपने असली अंजाम तक नहीं पहुँच पाया, इसका कारण शायद यह था कि कोई भी दल कम से कम चुनावों से पहले कांग्रेस के साथ नज़र आना नहीं चाहता है।

अब भाजपा के लिए कोई बड़ी चुनौती बाकी नहीं रह गई है, यहाँ तक कि तमिलनाडु जैसे राज्य में भी उन्हें सीटों के लिहाज से थोड़ा फायदा हुआ है।

ऐसे में यह सवाल उठता है कि अब बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है? हाल ही में तीन राज्यों में मिली हार से यह स्पष्ट हो गया है कि लोकसभा चुनावों में भाजपा को कांग्रेस पार्टी के घोषणा-पत्र से जरूर सचेत रहना चाहिए। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस ने लोक-लुभावन वादों पर सवार होकर सत्ता की चाबी हासिल कर ली है, अब उनके हाथ एक जबरदस्त फार्मूला हाथ लग चुका है, जिसका प्रयोग वो आम चुनाव में भी करेंगे। बल्कि इस बार तो वो और ज्यादा आक्रामक रूप से करने वाले हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि राहुल गाँधी के घोषणा-पत्र में भारी आर्थिक रियायतों का ऐलान होगा, कर्जमाफी जैसे वादे होंगे, कई ऐसे वादे होंगे जो आँखें चौंधिया देंगी क्योंकि कांग्रेस के पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है। जनता को पैसे का लालच देकर ही वो रेस में बनी रह सकती है, राहुल गाँधी के पास ऐसा कोई मुद्दा नहीं है जिससे मोदी सरकार को घेरा जा सके।

राफेल जैसे मुद्दों पर दिमाग खपाना आमजन को पसंद नहीं है और वैसे भी इस सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाना खतरे से खाली नहीं। मोदी की छवि उनके आरोपों को बीच में ही भोथरा कर देती हैं इसलिए ‘भ्रष्टाचार’ का मुद्दा विमर्श में ना आए, इसी में कांग्रेस की भलाई है।

इसके अलावा कांग्रेस पार्टी कुछ ऐसे सामाजिक मुद्दों पर भी उल्टे-सीधे घोषणा कर सकती है जो थोक के भाव वोट खींचने की क्षमता रखते हों, जैसे कि तीन तलाक, लिंगायतों का मसला, SC-ST एक्ट, गैर-हिन्दू दलितों को आरक्षण या फिर घुसपैठियों को नागरिकता जैसे मुद्दे! ये सभी विषय अलग-अलग राज्यों में चुनावों की सूरत बदलने की ताकत रखते हैं।

मोदी और अमित शाह की जोड़ी को इससे जरूर सचेत रहना चाहिए। हालाँकि पिछले कुछ दिनों में उन्होंने मध्यवर्ग को कुछ राहत देने की पहल की है, साथ ही किसानों के लिए भी सहायता राशि का ऐलान भी एक अच्छा कदम माना जा रहा है। फिर भी, तीन राज्यों के चुनाव से यह सबक मिला है कि कई बार ‘किसने क्या किया है?’ पीछे छूट जाता है और ‘कौन क्या करेगा?’ यह महत्वपूर्ण हो जाता है। सोचकर देखिए अगर राहुल गाँधी असम में जाकर नागरिकता बिल पर बोलेंगे तो उस समय ‘बोगीबिल ब्रिज’ का कोई महत्व नहीं रह जाएगा।

AIADMK+PMK+BJP alliance and political transition and transformation in Tamil Nadu

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Tamil Nadu is marching towards a transition state with reference to the mood and expectations of the electorates are concerned. Good number of people, especially the first time voters wants a total change in Tamil Nadu and thanks to the continuous efforts of Tamil patriots, people are today well informed about how DK and DMK imposed Dravidian identity over Tamil, promoted the politics of hatred, negativity towards God, Hindu religion and Hindi language and progressively destroyed the state. Further how true were they in reforming the state, annihilating the caste system are also well to people of the state.  Karunanidhi shrewdly used caste formula to win elections. Thanks to the emergence of MGR and Amma J Jayalalitha, the relics of good old Bhakti tradition of Tamil exist today, which was constantly being attacked and abused by the founding father of DK and the ethos of DMK – EV Ramasamy Naicker.

Tamil culture is not only the oldest but also is rich in literature, poetry, spirituality, philosophy, medicine, science, engineering technology, environmental concern, agriculture, astounding sewage and waste disposal system etc. As a result of the onslaught of such great Tamil tradition and the subsequent imposition of Dravidian identity over Tamil by EVR and then by DMK, the history has been portrayed in such a way that the Tamil Nadu that we see today is fully made by DMK and the elevation of depressed community has happened only because of DMK.

If DMK and EVR were that sincere, they could have classified all the Tamil people under one caste and reservation be made based on the backwardness in financial and educational situation of people.

The Sattanathan Commission appointed by the then Karunanidhi government in 1970 said that “some castes have taken full advantage of the state’s protective measures and made rapid strides, while many others continue to trail behind and are still in the lower stages of stagnancy”. Therefore the commission made recommendations for the removal of ‘creamy layer’ from the list of beneficiaries – exclusion of those families of salaried persons whose income exceeds Rs.9000, landowners with more than 10 acres of land and business people with taxable income exceeding Rs.9000.

But the Karunanidhi lead DMK government did not agree to the recommendation and did not exclude the creamy layers from the reservation list. Had DMK government lead by Karunanidhi implemented the recommendation of Sattanathan commission, today hardly any people would have been left for us to identify as backward class.

If DMK had excluded the creamy layer, many people from the backward class would have got better opportunity and representation in both education and government employment.

Today the missionaries of anti-God, anti-Hindu, anti-Hindi rhetoric has reduced the state politics to dynastic rule where the right to rule the state is transferred from father to son.

People of the state are looking for an alternate model of governance to save the country from the politics of dynasty.  People want a leader who is credible, decisive, honest and interested fully in development and sab ka vikas and not in dynastic politics, nepotism and corruption.

Today people of India at large find PM Narendra Modi to be most honest leader with clear vision and commitment for India’s development and sab ka vikas. Similarly, Dr Anbumany Ramadoss of PMK is seen as a ‘True Tamil Leader’, represent the ancient Tamil Bhakti tradition, focusing on development of the state, positive politics and on a clear mission to revive the ancient glory of Tamil tradition, God, spirituality etc.

If we carefully study the governance model of EPS, one undeniable fact would emerge strongly, which is the total and complete commitment of EPS towards poor people and their upliftment. Looks like EPS has completely inherited the pro-poor genes of MGR and Amma. The announcement of the financial aid to people below BPL by EPS is a remarkable fete.

By considering Pongal being the state festival and pride of Tamil Nadu, EPS made sure that everyone in the state must celebrate the festival and should not suffer due to lack of money. Hence EPS provided financial support to all family card holders along with 1kg rice, sugar cane, cashew etc., so that the Pongal during his governance will be a real celebration by every Tamil family. The Pongal of 2019 was a great and grandsire celebration thanks to the initiatives of EPS.

The combination AIADMK, PMK and BJP alliance is indeed a progressive combination.  Any transition can happen only through the existing establishment. EPS +OPS have brought huge transition in Tamil Nadu politics after the demise of Amma. Although they may not fill the leadership space of Amma, but have taken several measures towards uplifting the poor people, develop the state and administer the state in the best way possible. The way EPS government is functioning and making several development fetes clearly pointing towards the departed soul of Amma is very much present in Tamil Nadu, constantly guiding and mentoring EPS government and that is how EPS is making several wonders for the state.

PM Narendra Modi provides a credible leadership to the team/alliance. Further the election is for the centre and India need a stable, decisive, development centric government with good representation from Tamil Nadu to develop the state and not to loot or engage in scams. India is already aware of several scam allegations such as 2G, Coal allocation, Adarsh, CWC, Aircell-Maxcel etc.

People of Tamil Nadu must make the political transition happen by electing AIADMK alliance for both the development the state and India. PM Modi at the centre with the complete support and participation of PMK and AIADMK and the state being governed by AIADMK will certainly prove great to the state. Certainly the chemistry and arithmetic of dynasts will prove nothing but the politics of dynasty, nepotism and corruption and not development or sab ka vikas.

Post Pulwama Attack: All things that matter

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At the time this article was written, it already had been 7 days since the terror-attack occurred in the Pulwama district of Jammu and Kashmir, India. Hence, the incidents and facts are only latest as before 21th February 2019.

Almost a week after the death of 44 CRPF (Central Reserve Police Force) men, as the unfortunate event took place, it has left the whole Republic of India in a condition of grief. Yet, the nation shows undeniable unity and rage toward the terrorism and their de-facto sponsor Islamic Republic of Pakistan. As a descriptive article, first, we will put light on the terror incident.

As per the intelligence sources, at about 3:10pm a van filled with about 350Kg of RDX and similar components smashed into the convoy bus of the CRFP, the detonation of the suicide bomb, which was carried by member of Jaish-e-Mohammad, a radical terror based group of Pakistan along with bus turned into pieces with nothing but leftovers of the bus and our martyred soldiers, the suicide bomber had joined JeM last year and was hidden in Tral, a district near border in Kashmir itself. Sources have also confirmed that the noise of the blast was heard within the radius of about 15Km which also left, the Kashmir nervous too. Meanwhile the last 6 days have seen many sides of the story unfold but some things such as the in-denial attitude of Pakistan and the unbreakable morale of Indian people and their army remain same.

As of today, it’s not about where Kashmir belongs, that boat sailed away more than 70 years ago, the state belongs to India, even if you talk about Pakistan-occupied-Kashmir, either hook or by crook, by war or peace. The actual question is how there could be such violent attack? and how are we going to handle Pakistan? along with their military responses.

From JeM’s taking responsibility of this attack to Imran Khan responding reservedly after 5 days of it, so many things have taken place, it might be hard to track of them here, so we shall move with anti-chronological order.

Escalation of diplomatic pressure on Pakistan by India

The well-known Indus-water treaty between both countries is also an example of settled peace since 1960 but now, the Indian Government has decided to “use” the river flow, redirect it away from Pakistan, since according to the treaty, India can use unaccounted water flow as per its own convenience. We don’t know the magnitude of effect it will put on Pakistan but it’ll not be minute. Also, the increase in VAT to 200% over trade is substantial enough to pressurize Pakistan, expensive goods and basic needs will jerk normalcy there. Yet China’s reaction is still pending. Since it has a huge amount of money invested in CPEC, they will not stay silent for long. In fact, China already asked both countries “to solve it diplomatically”.

India will have to look after China’s interest and how to manage it before it becomes more tense.

Boycotting their artists, PSL matches, Visas and removal of the MFN nation have also given confidence to the Indian public and a global message that severe and cumulative actions will be taken against the ill-wishers. Another peace symbol, Delhi-Lahore bus services have been suspended and their future doesn’t look bright either.

Meanwhile, Pakistan stated that certain measures against terror and Hafiz Saeed are already been taken, ban on Jamat-ud-Dawa (JuD) and Falah-e-Insaniat Foundation (FIF) may look pleasing on paper, their actual results are yet to be accounted.

Draft of Foreign minister and response by Railway minister of Pakistan

on 19th February, as the Prime Minister of Pakistan shared his views on Pulwama attack, a couple of hours later their Foreign Minister Shah Mahmood Qureshi addressed to UN secretary-General by letter to draw their attention about the ‘growing threat’ of the Indian security force to the state of Pakistan. On one hand where Imran Khan asked India for ‘proof’ of attacks and warned the state that military action will get military response, it seemed like that de-facto in power, General Bajwa and their men are afraid of something, their letter to UN, in fact after the bilateral agreement of Shimla (1971) and perhaps only few diplomatic isolation by MEA India, Pakistan has started to feel the fear inside them.

While, the hypocrisy and confliction of their own statements are part of their basic traits, not to forget, the Railway minister has ‘warned’ India, for not to take any action. Now, both the professionalism of their Government and functionality comes into question.

One side their Foreign minister is asking UN to intervene in something very bilateral and internal matter, on the other side, their Railway minister managed to publish a video and threaten their neighbor nuclear state, to whom they have already lost 4 wars.

PM Imran’s view on Pulwama attack

The controversial statement of PM has left both India and the world with some kind of puzzle to solve. Starting with his statement itself, Khan has asked India for ‘proof’, assuming the fact that according to him: the responsible terror based group of Pakistan ‘JeM’ isn’t enough, or the fact that one more Pakistani terrorist was gunned down in Pulwama hours later. Pakistan playing the victim card and acting like nothing has happened is old as much their nation is, they didn’t even know about Osama Bin-Laden, they have kept the mastermind Ghazi safe in their Army Base hospital, they don’t have any hand in Kashmir situation, just some good innocent people minding their own business, killing innocents in Baluchistan and looking at their failing economy, while asking Saudi prince for money and China for over-head protection.

This is the same Imran Khan who used to say, “Decide fate of Kashmir in Sharjah by playing cricket”, same Imran Khan who couldn’t condemn the terrorist attack, same ‘elected’ Prime minister of Pakistan by their beloved citizens and when they ask for Kashmir, there is just one statement to reply “Shakal dekhi hai apni?“. The idea of peace and ‘walk the talk’ by Imran already shows that Pakistan is way more afraid than India thought.

JeM encounter in Pulwama post the attack

Within the 100 hours terror attack, the joint-force operation of Indian Army, CRPF and J&K Police were able to kill the commander-in-chief of JeM and three more of its members, while unfortunately eight of Indian forces were killed in action. GOC held a conference shortly after the operation, the briefing included some major points by the GOC Lt. Gen. KJS Dhillon of Indian Army, also addressing all the radical thinkers and terrorists, “Whoever picks up gun will get killed” asking the mothers of valley to ask their sons to surrender and come back into mainstream. Also stating that JeM is being commanded by Pakistan army and ISI, Lt. General has also stated that India will keep “option opens if these type of attacks reoccur”.

Although the force is still performing operations in the valley, the killing of JeM terrorist didn’t turn much viable, wife of Major Dhoundiyal, Mrs. Nikita Koul showed inspirational courage at his last rites. This is a lesson for anyone who had been questioning India’s capability and doubting ‘revenge’ with a nuclear state like Pakistan. Those who have supported such opinions shall also consider the opinions of martyr’s wives and mothers.

Such large and independent state like India can’t be afraid of full-front war or threats of Pakistan, else it would aid to their confidence.

Sympathizing Pakistan within 42 hours of attacks and Netizens strategy advisors.

What is hurtful to the nation is not Khan’s indifferent statement on Pulwama attack but the fact that for many in India, Pakistan and their citizens are a bigger priority than anything. Perhaps, they are more afraid for the sentiments of innocent citizens in Pakistan but nevertheless don’t have time to condemn their terrorist aid, attacks, and endorsements.

Some have said that the suicide bomber did it out of humiliation by Indian forces, while some have compared deaths from depression and hunger with death of a soldier, other college-activists like Shehla Rashid were found guilty of creating fake news about Kashmiri students getting harassed all over the country, CRPF informed the public about such news were made by miscreants and aren’t true, spread over the internet.

After all this, some have come over to solve the Kashmir issue, without even knowing the full form of LoC or anything about ‘Instrument of Accession’, all they did was forwarding posts on Facebook and Instagram and came across with their ‘best’ way to solve with Pakistan. Quoting Lt. Gen. Syed Ata Hasnain(retd) words “It is partly because of social media where everyone has an opinion and everyone is a strategic advisor”.

The best possible thing for everyone is to show unconditional support to the forces and observe the course of action, rather than making opinions online.

India’s pending reply to Pakistan and situation in Kashmir

While PM Narendra Modi has promised the Republic of India to take befitting avenge with Pakistan, the question stands still, which action is best-suited. It’s a fact that only diplomatic pressure will not suppress Pakistan but another Surgical strike isn’t possible since Pakistan is already ready for any on-ground attack.

Leaving them with Aerial solutions, UAV and missiles or even collaborating them. But, whatever action the forces take, Pakistan will act back and we have to be stay alert of it. Calculating risk factors and loss of causalities, every step has to be precise.

The talkers of peace already broke ceasefire in Nowshera sector on the same date their Prime Minister opened up about Pulwama. Our condolences are with the family of the martyrs, it’s true we as civilians can never relate to their loss and their lives are the cost of our freedom and we are indebted to excel for this nation.

Recruitment drive for Indian Army has started in Baramulla sector, which witnessed a huge amount of turn up by Kashmiris for being selected in the armed forces, proving that the people of Kashmir still look up to India for their development and show trust in us. The unrest in Kashmir will turn normal within due course of time, for the time being we expect the Valleys to be green and peaceful as before.

गिलगित-बाल्टिस्तान, जम्मू-कश्मीर और अनुच्छेद 370 व 35’A’

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वास्तव में अगर जम्मू-कश्मीर के बारे में बातचीत करनी है, तो जरूरत है सबसे पहले PoK-अक्साई चीन के बारे में बातचीत की। इसके ऊपर देश में चर्चा होनी चाहिए। गिलगित जो अभी PoK में है, विश्व में एकमात्र ऐसा स्थान है जो कि 5 देशों से जुड़ा हुआ है – अफगानिस्तान, तजाकिस्तान, पाकिस्तान, भारत और तिब्बत-चीन।

वास्तव में जम्मू-कश्मीर की महत्ता जम्मू के कारण नहीं, कश्मीर के कारण नहीं, लद्दाख के कारण नहीं बल्कि अगर यह महत्वपूर्ण है तो वह है गिलगित-बाल्टिस्तान के कारण।

इतिहास में भारत पर जितने भी आक्रमण हुए, यूनानियों से लेकर आज तक (शक, हूण, कुषाण, मुग़ल) वह सारे गिलगित के रास्ते हुए। हमारे पूर्वज जम्मू-कश्मीर के महत्व को समझते थे। उनको पता था कि अगर भारत को सुरक्षित रखना है तो दुश्मन को हिंदूकुश अर्थात गिलगित-बाल्टिस्तान के उस पार ही रखना होगा। किसी समय इस गिलगित में अमेरिका बैठना चाहता था, ब्रिटेन अपना बेस गिलगित में बनाना चाहता था। रूस भी गिलगित में बैठना चाहता था। यहां तक कि पाकिस्तान ने 1965 में गिलगित को रूस को देने का वादा तक कर लिया था। आज चीन गिलगित में बैठना चाहता है और वह अपने पैर पसार भी चुका है। पाकिस्तान तो खैर बैठना चाहता ही था।

दुर्भाग्य से इस गिलगित के महत्व को सारी दुनिया समझती है केवल एक उसको छोड़कर, जिसका वास्तव में गिलगित-बाल्टिस्तान है- वो है भारत। क्योंकि हमको इस बात की कल्पना तक नहीं है कि भारत को अगर सुरक्षित रहना है तो हमें गिलगित-बाल्टिस्तान किसी भी हालत में चाहिए।

आज हम आर्थिक शक्ति बनने की सोच रहे हैं। क्या आपको पता है गिलगित से थल मार्ग से आप विश्व के अधिकांश कोनों में जा सकते हैं। गिलगित से 5000 km दुबई है, 1400 Km दिल्ली है, 2800 Km मुंबई है, 3500 Km रूस है, चेन्नई 3800 Km है और लंदन 8000 Km है।

एक समय जब हमारा सारे देशों से व्यापार चलता था, 85% जनसंख्या इन मार्गों से जुड़ी हुई थी। मध्य एशिया, यूरेशिया, यूरोप, अफ्रीका सब जगह हम सड़कों से जा सकते हैं अगर गिलगित-बाल्टिस्तान हमारे पास हो।

आज हम पाकिस्तान के सामने ईरान-पाकिस्तान-भारत (IPI) गैस लाइन बिछाने के लिए गिड़गिड़ाते हैं। ये तापी की परियोजना है, जो कभी पूरी नहीं होगी। अगर हमारे पास गिलगित होता तो गिलगित के आगे तज़ाकिस्तान है। ऐसे में हमें किसी के सामने हाथ नहीं फ़ैलाने पड़ते।

हिमालय की 10 बड़ी चोटियां हैं, जो कि विश्व की 10 बड़ी चोटियों में से हैं और ये सारी हमारी है। इन 10 में से 8 गिलगित-बाल्टिस्तान में है। तिब्बत पर चीन का कब्जा होने के बाद जितने भी पानी के वैकल्पिक स्त्रोत (Alternate Water Resources) हैं, वह सारे गिलगित-बाल्टिस्तान में है।

आप अचंभित हो जाएँगे यह जानकर कि वहां बड़ी-बड़ी यूरेनियम और सोने की खदाने हैं। PoK के मिनरल डिपार्टमेंट की रिपोर्ट को पढ़िए, आप आश्चर्यचकित रह जाएँगे। वास्तव में गिलगित-बाल्टिस्तान का महत्व हमको (भारत को) मालूम नहीं है। और सबसे बड़ी बात यह कि गिलगित-बाल्टिस्तान के लोग पाकिस्तान विरोधी हैं।

दुर्भाग्य है कि हम हमेशा कश्मीर बोलते हैं, जम्मू-कश्मीर नहीं बोलतेl कश्मीर कहते ही जम्मू, लद्दाख, गिलगित-बाल्टिस्तान दिमाग से निकल जाता हैl ये जो पाकिस्तान के कब्जे में PoK है, उसका क्षेत्रफल 79000 वर्ग किलोमीटर है। उसमें कश्मीर का हिस्सा तो सिर्फ 6000 वर्ग किलोमीटर है लेकिन 9000 वर्ग किलोमीटर का हिस्सा जम्मू का है और 64000 वर्ग किलोमीटर हिस्सा लद्दाख का है, जो कि गिलगित-बाल्टिस्तान है। यह कभी कश्मीर का हिस्सा नहीं था। यह लद्दाख का हिस्सा था और वास्तव में सच्चाई यही है। इसलिए पाकिस्तान यह जो बार-बार कश्मीर का राग अलापता रहता है तो उसको कोई यह पूछे तो सही – क्या गिलगित-बाल्टिस्तान और जम्मू का हिस्सा जिस पर तुमने कब्ज़ा कर रखा है, क्या ये भी कश्मीर का ही भाग है? कोई जवाब नहीं मिलेगा।

भारत में आयोजित एक सेमिनार में गिलगित-बाल्टिस्तान के एक बड़े नेता को बुलाया गया था। उन्होंने कहा, “हम भारत भूमि के भुला दिए गए लोग हैं।” उन्होंने कहा कि भारत हमारी बात ही नहीं जानता।

किसी ने उनसे सवाल किया कि क्या आप भारत में रहना चाहते हैं ?

जवाब था – “60 साल बाद तो आपने मुझे भारत बुलाया और वह भी अमेरिकन टूरिस्ट वीजा पर और आप मुझसे सवाल पूछते हैं कि क्या आप भारत में रहना चाहते हैं l आप गिलगित-बाल्टिस्तान के बच्चों को IIT , IIM में दाखिला दीजिए, AIIMS में हमारे लोगों का इलाज कीजिए… हमें यह लगे तो सही कि भारत हमारी चिंता करता है, हमारी बात करता है। गिलगित-बाल्टिस्तान में पाकिस्तान की सेना कितने अत्याचार करती है, लेकिन आपके किसी भी राष्ट्रीय अखबार में उसका जिक्र तक नहीं आता है। आप हमें ये अहसास तो दिलाइए कि आप हमारे साथ हैं।”

उन्होंने तंज कसते हुए कहा, “आप सभी ने पाक को ‘हमारे’ कश्मीर में हर सहायता उपलब्ध कराते हुए देखा होगा। वह कहता है कि हम कश्मीर की जनता के साथ हैं, कश्मीर की आवाम हमारी है l लेकिन क्या आपने कभी यह सुना है कि किसी भी भारत के नेता, मंत्री या सरकार ने यह कहा हो कि हम PoK या गिलगित-बाल्टिस्तान की जनता के साथ हैं, वह हमारी आवाम हैं, उनको जो भी सहायता चाहिए होगी, हम उपलब्ध करवाएंगे – नहीं, आपने यह कभी नहीं सुना होगाl कॉन्ग्रेस सरकार ने कभी PoK या गिलगित-बाल्टिस्तान को पुनः भारत में लाने के लिए कोई बयान तक नहीं दिया, प्रयास तो बहुत दूर की बात है।

आपको बता दें कि पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय PoK का मुद्दा उठाया गया था, फिर 10 साल पुनः मौन धारण हो गया और फिर से नरेंद्र मोदी की सरकार आने पर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संसद में ये मुद्दा उठाया।

आज अगर आप किसी को गिलगित के बारे में पूछ भी लेंगे तो उसे यह पता नहीं होगा कि यह जम्मू-कश्मीर का ही भाग है l वह यह पूछेगा कि क्या यह किसी चिड़िया का नाम है? वास्तव में जम्मू-कश्मीर के बारे में हमारा जो गलत नजरिया है, उसको बदलने की जरूरत है।

अब करना क्या चाहिए ?

पहली बात कि सुरक्षा में किसी भी प्रकार का समझौता नहीं होना चाहिए। जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा का मुद्दा बहुत संवेदनशील है। इस पर अनावश्यक वाद-विवाद नहीं होना चाहिए।

एक अनावश्यक वाद-विवाद चलता है कि जम्मू-कश्मीर में इतनी सेना क्यों है?

तो बुद्धिजीवियों को बता दिया जाए कि जम्मू-कश्मीर का 2800 किलोमीटर का बॉर्डर है, जिसमें 2400 किलोमीटर पर LoC है l आजादी के बाद भारत ने पांच युद्ध लड़े, वह सभी जम्मू-कश्मीर से लड़े। भारतीय सेना के 18 लोगों को परमवीर चक्र मिला और वह 18 के 18 जम्मू-कश्मीर में वीरगति को प्राप्त हुए हैं। इन युद्धों में 14000 भारतीय सैनिक हुतात्मा हुए हैं, जिनमें से 12000 जम्मू-कश्मीर में शहीद हुए हैं। अब सेना बॉर्डर पर नहीं तो क्या मध्य प्रदेश में रहेगी? जो सेना की इन बातों को नहीं समझते, वही यह सब अनर्गल चर्चा करते हैं। जम्मू-कश्मीर पर बातचीत करने के बिंदु होने चाहिए- PoK, पश्चिम पाकिस्तान के शरणार्थी, कश्मीरी हिंदू समाज, आतंक से पीड़ित लोग, धारा 370 और 35A का दुरूपयोग, गिलगित-बाल्टिस्तान का वह क्षेत्र जो आज पाकिस्तान-चीन के कब्जे में है।

जम्मू- कश्मीर के गिलगित-बाल्टिस्तान में अधिकांश जनसंख्या शिया मुसलमानों की है और वे पाक विरोधी हैं। वह आज भी अपनी लड़ाई खुद लड़ रहे हैं, पर भारत उनके साथ है, ऐसा उनको महसूस कराना चाहिए। दुर्भाग्य से देश कभी उनके साथ खड़ा नहीं हुआ। परंतु पूरे देश में इसकी चर्चा होनी चाहिए। जम्मू-कश्मीर के विमर्श का मुद्दा बदलना चाहिए। जम्मू-कश्मीर को लेकर सारे देश में सही जानकारी देने की जरूरत है। इसके लिए एक इंफॉर्मेशन कैंपेन चलना चाहिए। पूरे देश में वर्ष में एक बार 26 अक्टूबर को जम्मू-कश्मीर दिवस मनाना चाहिए।

कश्मीर को जड़ से समझिए। कश्मीर में सबसे मुख्य समस्या मिस-कम्युनिकेशन की है। मिस-कम्युनिकेशन यानि भ्रामक जानकारी। ये भ्रामक जानकारी कश्मीरी लोगों में भी है और उससे ज्यादा शेष भारत में है। इस भ्रामक जानकारी को फ़ैलाने में मीडिया, राजनीति और राजनैतिक दलों – सभी का योगदान है।

कश्मीर के नाम से हम जिस भूभाग को जानते हैं, उसके दरअसल चार मुख्य हिस्से हैं। और हम लोगों में से ज्यादातर लोग जम्मू-कश्मीर को तीन हिस्सों में जानते हैं – कश्मीर, जम्मू एवं लद्दाख। गिलगिट-बाल्टिस्तान इसका चौथा भाग है। और सबसे महत्वपूर्ण भाग भी। यही भाग करीब 5 देशों को आपस में मिलाता है – अफगानिस्तान, पाकिस्तान, चीन, भारत और कजाकिस्तान। भारत के लिए सामरिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से बेहद महत्वपूर्ण भाग है यह। CPEC सड़क परियोजना इसी क्षेत्र से होकर गुजरती है। इसी क्षेत्र को काबू में करने के लिए पहले अमरीका और ब्रिटेन ने कोशिश की लेकिन अब ये चीन के हाथ लगा। पाकिस्तान ने बेहद चालाकी से इस इलाके को पहले आक्युपाइड जम्मू-कश्मीर से अलग किया। एक अलग प्रदेश बनाया और फिर चीन को इसमें प्रवेश करा दिया।

हम समझते हैं कि समस्त कश्मीर भारत के खिलाफ है। लेकिन ऐसा नहीं है। जम्मू-कश्मीर के लद्दाख और जम्मू रीजन के दस जिलों से में कहीं भी अलगाववादी भावना नहीं है। आतंकवाद जम्मू रीजन में जरूर रहा है लेकिन अलगाववाद नहीं। स्वयं कश्मीर के दस जिलों में से 5 जिलों में अलगाववादी भावना प्रबल है। श्रीनगर, अनंतनाग, सोपोर, बारामुला और कुपवाड़ा। अन्य जिलों में अलगाववाद नहीं के बराबर है। ये अलगाववाद मुख्यतः सुन्नी मुस्लिम इलाकों में है।

इन पांच जिलों में भी अलग-अलग पॉकेट हैं, जहाँ पत्थरबाजी की घटनाएँ होती हैं। जैसे श्रीनगर में डल लेक इलाके में कुछ नहीं है लेकिन लाल चौक इन घटनाओ में सबसे ऊपर है। कश्मीर में करीब 17% आबादी गुज्जर मुस्लिमों की है, जो इन अलगाववादियों के पक्ष में बिलकुल नहीं हैं। न ही शिया मुस्लिम। कारगिल की जनता इनके कतई खिलाफ है। और हमारे मीडिया बंधु इसे ऐसे दिखाते हैं मानो समस्त कश्मीर जल रहा है, हाथ से निकलता जा रहा है। एक-एक पत्थरबाजी की घटना को कवर करने के लिए पत्थरबाजों से ज्यादा पत्रकार वहाँ जमा होते हैं।

अब बात उदाहरण धारा 370 की। यह कुल जमा सिर्फ डेढ़ पेज की है लेकिन इसके इम्पैक्ट बेहद गंभीर हैं। जिसे ठीक से न हम समझते हैं और मजे की बात ये है कि कश्मीरी भी नहीं समझते। एक तरह से पूरा भारत (कश्मीर सहित शेष भारत) धारा 370 को जमीन से जोड़कर देखता है। हम समझते हैं कि धारा 370 की वजह से हम कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकते, वहाँ घर नहीं बसा सकते। और कश्मीरी जनता को समझाया जाता है कि इसी धारा 370 की वजह से वो और उनकी जमीनें बची हुई हैं वर्ना उनका सब कुछ छीन कर उन्हें कश्मीर से खदेड़ दिया जाएगा। सच यह है कि लगभग हर पहाड़ी क्षेत्र को बचाने के लिए धारा 370, 371 व 372 है। जिसके तहत यहाँ बाहरी आदमी जमीन नहीं खरीद सकता। नॉर्थ-ईस्ट में तो प्रावधान और कड़े हैं।

लेकिन धारा 370 सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं है। धारा 370 के अंतर्गत भारत के किसी भी कानून को जम्मू-कश्मीर में लागू होने से पहले वहाँ की विधानसभा से मंजूरी की जरूरत होती है। और खेल यहीं से शुरू होता है।

धारा 370 जम्मू-कश्मीर के स्थायी निवासी होने की पहचान के बारे में भी प्रावधान रखती है, जिसका जमकर दुरुपयोग हुआ है। कुछ और ऐसे प्रावधान इसी धारा में जोड़े गए हैं, जो खुद कश्मीर की जनता के खिलाफ हैं और इसकी आड़ में समस्त फायदे कुछ गिने-चुने परिवारों तक सीमित रखे गए हैं।

इसी में एक पेंच केंद्रीय सहायता का भी है। जो पैकेज केंद्र सरकार लगातार कश्मीर को देती रही है, वो कश्मीर के कुछ जिलों तक सीमित होकर रह गया है। क्षेत्रफल के हिसाब से सबसे बड़ा लद्दाख, फिर जम्मू और तीसरे नंबर पर कश्मीर रीजन है। पर संसाधनों को हथियाने में सबसे आगे कश्मीर ही रहा है। यही बात टूरिज्म पर भी उतनी ही लागू होती है। कारगिल एवं उससे जुड़े क्षेत्रों को पर्यटन के लिए कभी प्रमोट नहीं किया गया।

जिस अनुच्छेद 35A (कैपिटल ए) का जिक्र आजकल जम्मू-कश्मीर पर विमर्शों के दौरान हो रहा है, वह संविधान की किसी भी किताब में नहीं मिलता। जिस आर्टिकल 35A की वजह से लोग लोकसभा के चुनावों में तो वोट डाल सकते हैं लेकिन जम्मू-कश्मीर में पंचायत से लेकर विधान सभा तक किसी भी चुनाव में इन्हें वोट डालने का अधिकार नहीं : वह 35A भारत के संविधान में नहीं है। हालाँकि संविधान में अनुच्छेद 35a (स्मॉल ए) जरूर है, लेकिन इसका जम्मू-कश्मीर से कोई सीधा संबंध नहीं है। दरअसल इसे संविधान के मुख्य भाग में नहीं बल्कि परिशिष्ट (अपेंडिक्स) में शामिल किया गया है। यह चालाकी इसलिए की गई ताकि लोगों को इसकी कम से कम जानकारी हो।

भारतीय संविधान की बहुचर्चित धारा 370 जम्मू-कश्मीर को कुछ विशेष अधिकार देती है। 1954 के जिस आदेश से अनुच्छेद 35A को संविधान में जोड़ा गया था, वह आदेश भी अनुच्छेद 370 की उपधारा (1) के अंतर्गत ही राष्ट्रपति द्वारा पारित किया गया था। भारतीय संविधान में एक नया अनुच्छेद जोड़ देना सीधे-सीधे संविधान को संशोधित करना है। यह अधिकार सिर्फ भारतीय संसद को है। इसलिए 1954 का राष्ट्रपति का आदेश पूरी तरह से असंवैधानिक है।

अनुच्छेद 370 पूर्णतः हटाए जाने तक जम्मू-कश्मीर को कुछ विशेषाधिकार देता है। लेकिन कुछ लोगों को विशेषाधिकार देने वाला यह अनुच्छेद क्या कुछ अन्य लोगों के मानवाधिकार नहीं छीन रहा है? देश की पूर्व राजनैतिक सत्ताओं ने जम्मू-कश्मीर को लेकर जो संवैधानिक भ्रम और फरेब फैलाया है, उन भ्रमों को दूर किया ही जाना चाहिए।

जरूरी है कि नागरिक मूल अधिकारों के हनन का जिम्मेदार 35A न सिर्फ चर्चाओं में रहे बल्कि ‘एक देश, एक कानून’ को स्थापित करने के क्रम में 370 की समाप्ति से पहले उसकी शाखाओं को काटने तक का काम किया जाए।

अनुच्छेद 35A की वजह से ही :-

भारत के संविधान के अंतर्गत जो मौलिक अधिकार हैं, वह जम्मू-कश्मीर के लोगों पर लागू नहीं होते।

हम भारत के नागरिक होकर भी जम्मू-कश्मीर में जाकर बस नहीं सकते। वहाँ जमीन नहीं खरीद सकते, वहाँ जाकर कोई व्यवसाय नहीं कर सकते। जम्मू-कश्मीर में ही 70 सालों से रह रहे अस्थायी निवासी भी वहाँ जमीन नहीं खरीद सकते। उन्हें और उनकी पीढ़ियों को सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती, उनके बच्चो को उच्च शिक्षा, स्कॉलरशिप नहीं मिल सकती।

अनुच्छेद 35A महिलाओ में भी लैंगिक भेदभाव करता है। यदि कोई जम्मू-कश्मीर के बाहर की महिला [Non-PRC = जिसके पास PRC (Permanant Resident certificate) नहीं है] जम्मू-कश्मीर के किसी पुरुष से विवाह कर लेती है तो उसे और उसके बच्चों को PRC और सारे अधिकार मिल जाते हैं। इसके उलट अगर जम्मू-कश्मीर की महिला भारत के ही किसी अन्य राज्य के पुरुष के साथ विवाह करती है तो उसके पति और बच्चों को PRC के अधिकार नहीं मिलेंगे। अर्थात वह अपनी ही संपत्ति अपने बच्चों को ट्रांसफर नहीं कर सकती और न ही उसके बच्चे वहाँ पढ़-लिख (उच्च शिक्षा) या नौकरी कर सकते हैं।

अब आप देखिए फारुख अब्दुल्ला ने इंग्लैंड की लड़की से शादी की। उसके बाद वह जम्मू-कश्मीर की निवासी बन गई। उनका बेटा हुआ उमर अब्दुल्ला। ब्रिटिश लड़की से शादी कर उससे हुए बेटे को सब अधिकार है। उमर अब्दुल्ला ने शादी की पंजाब की लड़की से तो उसे भी सारे अधिकार मिल गए और उसके बच्चों को भी। लेकिन उमर अब्दुल्ला की बहन सारा अब्दुल्लाह ने शादी की राजस्थान के वर्तमान कॉन्ग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सचिन पाईलट से तो सारा को तो सब अधिकार है लेकिन उसके बच्चों को अपनी माँ की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं है और न ही सचिन पाईलट को।

इसी तरह रेणु नंदा का एक केस है, जो जम्मू यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं। उनका विवाह पश्चिम बंगाल के एक व्यक्ति से हुआ। दुर्भाग्यवश कुछ सालों बाद उनके पति का देहांत हो गया और वह अपने दो बच्चों के साथ अपने माता-पिता के घर जम्मू वापस लौट आईं। उनके बच्चे बड़े हो गए। अब उनको उच्च शिक्षा आदि में दाखिला नहीं मिल सकता, रेणु नंदा अपनी प्रॉपर्टी अपने बच्चों को ट्रांसफर नहीं कर सकतीं। रेणु नंदा जम्मू-कश्मीर की स्थायी निवासी हैं लेकिन उनके बच्चे वहाँ के निवासी नहीं हैं। क्या इससे बड़ा मानवाधिकार उल्लंघन कोई हो सकता है?

इसके विपरीत अगर पाकिस्तान का कोई लड़का जम्मू-कश्मीर की लड़की से शादी कर लेता है तो उस लड़के को सारे अधिकार और भारत की नागरिकता मिल जाती है।

अनुच्छेद 35A जम्मू-कश्मीर के लोगों के मानवाधिकारों का हनन करता है। और यह सब किया गया है अनुच्छेद 370 खण्ड (1) उपखण्ड (d) की आड़ में।

इसके अलावा भी अनुच्छेद 370 (1) (d) की आड़ में अनेक संवैधानिक आदेश पारित किए गए, जिससे हमारे संविधान के 130 से ज्यादा अनुच्छेद जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं होते। अपवाद व उपांतरण के नाम पर यहाँ के लिए कई प्रावधानों को संशोधित कर दिया गया ताकि राज्य को हर क्षेत्र में असीम शक्तियाँ दी जा सके।

अब कुछ उदाहरण देखिए, क्या-क्या संशोधित किया गया :-

हमारे देश के संविधान का अनुच्छेद-1 और जम्मू-कश्मीर का संविधान भी कहता है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। अनुच्छेद-3 राज्य की सीमाओं में संशोधन का अधिकार भारत सरकार को देता है। लेकिन उसमें संवैधानिक आदेश के द्वारा संशोधित किया गया कि केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर राज्य की सीमा में कोई परिवर्तन नहीं कर सकती।

इसी तरह अनुच्छेद-13 मौलिक अधिकार की जान है। जो यह कहता है कि भारत में कोई भी ऐसी विधि, यंत्रणा अथवा व्यवस्था संविधान में आए और यदि वो मौलिक अधिकार से किसी भी प्रकार से असंगत है तो वो शून्य (Void) माने जाएँगे। लेकिन यहाँ फिर से संवैधानिक आदेश के द्वारा संशोधन किया गया कि अगर जम्मू-कश्मीर के लिए कोई विधि, यंत्रणा अथवा व्यवस्था आए फिर चाहे वो मौलिक अधिकार से विसंगत ही क्यों न हो, वो अमान्य नहीं होंगे।

अनुच्छेद-238 कहता है कि भारत के अन्य राज्यों में विधायिका की अवशिष्ट शक्तियां (Residuary Powers) केंद्र सरकार में निहित है। इसे ऐसे संशोधित कर दिया कि जम्मू-कश्मीर राज्य के संदर्भ में यह शक्तियाँ राज्य में ही निहित होंगीl

केंद्र सरकार की राज्य सूची (State List) जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होंगी।

अनुच्छेद-368 यह कहता है कि संविधान के किसी भी प्रावधान में संशोधन का अधिकार सिर्फ देश की संसद को है। लेकिन संवैधानिक आदेश पारित किया गया कि अनुच्छेद-368 के अंतर्गत संविधान में संशोधन किए गए प्रावधान जम्मू-कश्मीर राज्य पर लागू नहीं होंगे।

क्या देश की संप्रभु सत्ता अपनी शक्ति को इस हद तक प्रत्यायोजित कर सकती है कि उसके अपने खुद के ही हाथ कट जाएँ?

क्या देश की संप्रभु संसद अनुच्छेद-370 के माध्यम से इस प्रकार की शक्ति का इस्तमाल कर सकती है कि उसकी स्वयं की शक्तियाँ ही क्षीण हो जाए और दूसरे को प्रत्यायोजित हो जाए?

धोखे की इस श्रृंखला में एक और आदेश जारी किया गया और उससे उच्चतम न्यायालय के भी हाथ काट दिए गए। जम्मू-कश्मीर के लोग मौलिक अधिकारों के तहत अनुच्छेद-32 को लेकर सुप्रीम कोर्ट तो आ सकते हैं लेकिन अनुच्छेद-135 और अनुच्छेद-139 जो सुप्रीम कोर्ट को प्रादेश पारित करने की और निर्णय देने की शक्ति प्रदान करता है, ये दोनों ही जम्मू-कश्मीर राज्य पर लागू नहीं है।

जम्मू-कश्मीर में भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम लागू नहीं होता। एंटी-रेप कानून लागू नहीं होता है और लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं हो सकती है।

जम्मू कश्मीर में सूचना का अधिकार (RTI) लागू नहीं हो सकता, शिक्षा का अधिकार (RTE) लागू नहीं हो सकता।

केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI), नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG), वहाँ किसी घोटाले की जांच नहीं कर सकते।

कश्मीर की महिलाओं पर शरीयत कानून लागू होता है।

जम्मू-कश्मीर के 30% अल्पसंख्यक हिंदू, सिख को आरक्षण नहीं दिया जाता है। वहां के 30% अल्पसंख्यक हिन्दू व सिख को बहुसंख्यक का दर्जा मिला हुआ जबकि 70% मुस्लिमों को अल्पसंख्यक का दर्जा मिला हुआ है।

जम्मू-कश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है जबकि भारत की अन्य राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल 5 वर्ष का होता हैl

वहाँ के विधानसभा क्षेत्रों को परिसीमन करने का अधिकार भारत के परिसीमन कमिश्नर को नहीं है। क्योंकि आज तक भारत के परिसीमन आयोग को वहाँ लागू नहीं किया गया।

आज सारे देश की राजनीति OBC, ST और SC के इर्द-गिर्द चलती है। इन ओबीसी, एसटी-एससी नेताओं को एक बार जम्मू-कश्मीर जाना चाहिए। आज जम्मू-कश्मीर में 14% ST है। 1991 तक जम्मू-कश्मीर में ST को आरक्षण नहीं था। 1991 में पहली बार ST को आरक्षण मिला और वह भी केवल शिक्षा और रोजगार में जबकि राजनीतिक आरक्षण तो आज भी नहीं है। पंचायत, विधानसभा, नगरपालिका इनमें कोई आरक्षण नहीं है। SC को आरक्षण केवल जम्मू में है, कश्मीर में नहीं।

अब आप कहेंगे कि एक ही राज्य में ऐसा कैसे हो सकता है?

पूरे जम्मू-कश्मीर में 5 लाख सरकारी कर्मचारी हैं। इनमें से 4 लाख कश्मीर घाटी में हैं। वहाँ पर नौकरियों को जिले और संभाग के आधार पर बांट दिया गया और कश्मीर घाटी में आरक्षण नहीं दिया गया। 2007 में जब सुप्रीम कोर्ट का डंडा चला तो SC को पूरे जम्मू-कश्मीर में आरक्षण मिलना शुरू हुआ। जबकि ओबीसी को तो आज तक आरक्षण नहीं है। आरक्षण तो छोड़िए, उनकी आज तक गणना भी नहीं हुई है।

राष्ट्रपति के द्वारा चुनाव आयुक्त के चुनाव संबंधी नोटिफिकेशन को जब तक जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल जम्मू-कश्मीर के संविधान में नोटिफाई नहीं कर देता, तब तक जम्मू-कश्मीर में चुनाव करवाने का अधिकार भारतीय निर्वाचन आयोग को नहीं है।

ऊपर के उदाहरण जम्मू-कश्मीर को ध्यान (ख़ास परिवार व लोग) में रखकर कुछ धोखों के बारे में है, जो देश के संविधान के द्वारा किए गए। देश के संविधान की गरिमा को नष्ट करने में कोई कसर बाकि नहीं रखी गई और ये सब कुछ हुआ कॉन्ग्रेस सरकार के तत्वाधान में।

राष्ट्रपति को किसी भी तरह से नया अनुच्छेद संविधान में जोड़ने का कोई अधिकार नहीं है। यह अधिकार सिर्फ देश की संसद का है। इसलिए अनुच्छेद-35A देश की एकता विरोधी, मानवाधिकार विरोधी तो है ही, साथ ही यह संविधान विरोधी भी है। अतः देश के भले के लिए इसका हटना अनिवार्य है और इसके लिए जागरूकता का कार्य हम सब को मिलकर करना है। अतः आप सभी से अनुरोध है कि जितना भी हो सके इस जानकारी को अधिक से अधिक लोगों के बीच प्रसारित कर एक जन चेतना लाएँ ताकि न्याय से वंचित लोगों को न्याय मिल सके।

(यह लेख मनीष श्रीवास्तव जी के ट्विटर थ्रेड से बनाया गया है।)

2019 का युद्ध

भारत की जनता युद्ध चाहती है, मैं भी चाहता हूँ और सरकार भी चाहती है। लेकिन क्या 2019 का युद्ध सिर्फ मैदान में लड़ा जाएगा? गोले, बारूद, असलहों से? या मिसाइल से, परमाणु बमों से, ड्रोन से। युद्ध किस स्तर पर होगा ये निर्णय सरकार कर सकती है। निश्चित तौर पर अगर सरकारी मशीनरी ईमानदार है तो वो भी पुलवामा का बदला लेने की सोच रहे होगी। क्या इस हमले का जवाब भी सर्जिकल स्ट्राइक है! या उससे कहीं आगे, सीमा पर या पाक अधिकृत कश्मीर में सेना द्वारा विशेष ऑपरेशन या अभियान चला कर आतंकवादियों को खत्म करने प्रयास किया जाएगा।

मुझे लगता है ये सारे तरीके पुराने हैं, आजमाये हुए है और नतीजा आज आपके सामने है। मसला बातचीत से हल नहीं हो सकता ये पहले से ही सिद्ध है। तो क्या सरकार पाकिस्तान को किसी और रूप से क्षति पँहुचा सकती है! ये मुद्दा विचारणीय है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पाकिस्तान की जनता क्या चाहती है ? उधर पाक सरकार सफाई दे रही है कि पाकिस्तान ऐसा क्यों करेगा। आइये देखते हैं।

अभी-अभी पाकिस्तान में सत्ता पलट हुआ है। नई सरकार आई है, नया भरोसा है, नया जोश है। लेकिन पाकिस्तान वही पुराना पाकिस्तान है। पाकिस्तान में अशिक्षा है, गरीबी है, हद से ज्यादा भ्रष्टाचार है। बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं, इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है। और इन सबके लिए पाकिस्तान के खजाने में पैसा भी नहीं है। सीधे-सीधे कहें तो पाकिस्तान आज एक दिवालिया मुल्क है।

पिछले कई वर्षों से पाकिस्तान अमेरिका के बेलआउट पैकेज पर पलता आया था और यही कारण था कि पाकिस्तान की सरकार, वहाँ का केंद्रीय बैंक, पाकिस्तान के लिए विकास के रास्ते नहीं तलाश सके। पाकिस्तान का केंद्रीय बैंक वहाँ के बैंकों को दिशानिर्देश जारी नहीं कर सकी। वहाँ की जनता ने बिना नियंत्रण के विदेशों से कैपिटल एकाउंट ट्रांसेक्शन किये। और अंत में पाकिस्तान एक्सपोज़ हो गया।

कई बार हम पाकिस्तान के लोगों को, वहाँ की सरकार को मानसिक रूप से दिवालिया मानते रहते हैं पर सच्चाई यह है कि वो आर्थिक रूप से दिवालियापन के शिकार है। मुल्क के लिए नीति निर्धारण का रास्ता बंद हो चुका है। पाकिस्तान पर वर्तमान में इतना ज्यादा कर्ज़ है कि उसके ब्याज और इंस्टॉलमेंट के लिए भी वो नए कर्ज़ पर निर्भर है। वह बार-बार आईएमएफ (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) के पास जा कर बेलआउट पैकेज की मांग करता है। कुल मिला कर पाकिस्तान वो कर्ज़खोर मुल्क है, जिसकी पूरी आय मुल्क के कर्ज़ों का ब्याज भरने में भी सक्षम नहीं है। पाकिस्तान भारी इकोनॉमिक क्राइसिस से जूझ रहा है।

इस क्राइसिस के वक्त उसके पुराने साथी अमेरिका ने हाथ खींच लिया है। अमेरिका की पाकिस्तान से दूरी का मुख्य कारण भारतीय विदेश नीति की सफलता और दक्षिणी एशिया में भारत के एक कद्दावर अर्थव्यवस्था में स्थापित होना है। उधर भारत का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी चीन विश्व व्यापार में अपनी धाक जमाने के लिए भारत को कमज़ोर करने का प्रयास करता रहता है और इस क्रम में दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है वाली सिद्धांत से पाकिस्तान का मित्र बना हुआ है।

ये मदद चीन का स्वार्थ है। पाकिस्तान की जमीन पर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कर चीन को विदेशी व्यापार को बढ़ाना उसका एक मात्र लक्ष्य है। पाकिस्तान के पास चीन के भीख के अलावा कोई ऑप्शन अवेलेबल नहीं। साथ ही पाकिस्तान की करेंसी भी एक डिरेग्युलेटेड एवं कमज़ोर करेंसी है, जिसका विश्व मानचित्र में कोई स्थान नहीं है। कुल मिला कर आतंकवाद पाकिस्तान और पाकिस्तानी सरकार की मजबूरी बन चुका है। पाकिस्तान की अवाम इसी दहशतगर्दी की शर्त पर रोटी खा रही है। सरकार के पास सिवाय मानव एवम गदहा के कोई संसाधन शेष नहीं है। इसलिए वे इन दोनों को ही एक्सपोर्ट कर पा रहे हैं। पाकिस्तान में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के नाम पर लॉलीपॉप है। एक तर्क यह भी है कि भारत में फैलाया जाने वाला आतंकवाद पाकिस्तान से ज्यादा चीन प्रायोजित है। और पाकिस्तान एक टूल की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।

अब बताइये ऐसे में भारत की सरकार को किस प्रकार का यद्ध शुरू करना चाहिए? निश्चित रूप से पाकिस्तान की आर्थिक हालत को बद से बदतर बनाना ही इक्कीसवीं सदी का युद्ध कहलायेगा। और ये युद्ध शुरू हो चुका है। पाकिस्तान के साथ व्यापार के नियमों को सख्त कर सरकार ने पहले ही अपनी मंशा जाहिर कर दी है। प्रतिदिन पाकिस्तान का एक्सपोर्ट किया जाने वाला माल सीमा से लौट कर वापस जा रहा है, पाकिस्तान प्रतिदिन करोड़ों का नुकसान झेल रहा है। मोस्ट फ़ेवर्ड नेशन का दर्जा हटा कर व्यापार में पक्षपात का रास्ता सरकार ने पुलवामा के अगले दिन ही खोल लिया है।

वित्त मंत्रालय एवं एफआईयू-इंडिया एफएटीएफ से पाकिस्तान के टेरेरिस्ट फंडिंग में संलिप्तता के आधार पर उसे हाई रिस्क कंट्री घोषित कराने में लगा हुआ है। इसके बाद पाकिस्तान के विदेशी व्यापार पर बड़ा असर पड़ेगा और पाकिस्तान की रही-सही आमदनी भी जाती रहेगी। आशियान देश जिससे पाकिस्तान का अधिकतम व्यापार संबंध है, भारत के दबाव में सीमित व्यापार के लिए मजबूर हो रहे हैं। अफगानिस्तान में भारतीय निवेश एवं आतंकवाद से लड़ने में भारत की मदद की बदौलत पाकिस्तान का निकटतम पड़ोसी उसके खिलाफ खड़ा है। इस समय अमेरिका भारत से नजदीकियों के चलते वर्ल्ड बैंक एवं आईएमएफ़ से भी पाकिस्तान की मदद राशि को कम-से-कम रखने के लिए प्रतिबद्ध है।

आज भारत सरकार ने पानी के लिए भारतीय नदियों पर आश्रित पाकिस्तान का राह और कठिन कर दिया है। कूटनीतिक रूप से पाकिस्तान को विश्व भर में डिफेम कर हमारे लोग और हमारी सरकार पाकिस्तान की वैश्विक रेटिंग और नीचे ले जा रही हैं। ऐसे में पाकिस्तान के पास चीन ही एक मात्र सहारा है। जो अपने स्वार्थ सिद्धि से ज्यादा मदद पाकिस्तान की कभी नहीं करेगा। धीरे-धीरे पाकिस्तान की जनता संसाधन, खाद्यान्नों की कमी और अधिकतम बेरोज़गारी से तंग आ कर सरकार के विरुद्ध सड़कों पर आ जायेगी। भूख के आगे कोई नहीं दिखता, पाकिस्तान अपने कदम पीछे खिंचेगा और इतना पीछे की फिर उसे अगला कदम पचास साल बाद भी नहीं आ सकेगा।

इधर हमारे हैकर्स भी लगातार पाकिस्तान सरकार की कार्यप्रणाली और सरकारी वेबसाइटों पर हमले कर रहे हैं। यह कदम भी युद्ध का ही एक रूप है। 21वीं सदी में साइबर युद्ध की भी अपनी पहचान है। तो देशवासियों युद्ध आरम्भ हो चुका है। जरूरी नहीं कि ये मिसाइल, तोप, परमाणु बम से ही लड़ा जाए। ये युद्ध का आरंभ है और ये आरम्भ है प्रचण्ड। देखते रहिये आगे होता है क्या।

मोदी विरोध के नाम पर देश विरोध कब तक?

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पुलवामा का दुःखद और दर्दनाक आतंकी हमला हुआ। हमारे जवान शहीद हुए। किसी ने अपना पति तो किसी ने अपना पिता तो किसी ने अपना बेटा खोया। इस हमले के तुरंत बाद पूरा देश मे आक्रोश का माहौल उत्पन हो गया है। पाकिस्तान को सबक सिखाने की मांग जोर पकड़ रही है और सरकार इसे पूरा करने के लिए दिन रात लगी हुई है। परंतु इन सब के बीच हमारे ही देश से आतंकियो के समर्थन में कई आवाजें उठी और बाहर आई जो अकेले पाकिस्तान को यह अहसास दिलाने के लिए काफी है कि वो अकेले नही है। उनके साथ हमारे ही देश के कुछ लोग है जो कभी अफ़ज़ल गुरु को अपना हीरो मानते है तो कभी बुरहान वाणी को।

इस हमले के बाद ऐसा लगा था कि देश राजनीति से ऊपर उठकर एक साथ पाकिस्तान को जवाब देगा। लेकिन इन सब के बीच कई सारे राजनेता अगर एक उंगली पाकिस्तान पर उठाते है तो बाकी के चार सरकार पर। जिस समय इन राजनेता को पाकिस्तान से सावल पूछना चाहिए था उस समय वो राजनीति नफा नुकसान को ध्यान में रखकर उल्टा सरकार की नाकामी गिनाने में मग्न है। क्या मोदी का विरोध करना इतना आवश्यक है कि हम कुछ समय पाकिस्तान पर ध्यान नही दे सकते। इमरान खान साहब ने तो कह दिया कि भारत पकिस्तान को उसके खिलाफ सबूत दे लेकिन हमारे देश के नेता सिद्धू साहब ने तो कह दिया कि आतंकवाद का कोई देश नही होता।

बिना सोचे इन्होंने पाकिस्तान को क्लीन चीट दे दिया। सिर्फ राजनेता ही नही हमारे देश की जनता का एक खास वर्ग जो मोदी के विरोधी सनातनी से रहे है, उनसे तो ये तक सुनने को मिलेगा की इलेक्शन के कारण इन हमलों को मोदी ने प्रायोजित किया है। अब ऐसे तर्क का क्या करे साहब, क्या इसे देश के साथ गद्दारी कहे और अगर यह कह दे तो कही ऐसा न हो कि बोलने की आज़ादी खतरे में आ जाए। क्या हर घटना को राजनीति के चश्मे से देखना आवश्यक है? कब तक अभिव्यक्ति की आज़ादी का इस्तेमाल देश के खिलाफ किया जाएगा।

किसी को मोदी से नफरत या मोदी से घृणा हो सकती है लेकिन कब ये नफरत देश से नफरत में बदल जाती है ये कहना मुश्किल है। यह वही मानसिकता है जो कभी सर्जिकल स्ट्राइक को फ़र्जीकल बना देती है तो कभी देश की सेना को रेपिस्ट कह डालती है। पाकिस्तान के विचारधारा को समर्थन करने वाले कहने को तो 1947 में ही हमसे अलग हो गए लेकिन आज की परिस्थितियों को देख कर लगता है कि कई सारे यही छूट गए। इन सब को देखकर कई दफा खून खौलता है लेकिन फिर दिल रोता है और पीड़ा होती है।

कब तक मोदी के विरोध की आड़ में देश का विरोध किया जाएगा? यह सवाल बहुत बड़ा हैं और उससे भी बड़ा शायद इसका उत्तर। समय आ गया है कि मोदी विरोधी और देश विरोधी में लक़ीर खिंचे।

‘कभी बड़े शीशे के सामने खुद को निहारना तब पता चलेगा आप कौन जात हो’

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यही कोई चार-पांच साल पहले टीवी पर नौ बजे प्राइम टाइम में एक शॉ में नमस्कार मैं फलां कुमार आपके साथ अमुख विषय पर बात करने के लिए हाजिर हूं दिखता था। ऐसा लगता था मानो पत्रकारिता की दुनिया में पांडे जी जैसा कोई क्रन्तिकारी नहीं बचा है। 2014 के बाद तो निष्पक्ष पत्रकारिता का वाले ये घुटने पूरी तरह जवाब देना शुरू हो गए, इनमें जैसे गंठिया बाय लग गया हो।

हर खबर में ‘कौन जात हो’ एंगल ढूंढने वाले पत्रकार साहब खुद को किसी मसीहा से कम नहीं मानते, ये बात और है कि शॉ की टीआरपी नीचे से पहले पायदान पर है। गौरी लंकेश का मामला हो या रोहित वेमुला का, ये महोदय रवीश की रिपोर्ट वाले कैमरामैन को लेकर दौड़ पड़े, बाद में पता चला कि जो रिपोर्ट आपने की वह तथ्यों से अलग थी। यही बात टुकड़े-टुकड़े मसले में हुई, उस समय ये महोदय कन्हैया का साक्षात्कार करते हैं जैसे उसने दुनिया में देश का नाम रौशन किया हो। बाद में फॉरेंसिक रिपोर्ट आने पर दूध का दूध और पानी का पानी हो गया और क्रांतिकारी राजा रबीश ने अब तक माफी नहीं मांगी। सच परेशान हो सकता है लेकिन पराजित नहीं, तो एक बार एनडीटीवी के मनी लॉन्ड्रिंग केस पर भी भरे बाजार में प्राइम टाइम हो जाए।

बात प्रोपगेंडा की हो तो कथित आईटी सेल और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी इनकी जुबान पर सबसे पहले रहता है। फेसबुक पर स्क्रीन शॉट चिपकाने का काम पहले करते हैं लेकिन पुलिस या अदालत में जाने का समय इनके पास नहीं होता। इसके साथ ही बीजेपी के किसी वार्ड मेंबर पर भी कोई आरोप लग जाए, तो ये अपने ताम तम्बू उठाकर वहां से प्राइम टाइम शूट करना शुरू कर देते हैं लेकिन बिहार में विधायक का चुनाव लड़ चुके अपने ही भाई के खिलाफ बलात्कार मामले में प्राइम टाइम तो क्या टिकर तक नहीं चलाते। इनको यह भी लगता है कि जनता को पता नहीं चलता लेकिन आप ही कहते हैं आईटी सेल वाले लोग, तो  पांडे बलात्कार मामले की जानकारी व्हाट्सएप्प पर देना उनका फर्ज बनता है ना, आखिर यही तो लोकतंत्र की खूबसूरती है। कौन जात है वाली पत्रकारिता के शिरोधार्य, कभी शांत चित मन से बड़े शीशे के सामने खड़े होकर खुद को निहारना तब पता चलेगा कि आप कौन जात हो।