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मीडिया की निगेटिविटी से बचने के लिए तीन मई तक आंख-कान ढंकना भी ज़रूरी है

प्रधान मंत्री ने लॉकडाउन को तीन मई रविवार तक बढाने की घोषणा करते समय अंत में कहा:`वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिता:’

यजुर्वेद (९:२३) के इस श्लोकार्ध का अर्थ है:`हम पुरोहित राष्ट्र को जीवंत और जागृत रखेंगे.’ पुरोहित यानी जो पुर का हित करे वह. पुर अर्थात नगर, शहर. यहां पुरोहित शब्द सत्ताधीशों के अर्थ में तथा नगरजनों के अर्थ में भी लिया जा सकता है क्योंकि नगर का हित केवल सत्ताधीश के मन से ही थोडी होता है. राष्ट्र को जीवंत और जागृत रखने की जिम्मेदारी हम जैसे नागरिकों की भी होती है.

मोदी ने अन्य धर्मों के प्रति कभी नापसंदगी व्यक्त नहीं की. क्योंकि उनके दिल में ऐसी कोई भावना नहीं. लेकिन उन्होंने कभी अपना हिंदुत्व नहीं छिपाया. इस देश की परंपरा और संस्कृति के मूल में हिंदुत्व है, सनातन धर्म है, भगवा रंग है इस बारे में वे हम सब की तुलना में अधिक सजग हैं. और यही सजगता प्रकट करने का एक भी मौका वे नहीं छोडते- फिर चाहे केदारनाथ गूफा में भगवा वस्त्र पहनकर साधना करनी हो, या वाराणसी के काशी विश्वनाथ मेंदिर में शिवजी की पूजा हो, चाहे अपने राष्ट्र व्यापी संबोधनों में संस्कृत श्लोकों का उपयोग करना हो, चाहे भारत आनेवाले विदेशी राष्ट्राध्यक्षों- प्रधानमंत्रियों को सरकार की ओर से भेंट दी जानेवाली ताजमहल की प्रतिकृ्ति के बदले भगवद्गीता देने की नई परंपरा हो.

अखबार-पत्रिकाएं भले ही अभी बंद हों लेकिन उसमें शोर मचानेवाले चुप नहीं हैं. वे सोशल मीडिया में जाकर चिल्ला रहे हैं कि लॉकडाउन की अवधि बढने से देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड रहा है, गरीबों-किसानों-दिहाडी मजदूरों के सिर पर आसमान टूट पडा है.

यदि मोदी ने लॉकडाउन उठाने की घोषणा की होती, कल से जिसे जहां जाना हो वहां जाने की छूट है- माइग्रेंट वर्कर्स को अपने गांव जाने की छूट है, गांव गए मजदूरों को लौटने की छूट है, मंदिरों-मस्जिदों-चर्चों के बंद द्वार खोलने की छूट दी होती, ट्रेन-विमान के आवागमन पर से पाबंदी उठा ली होती, थिएटरों-मॉल-बार-रेस्टोरेंट को फिर से चालू होने दिया होता तो यही लिब्रांडू कहते: मोदी में अक्ल नहीं है. इस दौर में ऐसा करने से कोरोना दावानल की तरह फैलेगा, देश बडे संकट में पड जाएगा.

देश में जो मोदी विरोधी गैंग है वह केवल मीडिया में या राजनीति में ही नहीं. हम सभी के आस पास मोदी द्वेषी लोग हैं जो `ऐसे तो मोदी अच्छा काम करते हैं लेकिन फलाने मामले में उन्होंने दूसरों की सलाह माननी चाहिए’ कहकर अपने मोदी द्वेष को छिपाने की कोशिश करते हैं. उन्हें अपने मोदीद्वेष को छिपाना पडता है क्योंकि उन्हें पता है कि अगर वे खुलेआम मोदी का विरोध करने लगेंगे तो उनके आसपास के मोदी भक्त उन्हें जातनिकाला दे देंगे, उनके साथ उठना बैठना बंद कर देंगे, वे अकेले पड जाएंगे.

अमेरिका ब्रिटेन जैसे धनवान और विकसित माने जानेवाले देशों की तुलना में भारत कोरोना के खिलाफ लडने में काफी एडवांस है. `इंडिया टुडे’ जैसी न्यूज चैनल विभिन्न देशों में कुल केसेस और कुल मृत्यु का चार्ट बनाकर कहता है कि भारत विश्व की तुलना में कहां है. आंकडों का उपयोग और प्रतिशत का उपयोग कब करना चाहिए क्या यह बात चैनलवालों को पता नहीं है? बिलकुल है. लेकिन जनता को भडकाने के लिए वे प्रतिशत के बदले कितने केस/ मौत के आंकडे देते हैं. भारत की जनसंख्या की तुलना में प्रतिशत निकाला जाना चाहिए. उदाहरण के लिए श्रीलंका में कोरोना से १०० मौतें होती हैं और भारत में २०० मौतें होती हैं तो कोरोना के खिलाफ चल रही लडाई में श्रीलंका की तुलना में भारत आगे है, क्या ऐसा नहीं कहना चाहिए, बेवकूफ चैनल वाले. दोनों देशों की जनसंख्या की तुलना में किस देश का कितना प्रतिशत है, इसकी जानकारी देनी चाहिए.

कोरोना जैसे संकट में भी लेफ्टिस्ट मीडिया अपने दिमाग की गंदगी हम तक पहुंचाना बंद नहीं कर रहा है. दिल्ली में केजरीवाल कोरोना को रोकने में, राहत कार्य करने में तथा माइग्रेंट वर्कर्स की समस्या को सुलझाने में बिलकुल नाकाम रहे हैं. इतना ही नहीं निजामुद्दीन मरकज में जुटे हजारों तबलीगियों को परोक्ष रूप से संरक्षण देकर तो केजरीवाल ने घोर अपराध किया है. इस कारण दिल्ली में कोरोना केस देश में सबसे हाइएस्ट/ सेकंड हाइएस्ट है. (दिल्ली की स्पर्धा में महाराष्ट्र की मिलीजुली सरकार है जो अपने पसंद-नापसंद के कारण तथा एनसीपी के अल्पसंख्यक वर्ग के लिए प्रेम के चलते कोरोना से लडने में समर्थ नहीं है). दिल्ली में बढते जा रहे कोरोना के केस/मृत्यु की कडी आलोचना करनी चाहिए. लेकिन केजरीवाल ने सरकारी खर्च पर दिल्ली के टीवी चैनल्स को करोडो रूपए के विज्ञापन दिए हैं. कुत्ते को बिस्किट खिलाने पर वह किस तरह से पूंछ हिलाता है, ये देखकर मजा आता है. राजदीप सरदेसाई इसी तरह से पूंछ हिलाते हुए ट्वीट करता है:`दिल्ली सरकार की पारदर्शिता की सराहना करनी ही पडेगी. कोरोना केस के आंकडे घोषित करने में वे लोग कुछ छिपा नहीं रहे, अन्य राज्यों को उनका अनुकरण करना चाहिए.’

राजदीप को नहीं दिख रहा है कि केजरीवाल ने दिल्ली से यूपी-बिहार के लाखों कामगारों को रातोंरात बाहर खदेडा था तब देश के लिए कितना बडा संकट खडा हुआ था. योगी आदित्यनाथ ने तुरंत इन दिहाडी मजदूरों के लिए रात में जागकर-स्थान पर जाकर, व्यवस्था खडी की और देश को एक विनाश से बचा लिया. योगी की कार्यक्षमता को सराहने के बजाय राजदीप जैसे लोग केजरीवाल की सरेआम हुई विफलता का किस विकृत तर्क से सराहते हैं, इसका बेहतरीन उदाहरण है उसका ये ट्वीट. फिर से पढकर देखिए.

वामपंथी राजदीप की पत्नी सागरिका घोष भी पति से भी सवाई पत्रकार है. वह ट्विटर पर कहती है:’क्या हमारा देश वेस्टर्न कंट्रीज की तरह इकोनॉमी को बंद करके और सोशल डिस्टेंसिंग करना सह सकता है? गरीबी, भुखमरी बेकाबू होती जा रही है.’

इस देश में कोई गरीबी-भुखमरी नहीं है. रोज अनेक सेवाभावी हिंदू संस्थाओं तथा सरकारी योजना के तहत करोडो गरीबों को तैयार खाना मिलता है, घर में पकाने के लिए राशन भी मिलता है. ये सही अर्थ में `सहनाववतु सहनौभुनक्तु’ परंपरा का देश है. हम सभी एक-दूसरे की रक्षा करें, हम सभी साथ मिलकर भोजन करें, हम सभी साथ मिलकर काम करें और उज्ज्वल सफल भविष्य के लिए अध्ययन करें, एक दूसरे से घृणा न करें.

लेकिन ऑक्सफोर्ड-कैम्ब्रिज में बाप के पैसों पर तागडधिन्ना करके आए लोगों तथा पश्चिमी ग्लिटर से जिनकी आंखों में अंजन लगा है, ऐसे रंगरूटों को ये बात समझ में नहीं आएगी. भारत को एक समृद्ध देश मानने से उनके पेट में मरोड उठती है. इस देश गरीबों-भुखमरे लोगों का है, ऐसा कहकर खुद को लिबरल कहलाने वाले देशद्रोही कोरोना के संकट में भी देश के साथ नहीं रहते. देश की समस्या गरीबी या भुखमरी नहीं है. देश की समस्या देश की खराब इमेज देशवासियों और विदेशियों को दिखाने वाली वामपंथी मीडिया की है, मीडिया को नचानेवाले सेकुलर राजनेताओं की है. यह मीडिया-राजनेताओं का नेक्सस भारत का नया अंडरवर्ल्ड है जिसके गैंगस्टर तथा गैंगलीडरों का प्रतीकात्मक एनकाउंटर अब अनिवार्य हो गया है. इस कार्य के लिए एकाध नहं अनेक एनकाउंटर स्पेशलिस्टों की जरूरत पडेगी.

महाराष्ट्र सरकार के चीफ सेक्रेटरी की हस्ताक्षरवाली चिट्ठी जिन्हें दी गई, वे जमानत पर छूटे अरबपति परिवार अपने रसोइए, नौकरों को लेकर मुंबई से महाबलेश्वर घूमने निकले पडते हैं और राज्य के मुख्यमंत्री ऊपरी तौर पर कदम उठाकर सारे मामले को दबा दे रहे हैं, इसके बावजूद बिकाऊ मीडिया कोई उहापोह नहीं करता. ऐसे मीडिया का आप क्या विश्वास करेंगे? सारे देश में लॉकडाउन के कारण तकलीफ में पडे करोडो लोगों को नियमित रूप से दो समय का भोजन-राशन पहुंचाया जा रहा है, ऐसी खबरों की केवल एक झलक दिखाकर कोई भी मीडिया उसकी विस्तार से रिपोर्टिंग नहीं कर रहा है. ऐसे मीडिया को आप क्या कहेंगे?

यह देश भव्य है, उदार है और सभी को संभालता है. पश्चिमी देश दूसरों को लूटकर, गुलामों का व्यापार करके तथा कमजोरों को डरा-धमका कर या फुसलाकर समृद्ध बने हैं. भारत को कभी ऐसी गंदी नीति से समृद्ध बनने की जरूरत नहीं पडी. इस देश में कोई जरूरतमंद लाचार नहीं होता. उसे संभालने वाले एक नहीं अनेक लोग हैं. यहां सेवा करने के लिए होड लगी रहती है. वहां की सेवा संस्थाएं जनता से दान लेकर उसमें से ९० प्रतिशत राशि अपना तंत्र चलाने के लिए, बडे बडे वेतन लेने के लिए उपयोग में लाती हैं. हमारी सेवा संस्थाओं में कई संस्थाएं ऐहसी हैं जिनके संचालक ओवरहेड्स के खर्च अपनी जेब से निकालते हैं. संस्था को मिलनेवाली सौ रुपए की दान राशि जरूरतमंदों तक पहुंचती है तब उसकी कीमत १० रूपए नहीं हो जाती बल्कि सौ के बजाय सवा सौ रूपए हो जाती है. ऐसी संस्थाओं के साथ काम किया है इसीलिए उनकी कार्यक्षमता का प्रत्यक्ष परिचय है.

प्रधानमंत्री एक अपील करते हैं तो उसके जवाब में अरबों रूपए दान में देनेवाले उद्योगपति इस देश में हैं. जिनके पास कोई बचत नहीं है वे छोटी राशि भेजकर भी प्रधान मंत्री के पीएम केयर्स फंड में अनुदान देते हैं.

अभी घर से बाहर जो कुछ भी होता है उसकी फर्स्टहैंड जानकारी नहीं होना स्वाभाविक है. घर में रहकर जो फर्स्टहैंड जानकारी मिली है वह शेयर करके समापन कर रहा हूं. हम जिस कालोनी में रहते हैं, वहां की जनता मध्यमवर्गीय है. कोई करोडपति-अरबपति नहीं है. १४ मंजिल की सात इमारतें हैं. सोसायटी की देखरेख के लिए स्टाफ, सुरक्षा व्यवस्था के लिए स्टाफ, सफाई कर्मचारी- अच्छे नियमित रूप से देखभाल करते हैं. लॉकडाउन के दौरान इन सभी को दुगुना वेतन देने का निर्णय किया गया जिसका अनुमोदन हर किसी ने एकमत होकर किया, ये तो ठीक है. लेकिन कुछ दिन पहले सोसायटी के मानद मंत्री का ईमेल सभी को आया: मित्रो, इन सभी के चायपान-भोजन की व्यवस्था के लिए मेंबर्स इतने उत्साही हैं कि डुप्लिकेशन हो रहा है और सामान बर्बाद हो जा रहा है. इसीलिए आप में से जो लोग भी चाय-नाश्ता-भोजन पहुंचाना चाहते हैं, उसके बारे में फलाने भाई के साथ कोऑर्डिनेट करने का निवेदन है.

ये भारत है. हमारी सोसायटी भारत का एक छोटा सा रूप है जहां बहुरंगी जनता रहती है. भूखों को- जरूरतमंदों को खिलाने के लिए दौडभाग होती है, ऐसे देश में हम रहते हैं. टीवी मीडिया के अपप्रचार पर ध्यान न दें और अखबार नहीं छप रहे हैं, इसे भगवान का आशीर्वाद मानिए.•••

वर्तमान परिदृश्य में भारतीय समाज का भविष्य

हमारे यहाँ एक कहावत काफी लोकप्रिय है “जाय दियौ हमारा ओइसे की मतलब” यह वाक्य तब आता है जब किसी विषय पर दो तीन घंटे तक बकैती करने के बाद जब मन उकछ जाए।आज के भी परिपेक्ष भी ऐसे ही है हमारे सामज की, समाज में कुछ अगर समस्या होता है तो उसपर बात करने वाले हजारों, लाखों मिलेंगे, लेकिन जब बात अगर सुधारने की होगी तो ऊपर वाले वाक्य पर आ जाएंगे।

अभी हम एक ऐसे समाज मे जी रहे हैं जो मानसिक रूप से अलसिया गया है, एक समाज के नाते हमारा कर्तव्य है, की समाज को प्रभावित करने वाले जो भी कारक है उसके खिलाफ प्रखर आवाज़ उठाए, चाहे वह कनिका कपूर हो या या चाइनीज वायरस को घर- घर पहुचने वाले जमाती।

लेकिन नही हम तो बस उससे सब्जी नही खरीदने की अपील करेंगे वो भी सोशल मीडिया के माध्यम से।

यक्षप्रश्न: अरविंद केजरीवाल की उस रसोई तक आजतक मीडिया क्यों नहीं पहुँच पाया?

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COVID19 की रोकथाम हेतु जब प्रधानमंत्री जी ने लॉक डाउन की घोषणा की तब दिल्ली के मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया कि इनकी सरकार ने पहले पहले 2 लाख फिर 4 लाख और बढ़ते बढ़ते यह संख्या 10 लाख लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था की है। जबकि आज भी मुझे ट्विटर से एक मित्र ने मैसेज किया जिसमें एक दम्पति अपने 8 दिन के नवजात शिशु के साथ भूख से तड़प रहे थे, महिला रो रो कर कह रही थी कि वे बच्चे को दूध भी नहीं पिला पा रही हैं। बहुत हृदय विदारक क्रन्दन था। वीडियो सोशल मीडिया पर यह समाचार वाइरल होने पर दिल्ली सरकार की लुटी पिटी इज्जत बचाने देवदूत बनकर स्थानीय विधायक अपनी सहायता का महिमामण्डन करते हुए सोशल मीडिया पर अवतरित होते हैं।

#यक्षप्रश्न? अरविंद केजरीवाल की उस रसोई तक आजतक मीडिया क्यों नहीं पहुँच पाया? यह विचारणीय है कि झण्डेवालान में सेवा भारती की रसोई को वही मीडिया दिल्ली सरकार की रसोई बना कर पेश करता है। जबकि वही दिल्ली का मालिक रोज चैनल्स पर आकर खुद का गुणगान करता नहीं अघाता।

भावी पीढ़ी इस तरह इसे इस तरह याद करेगी-

जब दिल्ली कोरोना से लड़ रही थी, उसका मालिक शर्ट बदल बदल कर टीवी पर शक्ल चमका रहा था।

दुःख हमें भी होता है; लेकिन हम नकली विक्टिम कार्ड नहीं खेलते

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पिछले वर्ष के दिसंबर में जैसे ही सरकार ने नए नागरिकता कानून को जनता के सामने लाकर प्रकट किया, वैसे ही मुझे यह आभास होने लगा कुछ लोगों को इससे बहुत मिर्ची लगने वाली है। ये लोग कौन है यह बात शायद मेरे खयाल में आज सभी लोग जिनकी बुद्घि और विवेक उनके साथ हैं, जानते होंगे। ये वही लोग हैं जिनके वोट बैंक की मशीनरी सिर्फ एक मजहब के लोगों को बरगला के चलती है, या शायद ये कहना भी ठीक होगा कि चलती थी। जब ये लोग स्वयं की सरकार बनाने के सपने को पूरा नहीं कर पाए, तो इन्होंने सोचा कि क्यूं ना कुछ मजहब विशेष के लोगों को बरगला के चलती सरकार को गिरा दिया जाए। परन्तु यदि आप कभी इनसे पूछेंगे की इसी नागरिकता कानून की मांग तो पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह जी ने भी की थी, तो फिर ये उसका जवाब देने से बचने लगेंगे। इन्हें लोगों को एनआरसी के नाम पर डराना है जिसका अभी तक कोई ड्राफ्ट भी सरकार के पास नहीं है। इन्हें मजहब विशेष के लोगों के मन में डिटेंशन सेंटर का डर भी बैठाना है।

परन्तु यदि कोई कहे की डिटेंशन सेंटर तो आपकी सरकार के अन्तर्गत बनाए गए थे, तो भी ये आपको जवाब देने से बचेंगे। ये सरकार को फासीवादी भी बताएंगे। पर यदि आप इनसे पूछे कि 1984 के सिख विरोधी दंगे और इमरजेंसी किसके कार्यकाल में लगी थी, तो भी इनके पास जवाब नहीं होगा। इनके काले कारनामों के बारे में लिखूंगा तो शायद शब्द ही कम पड़ जाएंगे। खैर, जैसे जैसे ये नागरिकता कानून का विरोध का आग पकड़ता गया, वैसे वैसे ही इन मजहब विशेष के लोगों के मन का हिन्दू विरोध भी बाहर आने लगा। फिर वो चाहे ‘काफिरों से आजादी’ का नारा हो या ‘हिंदुत्व की कब्र’ खोदने का या फिर ‘फॅक हिंदुत्व’ का पोस्टर, इन सभी घटनाओं को देखकर मन की शांति भंग हो गई। मै ये नहीं समझ पा रहा था कि एक कानून के विरोध में किसी एक धर्म विशेष को अपशब्द किसलिए कहे जा रहे हैं। कहीं शाहीन बाग़ में छोटी सी बच्चियां मोदी को हिटलर की मौत मारने की बात कर रही हैं। कहीं जामिया के अधेड़ उम्र के विद्यार्थी एक मजहब विशेष के नारे लगाकर किस बात का विरोध जता रहे है, ये बात मेरी समझ में नहीं आ रही थी।

थोड़ा शोध किया तो पता लगा कि कैसे कभी हमारे भाई बहनों को कश्मीर से रातों रात अपनी जमीन, घर, बार छोड़कर निकलना पड़ा था। फिर ये भी मालूम पड़ा कि कैसे उस रात मजहब विशेष की इमारतों से यही आजादी के नारे निकले और हमारे भाई बहनों को हथियारों की नोक पर पलायन करने पर मजबूर किया और सेंकड़ों को तो मौत के घाट उतार दिया गया। आज भी कभी पंडित टीका लाल टपलू की कहानी याद करता हूं तो शरीर को मानो सांप सूंघ जाता है। यदि उसी संदर्भ में देखा जाए तो ये आजादी का नारा हिन्दुओं पर एक गाली कि भांति प्रतीत होता है। जब भी कभी टीवी पर इन तथाकित प्रदर्शनकारियों को ये नारा लगाते देखता था तो मन की शांति भंग हो जाती थी। लेकिन ये सब यहीं तक सीमित नहीं था। जब कुछ तथाकथित मीडिया वर्ग के लोगों को इन्हीं प्रदर्शनकारी लोगों का बचाव करते देखता था तो मन में दुःख के साथ क्रोध के भी भाव उत्पन्न होते थे।

जो मीडिया वर्ग कभी अपने निष्पक्ष होने की ताल ठोंकते थे, आज वही मीडिया वर्ग इन अराजक तत्वों का बचाव करने मै लगे थे। फिर मैंने थोड़ी जानकारी जुटाने की कोशिश की तो यह ज्ञात हुआ की खुद हो राजा हरिश्चंद्र जैसा सच्चा और ईमानदार बताने वाले ये बड़े बड़े मीडिया हाउस कभी निष्पक्ष थे ही नहीं। गुजरात दंगो का सच जानने का प्रयास किया तो पता चला कि इन्हीं मीडिया वर्गों का हाथ दंगो को और भड़काने में था। और आज का दिन है, कि मानो इनका ये दोगला चेहरा देखने की आदत सी हो गई है। अब तो इनपर क्रोध भी नहीं आता, बल्कि तरस आता है।

इंसान ना जाने कुछ भौतिक सुखों के लिए किस हद तक गिर सकता है। एक समय तो उस मां पर भी क्रोध आ रहा था जिसने अपने बच्चे को उसी शाहीन बाग़ के प्रदर्शन की भेंट चढ़ा दिया। कभी उस बच्चे के बारे में सोचता हूं तो मैं कांप उठता है। साथ ही मन मस्तिष्क से, यह प्रश्न पूछने लगता है कि आखिर कोई मां ऐसा कैसे कर सकती है। हद तो तब हो गई, जब वह मां कहने लगी कि मेरा बच्चा शहीद हो गया। खैर इन प्रदर्शनों के आगे बढ़ते ही इन लोगों की मंशा साफ जाहिर हो गई। असम को काटकर अलग करने कि बात करने वाले भी इन्हीं प्रदर्शनों से निकले थे। जिन्ना वाली आजादी मांगने वाले भी इन्हीं प्रदर्शनों से निकले थे। ऐसी ना जाने कितनी घटनाएं लोगों ने देखी और समझी। कुछ लोग जिनकी आंखे बंद थी, वो खुल गई और जो जानबूझकर आंखें बंद करके बैठे थे उनके बारे में तो क्या ही कह सकते हैं।

धीरे धीरे ये पता चलने लगा कि ये विरोधी भेड़ की खाल में भेड़िए हैं। हो ना हो ये सारा घटना क्रम कुछ पूर्व सरकारों की एक मजहब विशेष के लोगों को खुश करने को गंदी राजनीति के कारण हुआ गई। यह भी किसी से छुपा नहीं है कि जैसे ही किसी सरकार ने हिन्दुओं के लिए कुछ करने का प्रयास भी किया, इन्हीं मजहब विशेष के कुछ कट्टर पन्थियों के माथे पर बल पड़ने लगे। साथ ही यह पता लगा कि मनुष्य जीवन में शिक्षा का कितना महत्व है। यदि पूर्व सरकारों ने मजहब विशेष के लोगों को खुश करने की बजाए उन्हें शिक्षित करने का प्रयास किया होता, तो आज वो लोग इसी भेड़चाल में ना पड़कर ईमानदारी से अपना जीवनयापन कर रहे होते। दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों का होना अपने आप में दिल को दुखी कर देता है। जब देश के अलग अलग शहरों में पत्थरबाजी और आगजनी की खबरे सुनता हूं तो लगता है मानो देश में और छोटे छोटे कश्मीर बन रहे हो।

हां। दुःख हमे भी होता है, जब बहादुर सिपाहियो को उन्मादी भीड़ द्वारा मार दिया जाता है
दुःख हमे भी होता है, जब हमारे पूज्य प्रतीक चिन्हों का उपहास उड़ाया जाता है
दुःख हमे भी होता है, जब हमारे भाइयों के हाथ पैर काटकर आग में डाल दिया जाता है
दुःख हमे भी होता है, जब हमारी पूज्य गाय का मजाक उड़ाया जाता है
दुःख हमे भी होता है, कैसे हमारे ही कुछ भाइयों को हमारे खिलाफ कर दिया जाता है
हां! दुःख हमे भी होता है, लेकिन हम नकली विक्टिम कार्ड नहीं खेलते।

उर्दू गालियों की विकृत संस्कृति का बोझ ढोती हिन्दी

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भाषा मनुष्य के सर्वोत्तम आविष्कारों में से एक है। यह भावों को व्यक्त करने में सहायता करती है। आपस में संवाद को सुगम बनाती है। पीढ़ियों और सभ्यताओं के मध्य सेतु का कार्य करती है। विचारों की गहनता को बढ़ाती है। अर्जित ज्ञान का संचय शुद्ध रूप में लंबे समय तक करती है।

भाषा का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह उस स्थान की संस्कृति और सामाजिक मान्यताओं को अपने साथ लेकर चलती है जहाँ से उसका उद्भव हुआ हो।

एक उदाहरण लेते हैं जिससे अधिक स्पष्टता आए। वर्ष 2004 की बात है। लखनऊ विश्वविद्यालय के खचाखच भरे मालवीय सभागार में के.एन. गोविंदचार्य जी वक्तव्य दे रहे थे। उन्होंने उपस्थित समूह से कहा कि ‘पुण्य’ शब्द के समान अर्थ वाला किसी दूसरी भाषा का कोई शब्द बताएँ। किसी ने ‘Blessing’ बोला, किसी ने ‘शबाब’ बताया तो किसी ने ‘Virtuous’। Holy, Sacred, Charity, Righteous आदि उत्तर भी दिए गए। परंतु न तो बाकी लोग किसी भी उत्तर से संतुष्ट थे, न गोविंदचार्य जी और न ही स्वयं उत्तर देने वाले।

कारण ये है की ‘पुण्य’ केवल एक शब्द नहीं है। भारतीय संस्कृति की झलक दिखने वाला एक झरोखा भी है। कोई गंगा नहा के पुण्य कमा सकता है तो कोई माँ-बाप की सेवा कर के। भूखे को खाना खिलाकर या प्यासे को पानी पिलाकर भी पुण्य अर्जित हो सकता है।  चींटी को आटा, मछली को चावल, गाय को पहली रोटी देकर या कुत्ते को आखिरी रोटी देकर पुण्य का पलड़ा भारी किया जा सकता है। पेड़ लगाना पुण्य का काम है तो उन्हे सींचना भी कम पुण्यकारी नहीं है। राजा प्रजा की सेवा करके पुण्य कमा सकता है तो प्रजा राजा को कर देकर। ऐसे अनगिनत उदाहरण दिए जा सकते हैं। आस्था आधारित पुण्य प्राप्ति के विकल्प तो अलग से हैं हीं।

इसीलिए किसी और भाषा में ऐसा समानार्थी शब्द नहीं मिलता जो ‘पुण्य’ में निहित समग्र विचार को समेट सके। ‘पुण्य’ की व्यापकता उन संस्कृतियों से उपजे शब्दों के बांधे नहीं बंधती जहाँ इतनी विराट संकल्पना ही न हो।

‘तलाक’ या ‘Divorce’ शब्द के साथ भी यही है। ढूँढने पर भी हिन्दी में इसके समानार्थी शब्द नहीं मिलता क्योंकि विवाह जैसे पवित्र बंधन के विच्छेद का कोई कान्सेप्ट ही यहाँ नहीं था।

अब आते हैं उन शब्दों पर जिन्हे हम ‘हिन्दी गाली’ कहते हैं। जितने भी फूहड़ और यौन-कुंठा के शब्द हिन्दी गालियों के रूप में बताए जाते हैं अगर उनके उद्भव की पड़ताल करें तो हिन्दी क्या किसी भी भारतीय भाषा से उनका संबंध दूर-दूर तक नहीं मिलता।

हाँ, उर्दू का विकास अवश्य ऐसी भाषा के रूप मे हुआ है जिसमें मुख्यतः अरबी-फारसी-तुर्की शब्द ही बहुतायत हैं। उर्दू के शिक्षक, शायर आदि सभी प्रयुक्त अरबी-फारसी-तुर्की शब्दों को उर्दू के शब्द कहते हैं। यह सही भी है। वस्तुतः सही अर्थों में उर्दू भारत में अरबी-फारसी-तुर्की भाषा की वाहक है।

और इसी आधार पर हिन्दी में प्रयोग होने वाली सभी अश्लील गालियाँ हिन्दी नहीं अपितु ‘उर्दू गालियाँ’ हैं।

प्रमाण के लिए किसी को माँ की गाली देने हेतु प्रयुक्त सर्वाधिक प्रचलित शब्द को लेते हैं। इसका पहला भाग ‘मादर’ शब्द है। ‘मादर’ अरब में माँ के लिए प्रयुक्त होता है इससे बनने वाले अन्य शब्द जैसे मादरे-वतन (मातृभूमि) या मादरे–जबान (मातृभाषा) उर्दू में भी बहुलता से पढ़ने-सुनने को मिल जाएंगे। इस गाली का दूसरा पद आक्रामक यौनिकता का शब्द है। जो संस्कृत, अवधी, बृजभाषा,खड़ी बोली आदि में कहीं भी नहीं मिलता।

इसी तरह से ‘हराम’ भी अरबी शब्द है। हरामखोर, हरामज़ादा, हरामी, हराम की औलाद जैसी गालियाँ इसी से निकली हुई हैं। ये सभी गालियाँ भी व्युत्पत्ति के आधार पर आयातित हैं और भारत में इन्हे उर्दू गालियाँ कहना सर्वथा उपयुक्त होगा।

बिल्कुल ऐसे ही शरीर के अंगों को अश्लील शब्दों मे व्यक्त करना इन गालियों की एक अन्य प्रवृत्ति है। इन शब्दों में शरीर के गुप्तांगों को गाली के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। हाँ, जो भी गालियाँ जो इसस समय आपके दिमाग में आ रही हैं वो सभी। इन अंगसूचक गालियों का प्रयोग सदैव नापने की सूक्ष्मतम इकाई के लिए, किसी को मूर्ख बताने के लिए, किसी को अक्षम या असहाय प्रदर्शित करने के लिए, किसी वस्तु की निरर्थकता साबित करने हेतु अथवा किसी कथन की महत्वहीनता को प्रकट करने में किया जाता है। इन अंगसूचक अश्लील शब्दों में से किसी का भी उद्भव किसी भी हिन्दी अथवा इसकी बोलियों में नहीं मिलता। अरबी, फारसी, तुर्की भाषाओं में कुछ शब्द, कुछ उपसर्ग-प्रत्यय अवश्य मिल जाते हैं। भारत में इस शब्दावली की वाहक सहज रूप से उर्दू ही है।

हाँ, महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा निर्मित ‘वर्धा हिन्दी शब्दकोश’ में ही इनमें से कुछ शब्दों पाया जा सकता है। और वो भी इसलिए की उस शब्दकोश में प्राक्कथन में ही ये स्पष्ट लिखा है कि हिन्दी क्षेत्र में बहुलता से प्रयोग होने वाले अरबी-फ़ारसी आदि शब्दों को इस शब्दकोश मे सम्मिलित किया गया है।

एक स्टैन्ड-अप कॉमेडियन है- जाकिर खान। अपने चुटकुलों में अपनी गर्लफ्रेंड को वो बार-बार बहन कहकर संबोधित करता है। बाद में श्रोताओं से दांत फाड़ते हुए पूरे गर्व के साथ कहता है कि मैं तो मुसलमान हूँ हमारे यहाँ भाई-बहन में ये सब चलता है। जाकिर खान इकलौता नहीं है। ऐसी विकृत मानसिकता के अधिकतर व्यक्तियों से सामान्य बातचीत में आप यह विचार देख सकते हैं।

हाल ही में पाकिस्तान में महिला अधिकारों से संबंधित ‘औरत-मार्च’ निकाला गया। इसमें एक पोस्टर बहुचर्चित रहा जिसमें लिखा था- ‘My brother showed me porn’ (sic). इस पोस्टर के ट्वीट पर लाहौर के एक डॉक्टर फैसल राँझा ने लिखा कि दुर्भाग्यपूर्ण रूप से यह सत्य है कि उनके पास ढेर सारे माता-पिता अपनी बेटी के गर्भपात के लिए आते हैं जो लड़कियाँ अपने भाइयों द्वारा गर्भवती हुई होती हैं।

Source: twitter

अब इस वैचारिक संस्कृति से जो भाषा निकलेगी उसमें ‘मादर##’ या ‘बहन##’ जैसे शब्द निकल के आयें तो यह बिल्कुल भी अचरज की बात नहीं है। कहावत ही है-बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होय। बाकी रक्षाबंधन या भाई-दूज मनाने वाली संस्कृति से निकला कोई भी व्यक्ति लोक-प्रचलन के कारण अथवा अनजाने में इनका प्रयोग भले कर ले परंतु ऐसे शब्दों का निर्माण नहीं कर सकता। इतनी कुत्सितता मस्तिष्क में आने का कोई वैचारिक स्रोत भी तो चाहिए!

हिन्दी में अपमानजनक शब्दों का अपना शब्दकोश है जिसमें मूर्ख, गदहा, कूकूर, ऊदबिलाव, सरऊ, मुँहझौंसे, बिलबिलहे, चपड़गंजू, मग्घे, जैसी अनेकों गालियाँ हैं। कई मुहावरे भी अपमान के लिए प्रयोग में आते हैं जैसे ‘दाल-भात मे मूसरचंद’, ’बिना पेंदी का लोटा’, ‘सावन का अंधा’, ‘थोथा चना बाजे घना’, ‘कुत्ते की पूँछ सीधी नहीं होती’ आदि। विदेशज शब्दों के प्रयोग से भी नए मुहावरों का भी निर्माण हुआ है जैसे- ‘बाप मरे अंधेरे में, बेटा पावरहाउस’। परंतु इनमें न तो स्त्री अपमान का भाव है और न ही यौन कुंठा का। उल्लेखनीय यह भी है कि अलग-अलग इन मुहावरों का प्रयोग भिन्न-भिन्न परिस्थिति के अनुसार ही किया जाता है। अतः इन अपमानजनक शब्दों के प्रयोग के लिए भी बुद्धि की आवश्यकता होती है।

कदाचित अब समय है कि हम सभी हमारी दिनचर्या की शब्दावली में घुसपैठ कर चुके इन अनैतिक, स्तरहीन, असामाजिक और कुंठाग्रस्त शब्दों क्रमिक रूप से बाहर करने के प्रयास आरम्भ करें। प्रक्रिया लंबी है; और दुरूह भी। परंतु कहीं न कहीं से आरंभ करना होगा। संभवतः इन अपशब्दों के अभारतीय होने का उद्घाटन और इस संदेश का प्रसार इस दिशा में पहला लघु प्रयास होगा। शेष शनैः-शनैः……

विधि का विधान या आपका संकल्प?

सामान्यतः आपको दुनिया में दो तरह के व्यक्ति मिलते हैं एक वो जो कहते है कि जो किस्मत में लिखा हुआ है वो होकर ही रहेगा आप कुछ भी कर लो उसे बदल नहीं सकते और दूसरे वो होते जो कहते हैं किस्मत जैसा कुछ नहीं होता इंसान की इच्छा शक्ति उसका संकल्प ही उसका भविष्य निर्धारित करती है।

किन्तु मेरे विचार से ये दोनों चीजें अति हैं वास्तव में दोनों संभव हैं अब आप कहेंगे ऐसा कैसे हो सकता है? तो मैं आपको बताता ऐसा कई बार हुआ हैं और इसका उल्लेख रामायण में वाल्मीकि ने भी किया हैं।

आपको मै रामायण का वह प्रसंग बताता हूं जहां ऐसा उल्लेख हुआ हैं..

रामायण को पढ़ने वाले या उसे जानने वाले सभी को पता होगा कि राम भक्त हनुमान ने आजीवन प्रभु की सेवा के कारण ब्रह्मचारी रहने का संकल्प लिया था किन्तु ब्रह्मा जी (नियति निर्माता) ने उनकी किस्मत में पुत्र योग लिखा हुआ था, यहां पर विधि के विधान और संकल्प में एक प्रत्यक्ष टकराव था क्योंकि ब्रह्मचारी के जीवन में पुत्र सुख नहीं होता हैं और हनुमान जी अपने संकल्प के प्रति इतने दृढ़ता से समर्पित थे की उनको विचलित करना विधि के लिए असम्भव था।

इस द्वंद की स्थिति के समाधान के लिए रामायण में मछली और उसके माध्यम से मकरध्वज के जन्म की कहानी को इस प्रकार रचा गया जिससे विधि का विधान भी अटल रहा और हनुमान जी का संकल्प भी।

अतः इस प्रसंग के माध्यम से आप सब से यही कहना चाहता कि हम विधि के विधान को शायद न बदल पाए लेकिन यदि हमारी इच्छा शक्ति मजबूत है हम उसके प्रति समर्पित हो तो परिणाम प्राप्ति की प्रक्रिया को जरूर बदल सकते हैं। हम अपने संकल्पों से प्रकृति को इतना विवश अवश्य कर सकते हैं कि वह कोई ऐसा मार्ग निकाले जिससे दोनों का सम्मान हो सके।

भारतीय “समुदाय विशेष” के लोग भारत या किसी भी देश के संविधान को मानने में असमर्थ क्यों सिद्ध होते हैं?

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मैं इस देश में जन्म से आज तक कुछ 26 वर्ष बिता चुका हूँ। मेरा जन्म जिस स्थान पर हुआ वह भगवान शिव की नगरी के नाम से भले ही प्रसिद्ध हो परंतु अपने मुहल्ले में मैने बचपन से समुदाय विशेष के लोगों को बहुत करीब से देखा। शायद ये लेख समुदाय विशेष के लोगों तक ना पहुचे परंतु फिर भी वैचारिक तौर पर मैं आज तक यह नही समझ पाया कि भारतीय “समुदाय विशेष” के लोग भारत या किसी भी देश के संविधान को मानने में असमर्थ क्यों सिद्ध होते हैं।

सत्य शाश्वत है और धर्म का जन्म केवल असत्य के अस्तित्व में आने के बाद में हुआ, ऐसा मैं सभी धर्मों के लिए मानता हूँ। परन्तु ये समुदाय विशेष का मानसिक जड़त्व है जो उन्हें विज्ञान को स्वीकारने से रोकता है। विज्ञान सत्य है। मुझे इस बात से तकलीफ नही है कि वे बचपन से एक विशेष पुस्तक पढ़ कर ज्ञान प्राप्त करते हैं लेकिन प्रति व्यक्ति मानसिक विकास (Sort of certified professional skill development) के लिए किए गए प्रयासों की घोर कमी एक विचारधारा को जन्म देती है जिससे मानव जीवन का संपूर्ण दायित्व भगवान पर सौंप कर जीवन यापन का सिद्धांत जन्म लेता है। जीवन की कीमत को इतना कम आँकना, अपने को ईश्वर के प्रति समर्पित बताते हुए जीवन त्याग के लिए तैयार रहना एवं अपने देश के लिखित एवं अलिखित दोनों प्रकार के नियमों को ताक पर रखते हुए अपने धार्मिक दायित्वों की पूर्ति करना.. इसकी आड़ में कुछ लोग मनमानी करते हैं।

देश के दूसरे समुदायों की बात करें तो या तो नौकरी या फिर व्यापार में संलिप्तता धीरे धीरे एक बच्चे से युवा और युवा से प्रौढ़ होते हुए मनुष्य में धार्मिकता को एक विश्वास के रूप में प्रस्थापित कर यह विचार प्रबल करती है कि परिश्रम करते हुए हमें मानव जाति के लिए अपने दायित्व पूरे करने हैं। ऐसा नही है कि ऐसे लोग धार्मिक नहीं होते परन्तु धर्म ही धर्म… उसके सिवाय कुछ नहीं.. ऐसी मानसिकता का विकास नहीं कर पाते।

बात की जाए विचारों की तो समुदाय विशेष में भी वैज्ञानिक और प्रभावशाली व्यक्तित्व हुए हैं और दूसरे समुदायों में भी धार्मिक रूढिवादी हुए हैं। मैंने जब से होश संभाला, मैने पूरे प्रयास किये कि मैं किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह से ग्रस्त ना होऊं! मैंने सभी धर्मों के लोगों से बात की और ये महसूस किया कि अपने धार्मिक मूर्खता को देख के जितना दुखी मैं होता हूं उतना ही किसी औऱ समुदाय का मेरा मित्र। ऐसे समय में ये स्पष्ट है कि धर्म गलत करने को नहीं बोला लेकिन कुछ लोगों ने अपने फायदे या किसी उद्देश्य विशेष की पूर्ति के लिए द्वेष भावना पाली और अपने प्रभाव का प्रयोग करते हुए उसे फैलाया।

समय की आवश्यकता समुदाय विशेष के विरुद्ध आवाज उठाने की नही है.. ऐसा करने से हम में और उन में कुछ विशेष अंतर नहीं। आवश्यकता है उनको ये मानने की की यदि आपका अस्तित्व किसी देश की स्वास्थ्य व्यवस्था से हुआ और आपके भरण पोषण के लिए उसी देश ने विभिन्न योजनाएं दीं, आप इसी देश के द्वारा जारी की गई मुद्रा प्रयोग कर अपने धार्मिक उद्देश्य पूरे करते हैं.. आप जब सब प्रकार से जिस जगह के संसाधनों पर निर्भर हैं तो उसके प्रति आपका कुछ तो दायित्व धार्मिक पुस्तकों में भी लिखा है। शिक्षा एवं नौकरी का सही से ना मिलना, किसी प्रकार की विशिष्ट योग्यता ना विकसित करना.. ऐसे कुछ कारण गिनाये जा सकते हैं कि जिसके कारण युवा भटका हुआ कहा जाता है लेकिन उन्हें एक बार यह देखना चाहिए कि उन्हीं के साथ के कुछ लोग अच्छे जीवन की तलाश में बाहर निकल गये और आज एक सामान्य जीवन जी भी रहे होंगे।

संकट काल में दिखता संघ का विराट रूप

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डा रवि प्रभात
असिस्टेंट प्रोफेसर
महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ केवल भारत नहीं अपितु वैश्विक पटल पर भी विभिन्न कारणों से सर्वदा चर्चा का केंद्र रहता है। अपने 95 साल के इतिहास में एक सामाजिक सांस्कृतिक संगठन होने पर भी संघ की अधिकतम चर्चा राजनीतिक अथवा सांप्रदायिक कारणों से ही की जाती रही, निहित स्वार्थों के वशीभूत वामपंथी मीडिया मुगलों के द्वारा एक विशेष चश्मे को लगाकर एकपक्षीय दुष्प्रचार संघ को लेकर किया जाता रहा। लेकिन इन सब दुष्प्रचारों से बेपरवाह संघ लक्ष्यैकचक्षुष्क होकर अपनी गति से निरंतर व्यक्ति निर्माण एवं चरित्र निर्माण के कार्य में लगा रहा। संघ की सामाजिक सांस्कृतिक गतिविधियों से भारत के आम जनमानस पर जो छवि अंकित हुई उस छवि को तमाम संसाधनों से दुराग्रही मीडिया संस्थान अथवा अन्य विरोधी पक्ष कभी धूमिल नहीं कर पाए।

घोषित तौर पर संघ के अधिकृत कार्यकर्ताओं का सर्वदा एकमेव कथन होता है कि संघ का कार्य शाखा के द्वारा व्यक्ति निर्माण एवं चरित्र निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण करना है। यद्यपि विरोधी पक्षों को आज तक कभी यह बात पची नही एवं यह लोग हमेशा संघ का मूल्यांकन राजनीतिक तौर पर करते रहें तथा संघ की छवि एक कट्टर मुस्लिम विरोधी संगठन के रूप में गढ़ते रहे।

पुनरपि यह देखने में आता है कि आम जनमानस संघ विरोधियों की इस तरह की बातों से कोई सहमति नहीं रखता, जिसके कारणों की तह में जाना अत्यंत आवश्यक है।

आम जनमानस में संघ के प्रति श्रद्धा एवं विश्वास की जब हम मीमांसा करते हैं तो पाते हैं कि इसका महत्वपूर्ण कारण है कि किसी भी आपदा काल में संघ का स्वतःस्फूर्त, स्वाभाविक सेवा-भाव। संघ अपने कार्यकर्ताओं को हमेशा समाज एवं राष्ट्र के प्रति निश्छल आत्मीयता एवं निस्वार्थ सेवा का संस्कार देता है, यही संस्कार संकट काल में जब सेवा कार्य के रूप में परिणत होकर समाज के सामने प्रत्यक्ष होता है तो आम जनमानस पर दुराग्रही मीडिया द्वारा संघ को लेकर जो भ्रम बुने जाते हैं वह क्षण भर में ध्वस्त हो जाते हैं। भारतीय समाज का एक दीर्घकालिक अद्भुत जुड़ाव संघ के साथ बन जाता है।

देश जब 1947 में विभाजन की त्रासदी से झुलस रहा था, लाखों लोगों का विस्थापन हो रहा था, पाकिस्तान में हिंदुओं का दमन बेहद दुर्दांत तरीके से किया जा रहा था तब अपनी सीमित शक्ति होने पर भी तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरूजी ने स्वयंसेवकों को इस भयानक रक्त विभीषिका में सीमापार से आ रहे हिंदुओं को सुरक्षित रास्ता देना, उन्हें सकुशल स्थापित करना, उनके भोजन आदि का प्रबंध करना इत्यादि कार्यों में जुटने का निर्देश दिया। श्री गुरु जी की इच्छा अनुसार संघ के स्वयंसेवकों ने तीन हजार से ज्यादा राहत शिविर लगाकर हजारों हिंदू परिवारों को पंजाब दिल्ली आदि स्थानों पर उनके आवास एवं भोजन की समुचित व्यवस्था की। आरंभिक काल में जहां संघ को महाराष्ट्र तक सीमित माना जाता था परंतु विभाजन काल में किए गए स्वयंसेवकों के सेवा भाव से आम समाज के मन में उनके प्रति जो सकारात्मक स्नेह पैदा हुआ इससे संघ की पहचान अखिल भारतीय संगठन के तौर पर की जाने लगी। रामचंद्र गुहा जो कि संघ के प्रति बेहद दुराग्रह रखते हैं, उन्होंने भी अपनी पुस्तक ‘भारत गांधी के बाद’ में विभाजन काल की स्थिति का वर्णन करते हुए संघ के सेवा कार्यो की चर्चा की है। यह अलग बात है कि अपने स्वभाव अनुसार वह इसे हिंदू समाज से जोड़कर सांप्रदायिक रंग देने से नही चूके।

इसके बाद तो जैसे एक श्रृंखला ही बनती चली गई एवं आपदा काल में संघ के स्वयंसेवकों द्वारा किए जाने वाले सेवा कार्य एक तरह से अपरिहार्य बन गए। चाहे 1962 का चीन का युद्ध हो अथवा 1965 पाकिस्तान के साथ युद्ध। जब संघ के कार्यकर्ताओं ने प्रशासन के साथ मिलकर सैनिक आवाजाही मार्ग की चौकशी, रसद आपूर्ति में सहायता की, साथ ही ट्रैफिक व्यवस्था संभालने तक का भी आग्रह किया ताकि उसमें लगे पुलिसकर्मी युद्ध में भाग ले सकें।

कभी संघ को फासिस्ट कहने वाले जयप्रकाश नारायण का संघ को लेकर हृदय परिवर्तन भी बिहार बाढ़ के दौरान किए गए संघ के स्वयंसेवकों के सेवा कार्यो को देखकर ही हुआ। जिसके बाद इमरजेंसी में संघ के साथ मिलकर तानाशाही से लड़ने में उन्होंने तनिक भी संकोच नहीं किया।

यह क्रम 1971 में ओडिशा में आए भयंकर चक्रवात से लेकर भोपाल गैस त्रासदी तक, 1984 के दंगों से लेकर गुजरात भूकंप तक तथा उत्तराखंड के भयंकर सुनामी से लेकर अद्यतन वैश्विक महामारी कोरोना से निबटने तक निरंतर निर्बाध गति से जारी है।

वर्तमान कालीन वैश्विक आपदा कोरोना की चर्चा करने से पहले एक बिंदु पर चर्चा करना अत्यंत आवश्यक है, लेख के आरंभ में ही इस बात पर चर्चा की गई है कि संसद के विरोधियों ने संघ की छवि एक कट्टर मुस्लिम द्वेषी संगठन के तौर पर गढ़ने का प्रयास किया है तथा यह कहने से भी नहीं चूकते कि मुस्लिमों की प्रतिक्रिया हेतु ही संघ की स्थापना की गई। परंतु जब संघ द्वारा किए जा रहे सेवा कार्यों पर दृष्टिपात करते हैं तो यह नैरेटिव भी ध्वस्त होता नजर आता है, क्योंकि जब संघ के स्वयंसेवक सेवा कार्य के लिए मैदान में उतरते हैं तो वह बिना किसी भेदभाव के ‘नर सेवा नारायण सेवा’ के भाव से सेवा कार्य करते हैं। वरिष्ठ पत्रकार आईआईएमसी के पूर्व निदेशक के जी सुरेश इस इस बात की तस्दीक करते हुए कहते हैं कि जब वह युवा थे और चरखी दादरी में वायुयान दुर्घटना हुई था तो वहां उन्होंने रिपोर्टिंग के दौरान पाया कि दुर्घटनास्थल पर अनेक संघ के कार्यकर्ता बिना किसी भेदभाव के मुस्लिम क्षतिग्रस्त यात्रियों की उसी पुनीत भाव से सेवा कर रहे हैं जिस भाव से अन्य की सेवा करते हैं, तो उनके मन में तत्कालीन संघद्वेषी तथाकथित बुद्धिजीवियों ने जो छवि गढ़ी थी वह तुरन्त ध्वस्त हो गई एवं उनका नजरिया भी परिवर्तित हो गया। यही सत्य का दर्शन होता है जिसके लिए द्रष्टा को निरपेक्ष व पूर्वाग्रहों से मुक्त होना चाहिए।

वैश्विक महामारी चायनीज वायरस से उपजी यह ऐसी भयंकर आपदा है जिसके सामने बड़े-बड़े विकसित देश भी पस्त हो चुके हैं। ऐसे में लोकडाउन की घोषणा के बाद दिहाड़ी मजदूर, दैनन्दिन कमाई वाले गरीब, प्रवासी मजदूर, प्रवासी विद्यार्थी, अनेक ऐसे परिवार जिनके युवा सदस्य अन्य शहर में या देश से बाहर हैं उनकी देखरेख, इन सबका भोजन आदि का प्रबंध जैसी अनेक समस्याएं उठ खड़ी हुई। इन सारी परिस्थितियों को संभालने के लिए फिर एक बार के पूरे भारतवर्ष में सेवा कार्य के लिए तत्पर दिखे संघ के स्वयंसेवक। आधिकारिक तौर पर वास्तविकता में संघ शाखा ही लगाता है परंतु संघ के कार्यकर्ता राष्ट्रहित के लिए उपयोगी सभी कदम उठाते हैं। इसलिए तमाम सेवा कार्य संघ के आनुषंगिक संगठन सेवा भारती की देख रेख में चलते हैं।

इस आपदा काल में अनेक लोगों के राशन वितरण से लेकर आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति एवं बुजुर्ग लोगों की संभाल तक का सारा कार्य देखते ही देखते सेवा भारती के माध्यम से संघ के कार्यकर्ताओं ने संभाल लिया। इस समय में देश के सभी प्रांतों की छोटी से छोटी बस्ती तक फैला हुआ संघ का पूरा तंत्र सक्रिय है, जमीनी स्तर पर जो जरूरतमंद हैं उन्हें अगर किन्ही कारणों से प्रशासनिक मदद पहुंच पा रही है तब भी उन तक मदद पहुंचाने का कार्य पिछले 20 दिनों से बखूबी करते आ रहे हैं। केवल दिल्ली प्रांत की बात करें तो पिछले दिनों में 55 हजार से ज्यादा लोगों को राशन किट का वितरण किया गया है, 179 रसोइयों के माध्यम से 10 लाख से ज्यादा लोगों को भोजन कराया जा चुका है, सेवा भारती की हमेशा एक हेल्पलाइन खुली रहती है, पूर्वोत्तर के छात्रों के लिए अलग हेल्पलाइन चलाई जा रही है, 400 से अधिक ऐसे परिवारों की देखभाल का कार्य भी संघ के कार्यकर्ता कर रहे हैं।

इसी प्रकार मुंबई में भी नियमित तौर पर एक लाख से अधिक परिवारों को भोजन तथा 30,000 से ज्यादा परिवारों को राशन का वितरण किया जा चुका है। देश के सभी प्रांतों में सेवा भारती के माध्यम से इस तरह के प्रकल्प चल रहे हैं, जिनसे 20 लाख से अधिक परिवारों तक सीधी सहायता किसी न किसी रूप में कार्यकर्ताओं ने पहुंचाई है। गुजरात में आयुर्वेदिक किट का वितरण बड़े स्तर पर किया गया जो काफी लोकप्रिय भी हुई।

कार्यकर्ताओं ने सोशल डिस्टेंस के लिए भीड़ प्रबंधन में भी प्रशासन का सहयोग अनेक स्थानों पर किया है। अभिप्राय यह है कि वर्तमान समय में इस आकस्मिक उपजी आपदा से निबटने के लिए संघ के स्वयंसेवक पूरी तरह सेवा कार्यों में जुटकर आमजन का संबल आमजन का संबल बने हुए हैं।

वस्तुतः कार्यकर्ताओं के सेवा कार्यो को प्रचारित करने में संघ विश्वास नहीं करता, यह विशुद्ध रूप से, निस्वार्थ भाव से किया जाता है। देश का जनमानस इसका प्रत्यक्षीकरण करने के बाद इसकी अनुभूति भी करता है। अतः विरोधियों के दुष्चक्र में कभी नहीं फंसता।

क़इ सारे तथ्यों को उजागर करने के पीछे का उद्देश्य यह दर्शाना है कि कैसे जब जब देश में संकट काल आता है तो संघ संकटमोचक की भूमिका में खड़ा रहता है। इसका उद्देश्य यह भी है कि दुराग्रही लोग निहित स्वार्थ के वशीभूत संघ के क्रियाकलापों को मात्र राजनीतिक कसौटी पर कसने की बजाय उसका सर्वांगीण मूल्यांकन करें। अनेक विश्लेषक संघ की जन स्वीकार्यता का विश्लेषण करते हुए अनायास इस निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं कि संघ का मुस्लिम विरोधी कोई एजेंडा इसका कारण है। जबकि वो इस बात को नजरअंदाज कर देते हैं कि स्वयंसेवकों के नर सेवा नारायण सेवा की भावना से ओतप्रोत जनसेवा ही उसकी पूंजी है जिसमें सारी शक्ति निहित है।

संकट काल में निश्चित ही सेवा की साधना से तप्त, कुंदन की भांति प्रदीप्त,अलौकिक आभा से युक्त संघ का विराट रूप आमजन को उसी भांति दृष्टिगोचर होता है जिस भांति अर्जुन को कृष्ण के विराट रूप के दर्शन महाभारत में हुए थे।

यहूदी राष्ट्रीयता

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गुड फ्राइडे, आज के दिन जीजस क्राइस्ट को क्रॉस पर चढ़ाया गया था, उस समय जेरूसलम रोमन साम्राज्य के अधीन एक यहूदी (jews) राज्य था। उस समय का रोमन साम्राज्य, ईसाई होली रोमन साम्राज्य नही था, रोमन उस समय अपोलो, जुपिटर आदि को पूजते थे।

जीजस के समय यहूदी (Jews) मुख्यतः जेरूसलम के आस पास के क्षेत्रों में रहते थे, जिसे इजराइल कहा जाता था। जब 66 AD से 135 AD के बीच रोमन और यहूदियों में संघर्ष प्रारंभ हुआ, jews के विद्रोह को कुचल दिया गया। जिसमे यहूदियों के एकता खत्म करने की कोशिश की, जेरुसलम को बर्बाद और jews के मंदिरों को तोड़ दिया गया, उनके राष्ट्रीयता को तोड़ने के लिए उस का नाम बदल कर सिरिया फेलिस्तीना कर दिया, jews को जेरूसलम में जाना प्रतिबंधित कर दिया।

इसके बाद बचे खुचे jews Meditarean sea (भूमध्य सागर) के चारो और बसे शहरों में बसने लगे। वहाँ के व्यपारिक केंद्रों में धीरे धीरे मुख्य व्यपारी बनने लगे। सामंतवाद (knightnood) के दौर में जहाँ यूरोप में किसानों की स्थिति बहुत ही बदतर थी, वही jews व्यापार के दम पर अपनी अच्छी स्थिति कायम कर ली थी। धीरे धीरे यूरोप के हर शहरों पर jews बस चुके थे।

जब यूरोप में चर्च का प्रभाव बढ़ने लगा और जब पूरा यूरोप ईसाई बन गया, तब यूरोप में धर्म के आधार पर यहूदियों को नफरत झेलना पड़ा। जीजस क्राइस्ट को सूली में चढ़ाने का बदला वहाँ बसे यहूदियों से लिया जाने लगा, जबकि जीजस खुद यहूदी परिवार के थे। मध्यकाल में यूरोप के कई जगहों में यहूदियों को मारा गया, भगाया गया और इसकी चरम परिणिती दूसरे विश्व युद्ध मे होलोकॉस्ट के रूप में देखने को मिली।

इस बीच, जैसे जैसे रोमन साम्राज्य ईसाई बनते गए, जेरूसलम ईसाइयों का पवित्र स्थान बन गया। वहाँ ईसाई बसने लगे। लेकिन जब मुस्लिम अरब शासक एक शक्ति के रूप में उभरे, जेरूसलम पर कब्जा करने की कोशिश करने लगे। जेरूसलम के आस पास तो मुस्लिमो ने कब्जा जल्दी ही कर लिया, पर जेरूसलम को जीतने में काफी समय लगा। इधर पोप के अधीन (11वी सदी से 15 वी सदी) ईसाई राज्य जेरूसलम को जीतने के लिए क्रुसेड (धर्मयुद्ध) करने लगे,कई बार जीतने में सफल रहे लेकिन अंततः ऑटोमन साम्राज्य के उदय और कांस्टेण्टिनोपोल के पतन से ईसाई चुनौती समाप्त हो जाती है। इस समय सिरिया फिस्टिनीया में अरबी मुसलमानो की आबादी में वृद्धि होती है, ये स्तिथि प्रथम विश्वयुद्ध तक बनी रहती है।

द्वीतीय विश्वयुद्ध के बाद सिरिया फेलिस्तीन का क्षेत्र ब्रिटेन और उसके सहयोगी के कब्जे में आ जाता है, इसके बाद पूरे विश्व के jews ब्रिटेन और USA के सहयोग से उस क्षेत्र में बसने लगते है,जिसे वर्तमान में इजराइल कहा जाता है। करीब करीब 2000 साल के बाद फिर से jews राष्ट्रीयता उभरती है।

जहाँ इस्लाम और ईसाई धर्म के बढ़ते प्रभाव से विश्व के कई रिलिजन समाप्त हो गए है या समाप्त होने की स्थिति में है, वही यहूदियों के यह संघर्ष और जिजीविषा उनको एक पहचान और एक महत्वपूर्ण स्थान देता है।

बिहार की राजनीती और कोरोना वायरस से जंग

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स्स्सस्स्स्स… कृप्या शोर न मचाए बिहार सरकार सो रही है!

एक 72 साल की महिला बिहार के सबसे अच्छे हॉस्पिटल PMCH Patna से भाग जाती है (या भगा दी जाती है). जो सिवान से आयी हुयी कोरोना वायरस की संभावित रोगी है. पर क्या मजाल जो हम सरकार से कुछ सवाल पूछ पाए! ऊपर से ये धर्म-निरपेक्ष सरकार जो है.

आखिर उसे अपने वोट बैंक की चिंता तो करनी है. इसीलिए 72 साल की महिला भी बिहार के सबसे सुरक्षित हॉस्पिटल से भगा दी जाती है. या फिर हो सकता है भागि या भगायी नही गयी हो. क्या पता उसे ओलिंपिक रेस के लिए तैयारी करनी थी पर इस साल तो वो भी रद्द हो चुका है.

ओह्ह… हां याद आया. बात यहाँ ओलिंपिक का नहीं बात यहाँ वोट बैंक का है. उसे तो भागना ही था. अगर उसके दोनों घुटने नहीं भी होते तब भी उसे भागना ही होता. इस साल चुनाव जो है बिहार में. इसीलिए लोग चाहे कोरोना से मरे या जिए. सुशासन बाबू का वोट बैंक बना रहना चाहिए.

अब ऐसी बातों के लिए मैं सरकार को दोषी नहीं मानता. क्यूंकि मुझे लगता है बिहार के लोगों को ऐसी ही सरकार चाहिए होती हैं.

साल 2015 के चुनाव को याद कर ले.

अच्छे खासे पढ़े लिखे तबके ने जाति के नाम पर वोट दिया था. (धर्म वालों की गिनती मैने करना बंद कर दिया क्यूंकि उनका तो धर्म ही खतरे में रहता है हमेशा. इसलिए वो हमेशा उन्हें ही वोट देते हैं जो उनका विकास नहीं बल्कि उनको बहकाने में सबसे आगे रहते हैं)

बुरा तो तब लगा था जब पढ़े लिखे तबके ने लालू जैसे घोटालेबाज़ जातिवादी नेता को फिर से वोट दे कर अपने आप को ऐसे दिखाने की कोशिश कर रहा था जैसे कोई बहुत बड़ा कारनामा कर दिया हो.

नीतीश कुमार ऊफ्फ सुशासन बाबू. मिस-मैनेजमेंट के गुरु है. हर साल AES से मुजफ्फरपुर में बच्चे मरते हैं पर क्या मजाल जो एक ढंग का हॉस्पिटल बनवा दिया हो. पर जरूरत किसे है. वोट तो जनता जाति देख कर ही करेगी न.

सो मरने दो. ये मरने के लिए ही पैदा होते है. अपनी कुर्सी बस बची रहनी चाहिए चाहे जैसे भी. फिर अंत में वही जाति (Caste) और सेकुलरिज्म का शिगूफा (दोनों एक दूसरे के विपरीत है तथ्य के हिसाब से) छोड़कर इलेक्शन जीत लिया जाता है.

अगर आपको अभी तक पढ़ कर ये लग रहा है की मै भाजपा आईटी सेल से जुड़ा हुआ हूँ तो, अफ़सोस… बिहार बीजेपी भी निकम्मे लोगो से भरी पड़ी हैं. चाहे सुशिल मोदी हो या मंगल पांडेय (स्वास्थ्य मंत्री), सब निकम्मेपन के शिखर पर विराजमान है. और जो काबिल हैं उन्हें नितीश जी आगे ही नहीं आने देते हैं. अरे फिर नीतीश जी अच्छे कैसे दिखेंगे.

वैसे आप सोच रहे है इस महामारी की घड़ी के मै राजनीती की बात क्यों कर रहा हूँ तो आप पूछिए अपने आप से, क्या बिहार में राजनीती ही सबसे बड़ी महामारी नहीं है?