देशद्रोहियों को दण्डित करने के लिए अध्यादेश लाये मोदी सरकार

वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर का हाल ही में एक वीडियो वायरल हुआ है, जिसमें वह हुर्रियत के अलगाववादियों के साथ देशद्रोह की बातों में संलिप्त दिखाए गए हैं. मणिशंकर अय्यर और सलमान खुर्शीद पहले भी सन २०१५ में पाकिस्तान के एक टी वी चैनल को इंटरव्यू देते वक्त पाकिस्तान सरकार से यह गुजारिश करते हुए रंगे हाथों पकडे जा चुके हैं कि पाकिस्तान मोदी सरकार को हटाने में उनकी मदद करे. कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं का देशद्रोह की घटनाओं और बयानों से चोली दामन का साथ रहा है. जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में जब देशद्रोही नारे लगाए गए थे, तब भी नारे लगाने वालों का सबसे पहले समर्थन करने के लिए राहुल गाँधी और केजरीवाल ही वहां पहुंचे थे. केजरीवाल क्योंकि खुद ही कांग्रेस पार्टी के दिखाए गए रास्ते पर चल रहे हैं, इसलिए वह कांग्रेस पार्टी की सोच से हटकर कुछ नया कर पाने में आज तक असमर्थ रहे हैं.

कांग्रेस पार्टी और उसके साथ नकली “सेक्युलरिज्म” का झुनझुना बजाने वालों ने क्योंकि इस देश में लगभग ६० सालों तक एकछत्र राज किया है, उनकी इस सोच को पिछले ६-७ दशकों में आधिकारिक मान्यता मिल चुकी है, जिसमे देश के खिलाफ कुछ भी बोलने या करने को “अभिव्यक्ति की आज़ादी” का नाम दिया जाता है और जो देशभक्त ताकतें देशद्रोह की इन घटनाओं और बयानों के खिलाफ अपनी आवाज़ उठती हैं, उन्हें संघ या भाजपा का समर्थक बताकर, मामले की गंभीरता को कम करने का प्रयास किया जाता है.

जाहिर सी बात यह है कि देश में देशद्रोहियों को दण्डित करने के लिए अगर कोई कानून नहीं बन सका है, तो उसका मुख्य कारण भी यही है कि जो लोग खुद इन देशद्रोह के दुष्कर्मों में शामिल थे, परोक्ष या अपरोक्ष रूप से देश में उन्ही की विचारधारा वाली पार्टी सत्ता में थी. कोई भी पार्टी ऐसा कोई कानून तो बनाने से रही, जिसके चलते खुद उसी पार्टी के नेता दण्डित कर दिए जाएँ. वाजपेयी सरकार के जमाने में “पोटा” नाम का कानून लाया भी गया था, जिससे आतंकवादियों और देशद्रोहियों पर लगाम लगाई जा सकती थी, लेकिन देश का दुर्भाग्य कि वाजपेयी सरकार दुबारा सत्ता में नहीं आयी और कांग्रेस सरकार ने सत्ता में वापसी करते ही जो पहला काम किया था, वह था कि “पोटा” कानून को समाप्त करने का. लिहाज़ा इस बात में कांग्रेस पार्टी ने देश को कभी भी संशय में नहीं रखा कि उसका हाथ सदैव ही देशद्रोहियों ,आतंकवादियों और अलगाववादियों के साथ है, सवा सौ करोड़ देशवासियों के साथ नहीं.

२०१४ के लोकसभा चुनावों में देशवासियों ने कांग्रेस पार्टी और इसके सहयोगियों की इन देशद्रोह समर्थित हरकतों का गंभीरता से संज्ञान लेते हुए, कांग्रेस और इसके सहयोगियों को धूल चटाते हुए पूर्ण बहुमत से मोदी सरकार बनबाई. सरकार को भारी बहुमत से लोगों ने इसीलिए जिताया था कि जो लोग पिछले ६० सालों से देशद्रोहियों और आतंकवादियों के समर्थन में डटकर खड़े हुए थे, मोदी सरकार उन्हें सजा दिलाकर उन्हें उनके अंजाम तक पहुंचाएगी.

मोदी सरकार को बने हुए ३ साल हो चुके हैं, लेकिन जनाकांक्षाओं के विपरीत अभी तक ऐसा कोई कदम मोदी सरकार ने नहीं उठाया है, जिसे देखकर जनता को यह लगे कि मोदी सरकार इन देशद्रोहियों को दण्डित करने के लिए लेशमात्र भी गंभीर है. कुछ लोग यह बहाना बनाकर भी भाजपा की इस अकर्मण्यता का बचाव करते हैं कि क्योंकि अभी राजयसभा में भाजपा को बहुमत नहीं है, इसलिए इस तरह का कोई कानून लाना फिलहाल संभव नहीं है. लेकिन इन बातों में कोई दम इसलिए नहीं है कि अगर सरकार की इच्छा शक्ति हो तो वह राजयसभा में बहुमत न होते हुए भी अध्यादेश ला सकती है जिसे संसद के अगले सत्र में पास करना होता है और उस अध्यादेश की अवधि को बढ़ाया भी जा सकता है. लगभग सभी सरकारें तरह तरह के कानूनों को अध्यादेश के जरिये लाकर उन पर अम्ल कर चुकी हैं. खुद वर्तमान सरकार भी कई अध्यादेश ला चुकी है. भूमि अधिग्रहण अध्यादेश भी मोदी सरकार न सिर्फ लाई, बल्कि उसकी अवधि को कई बार बढ़ाया भी गया था. फिर देशद्रोहियों को दण्डित करने के लिए राजयसभा में बहुमत न होने का बहाना इस देश की जनता के गले आसानी से उतर जाएगा, इसमें संदेह है.

चर्चा को लम्बा न खींचते हुए सीधे इस बात पर आते हैं कि देशद्रोहियों को दण्डित कर सकने वाले इस प्रस्तावित अध्यादेश का मसौदा क्या होना चाहिए. देशद्रोहियों को आम अपराधी नहीं समझना चाहिए और इनके लिए बिना किसी अदालती हस्तक्षेप के मृत्युदंड देने की व्यवस्था होनी चाहिए. इस मृत्यु दंड की सजा को माफ़ करने का अधिकार राष्ट्रपति के पास भी नहीं होना चाहिए. इस तरह के कानून का जो हल्का सा भी विरोध करता दिखाई दे, उसे भी इसी कानून के अंतर्गत मृत्युदंड की सजा देनी चाहिए. जैसे ही यह मामला सामने आये कि कोई भी व्यक्ति देशद्रोह की किसी घटना में संलिप्त पाया गया है, उसे हिरासत में ले लेना चाहिए और उसे अधिकतम एक सप्ताह के अंदर मौत के हवाले कर देना चाहिए.

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