Sunday, July 21, 2024
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अपराधियों की स्वीकार्यता वाला समाज नहीं चाहिए तो……

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एक गैंगस्टर मारा गया। उसने न जाने कितने परिवारों को नष्ट किया था, न जाने कितने लोगों की संपत्ति पर कब्ज़ा किया था, न जाने कितनी हत्याएँ की थीं। उसके गाँव ने मुक्ति की साँस ली। एक दिन उसकी भागती हुयी पत्नी जो उसके हरअपराध की सहभागी थी, का एक चित्र सामने आ गया जिसमें उसका एक लड़का भी था। शायद उन्होंने पुलिस से डरकर हाथ ऊपर कर रखे थे। छद्म मानवतावादियों को मौका मिल गया और एक कुख्यात अपराधी की अपराध गाथा की जगह, पुलिस की क्रूरता और बीवी बच्चे ने क्या बिगाड़ा है, की बहस ने ले ली।

दिल्ली में एक समुदाय ने सुनियोजित रूप से पूरे शहर को आग लगा दी, भयंकर दंगे हुए। न जाने कितने निर्दोषों की जान गयी। करोड़ों की संपत्ति जल कर खाक हुयी। दिन रात एक करके एजेंसियां दंगों के मास्टर माईंड तक पहुँच सकीं। अचानक एक दिन फिर कुछ छद्म मानवतावादी, मास्टर माईंड के बीवी बच्चों का दुखड़ा लेकर प्रकट हो गए और उनके दर्द का बयां करने लगे।

बम धमाके और लोन वोल्फ़ अटैक की तैयारी करने में लगे एक आतंकवादी के चार बच्चे और गर्भवती पत्नी होने के कारण उसे प्रति नरमी बरतने की दुहाई दी जा रही है।  

एक अस्वाभाविक मृत्यु जिसमें, अभी आत्महत्या या हत्या के रहस्य की जांच देश की तीन प्रमुख केन्द्रीय एजेंसियां कर रही हैं, एक बड़ा टी.वी. चैनल उसकी प्रमुख अभियुक्त को बुलाकर, उसके साथ कॉफ़ी टेबल जैसा संवाद कर उसके प्रति सहानुभूति उत्पन्न करने का प्रयास कर रहा है।

धरने में हंगामा करने और अराजकता फ़ैलाने वाली महिला जब जेल गयी तो लोग उसकी गर्भावस्था के कारण उसे निर्दोष करार कर दिए जाने की वकालत करने लगे।

हिंसात्मक प्रदर्शन करते हुए करोड़ों रुपये की निजी और सार्वजानिक संपत्ति को जलाकर रख करने वालों से जब उसकी भरपाई की बात की गयी, तो बड़े बड़े लोग मैदान में आ गए, ऐसा तो कोई कानून नहीं है।

आतंकवादी तो हमेशा से ही गरीब हेड मास्टर के बच्चे, प्रोफेसर, सिविल सर्विस एसपाईरेंट या सुरक्षा बलों से प्रताड़ित दबे, कुचले शांतिप्रिय वगैरह वगैरह होते रहे हैं।

ये किस समाज में जी रहे हैं हम? ये कौन लोग हैं जो येन केन प्रकारेण अपराधियों, दंगाइयों, भ्रष्टाचारियों, अराजकता फ़ैलाने वालों और आतंकवादियों के समर्थन आकर खड़े हो जाते हैं? ये कौन सी शिक्षा है जिसमें मानव अधिकारों की वकालत  उनके लिए की जाती है जो हर दिन स्वयं मानव और मानवता का खून बहाते हैं।

बेतुके तर्क और कुतर्क दिए जाते हैं जैसे, किसी के बीवी बच्चों का क्या दोष? क्यों क्या बीवी बच्चे उस समय दृष्टि बाधित हो गए थे जब घर में हथियार इकट्ठे हो रहे थे और बम बन रहे थे? उन्होंने पुलिस को सूचना क्यों नहीं दी? छत से पत्थर और बम फेंकने की तस्वीरें देखिये भरपूर संख्या में बीवियां मौजूद हैं। उस समय उन्हें नहीं पता था कि पत्थर और बम किसी दूसरी माँ के बच्चे की जान ले रहे हैं अब अपने बच्चों के लिए डर लग रहा है? कुछ लोग इन बीवियों की वकालत में खड़े हैं.

अपराध को सहमति देना, बढ़ावा देना, सहभागी होना, अपराध या अपराधी को छुपाना, अपराध के सबूत मिटाना ये सभी कृत्य अपराध की श्रेणी में आते हैं और सभी के लिए दंड की व्यवस्था है,

फिर अपराधियों के लिए मानवाधिकार की बात करके उनके अपराध को हल्का करने का प्रयास करना अपराध क्यों नहीं है? या अपराधियों को महिमा मंडित करना ,उनका गुणगान करना अपराध क्यों नहीं है? अपराधियों के प्रति सहानुभूति का वातावरण बनाने का प्रयास करना अपराध क्यों नहीं है?

अपराधियों के परिवार वालों को मासूम बताते हुए उनको मीडिया में इतना स्थान क्यों दिया जाता है? क्यों पूरे पूरे कैम्पेन चलाकर अपराधियों के मानवाधिकार सुरक्षित करने का भरपूर प्रयास होता है?

क्या मानवाधिकार की बड़ी संस्थाओं और मीडिया में बैठे लोग इन अपराधियों के साथ बेहतर जुड़ाव अनुभव करते हैं? या सिर्फ पैसों का लालच इनसे ऐसा करवाता है? या अपराधियों के साथ खड़ा होना भी एक तरह का स्टेटस सिम्बल और अपने आपको कूल साबित करने का मानक है?

या हम अपराधियों की स्वीकार्यता वाले समाज की तरह बढ़ चुके हैं?

या ऐसा इसलिए, क्योंकि हमारे यहाँ नैतिक शिक्षा विषय तो है लेकिन उसकी कभी परीक्षा नहीं होती इसलिए हम कभी समझ ही नहीं पाते कि सही क्या है और गलत क्या है?

हम ये तो स्मरण रखते हैं कि, पाप से घृणा करो पापी से नहीं लेकिन ये विस्मृत कर देते हैं, पापी को दंड मिलना सुनिश्चित करो जिससे कोई अन्य वह पाप करने का साहस न कर सके।

समाज का तथाकथित उदारवादी वामपंथी और छद्म मानवतावादी वर्ग जितनी बेशर्मी से सभी प्रकार के अपराधों और अपराधियों के समर्थन में खड़ा होता है ये स्थिति अगली पीढ़ी के लिए घातक है।

अपराधियों की स्वीकार्यता वाला समाज नहीं चाहिए तो जन जन को यथा शक्ति सहभाग करना होगा.

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