Sunday, April 14, 2024
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बिहार की राजनीती और कोरोना वायरस से जंग

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एक 72 साल की महिला बिहार के सबसे अच्छे हॉस्पिटल PMCH Patna से भाग जाती है (या भगा दी जाती है). जो सिवान से आयी हुयी कोरोना वायरस की संभावित रोगी है. पर क्या मजाल जो हम सरकार से कुछ सवाल पूछ पाए! ऊपर से ये धर्म-निरपेक्ष सरकार जो है.

आखिर उसे अपने वोट बैंक की चिंता तो करनी है. इसीलिए 72 साल की महिला भी बिहार के सबसे सुरक्षित हॉस्पिटल से भगा दी जाती है. या फिर हो सकता है भागि या भगायी नही गयी हो. क्या पता उसे ओलिंपिक रेस के लिए तैयारी करनी थी पर इस साल तो वो भी रद्द हो चुका है.

ओह्ह… हां याद आया. बात यहाँ ओलिंपिक का नहीं बात यहाँ वोट बैंक का है. उसे तो भागना ही था. अगर उसके दोनों घुटने नहीं भी होते तब भी उसे भागना ही होता. इस साल चुनाव जो है बिहार में. इसीलिए लोग चाहे कोरोना से मरे या जिए. सुशासन बाबू का वोट बैंक बना रहना चाहिए.

अब ऐसी बातों के लिए मैं सरकार को दोषी नहीं मानता. क्यूंकि मुझे लगता है बिहार के लोगों को ऐसी ही सरकार चाहिए होती हैं.

साल 2015 के चुनाव को याद कर ले.

अच्छे खासे पढ़े लिखे तबके ने जाति के नाम पर वोट दिया था. (धर्म वालों की गिनती मैने करना बंद कर दिया क्यूंकि उनका तो धर्म ही खतरे में रहता है हमेशा. इसलिए वो हमेशा उन्हें ही वोट देते हैं जो उनका विकास नहीं बल्कि उनको बहकाने में सबसे आगे रहते हैं)

बुरा तो तब लगा था जब पढ़े लिखे तबके ने लालू जैसे घोटालेबाज़ जातिवादी नेता को फिर से वोट दे कर अपने आप को ऐसे दिखाने की कोशिश कर रहा था जैसे कोई बहुत बड़ा कारनामा कर दिया हो.

नीतीश कुमार ऊफ्फ सुशासन बाबू. मिस-मैनेजमेंट के गुरु है. हर साल AES से मुजफ्फरपुर में बच्चे मरते हैं पर क्या मजाल जो एक ढंग का हॉस्पिटल बनवा दिया हो. पर जरूरत किसे है. वोट तो जनता जाति देख कर ही करेगी न.

सो मरने दो. ये मरने के लिए ही पैदा होते है. अपनी कुर्सी बस बची रहनी चाहिए चाहे जैसे भी. फिर अंत में वही जाति (Caste) और सेकुलरिज्म का शिगूफा (दोनों एक दूसरे के विपरीत है तथ्य के हिसाब से) छोड़कर इलेक्शन जीत लिया जाता है.

अगर आपको अभी तक पढ़ कर ये लग रहा है की मै भाजपा आईटी सेल से जुड़ा हुआ हूँ तो, अफ़सोस… बिहार बीजेपी भी निकम्मे लोगो से भरी पड़ी हैं. चाहे सुशिल मोदी हो या मंगल पांडेय (स्वास्थ्य मंत्री), सब निकम्मेपन के शिखर पर विराजमान है. और जो काबिल हैं उन्हें नितीश जी आगे ही नहीं आने देते हैं. अरे फिर नीतीश जी अच्छे कैसे दिखेंगे.

वैसे आप सोच रहे है इस महामारी की घड़ी के मै राजनीती की बात क्यों कर रहा हूँ तो आप पूछिए अपने आप से, क्या बिहार में राजनीती ही सबसे बड़ी महामारी नहीं है?

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