जिस तरह आतंकवादी का धर्म नहीं होता उसी तरह दलित को मारने वाले की जाति नहीं होती है

कुछ महीने पहले स्क्रोल.कॅाम पर एक लेख पढ़ रहा था। नंदिता दास द्वारा ट्विटर पर शेयर किया गया था जिसमें तमिलनाडु में कत्ल हुए नव विवाहित जोड़े की हत्या का जिक्र था। इस कत्ल का कारण लड़के का दलित होना और लड़की का ऊँची जाति का होना बताया गया था।

भारत में हर साल प्रेम विवाह के कारण कई नव विवाहित जोड़ो को हॅानर किलिंग के नाम पर मार दिया जाता है। हरियाणा में हुए हॅानर किलिंग के मामले में प्रायः नव विवाहित जोड़ा एक ही गोत्र का होता है उसके बावजूद वहाँ प्रेमी जोड़ो की हत्याएँ हो रही हैं। हर विवाहित जोड़े की हत्या के बाद जातियों का नाम कहाँ से आ जाता है? दलित लड़के की सवर्ण जाति के लड़की के साथ विवाह होने वाला कत्ल जहाँ चर्चा का विषय बन जाता है वहीं दूसरी तरफ पंडित और ठाकुर जाति के जोड़ो की हत्या खबर तक भी नहीं पहुंच पाती है।

भारत की वर्ण व्यवस्था का काला सच हम सब से छिपा हुआ नहीं है और शायद इसलिए ही पूर्वजों के द्वारा किया गया अत्याचार अब समाज पर जातिय आरक्षण के नामपर लगा दिया गया है, जहाँ आरक्षण प्राप्त जातियों को पढ़ाई और सरकारी नौकरियों में कई तरह की छूट दी गई है। प्रेम विवाह में क्या कत्ल इसलिए हुआ? क्योंकि लड़का दलित था या फिर यह गैर जाति का था? आप पूछ सकते हैं दोनों ही शक्ल में नवविवाहितो को मार दिया जाता है, तो फिर इसमें अंतर किस बात का करना?

स्क्रोल.कॅाम वाले लेख पर मैंने जब गूगल पर लड़की के परिवार की जाति का नाम डाला तो गूगल ने बताया की थेवर जाति तमिलनाडु में अतिपिछड़ा वर्ग में आती है। तो फिर इस खबर को लड़के का दलित होना और लड़की का ऊँची जाति को होना बताकर क्यों हम सब के सामने रख गया? प्रथमदृष्ट्या तो यह मामला हॅानर किलिंग का लगता है। जहाँ हत्या इसलिए हुई क्योंकि लड़का या लड़की दूसरी जाति के थे ना कि उनमे से एक दलित जाति का था।

जो लोग एक तरफ आतंकवादी हमले के बाद यह कहते फिरते हैं कि आतंकवादी का कोई मजहब नहीं होता है वहीं लोग प्रेम विवाह हत्या मामले के बाद हत्यारों की जाति जोर-जोर से चिल्लाकर बताते हैं। जब मुस्लिम आतंकवादी के कारण पूरे मुस्लिम समाज को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है तो फिर क्यों किसी ऊँची जाति परिवार के पागलपन कृत्य के कारण सभी सर्वण जातियों पर उंगली उठाकर यह बताया जाता है कि वो दलितों का शोषण कर रहें हैं।

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