Friday, May 7, 2021

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पत्रकार मनदीप पूनिया के प्रति मेरी घोर संवेदनाएं है!

मनदीप पूनिया एक पात्र है और ऐसे हजारों छात्र देश के हर विश्वविद्यालय में ट्रैप में फंसते हैं। व्यवस्था विरोध में फेक न्यूज की फैक्ट्री ही नहीं नक्सली भी बनते हैं। वो वैचारिक जोम्बी बनकर अपने आला का हुक्म बजाते हैं। फिर जोम्बिज का श्रृंखला बनता ही रहता है।

Will our academia be ever free of hypocrite liberals?

The seats of intellectual openness have become stifled where dissent is shouted down as saffronization and fascism by the left liberals.

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