एक पत्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम

आदरणीय प्रधान मंत्री जी,

आप हमारे देश के प्रधानमंत्री है, और देश की सेवा में लगे हुए हैं। आप बहुत मेहनत कर रहे हैं, और अपनी तरफ से देश को आगे ले जाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। लेकिन अभी कुछ समय पहले बीजेपी तीन राज्यों में सरकार नहीं बना सकी और उसको हार का सामना करना पड़ा. बहुत से लोग तरह-तरह से विष्लेषण कर रहे थे. पता नहीं क्या सही होगा क्या गलत, लेकिन, एक बात की तरफ अगर आप ध्यान दे सके तो बहुत अच्छा होगा. मुझे पता हैं, आप का समय बहुत कीमती हैं, इसलिए मै अपनी बात को थोड़े में कहने का प्रयास करूंगी।

बात अभी की नहीं हैं, हम भारतवंशियों की बात हज़ारों साल पहले से शुरू होती है। बहुत से आक्रांता हमारी भूमि पर आये, और हमको अपमानित और पद दलित किए हमारे उस समय के जो शासक थे, उनमें के कुछ ने विरोध का झंडा बुलंद किया, कुछ आक्रांताओं की गोद में ही जा कर बैठ गए, और सत्ता मोह में इतने चूर हो गए, कि अपनी बेटियां तक उन आक्रांताओं से व्याह दी। देश का, खुद का मान ,अपमान, बेटी बहु… सत्ता बनाये रखने के लिए, सब कुर्बान कर दिए। आतताइयों के साथ मिल गए, लेकिन सत्ता सुख का त्याग नहीं किया। परन्तु सभी ऐसे नहीं थे. कुछ ने अपने देश, और उसके मान सम्मान के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। दर दर की ठोकरें खाना मंज़ूर था, लेकिन अपमानित हो कर जीने से मर जाना अच्छा था।

लेकिन, प्रधान मंत्री महोदय, ऐसे में सामान्य जन ने क्या किया? सामान्य जन को सत्ता पक्ष अपने साथ जोड़ नहीं पाया। किसी न किसी वजह से यह लड़ाई सत्ता पक्षों के बीच ही होती रही, हज़ारों साल पहले भी यह लड़ाई हम सब की लड़ाई नहीं बनी। ऐसे में सामान्य जन, भक्ति रस और सूफी रस में थोड़ा सुकून तलाशने लगा, और उसने खुद को मै, मेरा बेटा, मेरी बेटी, मेरी माँ, मेरा पिता, मेरी बहन, मेरा भाई, और उसके बाद समय बचा तो मेरा गॉव तक सिमटा लिया। उसके पास ज्यादे कुछ बचा नहीं। महोदय अब हमको सब कुछ इसी चश्मे से देखने की आदत हो गयी हैं। हज़ार साल से , कोई हमारे लिए कुछ सोचने आया ही नहीं। जो आये भी वह व्यक्तिगत रूप से महान बन कर चले गए। हमको अपने साथ जोड़ा नहीं। सत्ता की लड़ाई मध्ययुगीन भारत में जान आंदोलन का रूप धारण नहीं कर सकी।

हज़ारो सालों बाद आप ने हमको किसी लायक समझा, और कहा, “अगर आप गैस सिलिंडर से सब्सिडी छोड़ सकते हैं, तो छोड़ दे. आप जानते हैं फिर कितने लोग “गिव इट अप’ से जुड़े। नहीं तो एक राजनितिक दल, कभी आधी रोटी खाएंगे, कभी पूरी रोटी खाएंगे का झुनझुना ही बजाता रहा। कभी गरीबी हटाने का वादा किया, कभी मकान देने का. हमको भिखमंगा, और खुद को खुदा समझ लिया. आप से पहले शिवा जी, गुरु गोविन्द सिंह जी, गाँधी जी ने भी हमसे बहुत कुछ माँगा था, हमने निराश नहीं किया. सुभाष चंद्र बोस जी ने भी माँगा था, उनको भी हमने निराश नहीं किया. जय प्रकाश नारायण जी ने माँगा था हमने निराश नहीं किया. लेकिन ऐसे लोग अपवाद स्वरुप हैं, नियम नहीं हैं, हमारे लिए. इसलिए ऐसे लोग कभी भी हमारे जिंदगी का हिस्सा नहीं बने। हमारे लिए फिर वही बचा, अपना परिवार। फिर हम उसी में सिमट गए।

और हज़ार साल बाद जब अपनी सरकार बनी, तो भी हमको आज़ादी का एहसास नहीं हुआ। बहुत जल्दी ही दलाली, घूसखोरी, भाई भतीजावाद और भ्रस्टाचार का बोलबाला हो गया। नोबेल पुरस्कार पाने वाले डॉ हरगोविंद खुराना हमारे देश में नौकरी करने लायक नहीं समझे गए। और इस पर कोई हल्ला नहीं मचा। भाखरा नांगल बांध बना तो कितने लोगों ने उसी में से सीमेंट ,सरिया और ईटें ले कर अपने घर बनवा लिए। घर में फ़ोन लगवाने के लिए कई कई साल इंतज़ार करना पड़ा। और हम अपने ही देश में इतने निरीह, दबे कुचले थे, कि इतने साल बाद फ़ोन लगने पर मिठाई बांटते थे, हमको गुस्सा नहीं आता था। बस इस देश के निवासी होने के नाते हमारा इतना की कर्तव्य था कि किसी तरह बेटे की नौकरी लग जाये, बेटी की शादी हो जाये, और रहने के लिए एक घर हो जाये. यही एक सफल मनुष्य की निशानी हज़ार साल पहले, थी, आज भी है और शायद आगे भी रहेगी।

हम और हमारा परिवार में सिमट जाना, हमसे दूर दृष्टि छीन लेता हैं। हम, हज़ार सालों से किसी तरह जी रहे हैं और हज़ार सालों से हमारा यही प्रयास रहा है क़ि किसी तरह अपने परिवार की रक्षा कर लें, और इसी चक्कर में कई बार तो हम अपने बच्चों के बच्चों से आगे नहीं देख पाते। एक राजनितिक दल हमारी इस कमजोरी को बखूबी जनता हैं, तभी वह हमारे सामने कभी क़र्ज़ माफ़ी का झुनझुना बजाता है, कभी मकान देने का, कभी नौकरी देने का। यह चीज़ हमको तुरंत समझ में आती हैं। दूरगामी नीतियां हमको थोड़ा कम समझ में आती हैं। नरेंद्र मोदी जी, पेट्रोल के दाम बढ़ना, सब्ज़ी, दाल के दाम ज़रा सा भी बढ़ जाना, चीनी थोड़ी भी महंगी हो जाना हमको बहुत कचोटता हैं। आर्थिक रूप से शायद नहीं, लेकिन मानसिक रूप से बहुत कष्ट देता हैं। हमको तुरंत लगता हैं कि हम और हमारा परिवार खतरे में हैं. हज़ार साल से सिर्फ और सिर्फ हम यही बचा पाए हैं। घूस दे कर, चाटुकारिता करके, अपमान सह कर, दलाल को खुश कर के भी हम इसको बचते हैं। कही से दो कम्बल मिल जाएँ, क़र्ज़ माफ़ हो जाये, बिजली का बिल काम देना पड़े, चुनाव से पहले जिससे खुश छोटा मोटा मिल जाये, हम उसी के साथ हो लेते हैं। बाकी मान, सम्मान, मर्यादा, भाषा, संस्कृति जो कि एक मनुष्य को मनुष्य बनती हैं, हमसे छीन लिया गया हैं और हर दिन छीना जा रहा हैं। लेकिन इसका हमको एहसास भी नहीं होता।

आपकी और हमारी लड़ाई बहुत लम्बी है, अभी तो हमको यह भी समझ में नहीं आता। एक सामान्य भारतीय अपने परिवार पर खतरा देख कर उस कालिदास की तरह व्यवहार करता है, जो जिस डाल पर बैठे थे, उसी को काट रहे थे। इसलिए आदरणीय प्रधान मंत्री जी, आप और आप की पार्टी जब भी चुनाव लड़े और अपना मैनिफेस्टो जारी करे तो हम सामान्य जन की इस बात को ध्यान में रखियेगा.

आप की शुभचिंतक
एक भारतीय

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