अगस्त हो या सितम्बर, बच्चे तो मरते ही हैं

गोरखपुर की त्रासदी को अभी बहुत ज्यादा दिन नहीं बीते हैं, घाव अभी भी हरा है, सांस अभी भी फूली है, दर्द अभी भी बेशुमार है; और साथ ही साथ यह भी याद है कि कैसे उपचार में हुई लापरवाही और कमिशनखोरी पर लगाम कसने में नाकाम सरकार की वजह से सैकड़ों बच्चे मार दिए गये|

जी हाँ, वो बच्चे मरे नहीं, मारे गए… लेकिन योगी जी के मंत्री जी बोलते हैं कि अगस्त में बच्चे तो मरते ही हैं| खुद योगी जी कहते हैं कि अब बच्चे भी क्या सरकार पाले?

योगी जी आप बच्चे नहीं पाल सकते, बचा तो सकते है? कानून आपका, सरकार आपकी, विभाग आपका, मंत्री आपके, डॉक्टर आपके और मरीज़…बस मरीज़ आपके नहीं है…मरते हुए…सांसों में अकड़न और दर्द लिए तड़पते हुए बच्चे आपके नहीं है| होंगे भी कैसे? आपने तो पहले ही घोषणा कर दी कि बच्चे भला हम क्यों पाले!

मुझे कोई सवाल-जवाब नहीं करना है, योगी जी…मैं यूपी का निवासी हूँ…कलम का सिपाही हूँ तो लिखूंगा और हक़ से लिखूंगा| तब तक लिखूंगा, जब तक आप यह न समझ जाय कि बच्चे भले नहीं आप पाल सकते लेकिन इन कमिशनखोरों को पाल रखा है…उनपर कानून का डंडा चलाना सरकार का काम है, पुलिस का काम है|

रोटी-कपड़ा-मकान तो दूर की बात है, आपकी सरकार कृपया यह स्पष्ट कर दे कि जीने का हक़ भी है कि नहीं? या फिर जीने के लिए, उपचार के लिए भी अगस्त बीतने का इंतजार किया जाय| या फिर आप घोषणा कर दो कि अगस्त में पैदा हुए बच्चे देशद्रोही है…मर जाए तो ठीक है वर्ना आपकी पुलिस है न…वो किस दिन काम आयेगी?

तो सुनिए योगी जी| आपकी घोषणाओं की तरह आपके मंत्री जी भी गच्चा खा गए| यहाँ बच्चे सितम्बर में भी मर रहे हैं| आपके सरकारी अस्पताल लाश का गटर बन चूके हैं और आपके सरकारी डॉक्टर कमिशनखोर| आपकी पुलिस संज्ञासुन्न हो चुकी है और आपकी अगस्त क्रांति ज़ारी है| सितम्बर, शायद अक्टूबर तक…शायद गांधी जयंती तक या लाशों का अंबार लगने तक आपकी अगस्त क्रांति जारी रहेगी|

आपके मंत्री जांच करने जाते हैं तो पकवान देखकर यह भूल जाते हैं कि वो आये किस लिए थे| ‘जांच’ और ‘कार्यवाही की जाएगी’ वो दो जुमले है जो शायद आपकी सरकार की अगस्त क्रांति के लिए रामबाण हैं| आप तो अगस्त क्रांति सफ़ल बनाइये, हमारा क्या है? हम तो लिखते थे और लिखते रहेंगे|

अबकी आपकी क्रांति में उज्जवल ध्वज़ फहराने वाला विभाग है आज़मगढ़ का सरकारी महिला चिकित्सालय| जहाँ एक बच्चे के जान की कीमत है मात्र तीन हज़ार रूपये| मोदी जी से पूछकर ही बता दीजिये कि बच्चा पैदा होने से पहले खुद ही मारने की एक स्कीम लागू कर दी जाए? ख़ासकर उन ग़रीबो के लिए यह स्कीम लागू हो जिनके पास तीन हज़ार रूपये न हो…वो…जो सरकारी अस्पताल में सरकार द्वारा मदद और उपचार की आश में मुंह उठा कर चले आये हो|

भला उन्हें भी पता नहीं क्या लगा है…योगी जी खुदे कह रहे हैं कि बच्चा हम क्यों पाले तो बड़े आये बच्चे का सपना देखने| अरे मर गया तो ठीक वर्ना डॉक्टर किस लिए है? सरकार न सही, सरकारी डॉक्टर खुदे मार डालेंगे| अरे गरीब! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई योगी जी की सरकार में बच्चा पैदा करने की? वो भी अगस्त महीने में|

योगी जी कभी आइये आजमगढ़ के महिला अस्पताल में निरीक्षण करने| अभी कुछ दिन पहले उपमुख्यमंत्री केशव जी आये थे…खूब हांके मीडिया के सामने| लोगों ने जब वसूली की शिकायत की तो ऐसे आँख तरेरे कि मानो उसी दिन कमीशनखोरी का पिंडदान कर देंगे| पर डॉक्टर ने जब आपकी अगस्त क्रांति वाली बात सुनी तो लहलहा गए, मन हरिया गया उनका| उनका तो कहना है कि अगस्त ही क्यों? यह क्रांति तो सितम्बर तक चलेगी| तभी तो तीन हज़ार रूपये के लिए जाने कितने बच्चे मार डाले| परिजनों ने शिकायत की तो चले गए हड़ताल पर| सरकार-वरकार नहीं मानते यहाँ के डॉक्टर लेकिन आपकी बातों पर अमल बहुत जी-जान से कर रहे हैं|

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अमर उजाला, पत्रिका, हिंदुस्तान…कहाँ नहीं छपी कमीशनखोरी वाली ख़बर| बच्चों को मारने वाली ख़बर| बस एक आपकी पुलिस ही है जो शायद अखबार नहीं पढ़ती..अरे हाँ…आजकल तो डिजिटल का ज़माना हैं| अगर एसपी साहब अखबार पढ़ लेंगे तो आईजी साहब बुरा नहीं मान जायेंगे! भला इस ज़माने में अखबार भी कोई पढने वाली चीज़ है?

सूचना देने पर आपकी पुलिस कहती है कि तहरीर मिलने पर कार्यवाही होगी| परिजन जो तहरीर देते है, वो या तो रॉकेट बना कर उड़ा देती है आपकी थाना पुलिस या फिर किलो के भाव से…यही कुछ…दस-बीस रूपये तो मिल ही जाते होंगे? वैसे भी क्या करना है? तहरीर का क्या है…रोज़ आती रहती है? आईजी साहब, आजमगढ़ पुलिस के थानों में तहरीर की हरियाली ही हरियाली है| जब जवाब न हो तो ‘जांच की जा रही है’ वाला स्वर्णिम वाक्य तो है ही? नहीं भी है तो क्या हुआ? जब मंत्री जी खुदे बोले है अगस्त में तो बच्चे मरते ही है…थोड़ा और सरक कर सितम्बर तक पहुँच गया तो क्या हुआ? प्रधानमंत्री मतलब कुच्छु नहीं होता, क्रांति जारी रहनी चाहिए|

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