Tuesday, March 2, 2021
Home Hindi धार्मिक भावनाएं और अभिव्यक्ति की आज़ादी

धार्मिक भावनाएं और अभिव्यक्ति की आज़ादी

Also Read

भारतीय समाज एक भावना प्रधान समाज है जिसमे धर्म एक अहम भूमिका निभाता है। हिन्दू समाज अपने ठाकुर जी की सेवा में जहां अपने आपको भूल जाता है, बिना भोग लगाए अन्न जल नहीं लेता वहीं मुस्लिम रमजान में यही सब करते हैं। एक समाज जिसे अपने बेटे के रोजगार के स्तर से ज्यादा लोग क्या कहेंगे जैसे जुमले ज्यादा प्रभावित करते हैं। एक समाज जिसमें वोट डालने के लिए नेता जमीनी स्तर पर नहीं  लेकिन बाबाजी और मौलानाओं से सेटिंग कर लेने में यकीन रखते हैं। फुरफुरा शरीफ के पीरज़ादा सिद्दीकी के दर पर माथा टेकते ओवैसी इसका सबसे सटीक उदाहरण है। 

दूसरी ओर इसका एक पहलू ये भी है कि गाहेबगाहे कुछ शरारती तत्व जो समाज में विघटन चाहते हैं, इस भावना को छेड़ जाते हैं। पेंटर हुसैन हो या ताजातरीन केस ऑफ़ मुनव्वर फारुकी, ये सेलेक्टिवली सेक्युलर लोग हिन्दू देवी देवताओं का अपमान करने में खुद को कूल डूड समझ पैसा कमाते हैं। लेकिन इस बार जिस प्रकार इस फारुकी को रिएक्शन मिला है, ये बहुत पहले होना जरुरी था। राजू श्रीवास्तव, गोविंदा और जॉनी लीवर जैसे बेहतरीन कॉमेडियन कलाकारों के देश में क्या किसी ऐसे विदूषक की जरुरत है, जिसे हास्य के आवरण में आपकी सभ्यता, आपके देश, आपके ईश्वर के अपमान में ही सबाब मिलता है? ये पूछे जाने की जरुरत है, वरना खुद को विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता मानने वाले इस देश में अब कोई भी हास्य के नाम पर गाली गलौच करके, किसी समाज की भावना भड़काकर समाज में वैमनस्य बढ़ाने का एजेंडा चलाने लगेगा। कोई भी भारत तेरे टुकड़े होंगे के नारे कुछ हजार में लगाने लगेगा। 

अभिव्यक्ति की आज़ादी एक बहुत वृहद विषय है और इसकी कुछ सीमाएं भी हैं। संविधान यदि मुझे कुछ अधिकार देता है तो मुझसे मेरे कर्तव्य निर्वहन पर प्रश्न भी कर सकता है। इस महान देश का नेतृत्व सौभाग्य से ऐसे कर्मयोगी के हाथ में है जो अपने लिए गालियों को भी सहर्ष स्वीकार करता है, लेकिन क्या एक सभ्य समाज इस तथ्य को स्वीकार कर सकता है कि उनके राष्ट्र प्रमुख को चंद टकों में किराये पर उपलब्ध हो सकने वाले कुकुरमुत्ते गालियां दें? अभिव्यक्ति की आज़ादी में नग्न पेंटिंग बनाने वाला एम एफ हुसैन पद्मा पुरस्कार पाता है। यही पेंटर भारत माता की नग्न पेंटिंग बना देश से भाग कतर में स्वैच्छिक निर्वासन में चला जाता है और एक कलाकार त्रिवेदी संसद पर बनाये अपने चित्र के लिए देशद्रोह में गिरफ्तार हो जाते हैं। अब ये सरकारों पर निर्भर करता है कि कौन सच में अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर आपके देवी देवता को गाली दे बच सकता है और कौन कानून के शिकंजे में फस सकता है। 

कला और कॉमेडी के नाम पर जो भद्दा मजाक ये विदूषक आपके साथ करते हैं, इन्हें सही गलत का फर्क बताया जाना चाहिए। एक सन्देश प्रसारित हो कि हम भी अपनी आस्था के साथ मजाक नहीं सहेंगे। मुनव्वर फारुकी जैसों का एजेंडा बड़ा साफ होता है, बहुसंख्यक आबादी को टारगेट करो, देश विरोधी ताकतों के हाथों “अवेलेबल ऑन रेंट” रहो और कन्हैया कुमार टाइप चुनाव लड़ लो। लालू टाइप लोगों का समर्थन राजनीती में और स्वरा भास्कर टाइप बुजुर्ग फेल्ड सो कॉल्ड एक्ट्रेसेस का साथ सिल्वर स्क्रीन पर मिल जायेगा, लगे हाथ हार्दिक पटेल की तरह गांधियो से स्टेट चीफ का तमगा मिल जाये तो करोड़ों अंदर और मजे। लाइफ में और चाहिए ही क्या। 

लगे हाथ हार्दिक पटेल की प्रॉपर्टी की लिस्ट भी गूगल कीजिये, पटेल आंदोलन से पहले और बाद में क्या फर्क आया, अभिव्यक्ति की आज़ादी नाम के टेंट के अंदर चलने वाला गेम समझ आ जायेगा। 

  Support Us  

OpIndia is not rich like the mainstream media. Even a small contribution by you will help us keep running. Consider making a voluntary payment.

Trending now

Latest News

Recently Popular

गुप्त काल को स्वर्ण युग क्यों कहा जाता है

एक सफल शासन की नींव समुद्रगप्त ने अपने शासनकाल में ही रख दी थी इसीलिए गुप्त सम्राटों का शासन अत्यधिक सफल रहा। साम्राज्य की दृढ़ता शांति और नागरिकों की उन्नति इसके प्रमाण थे।

सामाजिक भेदभाव: कारण और निवारण

भारत में व्याप्त सामाजिक असामानता केवल एक वर्ग विशेष के साथ जिसे कि दलित कहा जाता है के साथ ही व्यापक रूप से प्रभावी है परंतु आर्थिक असमानता को केवल दलितों में ही व्याप्त नहीं माना जा सकता।

The story of Lord Jagannath and Krishna’s heart

But do we really know the significance of this temple and the story behind the incomplete idols of Lord Jagannath, Lord Balabhadra and Maa Shubhadra?

Relevance of Netaji for 21st century leaders

t is more important now that we remember and celebrate this man’s achievements since we are in desperate need of great leadership in 21st century in every sector.

वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था के मध्य अंतर और हमारे इतिहास के साथ किया गया खिलवाड़

वास्तव में सनातन में जिस वर्ण व्यवस्था की परिकल्पना की गई उसी वर्ण व्यवस्था को छिन्न भिन्न करके समाज में जाति व्यवस्था को स्थापित कर दिया गया। समस्या यह है कि आज वर्ण और जाति को एक समान माना जाता है जिससे समस्या लगातार बढ़ती जा रही है।