Saturday, April 10, 2021
Home Hindi कोरोना वैक्सीन और सेकुलर मित्र

कोरोना वैक्सीन और सेकुलर मित्र

Also Read

देश के गिने-चुने वैज्ञानिक राजनेताओं में से एक माननीय अखिलेश यादव जी पहले भी राजनीति और विज्ञान के अन्तर्सम्बन्धों की नयी परिभाषाएं गढ़ते रहे हैं। गत वर्ष लोकसभा के चुनाव में अपनी पार्टी की हार पर उन्होंने कहा था कि बहन मायावती के साथ चुनावी गठबन्धन करके लड़ना उनका एक वैज्ञानिक प्रयोग था, और वैज्ञानिक होने के नाते ऐसे इस प्रकार के प्रयोग करना उनका स्वभाव है। तब भी उनके बयान ने वैज्ञानिक राजनीति और राजनीतिक विज्ञान की सीमाओं पर खड़े उनके प्रशंसकों में खलबली मचा दी थी, और आज जब उन्होंने भारत सरकार द्वारा जनसाधारण के लिए कोरोना की वैक्सीन पर यह टिप्पणी की, कि भाजपा-नीत सरकार द्वारा जारी किये जाने के कारण कॅरोना की यह वैक्सीन विश्वसनीय नहीं है, और वह तो यह वैक्सीन कदापि नहीं लगवाएंगे, तो एक बार फिर उनके प्रशंसकों में उत्तेजना फैल गयी है।

उनकी पार्टी के एक नवनिर्वाचित एमएलसी ने तो अपनी पार्टी के समर्थकों के लिए यह कहते हुए वैक्सीन लेने का निषेध ही कर दिया कि इसे लेने से नपुंसकता आ जाएगी, और सरकार वैक्सीन के बहाने जनसंख्या-नियन्त्रण का कानून ला रही है। कुछ ऐसे ही विचार पाकिस्तान के वैज्ञानिक नेताओं और विचारकों जैसे शेख़ रशीद और ज़ैद हामिद बहुत दिनों से व्यक्त कर रहे हैं। कांग्रेस के राशिद अल्वी ने भी पीछे न रहते हुए कॅरोना की वैक्सीन के विपक्ष के लिए हानिकारक सम्भावनाओं से युक्त बता दिया। राज्यसभा में कांग्रेस के उपनेता वैज्ञानिक आनन्द शर्मा ने भी राशिद अल्वी की बात का समर्थन करते हुए सरकार पर आरोप लगाया कि विपक्ष को पुंसत्वविहीन करने के उद्देश्य से ही मोदी-सरकार मानक प्रोटोकॉल की उपेक्षा करके वैक्सीन जल्दबाजी में बाज़ार में उतार रही है, और राहुलजी का तो आधिकारिक बयान यह है ही कि मोदी-सरकार देश के पिछड़ों, दलितों, अल्पसंख्यकों, किसानों, महिलाओं और युवाओं के हिस्से की वैक्सीन छीनकर अपने दो-तीन उद्योगपति मित्रों को लगा देना चाहती है। मामला इतना पेचीदा हो गया कि एक बार फिर मुझे अपने गुरूजी की शरण में जाना पड़ा।

वहाँ एक बार फिर अपने सेकुलर मित्र से सामना हुआ जिनका विज्ञान से तो कोई लेना-देना नहीं था, पर उनका मानना था कि कार्ल मार्क्स को पढ़ लेने के बाद उन्हें विज्ञान पढ़ने की कोई ज़रुरत नहीं थी।

गुरूजी की मुखमुद्रा विवर्ण हो रही थी: ऐसा लगता था जैसे उनके दिमाग का फ़्यूज़ बस उड़ने ही वाला हो; सेकुलर मित्र किसी भी सामान्य व्यक्ति का पाँच मिनटों के अन्दर यह हाल कर देने में सक्षम थे। वह कह रहे थे, “क्या ज़रुरत थी इस वैक्सीन की? क्या हमने सरकार से वैक्सीन की माँग की थी? करोना तो यूँ ही जा रहा था। सरकार यह वैक्सीन मुनाफ़ा कमाने के लिए लायी है, और सारा मुनाफ़ा चुपके से अम्बानी और अडाणी के खातों में डाल दिया जाएगा।”

मैंने और गुरूजी ने एक-दूसरे की ओर देखा, और चुप रहे क्योंकि हम जानते थे कि सेकुलर मित्र को समझाने का एक ही तरीका था जो ‘राग दरबारी’ में श्रीलाल शुक्ल जी ने छोटे पहलवान के लिए बताया था। वह तरीका था उन्हें पटक कर उनकी छाती पर चढ़ बैठना और उसके बाद बात करना।

मित्र कहते रहे: “बताइए, यह कैसे हो सकता है कि एक ही वैक्सीन अगड़े, पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक, महिलाओं, किसानों, मजदूरों और युवाओं- सबके ऊपर एक जैसी प्रभावशाली हो? सरकार को वैक्सीन बाज़ार में उतारने से पहले हर वर्ग पर उसके पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करना चाहिए था।”

सेकुलर मित्र के इस वैज्ञानिक तर्क के समक्ष हम दोनों गुरु-शिष्य ढेर हो गये। मित्र कहते रहे, “और मुसलमानों के इस भय का निवारण होना भी आवश्यक है कि इसमें कोई घुलनशील माइक्रोचिप पड़ी हुई है जो वैक्सीन लेने वालों में नपुंसकता उत्पन्न करने के साथ-साथ उनके मस्तिष्क की इस प्रकार प्रोग्रामिंग करेगी कि वह इस्लाम से दूर होते जाएंगे। जो सरकार अल्पसंख्यकों की चिन्ताओं की उपेक्षा करती है, उसे सत्ता में रहने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसे लोकतन्त्र से तो तानाशाही भली। सरकार को मुसलमानों पर इस वैक्सीन का अलग से परीक्षण करना चाहिए था।”
“पर श्रीमान, जब मुसलमान यह वैक्सीन लगवाएंगे ही नहीं, तो उन पर इसका परीक्षण कैसे होगा?” मैंने पूछा।

सेकुलर मित्र थोड़ा लड़खड़ाए, पर सँभल गये।

“यह जिम्मेदारी सरकार की है। उसे वैक्सीन लाने से पहले अल्पसंख्यकों को विश्वास में लेना चाहिए था। अब कोई मुसलमान तो यह वैक्सीन लेगा नहीं।”

थोड़ी देर रुक कर वह फिर बोले, “मैं भी नहीं लूँगा।”

शायद उन्होंने सोचा हो कि उनके इस व्यक्तव्य के बाद देश में नहीं तो कम से कम शहर में तो शोक व्याप्त हो ही जाएगा, और गुरूजी और मैं उनके चरण पकड़कर रोते हुए उनसे विनती करने लगेंगे कि वह ऐसा क्रान्तिकारी निर्णय न लें, पर हम दोनों उनके इस कथन को भी उसी तटस्थता से झेल गये, जिस प्रकार उनकी अन्य बातों को झेल रहे थे।

अपने श्रोताओं के निर्विकार चेहरे देखकर सेकुलर मित्र ने मानो पटरी बदली। “एक विज्ञान के नाम पर मोदी को देश में मनमानी करने की छूट नहीं दी जाएगी।”

अब यह नयी बात थी; इससे गुरूजी भी चौंक पड़े, और मुँह खोलने पर विवश हो गये। “का बिज्ञानो दू-चाट्ठे होला का?”

“क्यों नहीं?” सेकुलर मित्र दुगुने उत्साह के साथ बोले, “अगर इतिहास का पुनर्लेखन हो सकता है तो विज्ञान का क्यों नहीं? विज्ञान भी तो एक अन्धविश्वास ही है?! पूरा विज्ञान एक ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक अन्धविश्वास की नींव पर खड़ा है। सूर्य जो पितृसत्ता का प्रतिनिधित्व करता है, एक डॉन की तरह पृथ्वी जो एक अबला नारी की प्रतीक है, पर अपने प्रकाश का रौब डालता रहता है, और बेचारी पृथ्वी उसके इर्द-गिर्द चक्कर काटती रहती है। अगर यह मूल आधार ही बदल दिया जाय, तो पूरा विज्ञान उलट जाएगा।”

गुरूजी घबराये। जब वह बोले, तो उत्तेजनावश उनकी आवाज़ एक घरघराहट के साथ बाहर आ रही थी और शब्द एक के ऊपर एक चढ़ कर निकल रहे थे: “ऐसे कैसे बदल देंगे आप आधार? कोई घर की खेती है?” मैंने हैरान होकर गुरूजी की ओर देखा; मुझे लगा कि वह बस अपने आसन से कूदकर सेकुलर मित्र की गर्दन पकड़ने ही वाले हैं। मैंने उन्हें शान्त रहने का संकेत किया, और वह तुरन्त ही संयत हो भी गये। मेरी तरफ़ एक कृतज्ञता-मिश्रित प्रशंसा की दृष्टि डालते हुए गुरूजी फिर सेकुलर मित्र से सम्बोधित हुए: “मतलब साइन्स क पूरा आधारै बदल देबा तू?!”

सेकुलर मित्र झगड़ा टल जाने से थोड़ा निराश तो हुए, पर उन्होंने कोशिश जारी रखी। “इस्लाम नहीं मानता कि पृथ्वी गोल है और सूर्य के चक्कर काटती है। किसी ने क्या कर लिया उनका, और क्या बिगड़ गया उनका ऐसा मानने से? पाकिस्तान में दोनों तरह की साइन्स पढ़ाई जाती है: पृथ्वी के गोल और सूर्य के चारो ओर घूमने वाली भी, और उसके चपटी और स्थिर होने वाली भी, जिसको जो मानना हो, माने। यह होता है असली लोकतन्त्र!”

गुरूजी अब सेकुलर मित्र की बातों का मज़ा लेने लगे थे, और मित्र को इससे कुछ उलझन हो रही थी। गुरूजी ने प्रसन्नतापूर्वक कहा, “मतलब अब भारत में भी दो तरह की साइन्स चलेगी, और मानने या न मानने का फ़ैसला पढ़ने वाले करेंगे! वाह! बहुत खूब!! यानि साइन्स में भी लोकतन्त्र!”
सेकुलर मित्र ने झगड़ा शुरू करने की एक और कोशिश की: “जब दलित साहित्य हो सकता है, तो दलित फिजिक्स और दलित केमिस्ट्री क्यों नहीं? अगड़े गोल और गतिमान पृथ्वी वाली साइन्स पढ़ेंगे, और दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक, महिलाएं और युवा चपटी और स्थिर पृथ्वी वाली साइन्स।”

गुरूजी ठठाकर हँस पड़े, और इस घटना ने सेकुलर मित्र को अति गम्भीर बना दिया। वह चर्चा को वैज्ञानिकता के नये स्तर पर ले गये: “एटम का भी क्या मॉडल बनाया है! बीच में ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक प्रोटॉन और उसके इर्द-गिर्द चक्कर काटता बेचारा सर्वहारा इलेक्ट्रॉन! अब यह नहीं चलेगा।”

“यानि आपकी साइन्स में प्रोटॉन इलेक्ट्रॉन के चक्कर काटेगा?” गुरूजी ने दाँत पीसते हुए पूछा।

“हो भी सकता है।”- सेकुलर मित्र प्रसन्नतापूर्वक बोले: “पर हम तो एटम के इस मॉडल को ही खारिज करते हैं। क्यों एक पार्टिकल मस्ती में बैठा रहेगा, और दूसरा उसके चक्कर काटेगा? सारे पार्टिकल बराबर हैं, और सभी बैठे रहेंगे। हम तो यह भी नहीं कह सकते कि एटम जैसी कोई चीज़ होती ही है। दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक, महिलाओं और युवाओं के लिए हम अलग साइन्स लाएंगे। बुर्जुआ लोग अलग साइन्स पढ़ेंगे, और सर्वहारा वर्ग के लोग अलग।”

गुरूजी अब पूरी तरह चट चुके थे, और सामान्य दिखने के लिए उन्हें अपनी पूरी इच्छाशक्ति लगानी पड़ रही थी। बात को किसी तरह ख़त्म करने की नीयत से उन्होंने कहा, “अच्छा ठीक है, जब आपकी सरकार आयेगी, तो आप यह सब कर दीजिएगा, पर इसका वैक्सीन से क्या लेना-देना है?”

इस बार हँसने की बारी सेकुलर मित्र की थी। हास के बाद प्रकृतिस्थ होकर उन्होंने कहा, “वही तो मैं इतनी देर से समझा रहा हूँ; एक बार जब साइन्स के प्रतिमान बदल जाएंगे, तो वैक्सीन कैसे वही रहेगी? यह वैक्सीन नील्स बोर के एटॉमिक मॉडल और कोपरनिकस के सौर मॉडल को सच मान कर विकसित की गयी है। यह वैक्सीन उन लोगों पर क्यों काम करेगी जो पृथ्वी को चपटी मानते हैं? सरकार को पृथ्वी को चपटी मानकर नये सिरे से वैक्सीन की खोज करनी चाहिए।”

बैठक में सन्नाटा छा गया; सभी लोग बस एक-दूसरे का मुँह देखने लगे।

सेकुलर मित्र थोड़ी देर और अपना प्रवचन देते रहे, पर हमारे मस्तिष्कों पर बैठक का सन्नाटा हावी हो चुका था; हम न कुछ सुन रहे थे, न समझ रहे थे। अपनी बातों का कोई असर न पड़ते देख सेकुलर मित्र हमारी अवैज्ञानिक ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक सोच को कोसने लगे, और इसी क्रम में गुरूजी को उत्तेजित करने का भरसक प्रयास किया, पर इसका भी कोई प्रभाव न पड़ते देख मुट्ठियाँ भींचते और पैर पटकते हुए वह वहाँ से निकल लिये। हम दोनों ने राहत की साँस ली।

मैंने भी गुरूजी से चलने की आज्ञा माँगी। गुरूजी हलके मूड में बोले, “बइठा यार, चाय पी के जा।”

  Support Us  

OpIndia is not rich like the mainstream media. Even a small contribution by you will help us keep running. Consider making a voluntary payment.

Trending now

Latest News

Recently Popular

How West Bengal was destroyed

WB has graduated in political violence, political corruption and goonda-raj for too long. Communist and TMC have successfully destroyed the state in last 45 to 50 years.

Khalistani gang leader “Guru” stirring violence in Canada against Hindus

Hindus in Toronto have been organizing peaceful rallies in support of India-Canada relations over a great gesture by Prime Minister Narendra Modi of donating COVID vaccines to Canada which have been met with Khalistani elements causing disruptions and taking out counter rallies.

A Nandi that’s facing the wall

The original temple of Kashi was demolished by Aurangzeb and there was no Kashi Vishwanath temple for more than 100 years. Later in 1775, Ahalyabai Holkar built a new structure adjacent to Gyanvapi Mosque which we now worship as Kashi Vishwanath Temple.

गुप्त काल को स्वर्ण युग क्यों कहा जाता है

एक सफल शासन की नींव समुद्रगप्त ने अपने शासनकाल में ही रख दी थी इसीलिए गुप्त सम्राटों का शासन अत्यधिक सफल रहा। साम्राज्य की दृढ़ता शांति और नागरिकों की उन्नति इसके प्रमाण थे।

Darjeeling – Gorkhaland an untold story & an unfulfilled dreams of many

Leaving this piece of strategic land mass of Siliguri Corridor so called ‘Chicken Neck’ in the hands of Commie and TMC gang would be a very dangerous for sovereignty of this Great Country.