Thursday, August 13, 2020
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वैश्विक नेता के रूप में मोदी का बढ़ता कद

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असली नेता की पहचान संकट के समय में ही होती है. सच्चा नेता वही होता है जो संकट की घड़ी में जनता के साथ खड़ा रहे एवं आगे बढ़कर नेतृत्व करे. विश्व में समय-समय पर कई ऐसे नेता हुए पर भारत में ऐसे नेताओं की कमी रही जिन्होंने जनमानस को जोड़कर शासन चलाया हो. लेकिन आज अगर ये कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी की वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी एक ऐसे नेता के रूप में उभरे हैं जिनकी स्वीकारोक्ति न केवल भारत में बल्कि पुरे विश्व में कोरोना महामारी के संकट के समय में हुई है. जब पूरा विश्व एक अदृश्य दुश्मन का सामना कर रहा है एवं कई विकसित देश भी आज असहाय नजर आ रहे हैं तो इस कठिन घडी में नरेन्द्र मोदी भारत के जनता के बीच में एक ‘राजनेता’ के रुप मे नेतृत्व करते हुए प्रतीत हो रहे हैं. उनकी इस नेतृत्व क्षमता के कारण ही वह आज एक वैश्विक नेता के रूप में भी स्थापित हो चुके हैं. भारतीय जन में विश्वास एवं स्वीकारोक्ति इस कदर है की प्रधानमंत्री के किसी भी अपील को जनता एक आन्दोलन का रूप दे देती है जो की भारत के इतिहास में विरले ही देखने को मिलते हैं. इतिहास पर नज़र डालने पर दो ऐसी घटनाएँ याद आती हैं, एक तो तब जब 1920 के समय काल में महात्मा गाँधी राष्ट्रीय आन्दोलन को आम जन का आन्दोलन बना दिया था वहीँ 1975 में आपातकाल के दौरान जय प्रकाश नारायण का सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन जिसमे जनता ने नेतृत्व पर भरोसा करते हुए उसे सफल बनाने के लिए जी जान से लग गयी थी.

प्राचीन काल में भारत को विश्वगुरु का दर्जा हासिल था जो पूरी दुनिया को सत्य एवं शांति का पाठ पढाया करता था. लेकिन मध्यकाल में मुस्लिम आतातायियो के आक्रमण के बाद देश लगभग 1000 साल तक गुलाम रहा जिससे भारतवर्ष की स्थिति काफी ख़राब हो गयी. बाद के कालों में जब देश को स्वतंत्रता प्राप्त हुई उसके बाद भी कॉंग्रेस शासन के दौरान प्राचीन गौरवशाली परंपरा को पुनर्स्थापित करने की कोई खास कोशिश नहीं की गई. 2014 में जब देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बने तो वे लगातार भारत को विश्व पटल पर उसका वाजिब हक़ दिलाने के लिए प्रयास करने लगे. जिसका प्रतिफल भी देखने को मिला एवं जल्द ही विश्व के सभी अग्रणी देश भारत को एक वैश्विक शक्ति के रूप में देखने लगे. भारत की पहचान एक ऐसी उभरती शक्ति के रूप में होने लगी जो किसी भी देश को प्रतियोगी के रूप में नहीं, बल्कि एक सहभागी के रूप में देखता है.

वर्तमान में कोरोना महामारी की समस्या ने एक बार फिर से भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को एक वैश्विक नेता के रूप में अपने आपको साबित करने का अवसर दिया. जब कोरोना की विपदा बहुत शुरूआती चरण में थी उसी समय से नरेन्द्र मोदी ने विश्व के सामने इससे लड़ने के लिए परस्पर सहयोग एवं रणनीति बनाने को कह रहे थे. इसी चरण में 13 मार्च को उन्होंने अपने ‘पडोसी प्रथम’ नीति के तहत सार्क देशों (दक्षिण एशियाई देशों का समूह) को एक साथ आने का प्रस्ताव रखा. यह एक दूरदर्शिता वाला प्रस्ताव था क्यूंकि अभी तक विश्व के किसी भी देश के द्वारा इस महामारी से निपटने के लिए क्षेत्रीय या अन्तराष्ट्रीय स्तर पर किसी तरह की सहयोग की बात नही की जा रही थी. 15 मार्च को सार्क देशों के नेताओं ने प्रधानमंत्री मोदी के प्रस्ताव पर विडिओ कांफ्रेंसिंग से बातचीत की. बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने सार्क देशों को सहयोगात्मक तरीके से इस महामारी से निपटने का आह्वाहन किया. भारत ने एक ‘सार्क कोविड-19 आकस्मिक कोष’ भी बनाने का प्रस्ताव दिया जिसमे अपने तरफ से भारत ने शुरुआती तौर पर 10 मिलियन डॉलर सहयोग करने की बात की. 2014 के बाद से सार्क शिखर सम्मलेन नहीं होने के वावजूद प्रधानमंत्री मोदी के इस प्रस्ताव पर सभी देशों ने बैठक में भाग लिया जिसमे पाकिस्तान भी शामिल था.

पाकिस्तान के इस मौके पर कश्मीर राग अलापने के डर होने के वावजूद मोदी ने दक्षिण एशिया के आठों देश को साथ लाने का प्रयास किया जिससे की यह क्षेत्र इस महामारी के समय में बेहतर तरीके से सामना कर सके. प्रधानमंत्री ने साथ ही डॉक्टर्स एवं विशेषज्ञों की एक ‘त्वरित रेस्पोंस टीम’ गठन करने पर भी जोर दिया. परिणामस्वरुप दक्षिण एशिया का यह क्षेत्र कोरोना महामारी से अभी तक अच्छे तरीके से सामना कर पा रहा है. पश्चिमी देशों के मुकाबले जहाँ सारे संसाधन एवं जनसँख्या घनत्व कम होने के वावजूद सार्क देशों में अभी तक काफी कम संख्या में लोग संक्रमित हुए हैं. 17 मार्च को मोदी ने सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, जो की वर्तमान में जी-20 के अध्यक्ष भी हैं, के साथ बातचीत के दौरान जी-20 देशों की बैठक बुलाने का प्रस्ताव दिया. जी-20 विश्व के 20 आर्थिक रूप से सबसे बड़े देशों का समूह है जो विश्व के 86 प्रतिशत जीडीपी का प्रतिनिधित्व करती है. प्रधानमंत्री मोदी ने पहली बार आयोजित जी-20 की इस वर्चुअल सम्मलेन में वैश्वीकरण को आर्थिक गतिविधियों के साथ-साथ मानवीय दृष्टिकोण अपनाने पर भी जोर दिया.

अमेरिका सहित सभी विकसित देशों के इस समूह में प्रधानमंत्री ने डब्लूएचओ जैसी अन्तराष्ट्रीय संगठनों को मजबूत करने पर बल दिया. इसके साथ ही मोदी ने ब्रिक्स देशो के नेताओं सहित कम से कम तीन दर्जन राष्ट्रध्यक्षों के साथ संपर्क किया. विश्व को एकजुट करने के पहल के कारण ही कई न्यूज़ एजिंसियों के अनुसार अन्तराष्ट्रीय स्तर पर डोनाल्ड ट्रंप, बोरिस जॉन्सन, स्कॉट मॉरिसन जैसे नेता कोविड-19 महामारी से निपटने एवं देशों में सहयोग बनाने हेतु ‘अन्तराष्ट्रीय टास्क फ़ोर्स’ गठित करने का प्रस्ताव रखा जिसका नेतृत्व नरेन्द्र मोदी को करने का आह्वाहन किया.

जब पूरा अन्तराष्ट्रीय समुदाय कोरोना की भयावहता के आगे विवश नज़र आ रहा है तो ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी के इस पहल से एक उम्मीद बंधती है. यह तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब इस महामारी से निपटने में विश्व के सभी देश अपनी-अपनी सीमाओं के बाहर के बारे में नहीं सोच रहे. ऐसे में इस विकट परिस्थिति में भी मोदी का विश्व को मार्गदर्शन करना उन्हें एक ऊँचे कद का नेता बना देता है. इसी क्रम में भारत विदेशों में रह रहे अपने नागरिकों का भी पूरा ख्याल रखते हुए उन्हें अपने वतन लाने में कोई कसर नही छोड़ा.

 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक अभिभावक की भूमिका निभाते हुए अपने एक-एक नागरिक की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए अधिकतम लोगों को यहाँ लाने में सफल हुए. सबसे पहले चीन के वुहान शहर से जो कोरोना से बुरी तरह प्रभावित था वहां से फंसे भारतीओं के अलावे दुसरे देशों के नागरिकों को भी भारत वहां से निकालने में सफल हुआ. इसके साथ ही मलेशिया, फिलिपींस, इटली, स्पेन आदि देशों में भी रह रहे भारतीय जो संकट के समय में अपने देश लौटना चाहते थे उन्हें यहाँ सकुशल लाया. भारत ने अभी तक कुल 28000 लोगो को विभिन्न देशों से ला चुका है. अन्य देशों के नागरिकों को भी यहाँ से उनके देश जाने का समुचित प्रबंध सरकार के द्वारा किया गया.

विश्व के सबसे बड़े लोकंत्रत के जिम्मेवार नेता के रूप में नरेन्द्र मोदी ने भारत के “वसुधैव कुटुम्बकम” नीति को चरितार्थ करते हुए अनेक देशों को सहायता पहुंचाई है. सबसे पहले चीन जो सबसे अधिक इस महामारी से प्रभावित था उसे 15 टन चिकित्सा सामग्री उपलब्ध कराया. कोरोना महामारी का अब तक कोई अचूक दवा नहीं बन पाने के कारण विश्व के सारे देश परेशानियों से गुजर रहे थे ऐसे में भारत सभी देशों के लिए संजीविनी बनकर सहायता उपलब्ध कराया. जैसा की ब्राज़ील के राष्ट्रपति ने मलेरिया के लिए उपयोग में होने वाले ‘हाइड्रोक्सी क्लोरोक्विन’ दवाई पहुँचने पर प्रधानमंत्री मोदी और भारत को धन्यवाद देते हुए कहा था. इस दवाई को कोरोना वायरस के उपचार के लिए संभावित विकल्प के रूप में देखा जा रहा है. विश्व के कई देशो के द्वारा इस दवाई को देने का आग्रह प्राप्त होने पर इससे संबधित निर्यात की चिंताओं को दूर करते हुए नरेन्द्र मोदी सरकार ने देश के लिए पर्याप्त बफर स्टाक बनाये रखते हुए अतिरिक्त दवा के निर्यात का निर्णय लिया.

अमेरिका सहित कई देशों ने भारत के इस निर्णय का स्वागत करते हुए प्रधानमंत्री मोदी की विशेष तारीफ की. फ़िलहाल भारत ने 13 देशों में इसकी आपूर्ति करने का फैसला किया है. इसमें अमेरिका, स्पेन, ब्राज़ील और जर्मनी के साथ-साथ हमारे पडोसी अफगानिस्तान, भूटान, नेपाल, बांग्लादेश, मालदीव भी शामिल हैं जिन्हें प्राथमिकता के आधार पर उक्त दवा के अतिरिक्त पारासीटामोल की भी आपूर्ति कि गयी. विदेश मंत्रालय के अनुसार अब तक 55 से अधिक देशों ने इन दवाइओं की मांग की है. भारत संकट के इस समय में विश्व समुदाय को अधिकतम सहायता उपलब्ध करने की हरसंभव कोशश कर रहा है जिससे देश की अन्तराष्ट्रीय छवि और निखरी है.  

 

इतनी निराशापूर्ण स्थिति में नरेन्द्र मोदी ने अपने नेतृत्व क्षमता से दिखाया है की एक मजबूत, निर्णायक, संवेदनशील एवं दूरदर्शक नेता कठिन परिस्थितियों में भी आशा एवं विश्वास के साथ कैसे डट कर सामना करते हुए एक उदहारण पेश करता है. कोरोना वायरस से उपजी महामारी के परिणामस्वरूप जब दुनिया के देश आत्मकेंद्रित एवं संकीर्ण राष्ट्रवाद के तरफ बढ़ते जा रहे हैं तो ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी ने विश्व को एक नयी आशा दिखाई है. घरेलु स्तर पर भी प्रधानमंत्री ने अभी तक इस महामारी के खिलाफ पूरी मजबूती से लड़ाई लड़ी है. जहाँ विश्व के अन्य विकसित देश अपने यहाँ लॉकडाउन 5000 संक्रमितों की संख्या पहुँचने पर किया तो वहीँ प्रधानमंत्री ने भारत में जब संक्रमितों की संख्या 500 ही हुए तभी लॉकडाउन करने का कठिन निर्णय ले लिया. इसका उचित परिणाम भी नजर आया. जब पूरा विश्व महामारी से निपटने में अक्षम नजर आ रहा है तो भारत फिर भी तुलनात्मक दृष्टि से बेहतर स्थिति में है. अमेरिका में जहाँ 10 लाख लोग संक्रमित हो चुके हैं वहीँ 60 हजार से अधिक लोगो की जान जा चुकी है, इसी तरह इटली, फ़्रांस, ब्रिटेन, स्पेन जैसे देशों में भी मौत का आकड़ा 25 हजार पार कर चूका है. तो वहीँ भारत विश्व के दुसरे सबसे बड़े देश एवं मेडिकल सुविधाओं में तुलनात्मक दृष्टिकोण से पीछे होने के वावजूद अभी तक यहाँ 32000 लोग ही संक्रमित हुए हैं तो वहीँ लगभग 1000 लोगो की जान गयी है.

हालाँकि प्रधानमंत्री ने हरेक व्यक्ति की जान को महत्वपूर्ण समझा है फिर भी कोई अचूक इलाज विकसित नहीं होने के कारण इसे भारत का सही दिशा में बढ़ना ही कहा जायेगा. अभी तक सरकार के द्वारा जो भी निर्णय लिए गए हैं उसका पालन जनता ने पुरे मनोयोग से किया है जो की सरकार के प्रति विश्वास को दिखाता है. शुरुआत में चाहे सांकेतिक जनता कर्फ्यू की अपील हो या कोरोना वारियर्स के हौसला बढ़ाने के लिए ताली थाली बजाने की या फिर दीप प्रज्वलित कर जनता जागरण करने की बात हो चाहे पीएम केयर कोष में दान देने की अपील हो. भारत की जनता हर मौके पर अपने प्रधानमंत्री में अटूट विश्वास जताया है. इस बात की पुष्टिकरण इस बात से भी होती है की हाल ही में आईएएनस-सी वोटर कोविड-19 सर्वे की रिपोर्ट के मुताबित प्रधानमंत्री मोदी पर लोगों का भरोसा बढ़कर 93.5 प्रतिशत हो गया है जो की लॉकडाउन के शुरुआत में 76.8 था. अन्तराष्ट्रीय एजेंसियां भी विभिन्न सर्वे के द्वारा भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को विश्व के अग्रणी नेताओं में सबसे आगे बता रहा है.

हाल ही में अमेरका की मोर्निंग कंसल्ट अप्रूवल रेटिंग के अनुसार अभी भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विश्व में सबसे अधिक लोकप्रिय नेता हैं. मोदी की यह लोकप्रियता जनवरी के 62 अंकों के मुकाबले 14 अप्रैल तक 68 अंक तक पहुँच गया है. अन्तराष्ट्रीय संगठन हो या अन्तराष्ट्रीय नेता, सभी मान रहे हैं की भारत कोरोना महामारी से बेहतरीन तरीके से लड़ रहा है. डब्लूएचओ ने जहाँ महामारी से अच्छे तरीके से सामना करने  के लिए भारत की प्रशंसा की तो वहीँ इस कठिन घडी में समाज के कमजोर वर्गों के लिए भी संवेदनशील होने के लिए भी तारीफ की. गरीब, प्रवासी एवं कमजोर वर्गों के लिए मोदी सरकार ने लॉकडाउन के तुरंत बाद ही 1.70 लाख करोड़ रू सहायता की घोषणा की थी. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मोदी की तारीफों के पुल बांधते हुए उन्हें अपना सबसे अच्छा दोस्त करार दिया और कहा की हम यह मदद कभी नहीं भूलेंगे तो वहीँ बिल गेट्स ने मोदी की नेतृत्व क्षमता की तारीफ करते हुए कहा की राष्ट्रीय तालाबंदी, टेस्टिंग पर अधिक ध्यान देना और डिजिटल नवाचार ने भारत को इस आपदा से लड़ने में काफी आगे रखा है. गेट्स ने प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा लांच किया गया आरोग्य सेतु एप की भी प्रशंसा की जो पहले 13 दिन में ही विश्व के सबसे तेजी से अधिक संख्या में डाउनलोड होने वाला एप बन गया.

भारत के 50 मिलियन उपभोक्ता इसे डाउनलोड कर चुके थे. आईएमफ ने भी भारतीय नेतृत्व को सराहा और कहा की आर्थिक नुकसान के अंदेशा के वावजूद बहुत जल्द तालाबंदी का निर्णय वास्तव में सराहनीय है जिसे संगठन समर्थन करता है. वैश्विक स्तर पर अर्थव्यवस्था के मंदी की भविष्यवाणी के वावजूद आईएमफ ने अगले साल भारत में 7.4 प्रतिशत की वृद्धि दर का अनुमान लगाया है. विश्व बैंक भी भारत को कोरोना महामारी के केंद्र ना बनने देने के लिए सराहना की एवं 1 बिलियन डॉलर की सहायता राशी की घोषणा की. तो वहीँ संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एन्तेनियो गुतरेस ने विश्व समुदाय को कोरोना से लड़ने के लिए दवाई उपलब्ध कराने के लिए भारत की प्रशंसा की.

इस संकट काल में जब जी-2 यानि विश्व के दो ‘शक्तिशाली देश’ अमेरिका और चीन जो अपने आपको स्वयंभू मानता है, पर से लोगो का विश्वास उठता जा रहा है. एक तरफ जहाँ चीनी नेतृत्व पर दुनिया से सच्चाई छुपाने के आरोप लग रहे हैं जिसके चलते वायरस दुसरे देशों में पहुंचा तो वहीँ दूसरी तरफ अमेरिका पर महामारी से निपटने में लापरवाही बरतने का आरोप लगाया जा रहा है, वे महामारी की चेतावनी को मीडिया का उन्माद बता रहे थे. तो ऐसे में भारत के वर्तमान नेतृत्व के पास क्षमता है की वह इस शुन्यता को भर सके. विश्व भर की नजरें कोरोना महामारी के बाद की स्थिति पर टिकी है और भारत से लोगो को बहुत उम्मीदें हैं. मोदी ने अपने आपको एक ऐसे नेता के रुप मे प्रतिस्थापित किया है जो घरेलु जरूरतों और वैश्विक जिम्मेदारी को एक साथ निभा रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने सभी देशों की दवाइयों की मांग को उसी तरह पूरा किया है जैसे धन्वन्तरी ने सभी देवताओं को अमृत प्रदान किया था.

भारत का दुसरे देशों को सहायता देना, दवाइयां उपलब्ध कराना ‘सॉफ्ट पावर’ के रूप में इसे एक मजबूत देश बनाता है. तभी तो स्विट्ज़रलैंड ने अपने आल्प्स पर्वत पर तिरंगा लहराकर भारत के साथ इस महामारी के बीच ‘आशा एवं शक्ति’ का सन्देश देते हुए हर समर्थन देने की बात कही. “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयः” जैसे मंत्र भारत की संस्कृति में हमेशा से रही है और उसी संस्कार को प्रधानमंत्री मोदी इस कठिन घड़ी में भी विश्व समुदाय को मदद करते हुए दर्शा रहे हैं. कोरोना संकट के बाद के परिदृश्य में भारत की भूमिका बहुत निर्णायक होगी. चुनौती हमेशा ही अपार संभावनाएं भी लेकर आती है और ऐसे में नरेन्द्र मोदी के सामने अवसर है की भारत को विश्व के अग्रणी देशों में सबसे आगे लाकर खड़ा कर दे.

लेखक: बिनीत लाल, नालन्दा कॉलेज, नालन्दा में प्राध्यापक हैं एवं जेएनयू से पीएचडी किया है.

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