Tuesday, September 22, 2020
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एकतरफा धर्मनिरपेक्षता (सेकुलरिज्म) की मृग मरीचिका

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Om Dwivedihttp://raagbharat.com
Founder and writer at raagbharat.com Part time poet and photographer.
 

संवैधानिक इतिहास के झरोखे से….

साल 1976 भारतीय इतिहास का एक ऐसा हिस्सा है जब भारतीय संविधान में कई परिवर्तन किए गए। इस दौरान संविधान में होने वाले संशोधन प्रवृत्ति में आधारभूत और संविधान की आत्मा से जुड़े थे। वर्ष 1976 में संविधान में 40वां, 41वां और 42वां संशोधन किया गया। इनमे से 42वें संशोधन को मिनी कांस्टीट्यूशन की संज्ञा दी गई क्योंकि इसने संविधान के मूलभूत तत्वों को बदल दिया था। वास्तव में 1976 में संविधान में किया गया 42वां संशोधन, 1975 में इंदिरा गांधी के द्वारा लगाए गए आपातकाल की कोख से जन्मा था। 24 जून 1975 को उच्चतम न्यायालय के द्वारा इंदिरा गांधी के निर्वाचन के विरोध में दिए गए फैसले ने इंदिरा गांधी और कांग्रेस के अहंकार को चोट पहुंचाई। ये चोट इतनी गहरी थी कि उसके अगले ही दिन 25 मार्च 1975 को आधी रात के पहले पूरे देश में आपातकाल लगा दिया गया।

42वां संविधान संशोधन…..

आपातकाल लगाने के बाद कांग्रेस ने असीमित शक्तियों का उपयोग करते हुए संविधान में कई संशोधन कर डाले। ये संशोधन नौवीं अनुसूची, नागरिकों के मूल कर्त्तव्य, न्यायिक स्वतंत्रता एवं समीक्षा शक्तियों की कटौती, भारत में राष्ट्रीय आपदा की घोषणा और राष्ट्रपति शासन लगाए जाने जैसे विषयों से सम्बंधित थे। इसके आलावा एक और महत्वपूर्ण संशोधन किया गया जब संविधान की प्रस्तावना में तीन नए शब्द जोड़े गए, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और अखण्डता। यही वह समय था जब धर्मनिरपेक्षता का प्रेत शक्तियों के अनन्य प्रयोग की प्रवृत्ति से जन्मा। धर्मनिरपेक्षता का यह प्रेत आज भी मायावी रूप धरकर भारतवर्ष में हमारे सामने मुँह फैलाए खड़ा हुआ है। धर्मनिरपेक्षता की यह मृग मरीचिका दिखने में तो कल्याणकारी दिखती है लेकिन व्यवहारिक रूप में इसने भारतवर्ष का नुकसान ही किया है। संविधान की यह प्रक्षिप्त अवधारणा पूरी तरह से बहुसंख्यक विरोधी साबित हुई जिसने हिंदुओं के जीवन में सबसे ज्यादा प्रभाव डाला। 

शब्दों में धर्मनिरपेक्षता….

भारतवर्ष जैसे राष्ट्र में जहाँ संविधान में धर्मनिरपेक्षता वर्णित है, वहां इसकी उचित परिभाषा जानना आवश्यक है। धर्मनिरपेक्षता की पश्चिमी अवधारणा की तुलना में भारत में यह सैद्धांतिक रूप से अधिक वृहद एवं समावेशी है। भारतवर्ष के समाज में हिन्दू धर्म के अतिरिक्त अन्य मजहबों और पंथों का भी अस्तित्व है ऐसे में भारतीय संविधान इन सब को समान रूप से आदर प्रदान करता है। भारतीय धर्मनिरपेक्षता का उद्देश्य भारत के समाज में आपसी धार्मिक सामंजस्य की स्थापना करना है। संविधान का अनुच्छेद 15 धर्म के आधार पर भेदभाव को रोकता है। भारतीय संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता, संविधान में प्रदत्त धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार से पूर्ण होती है, जो अनुच्छेद 25 से अनुच्छेद 28 तक वर्णित हैं। 

 

वास्तविक धर्मनिरपेक्षता….

यदि शब्दों पर जाएं तो संविधान की यह धर्मनिरपेक्षता भारत के लिए सकल रूप से कल्याणकारी ही दिखाई देती है लेकिन वास्तविकता कुछ और है। व्यवहारिक धर्मनिरपेक्षता जिसे सेकुलरिज्म कहा जाता है, वह अल्पसंख्यकों की तुलना में, बहुसंख्यकों के अधिकारों को सीमित करने का राज्य का तंत्र है। यहाँ राज्य एक संवैधानिक शब्द है जिसके अर्थ में केंद्र एवं राज्य सरकार, स्थानीय निकाय, संवैधानिक और गैर संवैधानिक प्राधिकरण आदि सम्मिलित हैं। जैसे ध्वनि तरंगों के संचरण के लिए एक माध्यम की आवश्यकता होती है, वैसे ही भारत में तुष्टिकरण के लिए भी एक माध्यम की आवश्यकता हुई। धर्मनिरपेक्षता को उसी माध्यम के रूप में चुना गया। धर्मनिरपेक्षता तो ऐसा टेलीविज़न है जहाँ से तुष्टिकरण का एकतरफा प्रसारण होता है। धर्मनिरपेक्षता एक ऐसा लाली पॉप है जिसके द्वारा वोट बैंक की गारंटी प्राप्त होती है। भारत में इसका उपयोग बहुसंख्यकों की असीमित शक्ति के नियंत्रण के लिए किया जाता रहा है। लेकिन कौन से बहुसंख्यक? हिन्दू! हिन्दू तो इस सम्पूर्ण विश्व की सर्वाधिक सहिष्णु जाति है, भला इनकी कौन सी असीमित शक्ति और इनसे किसे खतरा हो सकता है?

भारतवर्ष में धर्मनिरपेक्षता….

 

धर्मनिरपेक्षता का दुरुपयोग भारतवर्ष में अनंत सीमा तक हुआ। सबसे चिंताजनक रहा सरकारों द्वारा अपनी तुष्टिकरण की राजनीति को सफल बनाने के लिए धर्मनिरपेक्षता का उपयोग। चाहे वो 1966 में गौ रक्षा कानून की मांग कर रहे साधुओं की हत्या हो, 1989 के दौरान कश्मीरी हिंदुओं का नरसंहार हो, 1990 में रामभक्तों तथा कारसेवकों पर गोलीबारी हो, कर्नल पुरोहित तथा साध्वी प्रज्ञा जैसे लोगों के साथ हिन्दू आतंकवाद की काल्पनिक अवधारणा के तहत की गई भीषण प्रताडना हो, धर्मनिरपेक्षता एवं तुष्टिकरण की आड़ में हिंदुओं पर लगातार हमले होते रहे। हालाँकि ये बहुत थोड़े उदाहरण हैं। हिन्दू अगणित बार धर्मनिरपेक्षता की भेंट चढ़े। आज भी भारतवर्ष के भीतर हिन्दू मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण है। कई राज्यों के अलग अलग कानूनों के अनुसार ये राज्य अपनी सीमाओं में स्थित हिन्दू मंदिरों एवं संस्थाओं के संसाधनों का उपयोग कर सकते हैं लेकिन मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारे इस प्रकार की अनिवार्यता से स्वतंत्र हैं।

इसके अलावा शैक्षणिक संस्थाओं के मामले में भी बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों में बड़ा अंतर है। हिन्दू संगठनों द्वारा चलाए जाने वाले शिक्षण संस्थानों को सरकार द्वारा किसी भी प्रकार की सहायता नहीं मिलती। आरएसएस वनवासी क्षेत्रों में अपने बलबूते निः शुल्क शिक्षा एवं भोजन आदि की व्यवस्था करता है। इसी भारतवर्ष में ऐसा भी समय था जब हज यात्रा के लिए सब्सिडी दी जाती थी और अमरनाथ तथा वैष्णो देवी यात्रा पर किसी प्रकार की सहायता का अस्तित्व ही नहीं था। अब सोचिए कि एक निर्धन हिन्दू तीर्थ यात्री की इसमें क्या गलती है कि वह एक हिन्दू के रूप में जन्मा है और क्या उसे सरकार से सहायता प्राप्त करने का कोई अधिकार नहीं है? हालांकि भाजपा इस प्रकार की तुष्टिकरण की राजनीति नहीं करती और धीरे धीरे ही सही लेकिन धर्मनिरपेक्षता की इस असमानता को दूर करने का प्रयास कर रही है।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य एवं प्रतिक्रियाएँ….

2014 में केंद्र और कई अन्य राज्यों में भाजपा की सरकार बनने के बाद स्थिति में परिवर्तन आया। भाजपा की हिंदूवादी छवि के कारण भारतवर्ष के बहुसंख्यकों को आशा की किरण दिखाई दी कि अब उनके साथ होने वाले अन्याय में कमी आएगी। भाजपा ने इसके लिए कार्य भी किया लेकिन हिन्दू विरोधी राजनैतिक दलों और मीडिया केंद्रों ने भाजपा के आने के बाद दोगुने वेग से धर्मनिरपेक्षता और तुष्टीकरण का उपयोग करते हुए अपना एजेंडा चलाया।

उदाहरण के लिए दिल्ली में CAA के विरोध में जो दंगे हुए वो CAA के विरोध में न होकर हिन्दू विरोधी थे लेकिन इन पूरे दंगों को अन्य राजनैतिक दलों और भारतीय मीडिया सहित अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने भी मुस्लिमों के विरोध में हुए राज्य समर्थित नरसंहार का नाम दे दिया गया। जबकि सत्य यही है कि इन दंगों में हिंदुओं को मात्र हिन्दू होने के लिए मारा गया। जब पूरा मेनस्ट्रीम मीडिया इन हिन्दू विरोधी दंगों को CAA का विरोध बताकर अपना भारत विरोधी एजेंडा चलने पर तुला हुआ था तब कुछ मुट्ठी भर ऐसी मीडिया संस्थाएं थीं जो सत्य के साथ खड़ी थीं। ऑपइंडिया जैसे मीडिया मंचों ने नगण्य संसाधन होने के बाद भी दिल्ली दंगों की वास्तविक रिपोर्टिंग की। ऑपइंडिया के रिपोर्टर अपनी जान का खतरा मोल लेकर उन जगहों पर जमीनी सच जानने गए जहाँ हिंदुओं के खिलाफ भयंकर हालात थे। जहाँ जान की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं थी। कोई ये नहीं जानता था कि कब एक पेट्रोल बम आकर पूरे शरीर की संरचना बदल दे। लेकिन ऑपइंडिया को भी मुस्लिम विरोधी होने का आरोप झेलना पड़ा।     

दूसरा उदाहरण वर्तमान Covid19 संकट के समय देखा जा सकता है। असल में कई ऐसे वीडियो सामने आए जहाँ मुसलमान फलों और सब्जियों पर थूकते हुए देखे जा रहे थे। इसके अलावा अस्पतालों में डाक्टरों और नर्सों के साथ भी जमात के सदस्यों द्वारा ऐसे ही व्यवहार किया गया। फलों और सब्जियों को नाली के पानी से धोने और उन पर थूकने जैसी घटनाओं को देखकर लोगों ने मुस्लिमों से सामान खरीदने से मना कर दिया। ऐसी परिस्थिति में कई राज्यों में इन लोगों पर कार्यवाही हो गई। इनमें अधिकतर हिन्दू ही थे। अब धर्मनिरपेक्षता का अन्याय देखा जा सकता है कि हिंदुओं को अपनी सुरक्षा के लिए जेल तक जाना पड़ा। धर्मनिरपेक्षता की यह सबसे बड़ी विशेषता है कि अपराध भी हिंदुओं के विरुद्ध ही होता है और अपराधी भी हिन्दू ही बनता है। वहीँ दूसरी ओर भारत के टुकड़े करने की इच्छा करने वाले उमर खालिद और शर्जील इमाम जैसे लोगों पर हुई कार्यवाही को मुसलमान के खिलाफ हुई कार्यवाही बता दिया जाता है।

धर्मनिरपेक्षता को बनाए रखने में मीडिया का योगदान भी अभूतपूर्व है। एक मुस्लिम के अपराधी होने पर हैडलाइन में अपराधी का नाम तक नहीं होता जबकि हिन्दू अपराधी का नाम बोल्ड अक्षरों में लिखा जाता है। ख़बरों का चयन भी धर्म देखकर होता है। यदि अपराध किसी मुस्लिम के विरुद्ध हुआ है तो बड़े बड़े बुद्धिजीवी, पत्रकार, लेखक और बॉलीवूडीए अपनी चूड़ियां तोड़ने लगते हैं। भारतवर्ष एक क्षण में मुसलामानों के लिए असुरक्षित हो जाता है लेकिन यदि कोई अपराध हिंदुओं के खिलाफ होता है तो उसे अखबारों और टेलीविज़न का एक छोटा सा हिस्सा भी नसीब नहीं होता।

बात यहीं ख़त्म नहीं होती। ऐसे असंख्य उदाहरण हैं जहाँ हिन्दुओं को मात्र हिन्दू होने का दंश झेलना पड़ा। उस जाति से अधिक सहिष्णु कौन होगा जो अपने ही राष्ट्र में बहुसंख्यक होने के बाद भी शरणार्थियों का जीवन व्यतीत कर रही हो। उन हिन्दुओं से अधिक दुर्भाग्यशाली कौन होगा जिनका अधिकार छीनकर बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्याओं को दे दिया जाए। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के उन हिंदुओं की पीड़ा कौन समझ सकता है जिनके नारकीय जीवन को समाप्त करने के लिए भाजपा सरकार CAA जैसा कानून बनाए लेकिन उनके एकमात्र आश्रय स्थल राष्ट्र में भी उस कानून का हिंसक विरोध प्रारम्भ हो जाए।

दशकों से यही होता आया है। हिन्दू अपने ही राष्ट्र में इस आशा में जी रहे हैं कि एक दिन ऐसा आएगा जब उन्हें बिना लड़े न्याय मिलेगा। हिन्दू उस भविष्य का सपना देख रहे हैं जब वो अपने धर्म का पालन बिना किसी भय के करेंगे। हिन्दू उस दिन की प्रतीक्षा में हैं जब कोई भी सरकार धर्मनिरपेक्षता की आड़ में हिंदुओं के हितों का मर्दन नहीं करेगी। हिन्दू तुष्टिकरण से मुक्त राजनीति देखना चाहते हैं।

लेकिन यह भी एक सत्य है कि भारतवर्ष का लोकतंत्र ही ऐसा है कि यहाँ हिंदुओं को अपने अधिकारों की प्राप्ति के स्वयं युद्ध करना होगा। इसके लिए आवश्यक है हिंदुओं का संगठित होना। हिन्दू एकता ही महान भारतवर्ष के निर्माण का पहला और आखिरी समाधान है।

जय श्री राम।

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