Thursday, November 26, 2020
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ब्रिटिश चुनाव परिणाम का संदेश

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Saurabh Bhaarat
सौरभ भारत

योरोपियन यूनियन से बाहर होने के मुद्दे पर लड़े गए ब्रिटिश संसदीय चुनाव में प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन की बड़ी जीत ने लेफ्ट-लिबरल विचारों और तथाकथित प्रगतिशील विमर्श से प्रेरित मुद्दों की निरर्थकता एक बार फिर सिद्ध की है। यह चुनावी परिणाम साफ संकेत हैं कि बड़े-बड़े मीडिया गिरोहों, बौद्धिक संस्थानों, वामधारा से प्रदूषित अकादमिक मंचों द्वारा फैलाया गया वितण्डा एक चीज है और आम जनता के मूल्य, मानक, सोच और वास्तविकता बिल्कुल दूसरी चीज। जनता से कटे नैरेरिव का बार-बार ध्वस्त होना ऐसी घटनाएं है जो भारत मे नरेन्द्र मोदी, अमेरिका में डॉनल्ड ट्रंप और पूर्वी योरोप के कई देशों में वहाँ की राष्ट्रवादी और दक्षिणपंथी पार्टियों की जीत पर देखने को मिली हैं। परंतु इस बार ब्रिटिश चुनावी परिणाम एक अन्य कारण से भी प्रासंगिक हो उठा है जिसके गहरे भारतीय सन्दर्भ हैं और जिनकी चर्चा यहाँ करना समीचीन होगा।

इस बार कंजरवेटिव पार्टी की प्रचण्ड जीत ने वहाँ रह रहे भारतीय समुदाय को एक मजबूत प्रेशर ग्रुप और एकजुट वोटिंग ब्लॉक के रूप में स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है। 650 सदस्यीय ब्रिटिश संसदीय सीटों में कंजरवेटिव पार्टी को 365 सीटें मिली हैं, वहीं विपक्षी लेबर पार्टी 203 पर सिमट गई है।

वैसे तो यह चुनाव मुख्यतः ब्रेक्जिट के मुद्दे पर प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन द्वारा पुनः जनादेश पाने की एक कवायद थी लेकिन ब्रिटिश हिन्दुओं के लिए यह चुनाव एक अन्य कारण से महत्वपूर्ण हो गया था। भारत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा कश्मीर से अनुच्छेद 370 को विदा करने के बाद से ही ब्रिटेन में जहाँ कंजरवेटिव पार्टी ने इसे भारत का आंतरिक विषय बताते हुए भारत और प्रधानमंत्री मोदी के साथ अपने अच्छे सम्बन्धों को बार-बार दोहराया वहीं दूसरी ओर लेबर पार्टी ने अनावश्यक रूप से अपने पार्टी सम्मेलन में कश्मीर मुद्दे पर प्रस्ताव पारित करते हुए अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की मांग की और भारत सरकार, भारतीय सेना और प्रधानमंत्री मोदी पर भी अनावश्यक और प्रतिकूल टिप्पणियाँ कीं। इस बेवकूफी भरे दुस्साहस का अगुआ रहा लेबर पार्टी का शीर्ष नेता जेरेमी कार्बिन। जेरेमी कॉर्बिन एक वाम झुकाव वाला इस्लामपरस्त लिबरल नेता है जिसकी तुलना आप अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी के बर्नी सैंडर्स जैसे समाजवादी लम्पटों से या भारत के किसी भी छँटे हुए सेकुलरबाज नेता से कर सकते हैं।

लेबर पार्टी के इस दुस्साहस ने भारतीय समुदाय को बुरी तरह चिढ़ाने का काम किया और ब्रिटिश हिन्दुओं ने भी इसे चुनौती के रूप में लिया। वहाँ ‘ओवरसीज फ्रेंड्स ऑफ बीजेपी’ नामक भाजपा समर्थक ब्रिटिश संगठन ने सभी भारतीयों को लेबर पार्टी के विरुद्ध एकजुट करना प्रारम्भ किया। उनका प्रयास रंग लाया और भारतीयों के बीच लेबर पार्टी और उसके नेता खलनायक बन गए। लेबर पार्टी के विरुद्ध इस ध्रुवीकरण को और बढ़ावा तब मिला जब कश्मीरी अलगाववादियों, खालिस्तानियों, जेकेएलएफ जैसे आतंकी संगठनों से जुड़े गुर्गे खुलेआम लेबर पार्टी के पक्ष में अभियान चलाने लगे और हद तो तब हो गई जब सोनिया-राहुल की कांग्रेस पार्टी ने भारत के विरुद्ध विषवमन करने वाली लेबर पार्टी के सम्मेलन के ठीक पश्चात अपना एक प्रतिनिधिमंडल लेबर पार्टी के नेताओं से मिलने के लिए भेज दिया। मानो लेबर पार्टी के भारत-विरोधी रुख पर जेरेमी कॉर्बिन को शाबासी देने के लिए कांग्रेसी व्याकुल हो उठे हों। खुद जेरेमी कॉर्बिन ने भी ट्वीट कर यह जानकारी दी कि कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल से उसने कश्मीर में मानवाधिकारों की स्थिति पर चर्चा की। उक्त प्रतिनिधिमंडल में कांग्रेस से जुड़े कई प्रभावशाली लोग शामिल थे।

इन सभी घटनाओं ने भारतीय समुदाय को एकजुट होकर लेबर पार्टी को चुनाव में धूल चटाने के लिए प्रेरित किया। लेबर पार्टी के लगभग हर प्रत्याशी का भारतीय मूल के लोगों ने बहिष्कार किया। यहाँ तक कि उन लेबर प्रत्याशियों का भी, जो स्वयं भारतीय मूल के थे। कश्मीर पर कंजरवेटिव पार्टी का रुख भारत-समर्थक था अतः भारतीय समुदाय की रणनीतिक वोटिंग के सबसे बड़े लाभार्थी भी प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ही बने।

यद्यपि इस चुनावी परिणाम का सारा श्रेय भारतीयों को देना आत्ममुग्धता होगी क्योंकि इस चुनाव के कुछ बड़े मुद्दे निश्चय ही दीगर थे परन्तु इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि भारत-समर्थन बनाम भारत-विरोध के मुद्दे ने भी इस चुनाव में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रधानमंत्री मोदी की लगातार विदेश यात्राओं और विदेशों में जाकर भारतीयों को एकजुट कर उन्हें सम्बोधित करने के कार्यक्रमों ने विभिन्न देशों में भारतीय समुदाय की एक मजबूत लॉबी तैयार कर दी है जो अब अपना राजनीतिक असर भी दिखा रही है। ब्रिटिश राजनीति में भारत-समर्थक छवि वाले दल की विजय और भारत-विरोधी दल की पराजय ने एक बात मजबूती से स्थापित कर दी है कि अब भारतीय समुदाय की राजनीतिक उपेक्षा करना सम्भव नहीं रह जाएगा, साथ ही किसी भी राजनीतिक दल का भारत के प्रति रुख भी उसकी चुनावी सम्भावनाओं को बनाने या बिगाड़ने का काम करेगा।

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