जम्मू-कश्मीर में एक “कुव्यवस्था” का अंत

भारत के आज़ादी के समय कई लोगो द्वारा ये आशंका व्यक्त की गई की यह एक राष्ट्र के रूप में सफल नहीं होगा और इसका विघटन हो जाएगा। इसके पीछे यह तर्क दिए गए की यहाँ के लोगो की कोई सामान भाषा अथवा संस्कृति नहीं है जो पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में पिरो सके। यह आशंका और प्रबल हुई जब अलग अलग राज्यो में भाषाई आधार पर बटवारे के आंदोलन हुए। लेकिन समय के साथ ये आशंका निर्मूल सिद्ध हुई। परंतु यहाँ एक अपवाद था। जम्मू -कश्मीर भारत संघ के साथ 15 अगस्त 1947 को नहीं जुड़ा था। भारत के साथ इसका जुड़ाव “इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ अक्ससेशन” के माध्यम से हुआ जो की महाराजा हरि सिंह और भारत सरकार के बीच 26 अक्टूबर 1947 में हुआ था। उस समय भारत का संविधान निर्माण प्रक्रिया में था।

संविधान लागू होने के बाद इसी IOA को आर्टिकल 370 के माध्यम से कानूनी रूप दिया गया। अतः यह कहा जा सकता है की जम्मू-कश्मीर का भारत से जुड़ाव “शर्तो” के साथ हुआ था। यह एक ऐतिहासिक चूक थी। पंडित नेहरू का रूख शुरू से ही कश्मीर और महाराजा हरि सिंह को लेकर नरम रहा। उन्होंने ने शेख अब्दुल्लाह के ऊपर विश्वास किया जिसने बाद में उन्हें धोखा दिया। दूसरी चूक उन्होंने कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में ले जा के किया जिसका परिणाम आज भी देश भुगत रहा है।
अब यह प्रश्न उठता है कि घाटी के लोगो में आज भी भारत के प्रति कोई लगाव क्यों नहीं है? इसका कारण घाटी में लगातार अलगाववादियों का सक्रिय होना है। पूर्व की सरकारों द्वारा उन्हें लगातार शह दिया गया, उन्हें राजधानी में वार्तालाप के लिए बुलाया जाता रहा। जबकि उनके द्वारा घाटी में निरंतर भारत के प्रति नफरत के बीज बोये गए। उन्हें विदेशो से अवैध फंडिंग प्राप्त हुई जिस पर पूर्व की सरकारों द्वारा कोई कार्यवाही नहीं हुई, उसी धन का प्रयोग घाटी में पत्थरवाजी और अलगवाद को बढ़ाने में हुआ। वर्तमान मोदी सरकार द्वारा जब NIA के माध्यम से जांच कराई जा रही है तब सच सामने आना शुरू हो रहा है।

दूसरा कारण वहा की नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी जैसी मुख्यधारा की राजनीतिक दले है जिनके नेताओ द्वारा आकंठ भ्रष्टाचार और कुशासन किया गया जिससे की आम कश्मीरी अवाम के जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आया। ये दल अपने आप को कश्मीरी अवाम के प्रतिनिधि के रूप में खुद को अस्थापित करने में विफल रहे जिसका परिणाम आज चुनाओ में अल्प मतदान प्रतिशत के रूप में दिखता है। यह मत प्रतिशत यह बताता है कि वहां की अवाम अब्दुल्लाह- मुफ़्ती में कोई विश्वास नहीं रखती। अतः वतर्मान परिपेक्ष्य में व्यवस्था परिवर्तन बहुत ही आवश्यक था जो मात्र आर्टिकल 370 को हटाने के माध्यम से हो सकता था। केंद्र सरकार के पास इस विषय पे निर्णय लेने के लिए इससे अच्छा वक़्त नहीं हो सकता था। अब चुकि लंबे समय से ये राज्य विकास के हर पैमाने से कोसो दूर था और कश्मीर घाटी और लेह-लद्दाक जहा की संस्कृति और भूगोल एक दूसरे से काफी अलग है, का विभाजन आवश्यक था। इन्हें केंद्र शासित प्रदेश बना के यह सुनिश्चित किया गया की पूर्व में हुए कुशासन की पुनरावृत्ति ना हो। वही घाटी के अलगाववादियों पर एक के बाद एक कार्यवाही ने वहा उनके प्रभुत्व को कमजोर कर दिया है।

आज जम्मू -कश्मीर के पास एक सुनहरा अवसर है की वह इस फैसले को सहर्ष स्वीकार कर के खुद और आने पीढ़ी को एक स्वर्णिम भविष्य दे जिसमे आतंकवाद और अलगवाद का कोई स्थान ना हो ना ही मुफ़्ती-अब्दुल्लाह जैसे स्वार्थी-वंशवादी जैसे लोग हो जो आम कश्मीरी अवाम को सपने बेचते है। उम्मीद है की आज लोक सभा में जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन बिल के पास होने के बाद जब महामहिम इस बिल को अधिनियम बनाएंगे तब यह जम्मू कश्मीर में आशा की एक नयी किरण लेके आएगा।

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