भ्रम से भरे अधूरे विज्ञापन

कहते हैं कि अधूरा ज्ञान बहुत ख़तरनाक होता है। लेकिन अगर विज्ञापन भी इसी तरह अधूरे दिखाए जाएँ तो क्या वो भी ख़तरनाक हो सकते हैं? हाल ही में क्लोज़-अप टूथपेस्ट का यह विज्ञापन आया, जिसमें एक लड़की के अनुसार उसके घरवालों की वजह से वो एक मुस्लिम लड़के से शादी नहीं हो पायी थी। लड़की का चेहरा, चेहरे पर भाव और यहाँ तक की बड़ी अँगूठी भी बिग बॉस २०१८ की विजेता से काफ़ी हद तक मिलते हैं। और तो और विज्ञापन बनाए जाने का समय भी जनवरी ही है, जब दीपिका ने बिग बॉस को जीता था। विज्ञापन बहुत की ख़ूबसूरती से बनाया गया, पर अधूरा बनाया गया है। विज्ञापन के अंत में यह तो दिखाया गया है कि हिंदू लड़की फिर से उस मुस्लिम दोस्त से मिल जाती है पर फिर क्या होता है?

क्या बिग बॉस वाली दीपिका के जैसे वो भी धर्म परिवर्तन करके मुस्लिम बन जाती है ताकि वो उसके पति की मुस्लिम परिवार में अपनायी जाने के लायक़ हो जाए? क्या वो भी अपना नाम बदल लेगी जैसे की उसके जैसी दिखने वाली टीवी कलाकार दीपिका ने भी किया? क्या यह सब करने के बाद वो पहले जैसी ही रहेगी या उसके ख़ुद के माता-पिता अब उसके लिए घृणा के पात्र समझे जाने वाले काफ़िर हो जाएँगे? काश! अगर यह विज्ञापन पूरा दिखाया गया होता तो शायद जागृत हिंदुओं को इतना विरोध करने करने की ज़रूरत न होती, बल्कि सच दिखाए जाने पर विरोध कहीं और से ही आता और केवल सोशल वेबसाइट्स तक ही सीमित न रहता।

हिंदू समाज पर इस प्रकार के परोक्ष हमले का हिंदू लोग बहुत ही सीमित तरीक़े से तार्किक शब्दों से विरोध करते हैं क्योंकि वो अपनी ज्ञान-आधारित संस्कृति के कारण हिंसा की बजाय तर्क देकर अपनी बुद्धिमत्ता से शत्रु को परास्त करने में विश्वास रखते आये हैं। वो सवाल पूछने वाले को ख़त्म करके अपना उत्तर सही सिद्ध नहीं करते, बल्कि सवाल पूछने वाले को अपने तर्क भरी वाणी से उत्तर देते हैं। जी हाँ! सवाल पूछने वाला ज़िंदा ही रहता है। परंतु हिंदुओं की इस आदत को लोग कायरता समझ बैठते हैं और ऐसे ही अधूरे विज्ञापन फिर से बनाने लगते हैं।

इसी कड़ी में दूसरा विज्ञापन आता है सर्फ़-ऐक्सल साबुन बनाने वाली कम्पनी का होली पर बनाया गया एक विडीओ जिसमें एक ८-९ साल की एक हिंदू लड़की अपनी ही आयु के एक मुस्लिम लड़के को रंग लगने से बचाती है ताकि वो नमाज़ पढ़ने जा सके। विज्ञापन बहुत ही सुंदर व दिल को छू जाने वाला बनाया गया है। एक-एक बात को बारीकी से दिखाया गया है जैसे कि मुस्लिम लड़के का पजामे को ऊपर की और मोड़ना, छत पर खड़े हिंदू बच्चे को दूसरे बच्चे का ग़ुब्बारा फेंकने से रोकना और अंत में लड़की का मस्जिद की सीढ़ी चढ़ रहे मुस्लिम लड़के को कहना कि- वापिस आने पर रंग लगेगा। यह वाक्य एक प्रकार से विज्ञापन की जान है, पर मुस्लिम लड़के रंग लगाया जाना और उसका हिंदुओं के साथ होली खेलना दिखाया नहीं जाता। यही बात इस विज्ञापन को भी अधूरा बना देती है। मान लीजिए विज्ञापन के आख़िर में अगर पूरा दिखाया जाता तो क्या होता? फिर तो शायद कोई और ही इस विज्ञापन का विरोध कर रहा होता और वो विरोध हिदुओं के जैसा शांतिपूर्वक नहीं होता, इसकी तो गारंटी समझिए। यह विज्ञापन न केवल अधूरा था बल्कि समाज को भ्रमित भी करने वाला था। विज्ञापन बनाने वाले बहुत अच्छे ढंग से जानते हैं कि अगर मुस्लिम बच्चे को होली खेलते हुए जाता तो उसकी प्रतिक्रिया किसी और तरफ़ से होती और उनके द्वारा गढ़ा गया भ्रम अपने आप ही टूट जाता।

फ़िलहाल तो यह विज्ञापन केवल अधूरा ही नहीं बल्कि बहुत ख़तरनाक भी है क्योंकि यह बच्चों को लेकर बनाया गया है और इससे वो प्रभावित हो सकते हैं। उनमें यह समझ नहीं होती कि किसी टोपी वाले को रंग लगाने जैसी छोटी से बात पर पूरे गाँव या शहर में साम्प्रदायिक तनाव की ख़बरें होली से अगले दिन हर साल अख़बारों में छपतीं हैं। ऐसे विज्ञापन न ही बने तो देश में ज़्यादा साम्प्रदायिक सौहार्द रहेगा।

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